--प्रकाश दर्पे

बैंकिंग सेवा में हर तीन वर्ष में स्थानांतरण होते रहते है ।एक बार एक शाखा प्रबंधक का स्थानांतरण एक छोटे क़सबे में हुआ। वे हर शनिवार को बस से अपने शहर को जाते थे।घर जाने के उतावलेपन के कारण जो भी बस पहले मिलती उससे घर निकल जाते । परंतु बस में भीड़ होने के कारण कभी जगह मिलती या नहीं मिलती । इससे उन्हें बहुत परेशानी होती थी।इससे निजात पाने के लिए उन्हें एक उपाय सूझा । एक दिन उन्होंने अपने चपरासी को बोला “ कल तुम वर्दी पहनकर आना। “
“ क्यों सर कल कोई इन्स्पेक्शन के लिए आने वाला है क्या?
“ जितना बोलता हूँ उतना करो । साहब थोड़ा गरम होकर बोले।
दूसरे दिन बैंक बंद होते समय उन्होंने अपना बेग पकड़ाते हुए चपरासी को कहा , “ जाकर मेरे लिए बस में जगह रोको। मैं अभी आता हूँ।

आज्ञाकारी की तरह वह चला गया । रास्ते में उसे दो चार लोगों ने सलाम ठोका तो वह दंग रह गया। बस जैसे ही आईं तो अफ़रा तफ़री मच गयी। चपरासी ने अपना दिमाग़ दौड़ाया और ड्राइवर को बोला , “ बड़े साहब के लिए अगली सीट रखना। और बेग उसे पकड़ा दिया। ड्राइवर ने एक बारगी उसकी वर्दी को देखा और बेग अगली सीट पर रख दी। वे जब बस में चढ़े तो अगली सीट उनका इंतज़ार कर रही थी।

 

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