- योगेश कुमार गोयल
(राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार)

देश के सबसे युवा राज्य तेलंगाना में 7 दिसम्बर को विधानसभा की सभी 119 सीटों के लिए कुल 1761 उम्मीदवार मैदान में हैं। सत्तारूढ़ दल तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) सहित कांग्रेस गठबंधन और भाजपा ने मतदाताओं के हर वर्ग को लुभाने के लिए हर वो पासा फैंकने का भरसक प्रयास किया है, जिससे उनके पक्ष में हवा बह सके। किसी भी पार्टी के लिए इस राज्य में मुस्लिम मतदाताओं का अत्यधिक महत्व है, यही कारण है कि हर दल खासकर मुस्लिम वोटरों को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। कांग्रेस जहां छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में ‘सॉफ्ट हिन्दुत्व’ की रणनीति अपनाती नजर आई, वहीं उसे तेलंगाना में खुलकर मुस्लिम कार्ड खेलना पड़ रहा है। दरअसल तेलंगाना में करीब 13 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, जो यहां की करीब 40 फीसदी सीटों पर उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला करने में अहम भूमिका निभाएंगे और निश्चित रूप में सरकार के गठन में मुस्लिम मतदाताओं भूमिका किंगमेकर की होगी। यही वजह है कि सभी दलों ने मुस्लिम वोटरों पर डोरे डालने के लिए वायदों का पिटारा खोल डाला है।
तेलंगाना में 2014 में लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव हुए थे और तब टीआरएस को 63, कांग्रेस को 21, टीडीपी को 15, एआईएमआईएम को 7, भाजपा को 5, वाईएसआर कांग्रेस को 3, बसपा को 2 तथा अन्य को 3 सीटें मिली थी किन्तु मौजूदा विधानसभा में टीआरएस के 90, कांग्रेस के 13, एआईएमआईएम के 7, भाजपा के 5 और टीडीपी के सिर्फ 3 विधायक हैं। चुनाव के पश्चात् टीआरएस पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई और के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। तेलंगाना आन्दोलन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले केसीआर ने एक दूरदर्शी, साहसिक फैसले लेने वाले चतुर नेता के रूप में अपनी छवि बनाई है। हालांकि उनकी सरकार का कार्यकाल समाप्त होने में करीब 8 माह का समय शेष था किन्तु चंद्रशेखर ने समय से कई माह पहले ही विधानसभा भंग कर समय पूर्व चुनाव कराने का दांव खेला। दरअसल वो नहीं चाहते थे कि लोकसभा चुनाव के साथ ही तेलंगाना विधानसभा के भी चुनाव हों क्योंकि ऐसी स्थिति में मोदी लहर का कुछ असर उन चुनावों में भी पड़ता और विधानसभा चुनाव को लोकसभा चुनाव के मुद्दे भी कुछ हद तक अवश्य प्रभावित करते। केसीआर चाहते थे कि विधानसभा चुनाव पूर्ण रूप से स्थानीय मुद्दों पर ही केन्द्रित रहे।
चंद्रशेखर राव ने अपने करीब सवा चार वर्षों के कार्यकाल में डेढ़ दर्जन से भी अधिक ऐसी योजनाएं चलाई, जो जनता के बीच काफी लोकप्रिय हुई। चंद्रशेखर को भरोसा था कि समय से पहले एकाएक विधानसभा भंग करने से राज्य में बिखरे पड़े विपक्षी दलों को एकजुट होने का अवसर नहीं मिल पाएगा और इसका सीधा लाभ उन्हें मिलेगा। जिस समय उन्होंने विधानसभा भंग की, तब उनकी ख्याति और स्वीकार्यता चरम पर थी किन्तु चुनाव की घोषणा के बाद जिस प्रकार कांग्रेस के नेतृत्व में एन. चंद्रबाबू की टीडीपी, वाम दल, तेलंगाना जन समिति इत्यादि विपक्षी दलों का महागठबंधन अस्तित्व में आया, उससे केसीआर की उम्मीदों को झटका लगा है। फिर भी टीआरएस तेलंगाना राज्य के गठन के लिए उसके आन्दोलनों और संघर्षों की कहानियों तथा चार सालों में किए गए विकास कार्यों व उपलब्धियों को जोर-शोर से प्रचारित कर उनके सहारे अपनी जीत को लेकर आशावान है।
विधानसभा चुनाव में तेलंगाना आन्दोलन, पृथक राज्य के गठन का श्रेय लेने की होड़, विकासशील योजनाओं को गति प्रदान करना, परिवारवाद, राष्ट्रवाद इत्यादि गिने-चुने ही ऐसे मुद्दे हैं, जिनके बल पर सभी दलों ने मैदान में ताल ठोंकी है। टीआरएस भले ही विकास कार्यों और तेलंगाना आन्दोलन में अपनी भूमिका को सबसे मुद्दा बनाकर मैदान में उतरी है किन्तु उसके लिए पार्टी के भीतर उभरे भारी असंतोष से निपटना मुश्किल हो गया है। दूसरी ओर केसीआर पर परिवार के जरिये सरकार चलाने और पूरे परिवार को राजनीति में स्थापित करने के आरोप भारी पड़ सकते हैं। उनके बेटा, बेटी, भतीजे इत्यादि मंत्री व सांसद हैं। इसके अलावा उन पर इन चार सालों में शानो-शौकत पर भारी-भरकम खर्च के आरोप भी लगते रहे हैं। मुख्यमंत्री चंद्रशेखर की सम्पत्ति में पिछले चार वर्षों में साढ़े पांच करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है और इस दौरान उन्होंने 16 एकड़ कृषि भूमि भी खरीदी है। अनेक विकास कार्यों के बावजूद अधिकतर ग्रामीण अंचलों में बेरोजगारी, किसानों को उनकी फसलों के सही दाम न मिलना, कर्ज में डूबे किसानों द्वारा आत्महत्या, सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण के बाद कम मुआवजा दिया जाना इत्यादि ऐसी समस्याएं हैं, जिससे लोगों में कुछ नाराजगी है। अधिकांश लोगों की शिकायत रही है कि आम लोगों का मुख्यमंत्री से मिल पाना बेहद मुश्किल है। इसके बावजूद टीआरएस की स्थिति अन्य दलों के मुकाबले मजबूत है।
मुस्लिम वोट बैंक को सुरक्षित रखने तथा राज्य में गैर भाजपा और गैर कांग्रेस समीकरणों को नई दिशा देने के लिए टीआरएस ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ‘एआईएमआईएम’ के साथ गठजोड़ किया है और चुनाव के पश्चात् भाजपा के साथ उसके गठबंधन का रास्ता भी खुला है। कभी यूपीए सरकार में कांग्रेस की भागीदार रही ‘एआईएमआईएम’ टीआरएस के साथ आने के बाद से कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ जमकर जहर उगल रही है। चंद्रबाबू की तेलुगूदेशम पार्टी की ही भांति ओवैसी की पार्टी ‘एआईएमआईएम’ भी 2014 में आंध्र प्रदेश के विभाजन का पुरजोर विरोध करती रही और तेलंगाना के अस्तित्व में आने के बाद भी उसका तेलंगाना विरोध बरकरार रहा किन्तु अचानक इसी साल सितम्बर माह में ओवैसी द्वारा मुुस्लिम मतदाताओं से हैदराबाद के बाहर के चुनाव क्षेत्रों में टीआरएस को वोट देने की अपील किए जाने से सारे समीकरण बदल गए।
तेलंगाना में भाजपा का कोई विशेष जनाधार नहीं है और यहां मुख्य मुकाबला अब टीआरएस-एआईएमआईएम तथा कांग्रेस की अगुवाई वाले ‘पीपुल्स फ्रंट’ के बीच है। हालांकि भाजपा अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों के बाद अब तेलंगाना में भी पांव पसारने के लिए पूरी कोशिशें कर रही है। पार्टी को अपने प्रदेशाध्यक्ष डा. के. लक्ष्मण से किसी करिश्मे की उम्मीद है, जिनकी राज्य में पार्टी को स्थापित कर नई ऊंचाईयां प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 2016 में उन्हें प्रदेश में पार्टी की बागडोर दी गई थी और तभी से वह टीआरएस के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। डा. लक्ष्मण हाईटैक विशेषज्ञ माने जाते हैं और ट्विटर तथा फेसबुक पर बहुत सक्रिय हैं। पार्टी को उनकी इस विशेषज्ञता का लाभ मिलने की भी उम्मीदें हैं और वह दूसरे सभी दलों के असंतुष्टों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति अपनाते हुए चुनाव में अकेले अपने दम पर मैदान में उतर रही है।
कांग्रेस 94 सीटों पर चुनाव लड़ रही है जबकि 25 सीटें उसने टीडीपी सहित अपने अन्य सहयोगियों के लिए छोड़ी हैं। हालांकि पिछले काफी समय से कांग्रेस तेलंगाना में अपने पैर जमाने की कोशिशों में लगी थी और कुछ विपक्षी दलों के साथ उसका महागठबंधन होने के साथ ही टीआरएस को घेरने की उसकी रणनीति सफल हुई, जिसके बाद उसके हौंसले बुलंद हुए हैं और वह सत्तारूढ़ दल को कड़ी चुनौती दे रही है। कुंदुरू जनारेड्डी राज्य में कांग्रेस की कमान संभाल रहे हैं और उन्हीं के कंधों पर कांग्रेस को सत्ता में लाने की जिम्मेदारी है। जनारेड्डी की राज्य की राजनीति में कितनी मजबूत पकड़ है, यह इसी से समझा जा सकता है कि वे 1983 के बाद से सात बार विधायक चुने जा चुके हैं। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में युवाओं को सरकार बनने के तीन माह के भीतर एक लाख रोजगार, किसानों को दो लाख रुपये तक के कर्ज, वृद्धों को दो-दो हजार रुपये पेंशन, बीपीएल परिवारों को घर बनाने के लिए पांच लाख रुपये, मस्जिदों तथा चर्च को मुफ्त बिजली, इमाम तथा पादरियों को प्रतिमाह वेतन, वक्फ बोर्ड को न्यायिक शक्ति प्रदान करने, उर्दू को राज्य की दूसरी अधिकारिक भाषा का दर्जा देने तथा सभी सरकारी आदेश इसी भाषा में जारी करने जैसे कई वायदे किए हैं।
बहरहाल, समय से पहले चुनाव कराने का मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव का दांव उनकी पार्टी टीआरएस के लिए कितना फायदे का सौदा साबित होगा, यह तो चंद दिनों बाद चुनाव परिणाम से पता चल ही जाएगा लेकिन दूसरी ओर देखा जाए तो उनके बारे में इस तरह की चर्चाएं आम हैं कि भाजपा के प्रति उनका रवैया सहयोगी सरीखा रहा है और भाजपा तेलंगाना में स्वयं अपनी उपस्थिति दर्ज कराने को आतुर है, इसलिए इस राज्य के चुनाव परिणामों पर भी हर किसी की नजरें केन्द्रित रहना स्वाभाविक है।


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