--प्रकाश दर्पे
इस दफ़ा भी हिंदी दिवस पर उत्सव का वही तामझाम था। बढ़चढ़कर भाग लेने वाले वही चेहरे और पुरुस्कार पाने वाले भी वही चिरपरिचित चेहरे । हमेशा की तरह कार्यालय में अंग्रेज़ी टाइपिस्ट हिंदी टाइपिंग में अतिरिक्त उत्साह दिखा रहे थे। हिंदी में ज़्यादा से ज़्यादा काम करने की कठोर हिदायतें प्रधान कार्यालय से आ रही थी । ऑफ़िस में हिंदी टाइपिस्ट की कमी होने की वजह से कई विघ्न आ रहे थे । नवनियुक्त हिंदी अधिकारी मिश्राजी को अब राह आसान सी नज़र आ रही थी । उनके ऑफ़िस में भी प्रतिभाशाली कर्मचारी है , यह उन्हें हाल ही की प्रतियोगिता में मालूम पड़ गया था ।उन्हें इस बात का अभिमान भी था।इसीलिए उन्होंने विजेयताओ की सूची रखते हुए अपने बॉस को कहा , “ सर हमारे ऑफ़िस में हिंदी टाइपिंग में सभी टाइपिस्ट बहुत निपुण हो गए है । अब कार्यालय का सारा कामकाज हिंदी में आसानी से हो सकता है।
बॉस ने अपने अफसराना अन्दाज़ में जवाब दिया , “ हिंदी में जलसा करना अलग बात है । इन्हें टाइपिंग के लिए अलग से भत्ता देना पड़ेगा । बहुत सी व्यावहारिक कठिनाइयाँ भी आती है। जैसा चल रहा है , चलने दो । और पुरस्कार वितरण की तैयारी में जुट जाओ।
बॉस का ग़ैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार देख वे सन्न रह गए । व्यर्थता का एहसास लिए वे अगले कार्यक्रम की व्यवस्था में में जुट गए ।


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