सावन माह में विशेष: नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, शिव ने यहां अपनी दिव्य उपस्थिति बनाए रखने का वचन दिया था

भारत में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है। गुजरात में सौराष्ट्र के तट पर, द्वारका शहर और बेट द्वारका द्वीप के बीच के रास्ते पर भगवान शिव का यह महत्वपूर्ण मंदिर स्थित है। यह दुनिया के 12 स्वयंभू (अपने-आप प्रकट हुए) ज्योतिर्लिंगों में से नागेश्वर मंदिर के गर्भगृह में स्थापित है। शिव पुराण की परंपरा के अनुसार, भगवान शिव ने भक्तों की रक्षा करने और उन्हें नागेश्वर यानी नागों के देवता के रूप में आशीर्वाद देने के लिए दारुकावन में अवतार लिया था।
‘सावन माह में विशेष’ की कड़ी में हम आपको सावन (श्रावण) के प्रारंभ से भारत में स्थित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में बता रहे हैं। इससे पहले, आपने प्रथम सोमनाथ, दूसरे मल्लिकार्जुन, तीसरे महाकालेश्वर, चौथे ओंकारेश्वर, पांचवें केदारेश्वर और छठें भीमाशंकर, सातवें विश्वेश्वर, आठवें त्र्यंबकेश्वर, नवें बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के बारे में पढ़ा। आज आप दसवें, नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में जानेंगे।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति
देवभूमि द्वारिका की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, नागेश्वर को ‘दारुकावन’ के नाम से जाना जाता था, जो भारत के एक जंगल का प्राचीन पौराणिक नाम है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, ‘बालखिल्य’ नामक बौने ऋषियों के एक समूह ने दारुकावन में लंबे समय तक भगवान शिव की पूजा की थी। उनकी भक्ति और धैर्य की परीक्षा लेने के लिए, शिव उनके पास एक नग्न तपस्वी के रूप में आए, जिनके शरीर पर केवल नाग लिपटे हुए थे। ऋषियों की पत्नियां उस संत की ओर आकर्षित हो गईं और अपने पतियों को छोड़कर उनके पीछे चली गईं।
इससे ऋषि-मुनि बहुत परेशान और क्रोधित हो गए। उन्होंने अपना धैर्य खो दिया और उस तपस्वी को श्राप दिया कि उसका लिंग गिर जाए (इसके कई अर्थों में से एक अर्थ पुरुष जननांग है, लेकिन इसका एक गहरा आध्यात्मिक और धार्मिक प्रतीक-अर्थ भी है)। जब शिवलिंग धरती पर गिरा और पूरी दुनिया कांप उठी। भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु भगवान शिव के पास आए और उनसे धरती को विनाश से बचाने और अपना लिंग वापस लेने का अनुरोध किया।
शिव ने उन्हें सांत्वना दी और अपना लिंग वापस ले लिया। (वामन पुराण, अध्याय 6 और 45 से)। तब से भगवान शिव ने दारुकवन में हमेशा ‘ज्योतिर्लिंग’ के रूप में अपनी दिव्य उपस्थिति बनाए रखने का वचन दिया।
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तुति में भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग को दारूकावन क्षेत्र में ही वर्णित किया गया है। महात्म्य के अनुसार जो आदरपूर्वक इस शिवलिंग की उत्पत्ति एवं महात्म्य को सुनेगा और इसके दर्शन करेगा, वह सभी पापों से मुक्त होकर समस्त सुखों को भोगता हुआ अंततः परमपद को प्राप्त होगा।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, यहीं पर दारुका नामक एक राक्षस ने शिव भक्त सुप्रिया को कैद कर लिया था। सुप्रिया द्वारा ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करने से भगवान शिव क्रोधित हुए और उन्होंने यहां आकर राक्षस का वध किया। यहां एक स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ, जिसकी आज भी पूजा की जाती है।
नागेश्वर मंदिर
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर देवभूमि द्वारका से लगभग 17 से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसे दारुकावन (Darukavana) और नागनाथ मंदिर भी कहा जाता है। यहां भगवान शिव की 80 फीट ऊंची विशाल मूर्ति मुख्य आकर्षण है। नागेश्वर मंदिर के एक विशाल हॉल के अंत में शिवलिंगयुक्त मुख्य गर्भ गृह है। यहां स्थित शिवलिंग भूमिगत गर्भगृह में है और इसे ‘द्वारिका शिला’ कहा जाता है। दिव्य नागेश्वर शिव लिंग छोटे-छोटे चक्रों से सजा हुआ है और इसका आकार तीन-मुखी रुद्राक्ष जैसा है। शिव पुराण के अनुसार, इस पवित्र लिंगम की पूजा करने से ज़हर, सांप के काटने और सांसारिक प्रलोभनों से सुरक्षा मिलती है।
मंदिर का डिज़ाइन वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित है और यह मानव शरीर की ‘शयन’ (सोने की) मुद्रा पर बना है। जब आप बहुत बारीकी से बनाई गई शिव मूर्ति के पास पहुंचेंगे, तो प्राचीन कारीगरों की कलाकारी देखकर आप हैरान रह जाएंगे। उनकी विरासत इस स्मारक की हर बारीक डिटेल और इसके विशाल आकार में सुरक्षित है।
मंदिर के पास ही एक और महत्वपूर्ण आध्यात्मिक स्थल है जिसे ‘गोपी तालाब तीर्थ’ कहा जाता है। इस झील से जुड़ी कहानी भगवान कृष्ण के बचपन से जुड़ी है।वृंदावन की गोपियां उनका आदर करती थीं, जब कृष्ण ने अपनी राजधानी द्वारका स्थानांतरित की, तो गोपियां उनसे विमुख होना सहन नहीं कर सकीं। वे उनसे मिलने द्वारका आईं और शरद पूर्णिमा के दिन रास किया। रास के बाद, उन्होंने इस भूमि को अपने प्राणों का अर्पण किया और भगवान कृष्ण में विलीन हो गईं। यहां की मिट्टी महीन और चिकनी है, जिसका रंग पीला है और माना जाता है कि इसमें दिव्य गुण हैं जो कई रोगों, विशेषकर त्वचा संबंधी रोगों को ठीक कर सकते हैं। इसे गोपी चंदन के नाम से जाना जाता है। यहां आने वाले लोग अपनी यात्रा के स्मृति चिह्न के रूप में इसे खरीदते हैं।
इस मंदिर से जुडी अन्य कथा के अनुसार, द्वापर युग में जब द्युत (जूआ अथवा शतरंजी/पासे का खेल) के खेल में कौरवों द्वारा पांचों पांडवों को पराजित किया गया था, तो द्यूत की शर्तों के अनुसार पांडवों को 12 वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास की सजा सुनाई गई थी। इस बीच, पांडवों ने पूरे भारत में भ्रमण किया। घूमते-घूमते वे इस दारुकावन में आ गए और इस स्थान पर उनके साथ एक गाय भी थी, वह गाय प्रतिदिन सरोवर में उतरकर दूध देती थी। एक बार भीम ने यह देखा और अगले दिन वह गाय का पीछा करते हुए सरोवर में उतर गया और उसने भगवान महादेव को देखा तो उसने देखा कि गाय हर दिन शिवलिंग को दुध छोड रही थी।
तब पांचों पांडवों ने उस सरोवर को नष्ट करने का निश्चय किया। और वीर भीम ने अपनी गदा से उस सरोवर के चारों ओर पर प्रहार किया और सभी ने महादेव के इस शिवलिंग दर्शन किये। श्री कृष्ण ने उन्हें उस शिवलिंग के बारे में बताया और कहा यह शिवलिंग कोई साधारण नही है , यह नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है। तब पांचों पांडवों ने उस स्थान पर भूतल पर स्थित ज्योतिर्लिंग का भव्य अखंड पत्थर (जिसे मोनोलिथ या Monolith भी कहते हैं) का मंदिर बनवाया।
और फिर से समय के साथ वर्तमान मंदिर हेमाडपंथी शैली (Hemadpanthi Style) में सेउना (यादव) वंश द्वारा बनाया गया था और कहा जाता है कि यह 13 वीं शताब्दी का है, इसे सात मंजिला पत्थर की इमारत का बनाया था। बाद में छत्रपति संभाजी महाराज के शासनकाल में औरंगजेब ने इस मंदिर की इमारतों को नष्ट कर दिया। मंदिर के वर्तमान शिखर का पुनर्निर्माण अहिल्याबाई होल्कर द्वारा किया गया था। यह मंदिर द्वारका आने वाले उन तीर्थयात्रियों के लिए एक पवित्र स्थान बना हुआ है जो दर्शन, संकल्प और शांतिपूर्ण पूजा करना चाहते हैं।
पूजा और कार्यक्रम
नागेश्वर मंदिर में रुद्राभिषेक, लघुरुद्राभिषेक मुख्य पूजा हैं। जलाभिषेक में सुबह के समय भक्त दूध चढ़ाते हैं। यहां धातु से बने नाग-नागिन भी अर्पित किए जाते हैं। जिसकी मान्यता है कि नाग दोष से मुक्ति मिलती है। महा शिवरात्रि (फरवरी/मार्च) में यहां विशाल मेला लगता है। हजारों श्रद्धालु आते हैं और इस दिन मंदिर पूरे दिन-रात खुला रहता है। श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) में हर सोमवार को विशेष पूजा और अनुष्ठान होते हैं। इसके अलावा, कार्तिक पूर्णिमा मेला, दिवाली, गोलोकधाम उत्सव भी यहां धूमधाम से मनाए जाते हैं। यदि आप मंदिर को उसके पूर्ण वैभव में देखना चाहते हैं तो आप पूर्णिमा की शाम को इसके दर्शन कर सकते हैं।
