-राज शेखर भट्ट, देहरादून


धार्मिक पर्यटन के मामले में उत्तराखंड वास्तव में दिव्य लोक की अनुभूति कराता है यहाँ की रमणीक वादियों में पहुचकर मन को मानसिक रूप से काफी सुकून मिलता है। यहाँ के पर्यटक स्थल, धार्मिक स्थल बरबस ही पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींच लेते है। यहाँ की सैर करने मात्र पर एक नए उत्साह का संचार होता है। हिमालय की गोद में बसी इस देवभूमि के नाम से विख्यात यहां की भूमि पर कभी ऋषि-मुनियों ने अपने तप से कई सिद्धियां पायी। मनमोहक प्राकृतिक सुषमा से भी अपना उत्तराखंड भरा पड़ा है। यहाँ एक बार आने वाला पर्यटक बार बार यहाँ आने की कामना करता है। देवभूमि उत्तराखंड कंकर-कंकर पर शंकर का वास कहा जाता है तो मां भगवती को भी यहां यत्र-तत्र पूजा जाता है। पूर्णागिरी मैया का यह धाम टनकपुर में ही स्थित है। अगर आप यहाँ आना चाहते है तो टनकपुर नजदीक का रेलवे स्टेशन है। यदि आपके यहाँ से टनकपुर के लिए ट्रेन की सुविधा नहीं है तो चिंता मत कीजिये।बरेली तक ट्रेन से आया जा सकता है। बरेली से टनकपुर के लिए तमाम बसें उपलब्ध रहती है। जहाँ आप वाया खटीमा पहुचते हैं।
समुद्र तल से 5500 फीट की ऊँचाई पर स्थित पूर्णागिरी मैया के इस धाम को समस्त दुखों को हरने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। यूं तो उत्तराखंड पर्यटन के लिहाज से काफी धनी है लेकिन पूर्णागिरी धाम की ख्याति पूरे देश में फैली है। “माँ वैष्णो देवी” जम्मू के दरबार की तरह पूर्णागिरी दरबार में लाखों की संख्या में लोग आते हैं। हर साल यहाँ आने वाले लोगों की तादात बढ़ती ही जा रही है। मार्च माह में होली खत्म होते ही टनकपुर स्थित पूर्णागिरी दरबार में लगने वाले मेले को लेकर चहल पहल शुरू हो जाती है। मेला अवधि में टनकपुर पूर्णागिरी को जोड़ने वाले संपर्क मार्ग में “प्रेम से बोलो जय माता दी सारे बोलो जय माता दी, सब मिलकर बोलो जय माता दी” के नारे गूंजते रहते है। ऐसा करने से सभी को काफी सुकून मिलता है। दर्शनार्थी भक्तों को जहाँ एक ओर शारदा नदी का दृश्य आनंदित करता है, वहीं दूसरी ओर सड़क मार्ग से चारों ओर दिखने वाली ऊँची-ऊँची पर्वत मालाएं यात्रा में चार चाँद लगाती हैं।
पूर्णागिरी माता का यह धाम सारे भारत में अब इतना प्रसिद्ध हो गया है कि यहाँ आकर शीश झुकाने मात्र से भक्तों के सारे बिगडे़ काम बन जाते हैं और मन में नई स्फूर्ति का संचार हो जाता है। कुमाऊ मंडल की हसीन वादियों में बसे पूर्णागिरी के इस धाम तक पहुचने में भक्तों को अब कुछ खास दिक्कत नहीं उठानी पड़ती है। टनकपुर टेक्सी स्टैंड से पूर्णागिरी धाम के लिए दिन भर टैक्सी, बसों की सेवा उपलब्ध रहती है। मार्च की समाप्ति में मेले के दौरान रात भर पूर्णागिरी वाले मार्ग में वाहनों की आवाजाही लगी रहती है। टनकपुर से पूर्णागिरी धाम की दूरी 22 किलोमीटर है। कुछ वर्ष पहले तक वहां वाहन ठूलीगाढ़ तक ही जाते थे परन्तु अब करीब भैरव मन्दिर तक सड़क की सुविधा हो जाने से पूर्णागिरी की दूरी बहुत कम हो गई है। फिर भी अभी मेले के समय भैरव मन्दिर से माता के दरबार तक की दूरी । किलोमीटर पैदल तय करनी पड़ती है लेकिन यदि आप सच्चे मन से माता के दर्शनों को जा रहे है तो माता के जयकारों के साथ कब यह दूरी आप तय कर लेते है यह पता नही चल पाता है। पूर्णागिरी जाने वाले कई भक्तों से जब मेरी बातचीत हुई तो उन्होंने यह कहा निराश और हताश प्राणी जब माता रानी की शरण में पहुंचता है तो माता उस पर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखती है। इस दौरान अगर आपने माता से कुछ मांग लिया तो माता रानी आपकी यह मुराद अवश्य ही पूरी करेगी। माता के बारे में कई गाथायें और किन्दवंतिया प्रचलित है। कुछ लोगांे की मान्यता है माता पूर्णागिरी का दरबार विश्व के 51 शक्ति पीठांे में एक है अतः इस दरबार का अपना अलग महत्त्व है तभी यहाँ की जाने वाली मनोती अधूरी नहीं जाती। कुछ लोग बताते हैं पूर्णागिरी का इतिहास जानने से कई रहस्य मय तथ्यों की जानकारी मिलती है।
पूर्णागिरी के मार्ग में बीच-बीच में कई स्थल ऐसे है जो मन को काफी सुकून देते है। फिर चाहे वह झूठे का मन्दिर हो या महादेव का मन्दिर या माता का शक्ति पीठ आश्रम यह स्थल ऐसे है जो शान्ति जैसा आभास करते है। मार्ग में पड़ने वाले झूठे के मन्दिर का बहुत महत्त्व है। मान्यता है एक बार किसी सज्जन ने पुत्र प्राप्त होने पर माता को सोने का चदावा देने का वायदा किया था परन्तु उसने लालच में सोने की जगह नकली सोने की पोलिश करवा दी और माता पर चढ़ाने की तैयारी कर दी। कहा जाता है जैसे ही उसने ताबे में माता को चढ़ाने के लिए बनाया मन्दिर उठाया तो वह इतना भारी हो गया कि उसको उठाना मुश्किल हो गया। तभी से यह झूठे का मन्दिर नाम से प्रसिद्ध हो गया।
कई भक्तों का मानना है उत्तराखंड की सरकार को पूर्णागिरी को जम्मू के “वैष्णो” देवी की तर्ज पर विकसित करने पर विचार करना चाहिए। वैसे ऐसी मांग वर्षो से हो रही है पर अभी तक इस पर विचार नहीं हो पाया है। प्रदेश सरकार को इस पर ध्यान देने की जरूरत है। पूर्णागिरी की यात्रा तभी सार्थक मानी जाती है जब भक्त जन माता के दर्शन करने के बाद (महेंद्र नगर) नेपाल स्थित ब्रह्म देव ” मंडी में स्थित सिद्ध नाथ बाबा के दर्शन करते है। पूर्णागिरी के दर्शनों को लालायित लोग आज भीसाइकिल से सवारी करते है। साइकिल से पूर्णागिरी के दर्शनों का चलन आज भी कम नहीं हुआ है फिर पैदलचलने वालांे की भी कमी नहीं है। मेरे जैसे पग यात्री तो पूरे दिन पैदल सवारी के द्वारा माता के द्वारे जाना पसंद करते है। आपसे गुजारिस है जब भी उत्तराखंड जाने का मन हो तो पूर्णागिरी दरबार के दर्शन अवश्य ही करें क्योंकि यहाँ माता रानी आपकी हर मुराद पूरी करती है। मार्च से जून तक मेलावधि के दौरान यहाँ काफी भीड़ भाड़ रहती है लेकिन जून के बाद कभी भी यहाँ आया जा सकता है।
यह स्थान चम्पावत से 95 कि.मी.की दूरी पर तथा टनकपुर से मात्र 22 कि.मी.की दूरी पर स्थित है। इस देवी दरबार की गणना भारत की 51 शक्तिपीठों में की जाती है। शिवपुराण में रूद्र संहिता के अनुसार दश प्रजापति की कन्या सती का विवाह भगवान शिव के साथ किया गया था। एक समय दक्ष प्रजापति द्वारा यज्ञ का आयोजन किया गया जिसमें समस्त देवी देवताओं को आमंत्रित किया गया परन्तु शिव शंकर का अपमान करने की दृष्टि से उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया। सती द्वारा अपने पति भगवान शिव शंकर का अपमान सहन न होने के कारण अपनी देह की आहुति यज्ञ मण्डप में कर दी गई। सती की जली हुई देह लेकर भगवान शिव शंकर आकाश में विचरण करने लगे भगवान विष्णु ने शिव शंकर के ताण्डव नृत्य को देखकर उन्हें शान्त करने की दृष्टि से सती के शरीर के अंग पृथक-पृथक कर दिए। जहां-जहां पर सती के अंग गिरे वहां पर शान्ति पीठ स्थापित हो गये। पूर्णागिरी में सती का नाभि अंग गिरा वहां पर देवी की नाभि के दर्शन व पूजा अर्चना की जाती है। यह स्थान टनकपुर से मात्र 17 कि.मी. की दूरी पर है अन्तिम 17 कि.मी. का रास्ता श्रद्धालु अपूर्व आस्था के साथ पार करते हैं। नेपाल इसके बगल में है। समुद्र तल से 3000 मीटर की ऊचाई पर स्थित है। पूर्णागिरी मन्दिर टनकपुर से 22 कि॰ मी॰, पिथौरागढ से 171 कि॰मी॰ और चम्पावत से 95 कि॰मी॰ की दूरी पर स्थित है। पूर्णागिरी में वर्ष भर तीर्थयात्रियों का भारत के सभी प्रान्तों से आना लगा रहता है। विशेषकर नवरात्री (मार्च-अप्रैल) के महीने मे भक्त अधिक मात्रा मे यहां आते हैं। भक्त यहा पर दर्शनों के लिये भक्तिभाव के साथ पहाड़ पर चढाई करते है। पूर्णागिरी पुण्यगिरी के नाम से भी जाना जाता है। यहां से काली नदी निकल कर समतल की ओर जाती है, वहां पर इस नदी को शारदा के नाम से जाना जाता है। इस तीर्थस्थान पर पहुंचने के लिये टनकपुर से ठूलीगाड़ तक आप वाहन से जा सकते हैं। ठूलीगाड़ से टुन्यास तक सड़क का निर्माण कार्य प्रगति पर होने के कारण पैदल ही बाकी का रास्ता तय करना होता है। ठूलीगाड़ से बांस की चढ़ाई पार करने के बाद हनुमान चट्टी आता है। यहां से पुण्य पर्वत का दक्षिण-पश्चिमी हिस्सा दिखने लगता है। यहां से अस्थाई बनाई गयी दुकानें और घर शुरू हो जाते हैं जो कि टुन्यास तक मिलते हैं। यहां के सबसे ऊपरी हिस्से (पूर्णागिरी) से काली नदी का फैलाव, टनकपुर शहर और कुछ नेपाली गांव दिखने लगते हैं। यहां का दृश्य बहुत ही मनोहारी होता है। पुराना ब्रह्मदेव मण्डी टनकपुर से काफी नजदीक है।
वैसे तो इस पवित्र शक्ति पीठ के दर्शन हेतु श्रद्धालु वर्ष भर आते रहते हैं। परन्तु चैत्र मास की नवरात्रियों से जून तक श्रद्धालुओं की अपार भीड़ दर्शनार्थ आती है। चैत्र मास की नवरात्रियों से दो माह तक यहां पर मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें श्रद्धालुओं के लिए सभी प्रकार की सुविधायें उपलब्ध कराई जाती हैं। इस शक्ति पीठ में दर्शनार्थ आने वाले यात्रियों की संख्या वर्ष भर में 25 लाख से अधिक होती है। इस मेले हेतु प्रतिवर्ष प्रदेश शासन द्वारा अनुदान की धनराशि जिलाधिकारी चम्पावत के माध्यम से जिला पंचायत चम्पावत जोकि मेले का आयोजन करते हैं, को उपलब्ध कराई जाती है। यहाँ आने के लिये आप सड़क या रेल के द्वारा पहुंच सकते है। यहाँ का निकटतम रेलवे स्टेशन टनकपुर है। वायु मार्ग से आने के लिए यहाँ का निकटतम हवाई अड़डा पन्तनगर है जो कि खटीमा नानकमत्ता के रास्ते 121 कि॰ मी॰ की दूरी पर है। उपलब्ध सुविधाओं में अस्पताल, डाक घर, टेलीफोन, दवा की दुकानें आदि सामान्य सुविधा की वस्तुएँ यहाँ उपलब्ध हैं। निकटतम पेट्रोल/डीजल पम्प टनकपुर में है एवम बाकी सभी साधारण सुविधाओं के लिए टनकपुर सबसे पास का स्थान है। यहाँ पर्यटन के लिए सबसे उपयुक्त समय वर्षा ऋतु का है। सर्दी के मौसम में गरम कपड़े जरूरी हैं। ग्रीष्म ऋतु मे हल्के ऊनी कपडों की जरूरत हो सकती है। यहाँ कुमांउनी, हिन्दी और अंग्रेजी भाषा बोली जाती है।
जैसा कि पहले जिक्र किया जा चुका है कि आस्था का यह धाम नैनीताल जनपद के पड़ोस में और चंपावत जनपद में अन्नपूर्णा शिखर पर 5500 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। कहा जाता है कि दक्ष प्रजापति की कन्या और शिव की अर्धांगिनी सती की नाभि का भाग यहाँ पर विष्णु चक्र से कट कर गिरा था। प्रतिवर्ष इस शक्ति पीठ की यात्रा करने आस्थावान श्रद्धालु कष्ट सहकर भी यहाँ आते हैं। चैत्र की नवरात्रियों में लाखों की संख्या में भक्त अपनी मनोकामना लेकर यहाँ आते हैं। अपूर्व भीड़ के कारण यहाँ दर्शनार्थियों का ऐसा ताँता लगता है कि दर्शन करने के लिए भी प्रतीक्षा करनी पड़ती है। पूर्व में यह मेला बैसाख माह के अन्त तक चलता था लेकिन वर्तमान में यहां ज्येष्ठ माह के अंत तक मेलार्थियों का आवागमन लगा रहता है।
यहंा ऊँची चोटी पर गाढ़े गये त्रिशुल आदि ही शक्ति के उस स्थान को इंगित करते हैं। जहाँ सती का नाभि प्रवेश गिरा था पूर्णगिरी क्षेत्र की महिमा और उसके सौन्दर्य से अंग्रेज लेखक एटकिन्सन भी बहुत अधिक प्रभावित था उसने लिखा है कि ‘‘पूर्णागिरी के मनोरम दृष्यों की विविधता एवं प्राकृतिक सौन्दर्य की महिमा अवर्णनीय है, प्रड्डति ने जिस सर्व व्यापी वर सम्पदा के अधिर्वक्य में इस पर्वत शिखर पर स्वयं को अभिव्यक्त किया है, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका का कोई भी क्षेत्र शायद ही इसकी समता कर सके किन्तु केवल मान्यता व आस्था के बल पर ही लोग इस दुर्गम घने जंगल में अपना पथ आलोकित कर सके हैं। यह स्थान महाकाली की पीठ माना जाता है, नेपाल इसके बगल में है जिस चोटी पर सती का नाभि प्रदेश गिरा था, उस क्षेत्र के वृक्ष नहीं काटे जाते टनकपुर के बाद ठुलीगाढ़ तक बस से तथा उसके बाद घासी की चढ़ाई चढ़ने के उपरान्त ही दर्शनार्थी यहाँ पहुँचते हैं, रास्ता अत्यन्त दुरुह और खतरनाक है। क्षणिक लापरवाही अनन्त गहराई में धकेलकर जीवन समाप्त कर सकती है। नीचे काली नदी का कल-कल करता रौद्र रूप इस स्थान की दुरुहता से हृदय में कम्पन पैदा कर देता है। रास्ते में पड़ने वाले टुन्यास नामक स्थान के बारे में बताया जाता है कि यहां पर देवराज इन्द्र ने तपस्या की, ऐसी भी जनश्रुती है।’’
मेले के लिए विशेष बसों की व्यवस्था की जाती है, जो टनकपुर से ठुलीगाड़ तक निसपद पहुँचा देती है। भैरव पहाड़ और रामबाड़ा जैसे रमणीक स्थलों से गुजरने के बाद पैदल यात्री अपने विश्राम स्थल टुन्यास पर पहुँचते हैं। जहाँ भोजन पानी इत्यादि की व्यवस्थायों हैं यहाँ के बाद बाँस की चढ़ाई प्रारम्भ होती है। जो अब सीढियाँ बनने तथा लोहे के पाइप लगने से सुगम हो गयी है। मार्ग में पड़ने वाले सिद्ध बाबा मंदिर के दर्शन जरुरी हैं। रास्ते में चाय इत्यादि के खोमचे मेले के दिनों में लग जाते हैं। नागा साधु भी स्थान-स्थान पर डेरा जमाये मिलते हैं। झूठा मंदिर के नाम से ताँबे का एक विशाल मंदिर भी मार्ग में कोतूहल पैदा करता है।
प्राचीन बह्मादेवी मंदिर, भीम द्वारा रोपित चीड़ वृक्ष, पांडव रसोई आदि भी नजदीक ही हैं। ठूलीगाड़ पूर्णागिरी यात्रा का पहला पड़ाव है। झूठे मंदिर से कुछ आगे चलकर काली देवी तथा महाकाल भैंरों वाला का प्राचीन स्थान है। जिसकी स्थापना पूर्व कूर्मांचल नरेश राजा ज्ञानचंद के विद्वान दरबारी पंडित चंद्र त्रिपाठी ने की थी। मंदिर की पूजा का कार्य बिल्हागाँव के बल्हेडिया तथा तिहारी गाँव के त्रिपाठी सम्भालते हैं। वास्तव में पूर्णागिरी की यात्रा अपूर्व आस्था और रमणीक सौन्दर्य के कारण ही बार-बार श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भी इस ओर आने को उत्साहित सा करती है। इस नैसर्गिक सौन्दर्य को जो एक बार देख लेता है, वह अविस्मरणीय आनंद से विभोर होकर ही वापस जाता है। कुमाऊँ क्षेत्र के कुमैंये, पूरब निवासी पुरबिये, थरुवाट के थारु, नेपाल के गोरखे, गाँव शहर के दंभ छोड़े निष्कपट यात्रा करने वाले श्रद्धालु मेले की आभा को चतुर्दिक फैलाये रहते हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पूर्णागिरी मंदिर धार्मिक आस्था का पर्याय बन गया है। मेलार्थी कहते हैं कि पूर्णागिरी का दरबार आस्था से परिपूर्ण है।


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