-इं. ललित शौर्य
चुनाव आते ही नेताजी को वोटरों के चरणों में जन्नत नजर आने लगती है। कभी 180 डिग्री पर घूरने वाली उनकी आखें अब सीधे 90 डिग्री पर झुककर विनम्रता की आइकन बन रही हैं। ये नेताजी के झुकने का सर्वोच्च है, वो पांच साल में चुनाव आने पर ही इतना झुकते हैं। चुनाव से पहले और चुनाव के बाद उनकी गर्दन अकड़ सी जाती है, उसमें हल्का सा लोच भी नेताजी अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। चुनावों में नेताजी अपनी से आधे उम्र के किसानों और मजदूरों के चरणों में भी वोट खोजते दिखाई देते हैं। दरअसल गरीबी की मार झेल रहे किसान मजदूर असमय ही बुढ़ापे के घर में इंट्री मार लेते हैं। ये लोग भी चुनावी मौषम में चरण वंदन का सुख अनुभव करते हैं। चुनाव के बाद तो इन्हें ही नेताजी की एक झलक के लिए चप्पल और पैर के तलवे घिसने होते हैं। परन्तु चुनावी सीजन में खुद नेताजी अपनी विदेशी सैंडिल घिसते हुए मतदाताओं के द्वार पहुंचते हैं। नेताजी इस दौरान बिल्कुल मख्खन मूड में होते हैं। मतलब की वो आपको गले लगा सकते हैं, आपके साथ सेल्फी खिंचवा सकते हैं। आपके घर का पानी पी सकते हैं। मूड कुछ ज्यादा बन गया तो आपके घर की एक-आध रोटियां भी तोड़ सकते हैं। चुनाव से पहले जिनकों धूल-मिट्टी और यहाँ तक कि जनता से भी एलर्जी हुवा करती थी, दौरे-चुनाव उनको ये सब प्यारी सी लगने लगती है। धूल-मिट्टी में सने नेताजी गाँव-गाँव, गली-गली अटकते-भटकते-लटकते दिखाई देते हैं. ये सीन जबर्दस्त होता है। नेताजी का चरण प्रेम उफान पर होता है। वो अठारह से ऊपर की उम्र के बन्दे या बंदी को देखते ही चहक उठते हैं। उनके हाथ मचलने लगते हैं। उनकी आँखों में वोटों के गोलगप्पे चटकारे लेने लगते हैं। वो सीधे अपने लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए चरणों पर टूट पड़ते हैं। और अपने पक्ष में वोट की अपील ठोक डालते हैं।
जैसे भक्त हरिदर्शन को उतावले रहते हैं, ठीक उसी तरह नेताजी चुनावी सीजन में चरण पकड़न को उतावले दिखते हैं। वो चुनावी प्रचार के दौरान सुबह से अगर ८०से १०० चरणों को ना थाम लें तो उनको खाना हजम नहीं होता। उनको स्वप्न में भी चरण दर्शन होने लगते हैं। उनपर चरण फोबिया इतना हावी हो जाता है कि कभी-कभी घरवाली के चरणों को पकड़कर उससे भी वोट की अपील करने लगते हैं। नेताजी का चरण प्रेम मतदान के नजदीक आते-आते अपने चरम पर पहुँच जाता है। वो रात-दिन बस चरण पूजन में ही रमें रहते हैं।
चरणों का बड़ा व्यापक इतिहास रहा है। चरणों में लोट-लोट कर ही बन्दे सत्ता के शीर्ष पर पहुँचे हैं। चरणों में वो शक्ति है की वो बन्दे को सीधे लतियाके कुर्सी में पटक दें। इस पटकन में जो आनन्द है वो कहीं नहीं है। इस लतियान में जो सुख मिलता है उसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। नेताजी तो बस बार-बार ऐसी पटकन झटकना चाहते हैं। नेताजी चुनाव के बाद लतियाना अच्छे से जानते हैं। इसलिए चुनाव के दौरान हर तरह झटकों के लिए तैयार रहते हैं। चुनाव के बाद मूल और ब्याज वसूलना नेताजी बखूबी जानते हैं। खैर चुनावी सीजन में तो उन्हें बस वोटर में रब दिखता है। उसके चरणों में वोट दिखता है...


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