-जावेद अनीस
मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में कुछ ही माह शेष बचे हैं लेकिन ऐसा लगता है कि तमाम कवायदों के बाद भी कांग्रेस अपनी पुरानी और सबसे गंभीर बीमारी “आपसी गुटबाजी” से अभी तक खुद को उबार नही पायी है. ताजा नजारा 9 जुलाई को प्रदेश अध्यक्ष द्वारा कांग्रेस पूर्व मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की बुलाई गयी बैठक का जिसमें नाराज मीनाक्षी नटराजन बिना बताये ही मीटिंग हाल से उठाकर बाहर चली गयीं.
कमलनाथ और ज्योतिरादित्य राव सिंधिया जैसे हाई प्रोफाईल नेताओं को कमान मिलने के बाद ये उम्मीद की जा रही थी कि पार्टी के विभिन्न गुट और क्षत्रप आपस में उलझने के बजाये मिलजुल कर पंद्रह साल से हुकूमत कर रही भाजपा के सामने चुनौती पेश करेंगें. अंदरूनी बदलाव के बाद पार्टी के नेताओं द्वारा दावा किया जा रहा है कि अब मप्र पार्टी में कोई भी गुटबाजी नही है और सभी गुट और नेता मिलजुल कर मिशन 2018 की तैयारी में लग गए हैं. कमलनाथ ने भी खुद को कमान मिलने का सबसे बड़ा फायदा यही बताया था कि उनके आने से गुटबाजी पर लगाम लगेगी. उन्होंने कहा था की “मेरा कोई गुट नहीं है, मेरे सबसे अच्छे संबंध हैं”.
पार्टी आलाकमान भी गुटबाजी की इस समस्या से अनजान नहीं है तभी तो चुनाव के दौरान पार्टी में एकजुटता के लिये जो समन्वय समिति का गठन किया गया है उसकी जिम्मेदारी दिग्विजय सिंह जैसे नेता को दी गयी है. लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि तमाम उपायों के बावजूद सालों पुरानी पार्टी अपने इस पुरानी बीमारी से पीछा नहीं छुड़ा पा रही है और अभी भी आपसी गुटबाजी बार-बार खुलकर सामने आ रही है जो उसकी चुनावी संभावनाओं पर असर डाल रही हैं.
मध्यप्रदेश में लम्बे समय से कांग्रेस की कमान ऐसे डमी नेताओं के पास रही है जिन्हें पार्टी के क्षत्रपों ने कभी अपना नेता नही माना और ना ही उन्हें सहयोग दिया. उनकी दिलचस्पी अपने- अपने इलाकों में खुद को पार्टी के समानांतर एक शक्ति केंद्र बनाये रखने में ज्यादा रही जिससे उनकी पकड़ ढीली ना पड़ सके. कमलनाथ जैसे सीनियर नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने के बाद ये माना जा रहा था कि इस स्थिति पर लगाम लगेगी और वे बिना किसी गुटबाजी या दबाव के काम कर सकेंगें. उनके साथ ज्योतिरादित्य राव सिंधिया को चुनाव प्रचार समिति का चेयरमैन और दिग्विजय सिंह को चुनाव समन्वय समिति का अध्यक्ष नियुक्त करके संतुलन साधने की कोशिश की गयी थी लेकिन सबके बावजूद गुटबाजी बनी हुई है.
पद से हटाये जाने के बाद से अरूण यादव असंतुष्ट नजर आ रहे और मौका मिलने पर वे इसका प्रदर्शन करने से भी नही चूकते हैं, लेकिन पार्टी की तरफ से उनके इस असंतोष को दूर करने की कोशिश नही की गयी और ना ही नए निजाम द्वारा उन्हें कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी ही दी गयी हैं. कांग्रेस पार्टी में उनकी इस स्थिति को भांपते हुये भाजपा नेताओं की तरफ से उन्हें पार्टी में शामिल होने के आफर आ रहे हैं.
राहुल गांधी के मंदसौर दौरे से पहले पार्टी के अन्दर काफी उठा-पाठक देखने को मिली है, मंदसौर दौरे की तैयारियों को लेकर उज्जैन में आयोजित एक बैठक का एक वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें सचिन यादव पार्टी में सट्टेबाजों, दारूबाजों का प्रभाव होने की बात कह रहे हैं, सचिन यादव पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव के करीबी रिश्तेदार बताये जाते हैं. इसी तरह से मंदसौर में भी राहुल गांधी के दौरे से पहले पार्टी में इस्तीफों का एक दौर चला जिसकी शुरुआत 2009 में मन्दसौर संसदीय क्षेत्र से मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ बगावत करके निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले राजेन्द्र सिंह गौतम को समन्वय समिति में सदस्य बनाए जाने से हुई, जिसके बाद मीनाक्षी नटराजन और उनके समर्थक खासे नाराज नजर आये बाद में मंदसौर के कई नेताओं द्वारा पार्टी की सदस्यता से ही इस्तीफा देने की ख़बरें आयीं. खुद मीनाक्षी नटराजन के चुनाव घोषणा पत्र कमेटी से इस्तीफा देने की खबरें आयीं. राजेन्द्र सिंह गौतम को सिंधिया समर्थक माना जाता है. बाद में आलाकमान के दबाव में किसी तरह से ऊपरी तौर पर इस मामले को शांति किया गया.
पंद्रह जून को भोपाल में आयोजित हुये 'सत्ता बचाओ-संविधान बचाओ' के यात्रा के समापन कार्यक्रम के दौरान तो आपसी गुटबाजी पर्चेबाजी में बदल गयी और इस बार निशाने पर ज्योतिरादित्य राव सिंधिया थे. कार्यक्रम के दौरान उनके विरोध में खुले आम पर्चे बांटे गये जिसमें मुंगावली और कोलारस की जीत का श्रेय सिर्फ सिंधिया को दिये जाने को लेकर सवाल खड़े किये गये थे और यह बताया गया था कि यह अकेले सिंधिया की जीत नही है बल्कि इसमें दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की भी बड़ी भूमिका रही है. पर्चा बांटने वाले अशोकनगर के पूर्व ब्लॉक अध्यक्ष अशोक शर्मा दिग्विजय सिंह के समर्थक बताये जाते हैं. अजय सिंह ने अपनी न्याय यात्रा के दौरान भी ज्योतिरादित्य सिंधिया को पूरी तरह से इगनोरे किया जबकि वे चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष हैं, बाद में मीडिया में इस सम्बन्ध में खबरें आने के बाद यात्रा के वाहन और प्रचार सामग्रियों में सिंधिया के फोटो को भी जगह दी गयी.

इधर पार्टी में एकजुटता के लिये यात्रा पर निकले दिग्विजय सिंह द्वारा 'हिंदू आतंकवाद' पर बयान देकर भाजपा को उसके पसंदीदा पाले में खेलने का मौका दे दिया है, हालांकि अपने इस बयान में उन्होंने आतंकवाद को हिन्दू धर्म से नहीं बल्कि संघ से जोड़ने की कोशिश की थी लेकिन चुनाव से ठीक पहले उनके इस बयान से पार्टी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. एक ऐसे समय में जब कांग्रेस पार्टी सत्ताधारी भाजपा को किसानों और दूसरे जमीनी मुदों पर घेरने में कामयाब नजर आ रही थी दिग्विजय सिंह के इस बयान ने भाजपा को हमलावर होने का मौका दे दिया है. चुनाव के दौरान अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी दिग्विजय सिंह के इस बयान को भुनाने की कोशिश जरूर करेगी जिसमें यह साबित किया जाएगा कि दिग्विजय सिंह ने हिन्दुओं को आतंकवादी कहा था.

इधर कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाने में अब दो गुजराती भी शामिल हो गये हैं जिसमें एक पहले से ही मैदान में हैं और दूसरे बस आने ही वाले हैं. दीपक बावरिया को जबसे प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है,वो अपने बयानों और फैसलों और नये विवादों को जन्म दे रहे हैं. पार्टी अभी तक इस पहेली को ही नही सुलझा पायी थी कि मध्यप्रदेश में पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद का चेहरा कौन होगा लेकिन दीपक बावरिया ने भावी कांग्रेस सरकार के डिप्टी सीएम का ऐलान कर दिया है. पिछले दिनों उन्होंने बयान दिया है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने पर दलितों को वरीयता दी जाएगी और सरकार बनने पर सुरेंद्र चौधरी उप मुख्यमंत्री बनेंगे जिसके बाद से पार्टी में घमासान मचा हुआ है तब कमलनाथ को कहना पड़ा कि “जिन्होंने बयान दिया है उन्हीं से पूछें, वे ही बताएंगे”.
हाल ही में मधुसूदन मिस्‍त्री को मध्यप्रदेश में स्‍क्रीनिंग कमेटी का चेयरमैन बनाया गया है. मिस्‍त्री 2013 में भी मध्य प्रदेश में कांग्रेस की स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन थे उस समय उनके व्‍यवहार और प्रत्याशियों के चयन को लेकर कई नेताओं के साथ मतभेद सामने आये थे. कांग्रेस के नेता इस बार भी इसी के दोहराव की आशंका जाता रहे हैं.

इसके मुकाबले सत्तधारी भाजपा को देखें तो डर और डंडे के बल पर ही सही लेकिन एकजुटता नजर आ रही है, कभी नरेंद्र मोदी के साथ प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल रहे शिवराजसिंह पार्टी आलाकमान के प्रति इस कदर समर्पण की भावना में हैं कि उन्हें अपने पूरे जीवन में सिर्फ दो ही महापुरुष दिखाई पड़ रहे हैं पहले महात्मा गांधी और दूसरे नरेंद्र मोदी .

ऐसा कई लोगों का मानना है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की गुटबाजी का फायदा उठाकर ही भाजपा इतने लम्बे समय तक सत्ता में कायम रह सकी है. सूबे में पार्टी के करीब आधा दर्जन कद्दावर नेता हैं जिनकी अपनी-अपनी डफली है और उनके सुरों का अलग होना भी स्वाभाविक है. लेकिन गुटबाज़ी जो अब नासूर बन चुकी है तभी तो इस बात पर सहमति होने के बवाजूद कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की वापसी की चाभी एकजुटता ही में है, पार्टी के नेता इस पर अमल नहीं कर पा रहे हैं.

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