डॉ प्रदीप उपाध्याय


अभी जब हमें अच्छी-अच्छी बातों की घूटी पिलाई जा रही है तो हम कड़वी बातों को कैसे हजम कर सकते हैं।चाहे अच्छे दिन आने की बात हो या अपने बैंक खातों में लाखों रुपये आने की बात!और भी जुमले हैं जिनपर विपक्षियों के पेट में मरोड़े आ रहे हैं लेकिन यह सब अच्छी बात नहीं है क्योंकि जब हमें अच्छी-अच्छी बातें सुनने की आदत हो चुकी हैं तो फिर गन्दी बात क्यों कही जाए।सभी एक दूसरे के लिए गन्दी-गन्दी बात कर रहे हैं और जनता के सामने अपनी-अपनी अच्छी-अच्छी बातें परोस रहे हैं और दूसरों के लिए डर्टी-डर्टी बातें!स्वच्छता अभियान के दौर में गन्दगी फैलाने वाली बातें करना अच्छी बात तो नही कही जा सकती है न!अच्छे-भले बनने के लिए न्याय को दरकिनार कर अन्याय भी तो थोपा जा सकता है। क्रोधी प्रवृत्ति को जब आप संतुष्ट करना चाहें तो शांत चित्त की असंतुष्टि कोई मायने नहीं रखती।वह दौर बीत चुका जब राजधर्म की बात सिखाई और पढ़ाई जाती थी और राजधर्म न निभाने वाले को बात-बात पर कहा जाता था कि यह अच्छी बात नहीं है।
लेकिन समय का चक्र भी अजीब तरीके से घूम रहा है।आज वह दौर है जहाँ मर्यादाओं को पनपने ही नहीं दिया जा रहा है और उन्हें उनकी बाल्यावस्था में ही मसल दिया जाता है, कुचल दिया जाता है।एक बार शेर की दाढ़ में जब लहू लग जाता है तो फिर वह यह नहीं देखता कि लहू किसका है।मर्यादा की रक्षा भी आखिर कौन करे! और कैसे करे!हवस के पुजारी मर्यादाओं की चौखट पर घात लगाए बैठे हैं हालांकि चारों ओर से आवाज उठती हुई मिलेगी कि ये अच्छी बात नहीं है लेकिन समुद्र में उठती तूफानी लहरों सा उबाल और फिर शांत।ये आवाज सूर्य रश्मियों की तरह गर्माहट न रखते हुए दिन ढ़लने का भी इंतजार नहीं कर पाती,ये तो महज पानी के बुलबुले के समान रहती हैं और इसीलिए इनमें ज्यादा हलचल मचाने की कुव्वत नहीं रह पाती हैं।लगता है कलियुग के हवाले तो सभी कारोबार कर दिया गया है और कहने वाले कह भी रहे हैं कि ऊपर वाला आँखें मूंदकर चैन की बंसी बजा रहा है।उनका अब समय नहीं रहा वरना वे भी कहते कि यह अच्छी बात नहीं है।
आजकल मजबूत इरादे जरूर बताये जाते हैं और बेजोड़ होने का दावा भी किया जाता है लेकिन इरादों में उतनी मजबूती नहीं होती है क्योंकि ये देश-काल-परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं।सिद्धान्तों,आदर्शों और विचारधाराओं को बड़ी ही आसानी से पलीता लग जाता है क्योंकि नैतिक मूल्यों का संग्रहण करना आसान नहीं रह गया है।शायद ये भारी भरकम होने लगे हैं जिनका बोझ अब उठाए नहीं उठता और इसीलिए जब इनपर टिकने में परेशानी आने लगती है तो सारे चोले उतार फैंक अपना बोझ कम करने में भी कोई गुरेज नहीं!सीधी सी बात है कि जब इरादे कमजोर होने लगते हैं और उनपर मजबूती से टिकने या टिकाने वाला कोई साल्यूशन दिखाई नहीं देता तब सिद्धांत, आदर्श और विचारधारा की बलि देना ही पड़ती है,क्या करें।भले ही कहने वाले कहते रहें कि यह अच्छी बात नहीं है।

१६,अम्बिका भवन,बाबूजी की कोठी,उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.
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