सुधार से ‘डर’ के पीछे का सियासी मकसद? SIR विवाद की असल हकीकत

बिहार की चुनावी बिसात पर लगातार दिल्ली से लेकर पटना तक विपक्ष द्वारा SIR प्रक्रिया की आड़ में चाल चली जा रही हैं। धीरे-धीरे विपक्ष अपनी ही इन चाल में फंसता नजर आ रहा है। विरोधाभास देखिए, जब आयोग किसी गड़बड़ी पर कार्रवाई नहीं करे तो शिकायत और जब कार्रवाई करे तो वही कार्रवाई ‘साजिश’ नजर आती है। हैरत की बात है कि जो विपक्ष लगातार SIR को ‘लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला’ बता रहा है वह एक भी ऐसे मामले की लिखित शिकायत नहीं कर पाया है कि जिसमें गलत तरीके से मतदाता का नाम हटा दिया गया हो। कर्नाटक के सहकारिता मंत्री केएन राजन्ना की बर्खास्तगी का मामला भी इस दोहरे रवैये की मिसाल है, क्योंकि जो दल सवालों का जवाब न देने के आरोप लगाता है वही एक मंत्री को सवाल पूछने पर तुरंत निष्कासित कर देता है।
क्या विपक्ष का मकसद मतदाता सूची की शुद्धता है या फिर चुनावी माहौल में आयोग की साख पर राजनीतिक चोट करना भर?
ऐसे में अब सवाल यह नहीं है कि चुनाव आयोग ने कदम क्यों उठाया बल्कि यह है कि क्या विपक्ष का मकसद मतदाता सूची की शुद्धता है या फिर चुनावी माहौल में आयोग की साख पर राजनीतिक चोट करना भर है। तथ्य यह है कि SIR प्रक्रिया न केवल कानूनी दायरे (Representation of the People Act, 1950 और Registration of Electors Rules, 1960) में संचालित है बल्कि इसका मकसद लोकतांत्रिक ढांचे की रक्षा है, न कि उसे कमजोर करना।
सुधार प्रक्रिया जरूरी या राजनीति?
हाल ही में बिहार में SIR के तहत प्रकाशित ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से लगभग 65 लाख नाम हटाए गए, जिन्हें विपक्ष ने लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला मान लिया। लेकिन चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया कि ‘ड्राफ्ट’ रोल में नाम न होना ‘विलोपन’ नहीं है बल्कि प्रारंभिक सूची भरने की एक प्रक्रिया है। जो नाम हटाए गए हैं, वे अपनी पहचान और दस्तावेजों (जैसे कि फॉर्म-6) के जरिए पुनः सूची में जोड़े जा सकते हैं।
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नाम हटने के बाद भी इच्छुक नागरिक दावे और आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं
सुप्रीम कोर्ट के सामने आयोग यह भी बता चुका है कि ‘नाम हटाए जाने’ के बाद भी इच्छुक नागरिकों के पास ‘claims and objections’ (दावे और आपत्तियां) प्रस्तुत करने का अवसर है। साथ ही, यह स्पष्ट किया गया कि ड्राफ्ट रोल में नाम न होना एक अस्थायी चरण है और स्थायी विलोपन तभी होता है जब सुनवाई और कारण सहित आदेश पारित हो जो एक उचित प्रक्रिया का हिस्सा है।
विपक्ष के डर और भ्रम को समझने के लिए SIR की पूरी प्रक्रिया को समझने की जरूरत
इन तथ्यों से स्पष्ट है कि चुनाव आयोग ने एक विधिक, सुनियोजित और नागरिकों को सुनने व विकल्प उपलब्ध कराने वाली प्रक्रिया अपनाई है, न कि निष्पक्षता को दरकिनार करने वाली कोई रणनीति। वहीं, विपक्षी दलों का तरीका एकतरफा संवाद का नजर आ रहा है यानि की जो वो कह रहे हैं सिर्फ वही सही मान लिया जाए, बिना वाजिब तथ्यों के भी। विपक्ष के डर और भ्रम को समझने के लिए SIR की पूरी प्रक्रिया को भी समझना जरूरी है।
SIR की पूरी प्रक्रिया क्या है?
जब विपक्षी गठबंधन ने SIR प्रक्रिया पर कटाक्ष किया तो चुनाव आयोग ने उनकी मांगों को नजरअंदाज नहीं किया। आयोग ने SIR से जुड़े दस्तावेज साझा किए और स्पष्ट किया कि BLA-BLO स्तर पर भी सहयोग और रिपोर्टिंग की व्यवस्था है। विशेषतः BLO ने आयोग को 65 लाख नामों की सूची दी, जिसमें मृत, पलायन और पता-अज्ञात मतदाता शामिल थे। चुनाव आयोग ने SIR के दौरान हटाए गए नामों के आंकड़े भी सुप्रीम कोर्ट और आम जनता के सामने रखे। इस प्रक्रिया में 22 लाख मृत मतदाता, 36 लाख पलायन या अनट्रेसेबल मतदाता, 7 लाख डुप्लीकेट/एक से अधिक रजिस्ट्रेशन वाले पाए गए। यह कुल मिलाकर लगभग 65 लाख मतदाता बनते हैं जो बिहार की कुल मतदाता संख्या (लगभग 7.24 करोड़) का लगभग 8–9% है।
प्रत्येक विलोपन का कारण स्पष्ट किया जाता है और सुनवाई का ऑप्शन रहता है
इस प्रक्रिया के अंतर्गत आयोग ने SMS alerts भेजकर 5.7 करोड़ मोबाइल यूजर्स को सूचित किया। BLO-BLA-ERO चेन के अंतर्गत BLO घर-घर फॉर्म वितरित करता है; ERO संदिग्धों की जांच करता है, CEO लेवल तक इस पूरी प्रक्रिया का ऑब्जर्वेशन होता है। प्रत्येक विलोपन का कारण स्पष्ट किया जाता है और सुनवाई का ऑप्शन रहता है। इसके बावजूद अभी तक किसी भी BLA ने आपत्ति तक नहीं दायर की है।
विपक्ष का यह आरोप कि आयोग फर्जी वोट बना रहा है, तथ्यों से परे और महज़ आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा प्रतीत होता है
न केवल ड्राफ्ट रोल प्रकाशित करना, बल्कि राजनीतिक दलों को डेटा उपलब्ध कराना और BLA-BLO स्तर पर मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करना, यह सम्पूर्ण प्रक्रिया चुनाव आयोग की जवाबदेही और पारदर्शिता का परिचायक है। इसके विपरीत, विपक्ष की टिप्पणी कि आयोग फर्जी वोट बना रहा है तथ्यों पर आधारित नहीं बल्कि केवल आरोप-प्रत्यारोप का खेल प्रतीत होता है।
सवालों पर दोहरा रवैया?
एक तरफ कांग्रेस पार्टी आयोग पर सवालों का जवाब न देने का आरोप लगा रही है वहीं उसका खुद का इस नजरिए पर दोहरा रवैया सामने आया है। राज्य स्तर पर, कर्नाटक के मंत्री केएन राजन्ना ने राहुल गांधी के कथित ‘वोट चोरी’ अभियान की राजनीति का विरोध करते हुए यह कहा कि ‘जब वोटर लिस्ट बन रही थी तब कांग्रेस नेता खामोश क्यों थे।’ इन टिप्पणियों के छह घंटे के भीतर ही उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया। यह पूरा घटनाक्रम विपक्ष के दोहरे रवैये की राजनीति को उजागर करता है, जिससे उनकी मंशा पर सवाल उठना लाजमी है क्योंकि ऐसा ही बिहार में हो रहा है।
निशाने पर इस बार ईवीएम की जगह वोटर लिस्ट होगी
बिहार में जब SIR के आंकड़े सबके सामने रखे जा रहे हैं तब विपक्ष इसमें कोई कमी नहीं निकाल पा रहा इसके उलट संसद में और सड़क पर विरोध किया जा रहा है। इससे साबित होता है कि विपक्ष कहीं न कहीं परिणाम उनके पक्ष में न आने के डर को ध्यान में रखते हुए एक नैरेटिव गढ़ने की तैयारी कर रहा है ताकि हमेशा की तरह एक बार फिर हार का ठीकरा आयोग पर फोड़ा जा सके। फर्क सिर्फ इतना होगा कि निशाने पर इस बार ईवीएम की जगह वोटर लिस्ट होगी।
सुधार की बजाय स्थिति को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश
कुल मिलाकर चुनाव आयोग की कार्रवाई, विशेषकर बिहार में SIR प्रक्रिया, विधिक, सुनियोजित और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से संचालित नजर आती है। ड्राफ्ट रोल, claims and objections, BLA-BLO नेटवर्क और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी- सब इस बात के संकेत हैं कि आयोग स्वतंत्र संस्था के रूप में काम कर रहा है। सामाजिक और राजनीतिक विरोध, विशेषकर विपक्षी दलों की आलोचनाएं अक्सर संस्थागत सुधार की बजाय स्थिति को राजनीतिक मुद्दा बनाने पर केंद्रित दिखाई देती हैं।विपक्ष के ‘वोट चोरी’ और ‘नाम कटना’ जैसे आरोपों में तथ्य-आधारित सुधार पर अपेक्षाकृत कम जोर है। यह स्पष्ट करता है कि विपक्ष की कथित लोकतांत्रिक तर्क-वाद की राजनीति नियंत्रित और रणनीतिक है, न कि व्यवस्था सुधार-उन्मुख।
