-ओम प्रकाश उनियाल
दुनिया में भांति-भांति के लोग हैं। सबकी विचारधारा अलग-अलग। दयालु भी हैं तो निर्दयी भी। दूसरों की मदद को हाथ बढ़ाने वाले भी हैं तो दूसरे का हक छीनने वाले भी।पापी भी हैं तो पुण्य करने वाले भी। किस के मन-मस्तिक में क्या चल रहा है कोई नहीं बता सकता। अक्सर सुनने में आता है कि लोग हर तरफ से जागरूक हो रहे हैं। या जागरूक किया जा रहा है। अच्छे कार्यों के प्रति बहुत कम जागरूक होते हैं। बुरे कामों के प्रति अधिक जागरूकता रहती है। समाज किस तरफ पलटी खा रहा है कुछ पता नहीं। सामाजिक बुराईयों पर नियंत्रण पाना बमुश्किल हो चुका है। बदलते समाज का परिदृश्य सबके सामने है। ऐसी-ऐसी घटनाएं घट रही हैं जिनकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। एक निर्दयी मां का अपनी कोख से जन्मी नवजात को निर्जन स्थान पर कीचड़ में फेंककर अपना पीछा छुड़ा लेने की घटना वास्तव में दिल चीर देने वाली घटना है। घटना देहरादून की है। पता चलने पर जिसने उसे अस्पताल पहुंचाया उसे फरिश्ता ही कहा जाएगा। कितना फर्क है मन-मन में। मां की महिमा का वर्णन जितना किया जाए कम ही होता है। मां तो ममता की मूर्त होती है। संतान चाहे कैसी भी हो, वैध-अवैध। या फिर किसी प्रकार की मजबूरी। लेकिन निर्दयता की भी हद होती है। वह भी नवजात के प्रति क्या निर्दयता। बस शायद उस नवजात का कसूर इतना ही था कि उसने एक बेटी के रूप में जन्म लिया। भारतीय समाज के मुंह पर ऐसी घटनाओं का घटना करारा तमाचे के समान है। यह तो सच है कि नब्बे प्रतिशत लोग बेटियों के प्रति कुंठित व संकुचित विचार रखते हैं। बेशक उसे अच्छी और उच्च शिक्षा देते हों, बेहतर ढंग से पालन- पोषण करते हों। लेकिन उसे कचोटने व टोकने से बाज नहीं आते। हरदम उसकी स्वतंत्रता पर हावी रहते हैं। हां, बाहरी दिखावे के लिए खीसें जरूर निपोड़ कर यह कहते सुनायी देते हैं बेटी तो घर की लक्ष्मी है। तबका कोई-सा हो बेटी के प्रति सबकी यही भावना देखने को मिलती है। उसको किसी प्रकार की छूट नहीं, बेटा है तो अनाप-शनाप कुछ भी करे सब माफ। कुलदीपक की संज्ञा से उच्चारित करते हैं। बेटी पराए घर की। सोचिए, समाज के ज्ञानी-ध्यानियों भेदभाव की नीति निर्धारित करने वाला कौन होता है। ये सब इसी समाज के भीतर हैं जो इस प्रकार के बीज बोते हैं। अपना वर्चस्व कायम रखने की खातिर। पुरुष-प्रधान समाज जो ठहरा। जो समाज बेटी को हेय दृष्टि से देखता हो, पराया धन समझता हो उस समाज का विरोध करना चाहिए। तभी बेटी शब्द की कद्र होगी। बेटियों के साथ क्या नहीं घट रहा। तब क्यों नहीं आगे आते समाज के ये ठेकेदार। समाज के सामने किसी बेटी के साथ किसी प्रकार की बदसलूकी हो रही हो तब सब मूर्त बन खड़े क्यों रहते हैं। बेटी की अहमियत हमारा समाज आज भी नहीं समझ पा रहा है। तभी तो एक मां निर्दयी बन जाती है, जरा भी नहीं पसीजता उसका दिल। यह पहली घटना नहीं। न जाने कितनी बेटियां दफन हो चुकी हैं इस घिनौने समाज की खोखली विचारधारा से। चेतने का समय है अभी भी। बेटी का मान, बेटी की रक्षा हमारी शान का संकल्प लेशा होगा। तभी 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का सपना साकार होगा। बेटियां किसी से खौफ न खाएं। उनको आगे बढ़ना है तो नारी-शक्ति का उपयोग करें। इस सामाजिक बुराई के खिलाफ एकजुट होकर बिगुल बजाएं। अपने अधिकारों को न छिनने दें। याद रखें इस पर भी राजनीति खिल सकती है, विरोध के स्वर फूट सकते हैं। लेकिन इस बुराई के खिलास डटे रहना ही बेटियों की जीत होगी।

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