-रमेश सर्राफ धमोरा (स्वतंत्र पत्रकार)


राजस्थान विधानसभा के लिये अगले माह होने वाले चुनाव में प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा व मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा तीसरा मोर्चा कितना दम दिखा पायेगा। आज यह सवाल हर मतदाता के मन में उठ रहा हैं, क्योंकि राजस्थान में हर बार बनने से पहले ही बिखर जाता है तीसरा मोर्चा। राजस्थान में अब तक कांग्रेस व भाजपा की ही सरकारे बनी है। अब तक 14 बार सम्पन्न हुये राजस्थान विधानसभा के चुनाव में 9 बार कांग्रेस व 5 बार भाजपा की सरकार बनी है। 1998 से तो लगातार एक बार कांग्रेस एक बार भाजपा की बारी-बारी से सरकार बनने का सिलसिला चलता आ रहा है।
राजस्थान में कुछ समय को छोड़ कर अधिकतर कांग्रेस व भाजपा का ही प्रभाव रहा है। 1977 में जनता पार्टी के गठन के समय भाजपा का पूर्ववर्ती दल जनसंघ सहित कांग्रेस के खिलाफ के सभी दल जनता पार्टी में शामिल होकर कांग्रेस को उखाड़ फेंका था। 1980 में जनता पार्टी से टूट कर भाजपा व चौधरी चरणसिंह के नेतृत्व में लोकदल बना। 1980 में भाजपा प्रदेश विधानसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी। 1985 के चुनाव में प्रदेश में भाजपा मजबूत बनकर उभरी।
1990 के विधानसभा चुनाव में भाजपा व नवगठित जनतादल ने प्रदेश में कांग्रेस के खिलाफ गठबंधन कर सीटो का बटवारा कर चुनाव लड़ा व प्रदेश में भाजपा के भैंरोसिंह शेखावत के नेतृत्व में पहली बार भाजपा, जनतादल गठबंधन की सरकार बनायी। मगर यह सरकार ज्यादा नहीं चल पायी। बाबरी मस्जिद प्रकरण के बाद सरकार बर्खास्त कर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 1993 में हुये विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर भाजपा के भैंरासिंह शेखावत ने निर्दलिय विधायको के समर्थन से पांच साल सरकार चलायी। उसके बाद कांग्रेस व भाजपा ने बदल-बदल कर शासन किया।
प्रदेश में कांग्रेस व भाजपा के अलावा कई अन्य दलो ने भी हर चुनाव में तीसरी ताकत बनने का प्रयास किया मगर सफल नहीं हो पाये। 2013 के विधानसभा चुनाव में राजस्थान में बहुजन समान पार्टी, माकपा, डा.किरोड़ीलाल मीणा की नेशनल पीपुल्स पार्टी, जमींदारा पार्टी, समाजवादी पार्टी, जनतादल (यूनाइटेड)ने तीसरी ताकत बनने के दावे के साथ चुनाव लड़ा था। मगर प्रदेश के मतदाताओं पर कोई असर नहीं छोड़ पाये।
पिछले विधानसभा चुनाव में डा.किरोड़ीलाल मीणा की नेशनल पीपुल्स पार्टी ने 134 सीटो पर चुनाव लड़ कर मात्र चार सीट ही जीत पायी थी। इस पार्टी को प्रदेश में कुल 13 लाख 12 हजार 402 मत मिले। जो कुल मतदान का 4.3 प्रतिशत था। बसपा ने गत विधानसभा चुनाव में 195 सीटो पर चुनाव लड़ कर मात्र 3 सीटो पर ही जीत दर्ज करवा पायी। बसपा को 10 लाख 41 हजार 241 मत मिले जो कुल मतदान का 3.4 प्रतिशत था। माकपा ने प्रदेश की 38 सीटो पर चुनाव लड़ा मगर एक सीट भी नहीं जी पायी। इतना ही नहीं इस चुनाव में माकपा ने अपनी पर्व में जीती हुयी 3 सीट भी गवा दी। माकपा को प्रदेश में कुल 2 लाख 69 हजार दो मत मिले जो कुल मतदान का 0.9 प्रतिशत था। 2013 के चुनाव में नवगठित जमीदारा पार्टी ने प्रदेश की कुल 25 सीटो पर चुनाव लड़ा व दो सीट जीतने में सफल रही। जमीदारा पार्टी को प्रदेश में कुल 3 लाख 12 हजार 653 वोट मिले जो कुल मतदान का एक प्रतिशत था। समाजवादी पार्टी को 118911 व जनतादल (यूनाइटेड) को मात्र 59673 मत मिले।
2013 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त 6 दलो ने कांग्रेस व भाजपा को हराने के लिये चुनाव लड़ा मगर प्रदेश के मतदाताओ ने उनको ही बुरी तरह हरा दिया। उस समय 6 राजनैतिक दलो ने अलग-अलग चुनाव लड़ कर कुल मतदान का 10.2 प्रतिशत वोट ले गये थे मगर एकजुट होकर नहीं लडऩे के कारण अपना असर छोडऩे में नाकाम रहे।
आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा, कांग्रेस के खिलाफ बसपा, माकपा, आप, जमीदारा पार्टी के अलावा नवगठित राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी, भारत वाहिनी पार्टी तीसरी ताकत के रूप में प्रदेश में चुनाव लडऩे जा रही है। आगामी चुनाव में बसपा व आप ने प्रदेश की सभी 200 सीटो पर अपने बूते ही चुनाव लडऩे की घोषणा कर चुके हैं। निर्दलिय जाट विधायक हनुमान बेनीवाल ने गत 29 अक्टूबर को ही अपने नये दल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का गठन किया था। भारत वाहिनी पार्टी का गठन भी कुछ माह पूर्व भाजपा के बागी विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने किया था। दोनो ही दल नये है व दोनो के नेता ने मिलकर चुनाव लडऩे की घोषणा की है।
इसके अलावा समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, शरद यादव की पार्टी व शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के भी चुनाव लडऩे की भी सम्भावना है। हालांकि अभी इन दलो के नेता कांग्रेस से मिलकर चुनाव लडऩा चाहते हैं। मगर कांग्रेस से बात नहीं बनने पर ये दल अपने बूते चुनाव में उतरने की बात भी कह रहे हैं।
राज्य में बसपा, माकपा व आप की स्थिति वोट कटवा पार्टी की ही रहेगी। इनके अलग-अलग चुनाव लडऩे का लाभ भाजपा को ही ज्यादा रहेगा। ये सभी पार्टियां खुद को सेक्यूलर मानती है व भाजपा पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाती रही है। चूंकि कांग्रेस भी खुद को सेक्यूलर बताती रही है, ऐसे में इनका भाजपा के खिलाफ वोट बैंक भी एक ही है। बसपा, माकपा, आप का निशाना दलित, मुस्लिम, अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओ पर है जिन्हे कांग्रेस अपना कोर वोट बैंक मानती है। ऐसे में बसपा, माकपा, आप को मिलने वाला वोट कांग्रेस के वोट बैंक को ही कम करेगा जिसका सीधा नुकसान कांग्रेस को ही उठाना पड़ेगा।
प्रदेश में वामपंथी दल 1952 से ही विधानसभा चुनाव लड़ते आ रहे हैं। 1952 व 2013 के चुनाव को छोडक़र उनका हमेशा विधानसभा में प्रतिनिधित्व रहा है। 1962 के चुनाव मे तो वामपंथियों को प्रदेश में 5.40 फीसदी वोटो के साथ पांच सीटो पर जीत मिली थी। 1972 में उन्हे चार सीट व 2008 में तीन सीटो पर विजयी हुये थे। इसके अलावा उन्हे हर बार एक या दो सीट मिलती रही थी।
बसपा भी 1990 से राजस्थान में विधानसभा के चुनाव लड़ती आ रही है। मगर बसपा को 1998 में पहली बार सफलता मिली जब पार्टी के दो विधायक चुने गये। उसके बाद 2003 में दो, 2008 में छ, 2013 में 3 विधायक जीतने में सफल रहे। 2008 में बसपा के पास प्रदेश में पांव फैलाने का अच्छा मौका था जब विधानसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला था। उस समय बसपा के 6 विधायक जीते थे मगर कांग्रेस के अशोक गहलोत ने बसपा के समर्थन से सरकार बनाकर बसपा के सभी 6 विधायको को कांग्रेस में शामिल करवा लिया। बसपा विधायको के दलबदल से बसपा का वोट बैंक कमजोर हुआ व 2013 के विधानसभा चुनाव में उसके विधायको की संख्या व वोट घटकर आधे रह गये। कांग्रेस द्वारा दिये गये झटके से बसपा अभी तक नहीं उबर पायी है।
निर्दलिय विधायक हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का प्रदेश के जाट बहुल 15 जिलो की करीबन 50 से 60 सीटो पर प्रभाव पड़ेगा। चूंकि आगामी चुनावो में जाट मतदाताओं का झुकाव कांग्रेस की तरफ ज्यादा नजर आ रहा था। वैसे भी जाट मतदाता कांग्रेस समर्थक रहे हैं व एक दो बार को छोड़ कर कांग्रेस को ही वोट देते रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को मिलने वाले जाट वोटो का कांग्रेस को ही ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा। भाजपा के बागी विधायक घनश्याम तिवाड़ी खुद अपनी सांगानेर की सीट बचाने के चक्कर में लगे हैं। उनकी पार्टी का अभी तक प्रदेश के मतदाताओं पर कोई असर नजर नहीं आ रहा है। आप पार्टी का राजस्थान में कोई प्रभाव नजर नहीं आ रहा है। आप ने जिस ताबड़तोड़ तरीके से उम्मीदवार खड़े किये है उससे यही लगता है कि उनका मकसद सीट जीतना कम प्रदेश में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना ज्यादा है।
कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि राजस्थान में हर बार चुनाव से पहले तीसरा मोर्चा बनाने की बाते खूब होती है मगर चुनाव नजदीक आते-आते तीसरे मोर्च की सिर्फ बाते रह जाती है। उनकी सोच धरातल पर नहीं उतर पाता है। फलस्वरूप अन्य दल प्रदेश में अपना प्रभाव जमा पाने में नाकाम ही रहते हैं।


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