प्रमुख खबरें

बाघों का संरक्षण वनों, जलक्षेत्रों और समृद्ध जैव विविधता की भी रक्षा करता है: भूपेंद्र यादव

बाघों का संरक्षण वनों, जलक्षेत्रों और समृद्ध जैव विविधता की भी रक्षा करता है: भूपेंद्र यादव
  • PublishedJune 29, 2026

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि बाघ संरक्षण केवल एक प्रजाति की रक्षा करने के बारे में नहीं है, बल्कि वनों, जलक्षेत्रों और समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण के बारे में भी है, जो बाघों के आवास का हिस्‍सा है। बाघ संरक्षण में देश की उपलब्धियों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में बाघ अभ्यारण्यों की संख्या 46 से बढ़कर 58 हो गई है। यादव ने यह भी बताया कि भारत ने 2022 तक वनों में बाघों की आबादी को दोगुना करने के सेंट पीटर्सबर्ग घोषणा के लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्‍त कर लिया है।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने रविवार को राजस्थान के अलवर में “बाघों का पुनर्वास अवसर और चुनौतियां” विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन किया और बाघ संरक्षण और प्रोजेक्‍ट चीता पर तीन प्रकाशनों का विमोचन किया। यादव ने सरिस्का बाघ पुनर्वास कार्यक्रम को वन्यजीव संरक्षण में एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए कहा कि यह विश्व में बाघों का पहला सफल वैज्ञानिक पुनर्वास है जो उस क्षेत्र में किया गया है जहां यह प्रजाति स्थानीय रूप से विलुप्त हो गई थी।

उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम वैज्ञानिक प्रबंधन, समर्पित संरक्षण प्रयासों और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से प्रजातियों के पुनर्वास का एक सफल वैश्विक उदाहरण है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पन्ना और सरिस्का में बाघों का सफल पुनर्वास स्थानीय समुदायों के सहयोग और भागीदारी के कारण ही संभव हो पाया है। उन्होंने उल्लेख किया कि ओडिशा के सतकोसिया बाघ अभ्यारण्य में सामुदायिक सहयोग की कमी के कारण ऐसी सफलता प्राप्त नहीं की जा सकी।

यादव ने कहा कि प्रोजेक्ट चीता की सफलता में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी का भी बड़ा योगदान रहा है। केंद्रीय मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि देश और विदेश से पर्यटकों को आकर्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन स्थानीय समुदायों के कल्याण और हितों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

यादव ने यह भी कहा कि जिन भू-भागों में बाघों और हाथियों का वितरण क्षेत्र एक दूसरे से मिलता-जुलता है, वहां भू-भाग की परस्पर संबद्धता को बनाए रखने और मजबूत करने पर जोर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कार्यशाला में बाघों के पुनर्वास के संभावित स्रोत और कम होते क्षेत्रों का विश्लेषण किया जाना चाहिए और उन कारकों पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए जिन्होंने बाघों के सफल पुनर्वास कार्यक्रमों में योगदान दिया है। उन्होंने आगे कहा कि कार्यशाला में बाघों के पुनर्वास के वैज्ञानिक प्रबंधन पर भी विचार किया जाएगा।

वहीं, संतुलित संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए यादव ने कहा, “हमारी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि हमारे बाघों की रक्षा हो, हमारे वन हरे-भरे और स्वस्थ रहें और स्थानीय समुदाय समृद्ध होते रहें।”

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल बाघों की रक्षा करना ही नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि कोई भी प्रजाति विलुप्त न हो और संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण और पुनर्वास के लिए निरंतर प्रयास किए जाएं। उन्होंने कहा कि प्रकृति के संरक्षक के रूप में, संरक्षण प्रयास वैज्ञानिक और मानवीय मूल्यों पर आधारित हो।

इस अवसर पर यादव ने तीन महत्वपूर्ण प्रकाशनों- भारत में बाघों के सक्रिय प्रबंधन पर रोड मैप, भारत में बाघों के संरक्षण और पुनर्वास पर पुस्तिका और प्रोजेक्‍ट चीता की वार्षिक रिपोर्ट (सितंबर 2024-दिसंबर 2025) का विमोचन किया।