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आत्मनिर्भर भारत की नई उड़ान: ईवी और हाइब्रिड बैटरियों का संगम

आत्मनिर्भर भारत की नई उड़ान: ईवी और हाइब्रिड बैटरियों का संगम
  • PublishedAugust 28, 2025

कभी पूरी तरह से आयात पर निर्भर रहने वाला भारत आज बैटरियों, इलेक्ट्रिक वाहनों और हाइब्रिड तकनीक का ग्लोबल एक्सपोर्टर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। गुजरात के हंसलपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा Maruti Suzuki की पहली बैटरी इलेक्ट्रिक SUV e-Vitara का उद्घाटन और देश में हाइब्रिड बैटरी इलेक्ट्रोड उत्पादन की शुरुआत का शुभारंभ इस दिशा में बड़ा कदम है। यह आत्मनिर्भरता और स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं के विकास में बड़ा बदलाव है जो वाकई ‘मेक इन इंडिया’ से ‘मेक फॉर द वर्ल्ड’ की यात्रा को और सशक्त बनाने वाला है। EV के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, आने वाले वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था, रोजगार और निर्यात पर गहरा प्रभाव डालेगी।

मोदी सरकार और ईवी नीति की रूपरेखा

2014 के बाद से नरेंद्र मोदी सरकार ने इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को केवल पर्यावरणीय मजबूरी के रूप में नहीं देखा बल्कि इसे औद्योगिक आत्मनिर्भरता और रोजगार निर्माण का एक बड़ा साधन बनाया। एक तरफ फेम-इंडिया (FAME I और II) जैसी योजनाओं ने ईवी अपनाने को बढ़ावा दिया तो उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) स्कीम ने बैटरी और कंपोनेंट निर्माण के लिए भारी निवेश आकर्षित किया। 2025 तक भारत सरकार का लक्ष्य है कि ईवी बिक्री का हिस्सा कुल वाहन बिक्री में 30% तक पहुंचे। अभी भारत में लगभग 25 लाख से अधिक ईवी सड़क पर हैं और पिछले साल की तुलना में इस क्षेत्र में 40% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।

हाइब्रिड बैटरी मैन्युफैक्चरिंग भारत के लिए नया अध्याय

अब जब भारत में हाइब्रिड बैटरी इलेक्ट्रोड मैन्युफैक्चरिंग शुरू हो चुकी है तो इसके परिणाम केवल औद्योगिक उत्पादन तक सीमित नहीं रहेंगे। पहले भारत लिथियम-आयन सेल्स और बैटरियों के लिए लगभग 90% आयात चीन और दक्षिण कोरिया से करता था जिससे विदेशी मुद्रा पर दबाव और सप्लाई चेन की असुरक्षा बनी रहती थी। गुजरात में शुरू हुई इस पहल से भारत आयात-निर्भरता को घटाकर न केवल आत्मनिर्भर बनेगा बल्कि ‘नेट एक्सपोर्टर’ की स्थिति तक पहुंच सकेगा।

चीन और यूरोप बनाम भारत

आज चीन दुनिया का सबसे बड़ा ईवी निर्यातक है, जिसने 2024 में करीब 5.2 मिलियन ईवी निर्यात किए। यूरोप, विशेषकर जर्मनी और फ्रांस, ने भी ईवी उत्पादन और बैटरी तकनीक में भारी निवेश किया है। भारत की स्थिति अभी शुरुआती है लेकिन इसकी खासियत ‘किफ़ायती ईवी मॉडल’ और ‘बड़े घरेलू बाज़ार’ में है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भारत अपनी उत्पादन क्षमता को 2030 तक 10 मिलियन यूनिट्स वार्षिक तक ले जाने में कामयब रहा तो वह चीन और यूरोप के बाद तीसरा सबसे बड़ा ईवी निर्यातक बन सकता है। मोदी सरकार इस दिशा में तेजी से कदम उठाती नजर आ रही है।

रोजगार और ‘स्किल इंडिया’ से जुड़ाव

ईवी इंडस्ट्री केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसमें डिजाइन, रिसर्च, सॉफ्टवेयर, बैटरी तकनीक, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और आफ्टर-सेल्स सर्विस जैसे अनेक क्षेत्र शामिल हैं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ईवी सेक्टर 2030 तक लगभग 1 करोड़ नौकरियों के सीधे और अप्रत्यक्ष अवसर पैदा कर सकता है। ‘स्किल इंडिया’ मिशन के तहत खासतौर पर बैटरी प्रबंधन, चार्जिंग स्टेशन तकनीशियन और ईवी रिपेयरिंग में युवाओं को प्रशिक्षित किया जा रहा है। इससे न केवल रोजगार बढ़ेगा बल्कि तकनीकी दक्षता भी विकसित होगी, जिससे भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती आएगी।

औद्योगिक ज़ोन और ईवी क्लस्टर्स

भारत सरकार और राज्य सरकारें मिलकर कई जगह ‘ईवी इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स’ विकसित कर रही हैं। तमिलनाडु, कर्नाटक, गुजरात और उत्तर प्रदेश में पहले से ही ईवी हब बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इन क्लस्टर्स में बैटरी निर्माण, वाहन असेंबली, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसर्च-डेवलपमेंट को एक ही जगह इकट्ठा किया जा रहा है। इस मॉडल से लागत घटेगी, सप्लाई चेन तेज होगी और निर्यात की संभावना भी बढ़ेगी। चीन ने जिस ‘EV cluster model’ से सफलता पाई, उसी का भारतीय संस्करण अब आकार ले रहा है।

दूरदर्शी सोच से आए परिणाम

गुजरात में ईवी क्रांति की यह कहानी दरअसल 2012 में लिखी गई थी, जब नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे। उस समय उन्होंने मारुति सुज़ुकी को हंसलपुर में जमीन अलॉट की थी। शुरुआत में यह फैसला आसान नहीं था। स्थानीय राजनीति, ज़मीन अधिग्रहण और औद्योगिक असहमति जैसी चुनौतियां थीं लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी ने उस समय औद्योगिक विकास को भविष्य की प्राथमिकता माना और निवेशकों को भरोसा दिलाया। परिणाम यह हुआ कि आज वही इलाका एक प्रमुख ऑटो हब के रूप में जाना जाता है और हजारों युवाओं को रोजगार मिल रहा है। उस निर्णय की दूरगामी सोच ने ही आज गुजरात को भारत का ‘ईवी गेटवे’ बना दिया है।

निर्यात और भारतीय अर्थव्यवस्था का नया चेहरा

अब जब भारत के ईवी 100 से अधिक देशों में निर्यात के लिए तैयार हैं, तो यह केवल ऑटो इंडस्ट्री की सफलता नहीं है बल्कि यह ‘ब्रांड इंडिया’ की साख को भी वैश्विक स्तर पर मजबूत करेगा। अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भारत आने वाले पांच सालों में अपनी ईवी निर्यात क्षमता को वार्षिक 50 बिलियन डॉलर तक ले जाता है तो यह अकेला सेक्टर ही भारत की जीडीपी में 1.5% अतिरिक्त योगदान दे सकता है।

भविष्य की संभावनाएं?

भारत की ईवी यात्रा केवल वाहनों तक सीमित नहीं है। यह ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन, विदेशी मुद्रा बचत और औद्योगिक आत्मनिर्भरता की कहानी है। हाइब्रिड बैटरी प्लांट का उद्घाटन इस यात्रा का नया अध्याय है। आने वाले वर्षों में यह पहल भारत को न केवल दुनिया के सबसे बड़े ईवी बाज़ारों में शामिल करेगी बल्कि वैश्विक निर्यातक की श्रेणी में भी मजबूती से खड़ा करेगी।

आत्मनिर्भर भारत की नई पहचान

भारत आज जिस रास्ते पर चल पड़ा है, वह उसे ‘आयात-निर्भर उपभोक्ता’ से ‘आत्मनिर्भर आपूर्तिकर्ता’ बनाने की ओर ले जाएगा। जब आने वाले सालों में दुनिया के कई देशों की सड़कों पर ‘मेड इन इंडिया’ ईवी दौड़ेंगी तो यह केवल औद्योगिक उपलब्धि नहीं होगी बल्कि राष्ट्रीय गर्व और आर्थिक शक्ति की नई पहचान होगी।