... सुरेन्द्र कुमार (लेखक एवं विचारक)


राज्य का शिक्षित बेरोजगार जहाँ शासकीय व्यवस्था में प्रवेश पाने के लिए कड़ी मशक्कत करता है वहीं व्यवस्था में एक कर्मचारी के रूप में आमजन को बेहतर सुविधाएँ प्रदान करने के लिए भी वह कड़ी जद्दोजहद करता है। लेकिन अपनी मेहनत का प्रतिफल उस कर्मठ कर्मचारियों को शायद ही मिल रहा हो। माना कि वक्त के साथ हिमाचल के कुछ कर्मचारी आरामप्रस्त होते जा रहे हैं। लेकिन राज्य में तैनात बहुत से राजकीय मुलाजिम ऐसे भी हैं जो अपने मेहनतनामे से अधिक मेहनत करते हैं तथा हिमाचल को देश के अन्य राज्यों से अव्वल दर्जे पर पहुँचाते हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, कम स्टाफ और मामूली वेतन व सुविधाएँ मिलने पर भी हमारा शासकीय सेवक हमें बेहतर शासन प्रदान कर रहा है। जबकि इसकी एवज में कर्मचारी को मिलने वाली सहुलियतों व पदोन्नतियों को हमारा घटिया तंत्र उसे प्रदान करने से कतराता रहता है तथा देर सवेर जब प्रदान भी की जाती है तो वह उसे एक आम कर्मचारी की भाँति 20 वर्षों बाद हासिल हो रही है। यह हमारी जुगाडू व्यवस्था की एक कड़वी सच्चाई है कि यहाँ एक होनहार मुलाजिम की उपलब्धियाँ भी एक आम कर्मचारी की सामान्य सेवाओं की भाँति मूल्यांकित की जाती है। यहाँ कर्मचारी की पदोन्नति उनकी काबिलियत के आधार पर नहीं बल्कि उनकी सेवाकाल की अवधि के आधार पर मिलती है। यहाँ कर्मचारियों की तरक्की उनके कार्यों की प्रभावशीलता के आधार पर नहीं बल्कि सेवाकाल में गुजारे वर्षों के आधार पर होती है। मतलब एक बेपरवाह व कामचोर मुलाजिम के 20 वर्ष, एक योग्य व काबिल मुलाजिम के 19 वर्षों से विभाग को कहीं अधिक महत्व रखते हैं। हिमाचल प्रदेश के विभिन्न विभागों की पदोन्नति प्रक्रिया से ऐसा प्रतीत होता है मानो यहाँ मेहनतकश और योग्य कर्मचारियों की कार्यक्षमता मापने के लिए कोई पैमाना ही नहीं बना हो। परिणामस्वरूप प्रदेश का एक कर्मठ मुलाजिम और आम मुलाजिम एक साथ विभागीय तरक्की हासिल कर रहे हैं। भले ही उनकी कार्यशैली और योग्यता में दिन रात का अंतर क्यों न हो। परंतु पदोन्नति उसे भी तभी मिलेगी जब विभाग में समकक्ष अन्य मुलाजिमों को मिलेगी। यहाँ एक बार सरकारी तंत्र में प्रवेश करने पर राजकीय नुमाइदों की वेतन वृद्धि व पदोन्नति एक स्वचलित प्रक्रिया के तहत चलती रहती है। इन्हें प्राप्त करने के लिए नुमाइदों को कोई विशेष योग्यता हासिल नहीं करनी पड़ती। कर्मचारियों द्वारा कार्यशैली में विशिष्टता दिखाना यहाँ विभाग को कोई मायने नहीं रखती। कर्मचारी कार्यस्थल से नरादन रहे, आराम फरमाता रहे, लोगों से उलझता रहे, हुडदंग मचाता रहे या आमजन को शोषित करता रहे। सरकार को इन बातों से कोई सरोकार नहीं। बल्कि विभाग समय आने पर उसके सेवाकाल के वर्षों की गिनती करके उसे प्रोत्साहन देना नहीं भूलेगा। वर्तमान में ईमानदार और काबिल कर्मचारी के लिए सरकार के पास भले ही कोई विशेष सुविधाएँ न हो पर निकम्में कर्मचारियों की मौज मस्ती का बंदोबस्त यहाँ बखूबी रहता है। प्रदेश के विभिन्न विभागों की पदोन्नति प्रक्रिया में पनपी भ्रांतियाँ आज जुझारू एवं काबिल मुलाजिमों की कार्यशैली को हतोत्साहित कर रही है। इसका एक जीवंत उदाहरण राज्य शिक्षा विभाग में तैनात प्राप्त हजारों शिक्षकों की तरक्की में आएं लंबे ठहराव के रूप में देखा जा सकता है। जो पिछले 20 वर्षों से एक ही पद पर अपनी सेवाएँ प्रदान करते हुए निरस होते जा रहे हैं। आज से 15 वर्ष पूर्व जो शिक्षक अपनी योग्यता में सुधार करने पर 5 या 7 वर्षों बाद प्रमोट हो जाता था। आज उसी पद पर आसीन शिक्षक अपनी नियुक्ति से पूर्व पदोन्नति के लिए वांछित योग्यता रखने पर भी 20 वर्ष से पदोन्नति की वाट जोह रहा है। इतना ही नहीं शिक्षा विभाग में सैकड़ों पीजीटी और असिस्टेंट प्रोफेसर ऐसे हैं जो अपने विषयों में डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त है। परंतु प्रदेश के दोषपूर्ण पदोन्नति नियमों की विडंबना के चलते वे पिछले 20 वर्षों से अपनी पद वृद्धि को तरस रहे हैं। विभाग का अपने मुलाजिमों के प्रति ऐसा विचित्र रवैया उनकी योग्यता को पंगु बना रहा है। इसी प्रकार राज्य पशु पालन विभाग में तैनात वेटनरी फार्मासिस्ट की व्यथा भी कुछ ऐसी ही है जो पिछले 25 वर्षों से एक ही पद पर कार्य करते करते उभ से गए हैं। लेकिन तरक्की हासिल करना उसे अभी भी दूर की कौडी साबित हो रही है। अब यदि राज्य पंचायती राज महकमे में तैनात पंचायत सचिवों का जिक्र किया जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। वर्तमान में विभाग में सैकड़ों सचिव ऐसे हैं जो एक साथ दो पंचायतों के रिकॉर्ड का रखरखाव कर रहे हैं। परंतु विभागीय प्रोत्साहन के रूप में उन्हें भी लगभग 25 वर्षों बाद मुश्किल से प्रमोशन हासिल हो रही है। पदोन्नति में असमानता के दंश से एचआरटीसी में सेवारत परिचालक भी अछूते नहीं है। यहाँ निगम पदोन्नति नियमों की सारी हदे लांघते हुए 30 वर्षों के सेवाकाल के उपरांत भी परिचालकों को बस में सीटी बजाने के लिए मजबूर कर रहा है। परिचालक चाहे दसवीं पास हो या बीए पास इससे निगम को कोई सरोकार नहीं है। कर्मचारियों को तरक्की यहाँ भी सेवाकाल की वर्षों के आधार पर ही मिलेगी। इसके आलावा भी प्रदेश के विभिन्न विभागों में तैनात अनेकों कर्मचारी ऐसे हैं जो वर्षों से पदोन्नति के लिए वांछित योग्यता रखते हैं परंतु राज्य के कर्मचारी विरोधी तंत्र के समक्ष उन सभी योग्य मुलाजिमों की बहुमूल्य काबिलियत बेमोल ही साबित हो रही है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रदेश में अपनाए जाने वाले पुराने पदोन्नति नियम आज नए कर्मचारियों की कार्यक्षमता को हतोत्साहित कर रहे हैं। अतः राज्य की जयराम सरकार को चाहिए कि हिमाचल में अपनाए जाने वाले त्रुटिपूर्ण पदोन्नति नियमों को यथासंभव शिघ्रता से संशोधित करने के लिए सभी विभागाध्यक्षों को उचित निर्देष दें। ताकि कर्मचारियों की पदोन्नति कार्यकाल नही बल्कि योग्यता के आधार पर सुनिश्चित हो सकें, इसके अतिरिक्त सरकार को चाहिए कि वह राज्य में हर वर्ष प्रत्येक विभाग द्वारा पदोन्नति परीक्षाएं संचालित करवाएँ। साथ ही दस वर्षों में कम से कम एक तरक्की, राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर सम्मानित कर्मचारियों को विशेष पदोन्नति, विभागीय कार्यों के साथ सामाजिक कार्यों में खास योगदान देने वाले मुलाजिमों की विशेष पदोन्नति को भी सुनिश्चित करें। राज्य कर्मचारी पदोन्नति प्रक्रिया ऐसी हो जो विभाग में सबसे निम्न स्तर पर नियुक्ति प्राप्त शासकीय सेवक को अपनी योग्यता के आधार पर सबसे उच्च पद पर आसीन होने का मौका प्रदान करें।

हिमाचल प्रदेश।
surenderkchaun@gmail.com

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