-संध्या चतुर्वेदी "रिया जो कि मायके में छोटी होने के कारण पापा की लाडली बेटा थी।शादी एक संयुक्त परिवार में हुई।रिया सबसे छोटी बहू थी।ससुराल में चार जेठ और चार जेठानियाँ, फिर बड़े सास-ससुर के बीच सबसे छोटी बहू। जहाँ मायके में खुद को बेटे की तरह लाड़ और आजादी मिली,वही ससुराल में सब का घूँघट करना और किसी की बात का जबाब ना देना। इन कठिन नियमो के बीच खुद को ढाल पाना बहुत मुश्किल था रिया के लिए। लेकिन विदा होते समय मम्मी की दी सिख बीटा ससुराल में सब का मान-सम्मान करना।कोशिश करना सब का प्यार मिले। रिया खुले विचारों की लड़की थी,फिर भी सब के मान-सम्मान किया करती।लेकिन रिया नही जानती थी कि किस दलदल में आ फँसी है।उस के ससुर जी जिन की वो नातिन की उम्र की थी।उस पर गलत निगाह रखते।जब भी अकेला देखते पल्लू में हाथ डाल देते।रिया को बर्दाश्त नही था।लेकिन जिस से भी शिकायत करती सब बात अनसुना कर देते। खुद के आत्म सम्मान की परवाह किया बिना गलत बात पर भी जबाव ना देना,चुप सब कुछ सुनना। लेकिन कितने दिन तक संस्कार के नाम पर हो रहे अत्याचार को सहन करती।अंतर मन विरोध करने पर आ गया।ये कैसे संस्कार जो अन्याय सहने को मजबूर कर दे। मथुरा उप sandhyachaturvedi76@gmail.com

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