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बरेली। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को रूहेलखंड विश्वविद्यालय में 'भारत का भविष्य' विषयक संगोष्ठी में संविधान की तस्वीर का खाका खींच दिया। भागवत ने कहा कि देश संविधान की व्यवस्था से चलता है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने संगोष्ठी में हिन्दुत्व का अर्थ बताया।मोहन भागवत ने कहा कि जब आरएसएस के कार्यकर्ता कहते हैं कि यह देश हिंदुओं का है और 130 करोड़ लोग हिंदू हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम किसी का धर्म, भाषा या जाति बदलना चाहते हैं... हमें संविधान से इतर कोई केंद्र शक्ति नहीं चाहिए क्योंकि हम इस पर विश्वास करते हैं। भागवत ने कहा कि हमें अपनी विविधता के बावजूद एक साथ रहना होगा, इसे ही हम हिंदुत्व कहते हैं। संविधान कहता है कि हमें भावनात्मक एकीकरण लाने की कोशिश करनी चाहिए। भावना क्या है? वह भावना है- यह देश हमारा है, हम अपने महान पूर्वजों के वंशज हैं।भागवत ने कहा कि हमें अपनी विविधता के बावजूद एक साथ रहना होगा, इसे ही हम हिंदुत्व कहते हैं। भारत का प्रत्येक नागरिक हिंदू है और विविधताओं के बावजूद एक साथ रहना ही हिंदुत्व है। भागवत ने हिंदुत्व का मतलब समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि विभिन्न विविधताओं के बावजूद एक साथ रहना ही हिंदुत्व है। उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस संविधान से इतर कोई पावर सेंटर नहीं चाहता है और संघ संविधान पर पूरा विश्वास करता है।उन्होंने संविधान का हवाला देकर इसको समझाया। मोहन भागवत ने कहा कि संविधान में हमें भावनात्मक एकीकरण लाने की कोशिश करनी चाहिए, लेकिन भावना क्या है? वह भावना है कि यह देश हमारा है, हम अपने महान पूर्वजों के वंशज हैं और हमें अपनी विविधता के बावजूद एक साथ रहना होगा। इसे ही हम हिंदुत्व कहते हैं। उन्होंने कहा कि जब आरएसएस के कार्यकर्ता कहते हैं कि यह देश हिंदुओं का है और 130 करोड़ लोग हिंदू हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम किसी का धर्म, भाषा या जाति बदलना चाहते हैं। हम तो किसी भी कीमत पर शक्ति का केंद्र नहीं होना चाहते हैं। हम सिर्फ संविधान पर विश्वास करते हैं और इसके इतर कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान में देश के भविष्य की तस्वीर पूरी तरह साफ है। हमारा संविधान तो प्रारंभ और गंतव्य बताने वाला है, लेकिन पिछले 70 वर्ष में हमने कितनी प्रगति की है यह तो हमें इजरायल जैसे छोटे से देश से सीखने की जरूरत है। जिसने न सिर्फ अपनी आजादी के लिए कई लड़ाई लड़ी और आज वह दुनिया के समृद्धिशाली देशों में से एक है। संघ प्रमुख ने इजराइल का जिक्र करते हुए कहा कि वह दुनिया मे संपन्न देश है। आज उसकी धाक है। उसे हाथ लगाया तो अंजाम भुगतना पड़ेगा।उन्होंने आजादी के समय की परिस्थितियों का जिक्र करते हुए कहा कि आजादी के समय देश की जनसंख्या करोड़ो में थी। देश के खजाने में 16 हजार करोड़ बाकी थे, इंग्लैंड से हमको 30 हजार करोड़ वसूलना था। संघ प्रमुख ने कहा कि समस्या स्वतंत्र होना नहीं है। हम बार-बार गुलाम होते रहे, इसलिए बार-बार स्वतंत्र होते रहे। मुट्ठी भर लोग आते हैं और हमें गुलाम बनाते हैं। ऐसा इसलिए कि हमारी कुछ कमियां है। उन्होंने कहा कि सब एक हैं, तो सब मिलकर रहो। हम सब हिन्दू हैं, हिंदू भाव को जब-जब भूले तब-तब विपत्ति आई।संघ प्रमुख ने कहा कि हम भारत की कल्पना कर रहे हैं, भविष्य का भारत तैयार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि 1940 से पहले तक समाजवादी, कम्युनिस्ट और अन्य सभी राष्ट्रवादी थे। 1947 के बाद बिखरे थे। संघ प्रमुख ने कहा कि भारत रूढ़ियों और कुरीतियों से पूरी तरह मुक्त हो, 7 पापों से दूर रहे और वैसा हो जैसा गांधीजी ने कल्पना की थी। उन्होंने कहा कि देश के संविधान में भविष्य के भारत की कल्पना की गई है।
विरोध का भी स्वागत:-संघ प्रमुख भागवत ने कहा कि हम तो हर विरोध का स्वागत करते हैं। बिना विरोध के सुधार संभव नहीं होता। विरोध किस तरह का हो रहा है, यह भी देखने की बात है। संघ किसी के विरोध में नहीं है। संविधान की मूल भावन के अनुरूप संघ की कल्पना और प्रयास भारत का कद पूरी दुनिया में बढ़ाना है। इसमें सभी को सहयोगी बनने के लिए आगे आना चाहिए। अपने देश के संविधान में भविष्य के भारत की कल्पना की गई है।अपने देश के संविधान में भविष्य के भारत की कल्पना की गई है। संविधान को पढ़िए। स‍ंविधान की प्रस्तावना पढ़िए, नागरिक अधिकार पढ़िए , नागरिक कर्तव्य पढ़िए, मार्गदर्शक तत्वों का प्रकरण पढ़िए। भविष्य के भारत का रुप है। संविधान की मूल प्रति के पन्ने पन्ने पर जो चित्र है, उन चित्रों मेें से उस प्रेरणा का स्रोत आया है। हमारा प्रारंभ बिंदु क्या है हमारा गंतव्य क्या है दोनो को बताने वाला हमारा संविधान है। संविधान को जनता को समर्पित करने के पहले और बाद मे बाबा साहब अंबेडकर के दिए गए दोनों भाषणों में भारत के भविष्य की कल्पना है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत शनिवार शाम शहर में पहुंचे। दो दिवसीय प्रवास के लिए संघ प्रमुख निर्धारित समय आठ बजे से करीब सवा घंटे पहले मुरादाबाद से बरेली पहुंच गए। जीआरएम स्कूल पहुंचे मोहन भागवत ने स्थानीय संघ पदाधिकारियों से मुलाकात की। इसके बाद रात आठ बजे से नौ बजे तक प्रमुख पदाधिकारियों के साथ बैठक हुई। स्कूल परिसर में बने आवास में ही उनके रात्रि विश्रम का इंतजाम किया गया। रविवार दोपहर 3.30 बजे वह शहर से रवाना हो जाएंगे।
कड़ी सुरक्षा व्यवस्था:-संघ प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम को लेकर सुरक्षा बंदोबस्त बेहद सख्त किए गए हैं। मुरादाबाद से बरेली आते वक्त सड़क मार्ग पर भी बेहद चौकसी बरती गई। छह गाडिय़ों के काफिले के साथ संघ प्रमुख तय समय से पहले शहर आ गए। संघ के प्रमुख पदाधिकारियों को ही इसकी जानकारी थी।

नई दिल्ली। डेथ वारंट जारी होने के बाद से ही निर्भया के दोषियों को मौत का खौफ सता रहा है। सूत्रों के मुताबिक विनय के व्यवहार में सबसे अधिक परिवर्तन देखा जा रहा है। बुधवार को वह जेल की अपनी कोठरी में बेसुध हो गया था। आनन फानन में उसे अस्पताल भेजा गया, जहां इलाज किया गया। वह खाना ठीक से नहीं खा रहा है, जिससे धीरे-धीरे कमजोर होता जा रहा है।
विनय के परिजनों ने की मुलाकात:-शुक्रवार को जारी पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा जारी नया डेथ वारंट देर शाम तिहाड़ जेल पहुंच गया, चारों दोषियों को 1 फरवरी को सुबह 6 बजे फांसी दिए जाने के लिए कहा गया है। इससे कुछ देर पहले ही दोषी पवन से उसकी दादी, बहन और पिता ने मुलाकात की, जो करीब आधा घंटे चली। जेल संख्या तीन में ले जाए जाने के बाद किसी दोषी की परिजनों से पहली मुलाकात है। बताते हैं कि जेल संख्या तीन में लाए जाने के बाद दोषियों को नींद नहीं आ रही है। जेल अधिकारी लगातार इन पर नजर रखे हुए हैं। बीच-बीच में आकर इनसे बातचीत करते रहे।
विनय के खुदकुशी की कोशिश की अफवाह को किया खारिज:-जेल अधिकारियों के अनुसार चारों दोषियों के स्वास्थ्य पर पूरी नजर रखी जा रही है। इनका डायट चार्ट भी बनाया जा रहा है ताकि वजन एकाएक कम नहीं हो। हालांकि, गुरुवार को विनय के खुदकशी की कोशिश की अफवाह फैल गई थी। जेल अधिकारियों ने इस बात से साफ-साफ इन्कार कर दिया। जेल अधिकारियों का कहना है कि डेथ वारंट जारी होने के बाद से ही चारों दोषियों पर नजर रखने के लिए चौबीस घंटे एक सुरक्षाकर्मी की डयूटी लगी रहती है। कोठरी के भीतर और बाहर दोनों जगह सुरक्षाकर्मियों को उन पर नजर रखने का निर्देश है। दोषी तनाव में न रहें इसके लिए उनकी काउंसिलिंग भी कराई जा रही है।
फांसी या फांसी घर के बारे में बातचीत की मनाही;-सूत्रों का कहना है कि दोषियों को ऐसे सेल में रखा गया है जहां से फांसी घर नजर नहीं आता है। हालांकि दूरी बहुत कम है। प्रशासन मान रहा है कि यदि फांसी घर इन्हें दिखेगा तो इनके भीतर भय के कारण तनाव हो सकता है। सुरक्षाकर्मियों को हिदायत दी गई है कि दोषियों से फांसी से जुड़े उनके किसी भी सवाल का जवाब न दें।
नहीं जाहिर की कोई इच्छा:जेल सूत्रों का कहना है कि अभी तक दोषियों ने कोई किताब या धार्मिक पुस्तक उपलब्ध कराने की कोई इच्छा जाहिर नहीं की है। प्रशासन का कहना है कि यदि वे इस तरह की कोई इच्छा जाहिर करते हैं तो ध्यान दिया जाएगा।
फांसी पर लटकाने के लिए पूरी तरह स्वस्थ रहना जरूरी:-जेल मैनुअल के अनुसार फांसी पर लटकाने के लिए दोषी का पूरी तरह से स्वस्थ होना जरूरी है। उसका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक रहना चाहिए। इसके लिए जल्द ही मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाएगा। जेल संख्या तीन में उनकी स्वास्थ्य जांच रोजाना हो रही है। यहां तिहाड़ का केंद्रीय अस्पताल भी है। जल्द ही यहां एक वार्ड आरक्षित कर दिया जाएगा ताकि यदि किसी दोषी की तबीयत खराब हो तो उसे भर्ती किया जा सके। वार्ड में सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं ताकि इन पर नजर रखी जा सके। शुक्रवार को चिकित्सकों ने दोषियों की जांच उनके सेल में ही जाकर की।
जानिये 20112 के निर्भया केस के बारे में:-16 दिसंबर को पैरा मेडिकल की छात्रा निर्भया के साथ दक्षिण दिल्ली के वंसत विहार इलाके में चलती बस में दरिंदगी हुई थी। मिली जानकारी के मुताबिक, बस में मौजूद ड्राइवर राम सिंह, एक नाबालिग के अलावा अक्षय सिंह कुमार, विनय कुमार शर्मा, पवन कुमार गुप्ता और मुकेश सिंह ने निर्भया के साथ दरिंदगी की थी। इसी के साथ निर्भया को मानसिक और शारीरिक कष्ट इस कदर दिया कि इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।इसके बाद पूरे देश में गुस्से की लहर दौड़ गई और पूरे देश में प्रदर्शन हुए। इसको देखते हुए केंद्र सरकार के निर्देश पर फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चला था। पहले निचली अदालत, फिर दिल्ली हाईकोर्ट और अंत में सुप्रीम कोर्ट ने चारों दोषियों अक्षय, मुकेश, पवन और विनय की फांसी पर मुहर लगाई, वहीं, राम सिंह ने जेल में ही फांसी लगाकर जान दे दी थी तो अन्य नाबालिग जुवेनाइल कोर्ट में सजा पूरी कर चुका है।

नई दिल्ली:-निर्भया मामले में फांसी की सजा पाए चारों दोषियों में से एक पवन कुमार गुप्ता की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) सोमवार को अहम सुनवाई करेगा। दोषी पवन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें कोर्ट ने घटना के समय उसके नाबालिग होने का दावा करने वाली याचिका खारिज कर दी थी।याचिका पर जस्टिस आर. भानुमति की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ सुनवाई करेगी, जिसमें पीठ के अन्य सदस्य जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस बोपन्ना शामिल हैं। इस सुनवाई में अगर फैसला दिल्ली हाई कोर्ट की तरह रहा तो पवन कुमार गुप्ता के पास फांसी से बचने का यह विकल्प भी खत्म हो जाएगा। वहीं, कोर्ट में दायर याचिका में दोषी पवन कुमार गुप्ता का कहना है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने उसकी दलीलों और सबूतों को अनदेखा करते हुए याचिका खारिज की है। अब सु्प्रीम कोर्ट में दायर याचिका में उसने कहा है कि उसके साथ न्याय किया जाए। याचिका में यह भी कहा कि ऐसे में अगर न्याय प्रक्रिया में थोड़ी सी भी चूक उसे फांसी के फंदे तक पहुंचा देगी।
जानिए, पूरा मामला;-गौरतलब है कि दोषी पवन कुमार गुप्ता ने पिछले साल 18 दिसंबर, 2019 की दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर दावा किया था कि वह घटना के वक्त नाबालिग था। वहीं, हाई कोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी। इसके बाद 7 जनवरी को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने चारों दोषियों अक्षय सिंह ठाकुर, मुकेश सिंह, पवन कुमार गुप्ता और विनय कुमार शर्मा की फांसी के लिए डेथ वांरट जारी किया था, जिसके तहत 22 फरवरी को सुबह 6 बजे फांसी होनी थी। इस बीच 17 जनवरी को एक बार फिर पटियाला हाउस कोर्ट ने नए सिरे से डेथ वारंट जारी किया है, जिसके बाद अब एक फरवरी को सुबह 6 बजे चारों दोषियों को तिहाड़ जेल में फांसी दी जाएगी।बता दें कि 16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली के वसंत विहार इलाके में निर्भया के साथ चलती बस में छह दरिंदों (ड्राइवर राम सिंह, एक नाबालिग, मुकेश सिंह, पवन कुमार गुप्ता, विनय कुमार शर्मा और अक्षय सिंह ठाकुर) ने सामूहिक दुष्कर्म किया था। हादसे के कुछ दिन बाद निर्भया की इलाज के दौरान मौत हो गई थी। इसके बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चला जिसमें निचली अदालत फिर दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी चारों दोषियों अक्षय, पवन, विनय और मुकेश को फांसी की सजा सुना चुका है। वहीं, नाबालिग बाल सुधार गृह में अपनी सजा पूरी कर चुका है तो राम सिंह ने तिहाड़ जेल में फांसी लगाकर जान दे दी थी।

अजय देवगन की फिल्म ‘तान्हाजी’ ने एक बार फिर से यह साबित किया कि दर्शकों की अपने ऐतिहासिक चरित्रों में खासी रुचि है। यह फिल्म रिलीज के पहले ही सप्ताह में सौ करोड़ के कारोबारी आंकड़े को पार कर अपनी सफलता का परचम लहरा चुकी है। जबकि इसके साथ ही दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘छपाक’ भी रिलीज हुई थी जिसे मेघना गुलजार जैसी मशहूर शख्सियत ने निर्देशित किया था। अपनी फिल्म की रिलीज के पहले दीपिका ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों को मूक समर्थन देकर मीडिया में सुर्खियां बटोरने का उपक्रम भी किया था। बावजूद इसके फिल्म छपाक को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। छपाक एक सप्ताह में लागत भी नहीं निकाल सकी और सप्ताह का कलेक्शन 26 करोड़ से नीचे रहा। बॉक्स ऑफिस की रिपोर्ट के मुताबिक दीपिका की फिल्प ‘छपाक’ फ्लॉप हो गई है।सोशल मीडिया पर तमाम क्रांतिकारी शूरवीरों ने भी दीपिका की इस फिल्म को सफल बनाने की मुहिम चलाई थी, लेकिन उस फिल्म को लेकर जो एक अवधारणा लोगों तक पहुंचनी चाहिए थी वह बन नहीं पाई। रिपोर्ट के मुताबिक ‘छपाक’ ने बड़े शहरों में भी अच्छा बिजनेस नहीं किया और रिलीज होने के अगले गुरुवार को उसकी कमाई सिर्फ एक करोड़ रुपये ही रह गई। फिल्म ‘छपाक’ का विषय अच्छा है, लेकिन उसका ट्रीटमेंट और निर्देशन उस स्तर का नहीं है कि वो फिल्म से कोई छाप छोड़ सके। एसिड पीड़िता के दर्द को समाज में प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति महसूस करता है, इस हमले के खिलाफ उसके मन से प्रतिरोध की आवाज भी उठती रहती है, लेकिन फिर भी लोग इस फिल्म को अपेक्षित संख्या में देखने नहीं गए। इसकी वजह यही रही कि यह फिल्म लोगों के बीच आपसी बातचीत का हिस्सा नहीं बन पाई। ‘छपाक’ जैसी फिल्मों को कभी भी बंपर ओपनिंग नहीं मिली है और इस तरह की फिल्में धीरे-धीरे ही बेहतर कारोबार करती हैं। हाल ही में रिलीज हुई निर्देशक अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘आर्टिकल 15’ भी इसी रास्ते पर चलकर सफल हुई। ‘आर्टिकल 15’ के विषय के बारे में, आयुष्मान खुराना के अभिनय के बारे में लोगों के बीच चर्चा शुरू हो गई और फिर धीरे-धीरे दर्शक इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमा हॉल जाने लगे और फिल्म सफल हो गई। लोगों में चर्चा से फिल्म हिट होने का एक सटीक उदाहरण है फिल्म- शोले। वर्ष 1975 में जब यह फिल्म रिलीज हुई थी तब ना तो चौबीस घंटे के न्यूज चैनल थे, ना ही वेबसाइट्स और ना सोशल मीडिया। तब अखबारों में विज्ञापन आया करते थे। फिल्म समीक्षा छपा करती थी। पोस्टरों से लोगों को फिल्मों की जानकारी मिलती थी या कई शहरों में तो रिक्शे पर लाउडस्पीकर लगाकर फिल्म का प्रचार किया जाता था।

नई दिल्‍ली। कश्‍मीरी पंडितों को अपनी जमीन छोड़े तीन दशक बीत चुके हैं। 1990 में जब कश्‍मीर में आतंकवाद ने अपने पांस पसारने शुरू किए तब से ही हर दिन इन लोगों के लिए दहशत का पर्याय बन गया। आतंकवाद ने इन लोगों को अपनी जमीन को रातों-रात छोड़ने पर मजबूर कर दिया। जिसके हाथ जो लगा वो उसको ही लेकर अपनी और अपने परिवार की जान बचाने के लिए अपना घर छोड़ कर रातों-रात कूच कर गया। इस चक्‍कर में कईयों के कई अहम दस्‍तावेज तक वहीं पर छूट गए। जिस घर में उन्‍होंने अपना बचपन बिताया या उनके बच्‍चों के होने की किल‍कारियां गूंजीं और जहां इनके बाप-दादा ने आखिरी वक्‍त गुजारा उसको रातों-रात छोड़ने का दर्द इनके अलावा कोई दूसरा नहीं जान सकता। तीन दशक गुजरने के बाद भी इन्‍हें अपनी जमीन खोने का दर्द आज भी सालता है। साथ ही इन्‍हें उम्‍मीद है कि एक दिन ये अपने उसी घर में वापस जाएंगे जहां से ये तीन दशक पहले बिछड़े थे। 19 जनवरी को कश्‍मीरी पंडित विस्‍थापन दिवस के रूप में मनाते हैं। हाल ही में रिलीज फिल्‍म 'शिकारा' भी इन्‍हीं लोगों की जिंदगी की कहानी को बयां करती है। लेकिन इस कहानी से दूर इन लोगों का दर्द काफी कुछ और भी कहता है। इनका कहना है कि जिस पर बीतती है उसका दर्द भी वही जानता है। इस मौके पर हमने भी जम्‍मू-कश्‍मीर से अपना घर छोड़कर आए कुछ लोगों से उनका दर्द साझा करने की कोशिश की।
धमकियों के बीच हर वक्‍त मौत का साया:-एमके भट्ट, रवि कौल एलआईसी से और एम धर बैंक से रिटायर होकर फिलहाल गाजियाबाद में रहते हैं। इन सभी का दर्द और उम्‍मीद एक जैसी है। ये लोग तीन दशक बाद भी उस रात को नहीं भूले हैं जब इन्‍हें अपना घर छोड़कर सभी की जान बचाकर परिवार के साथ भागना पड़ा था। ये 90 के दशक का दौर था जब जम्‍मू कश्‍मीर में आतंकवाद तेजी से पांव पसार रहा था। इन आतंकियों के निशाने पर कश्‍मीर पंडित थे। इन्‍हें कई बार आतंकियों द्वारा तो कई बार मस्जिदों से इन्‍हें अपना घर छोड़कर जाने की धमकी दी जा रही थी। हर रोज लोगों की हत्‍या की खबर सामने आ रही थी। रवि कौल बताते हैं कि वह अपनी मां, बीवी और बच्‍चों के साथ अनंतनाग में रहते थे। जिस वक्‍त राज्‍य में आतंकवाद शुरू हुआ तब वहां धीरे-धीरे सरकारी ऑफिस भी अपना कामकाज समेटने लगे थे। एलआईसी की जिस ब्रांच में कौल काम करते थे वहां पर भी आतंक का साया नजर आने लगा था। आतंकियों की नजरें कश्‍मीरी पंडितों पर लगी थीं। उनका मकसद या तो उन्‍हें मारना था या फिर उन्‍हें भगाना था।
घर से बाहर नहीं निकल पाते थे बच्‍चे:-अनंतनाग में सरकारी जॉब और दहशत के बीच ;दिन काट रहे कौल बताते हैं कि आतंकवाद का डर उनके और उनके परिवार के दूसरे लोगों पर इस कदर व्‍याप्‍त था कि बच्‍चों का घर से बाहर निकलना बंद हो गया था। इस डर को झेलने वाला केवल उनका अकेला परिवार ही नहीं था बल्कि कई दूसरे परिवारों के मन में भी यही डर था। इसकी वजह से कइयों की पढ़ाई बीच में ही छूट गई।वो बताते हैं कि जब भी गेट बजता था तब मन में यही सवाल होता कि न मालूम गेट के दूसरी तरफ कौन हो। एक दिन उनका ये डर सच साबित हुआ। रात करीब दस बजे उनके गेट किसी ने तेजी से खटखटाया। कौल साहब के के परिवार के दूसरे लोगों का डर इस खटखटाहट को सुनकर और अधिक बढ़ गया था। डरते-डरते उन्‍होंने गेट खोला तो सामने चार आतंकी हाथों में एके 47 लिए खड़े थे। उन्‍होंने मुंह पर कपड़ा बांधा हुआ था। गेट खुलते के साथ ही एक आतंकी ने उन्‍हें धक्‍का मारकर जमीन पर गिरा दिया और सभी घर में दाखिल हो गए। इस घटना ने परिवार के दूसरे लोगों के होश कुछ समय के लिए उड़ा दिए थे। सभी को कुछ अनहोनी होने का डर सताए जा रहा था। एक आतंकी ने कौल के सीने पर राइफल तान दी। इससे घबराई कौल साहब की पत्‍नी आतंकियों से उनके जीवन की भीख मांगने उनके पांव पर गिर गई थी। परिवार का हर व्‍यक्ति खुद को लाचार महसूस कर रहा था। बच्‍चों के शरीर डर के मारे थर-थर कांप रहे थे।
बस गोली ही नहीं मारी:-कौल साहब बताते हैं कि वो दिन शायद अच्‍छा था कि आतंकियों ने उन्‍हें गोली नहीं मारी और ये कहते हुए वहां से चले गए कि दिन निकलने से पहले वो यहां से चले जाएं, नहीं तो अगले दिन सभी को मार दिया जाएगा। आतंकियों के जाने के बाद बिना देर किए कौल साहब ने कुछ सामान लिया और रातों-रात घर से निकल गए। दिल में दहशत थी और आंखों में आंसू थे। दिल में अपना ही घर छोड़ने का दर्द था। वो नहीं जानते थे कि उन्‍हें कभी वापस आने का मौका मिलेगा भी या नहीं। सुनसान सड़क पर ह काफी दूर तक पैदल अपने परिवार के साथ आगे बढ़ रहे थे। कुछ किलोमीटर चलने के बाद उन्‍हें एक टैक्‍सी दिखाई दी जिससे वो किसी तरह से जम्‍मू पहुंचे और यहां से फिर दिल्‍ली आ गए। उन्‍हें दिल्‍ली में नए ऑफिस में ज्‍वाइनिंग मिल गई। लेकिन वर्षों तक उनके और परिवार के दूसरे लोगों के मन में उस रात की याद कभी धुंधली नहीं हो सकी। करीब 15 वर्षों तक वह अपने घर नहीं जा सके। उनकी बूढ़ी मां ने भी दिल्‍ली में ही आखिरी सांस ली।
घर वापसी की उम्‍मीद;-वो बताते हैं कि उनकी मां को अंतिम समय तक अपने घर पर जाने की आस सालती रही। यह पल उनके लिए काफी बुरा था, क्‍योंकि वो अपनी मां की आखिरी ख्‍वाहिश पूरी करने में नाकाम साबित हुए थे। डेढ़ दशक के बाद जब उन्‍हें वापस अनंतनाग जाकर अपने घर जाने का मौका मिला तो वहां पर काफी कुछ बदल चुका था। दूसरे लोग घर में बस चुके थे। उनके लिए वह अंजान थे। उनके आसपास जो भी हिंदू रहते थे वो भी दूसरी जगह पर जा चुके थे। वहां पर वो अंजान थे। कुछ पल अपने घर को देखने के बाद वो उलटे पांव आंखों में आंसू भरकर वापस दिल्‍ली लौट आए।
महज दो लाख में बेचना पड़ा था घर:-कौल साहब इस कहानी के केवल एक किरदार ही नहीं है। एनके भट्ट की भी कहानी ऐसी ही है। जिस वक्‍त घाटी आतंकवाद की चपेट में नहीं आई थी तब उनके पड़ोस में रहने वाले एक शख्‍स ने उनके मकान के 15 लाख रुपये लगाए थे। लेकिन आतंकवाद के पनपने और कौल साहब की तरह ही उनके परिवार को आतंकियों की धमकी मिलने के बाद भट्ट साहब को अपना मकान रातों रात महज दो लाख की कीमत में बेचना पड़ा। उन्‍हें आज भी वो पल याद है जब वह अपना घर छोड़कर परिवार को लेकर हमेशा के लिए जान बचाकर दिल्‍ली भाग आए थे। उनके घर पर किसी ने रात में पेट्रोल बम से हमला किया था। घर के बाहर खड़े कुछ लोग उन्‍हें लगातार यहां से भाग जाने की बात कहते हुए धमकी दे रहे थे। परिवार की मदद करने के नाम पर पड़ोस के ही एक शख्‍स ने दो लाख रुपये में घर का सौदा कर लिया। जिस रात वो घर से निकले उस वक्‍त पूरे इलाके में बर्फ गिरने की वजह से रात में गाडि़यों की आवाजाही लगभग बंद थी। वो नहीं जानते कि उस सर्द रात में कितने किलोमीटर पैदल चलकर बस डिपो पहुंचे थे। वहां से जम्‍मू फिर ट्रेन से दिल्‍ली पहुंचे।
श्रीनगर में जी रहे थे खुशहाल जिंदगी;-गाजियाबाद में ही रह रहे धर साहब बताते हैं कि उनके घर में करीब 15 कमरे थे। नौकर थे। वो श्रीनगर में हर तरह से बेहतर जिंदगी जी रहे थे, लेकिन आतंकवाद ने सब कुछ बर्बाद कर दिया। जो कभी अपने हुआ करते थे उन्‍होंने भी साथ छोड़ दिया। तीन दशकों से दिल्‍ली और फिर गाजियाबाद में रहने वाले धर बताते हैं कि जब वह कुछ माह पहले अपने घर की तरफ वापस गए तो वहां पर पहले जैसा कुछ नहीं रह गया था। उनके घर पर भी कई लोगों ने कब्‍जा कर लिया था। उसके हिस्‍से कर अलग-अलग उसको बेचा जा चुका था। वहां पर रहने वाले सभी लोग नए थे। उनके मुताबिक जिस गली में उनका घर था वहां के कई लोग अपना घर छोड़कर वहां से जा चुके थे। उन्‍हें लगा कि वह किसी अंजान जगह पर हैं। न कोई उन्‍हें जानता था और न ही वो किसी को जानते थे। मायूस होकर वापस लौटे धर साहब को भी अब उम्‍मीद है कि वो किसी न किसी दिन जरूर अपने घर वापस लौटेंगे।

नई दिल्‍ली। दिल्‍ली के चुनावी रण को जीतने के लिए सभी पार्टियां ताल ठोक चुकी हैं। कमोबेश सभी पार्टियों के प्रत्‍याशियों की सूची भी जारी हो चुकी है, जो कुछ एक सीटों पर पेंच फंसा है उनपर भी जल्‍द ही प्रत्‍याशियों के नाम फाइनल हो जाएंगे। इधर आम आदमी पार्टी ने गारंटी कार्ड को जारी किया है।इस कार्यक्रम में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वादा किया है कि दिल्लीवालों को मिल रही फ्री की सुविधाएं अगले पांच सालों भी जारी रहेंगी। बता दें कि इससे पहले कई विपक्षी पार्टियां केजरीवाल सरकार पर आरोप लगा रहे थे कि आप सरकार चुनावी के दौरान करने वाली फ्री की योजनाओं को चुनाव के बाद खत्‍म कर देगी।इधर केजरीवाल ने गांरटी कार्ड लांच करते वक्‍त जनता से कुछ नए वादे भी किए। रविवार को दिल्ली सीएम ने अपनी पार्टी के घोषणापत्र का संक्षिप्त विवरण भी पेश किया। इसे 'केजरीवाल गारंटी कार्ड' नाम दिया गया है। सीएम केजरीवाल अरविंद केजरीवाल ने गारंटी कार्ड लांच करते वक्‍त यह भी कहा कि अगले पांच साल में वह दिल्ली को और चमका देंगे। उन्‍होंने यह भी कहा कि पांच साल में वह लोगों को यमुना में डुबकी जरूर लगवा देंगे।

पटना। पटना विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र विभाग की छात्र मिताली प्रसाद ने बीते दिनों एशिया के बाहर सबसे ऊंची चोटी माउंट अकोंकागुआ (6962 मीटर) को फतह किया। शिखर तक पहुंचने के सफर में सबसे अहम बात यह रही कि उन्होंने बगैर किसी गाइड और पोर्टर के माउंट अकोंकागुआ को फतह किया। एशिया के बाहर की इस सबसे ऊंची चोटी पर अकेले पहुंचने वाली वह पहली भारतीय महिला बनीं। उनका यहां तक का सफर बिल्कुल भी आसान नहीं रहा।
घर की कमजोर आर्थिक स्थिति:-कमजोर आर्थिक स्थिति से गुजर रहे परिवार में जन्मी मिताली के लिए संसाधनों को जुटाना शिखर फतह करने से भी ज्यादा कठिन रहा। हालांकि, इन संघर्षो ने उनके इरादों को और मजबूत किया। गत 13 जनवरी की रात 12:45 बजे दक्षिण अमेरिका की माउंट अकोंकागुआ की चोटी पर तिरंगा फहराने वाली मिताली पिछले साल अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी किलिमंजारो (तंजानिया) को भी फतह कर चुकी हैं। उनका लक्ष्य सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करना है, जिसके सफर पर वह निकली हैं।
बिना गाइड और पोर्टर के पूरी की चढ़ाई:-मिताली ने चार जनवरी को माउंट अकोंकागुआ की चढ़ाई प्रारंभ की थी। मौसम खराब होने के कारण अतिरिक्त पांच दिन लगे। इस वजह से राशन की कमी भी आड़े आई। 90 से 100 किलोमीटर की रफ्तार वाली हवा और मानइस 30 डिग्री सेल्सियस के बीच चढ़ाई बिल्कुल भी आसान नहीं थी, लेकिन मिताली शिखर को फतह कर के ही मानीं। मिताली ने बगैर गाइड और पोर्टर चढ़ाई की। राशन भी खुद ही उठाया। रास्ते में खाना भी बनाया। रोडमैप और प्लानिंग भी खुद ही की। सामान्य तौर पर पर्वतारोही ग्रुप में चढ़ाई करते हैं। गाइड और पोर्टर के बिना चढ़ाई काफी जोखिम भरी होती है।
खुशी से ज्यादा कर्ज उतारने की चिंता;-इस मिशन के लिए मिताली गत 17 दिसंबर को पटना से रवाना हुई थीं। उन्होंने बताया कि राज्य के खेलकूद में पर्वतारोहण शामिल नहीं होने के कारण सहायता नहीं मिल पाती। कुछ मददगार हैं, जो हौसला टूटने नहीं देते हैं। कराटे में ब्लैक बेल्ट मिताली नालंदा जिले के कतरीसराय प्रखंड के मायापुर गांव की हैं। वह पटना के बहादुरपुर में परिवार के साथ रहती हैं। मां चंचला देवी सर्जिकल बेल्ट बनाती हैं। पिता मणीन्द्र प्रसाद किसान हैं। परिजनों का कहना है कि चोटी फतह करने की अपार खुशी है, लेकिन बेटी कर्ज के पैसे से दक्षिण अमेरिका गई है। अब उसे उतारने की चिंता है।
चंदे में कोई 10 रुपये देता तो भर आतीं आंखें;-मिताली कहती हैं, ‘किलिमंजारो और अकोंकागुआ फतह करने से ज्यादा समय विभाग में प्रोत्साहन राशि के लिए दौड़ने में लगा। पैसा तो नहीं मिल सका, लेकिन तिरस्कार ने सपने को जिद में बदलने का हौसला पैदा कर दिया। साथियों की सलाह पर सर्टिफिकेट दिखाकर चंदा मांगती थी। लाखों रुपये सैलरी पाने वाले जब 10 रुपये चंदा देते थे तो घर पर आकर खूब रोती थी। हालांकि, कुछ सपोर्ट करने वालों ने हौसला टूटने नहीं दिया। किलिमंजारो फतह करने के बाद सपोर्ट करने वालों की संख्या बढ़ी है। अब माउंट एवरेस्ट की बारी है।’
मां का संघर्ष चोटी फतह करने से भी बड़ा:-आर्थिक तंगी से निकलने के लिए मिताली की मां चंचला देवी ने खादी ग्रामोद्योग से ट्रेनिंग ली और 2008 में परिवार के सभी सदस्यों को लेकर पटना आ गईं। तीन बेटियों की पढ़ाई और सभी खर्चे उन्होंने ही 12 से 18 घंटे काम कर पूरे किए। चंचला देवी बताती हैं कि बड़ी बेटी ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन (अहमदाबाद) से टेक्सटाइल डिजाइनिंग में कोर्स किया है। अभी सिलवासा में नौकरी करती है। छोटी बेटी मीनल 12वीं में पढ़ती है।
पर्वतारोहण के सभी कोर्स में उत्तीर्ण:-मिताली ने बताया कि उनके गांव से राजगीर के पहाड़ नजदीक हैं। पहाड़ पर चढ़ाई बचपन का सपना है, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति इतना ज्यादा सोचने की इजाजत नहीं देती थी। पटना आने पर एनसीसी से जुड़ीं। ‘सी’ सर्टिफिकेट प्राप्त किया। पर्वतारोहण की परीक्षा में बेहतर करने पर एनसीसी की ओर से पैरा जंपिंग टीम में चयन हुआ। पर्वतारोहण के बेसिक, एडवांस, मेथड ऑफ इंस्ट्रक्शन के साथ-साथ अल्पाइन कोर्स भी किया। अल्पाइन कोर्स में तंबू के साथ विद्यार्थी किसी चोटी पर कई दिनों के लिए अकेले छोड़ दिया जाता है।

 

श्रीनगर। राष्‍ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की पांच सदस्‍यीय टीम रविवार से जम्‍मू कश्‍मीर के दौरे पर है। जांच एजेंसी टीम यहां एक सप्‍ताह के लिए रहेगी। टीम जम्‍मू कश्‍मीर के डिप्‍टी सुप्रिटेंडेंट ऑफ पुलिस देविंदर सिंह (DSP Davinder Singh) से पूछताछ करेगी। सूत्रों के अनुसार, जांच टीम एक सप्‍ताह के लिए कश्‍मीर में रहेगी और यहां सबूत एकत्रित करेगी। ऐसा भी कहा जा रहा है कि देविंदर सिंह को अपने साथ वापस दिल्‍ली लेकर आएंगे।अगले कुछ दिनों में जांच टीम कुलगाम (Kulgam), काजीगुंड (Qazigund), श्रीनगर (Srinagar) एयरपोर्ट और सिंह के आवास पर जाएगी। गृह मंत्रालय की ओर से जारी आदेश के बाद NIA द्वारा यह मामला शनिवार को दर्ज कराया गया और मामले की जांच शुरू की गई। हिज्‍बुल मुजाहिदीन के तीन आतंकियों समेत देविंदर सिंह को 11 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया गया था। ये सब राष्‍ट्रीय राजमार्ग से काजीपुर जा रहे थे। सूत्रों का कहना है कि देविंदर सिंह शीर्ष कमांडर नवीद बाबू को अपने साथ ले जा रहा था ताकि वह पाकिस्‍तान जा सके।वकील इरफान अहमद को भी गिरफ्तार किया गया। तब से देविंदर सिंह से कई जांच एजेंसियों ने पूछताछ की। आतंकवाद से लड़ाई लड़ रही जम्‍मू कश्‍मीर पुलिस के साथ देविंदर सिंह जुड़े हुए थे। देविंदर श्रीनगर में एंटी हाईजैकिंग विंग में थे। इसके अलावा देविंदर उस टीम का भी हिस्‍सा रहे हैं जिसने इस माह के शुरुआत में कश्‍मीर आने वाले राजदूतों की प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की थी।आतंकियों के साथ संबंध के आरोप में गिरफ्तार डीएसपी देविंदर सिंह को उनके पद से पुलिस प्रशासन ने बर्खास्त कर दिया। इसके लिए आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा कर लिया गया है। देविंदर सिंह को मिला शेरे-कश्मीर पुलिस मेडल भी वापस ले लिया गया। यह मेडल उसे पुलवामा पुलिस लाइन पर 25-26 अगस्त, 2017 को हुए आतंकी हमले के बाद आतंकरोधी अभियान में अहम भूमिका के लिए दिया गया था।

रायपुर। छत्तीसगढ़ के एक स्कूल हॉस्टल में एक छात्रा ने नवजात को जन्म दिया। दंतेवाडा में यह स्कूल मौजूद है। डिप्टी कलेक्टर के मुताबिक, पैदा हुए नवजात की मौत हो गई है। उन्होंने बताया कि छात्रा पिछले दो साल से अपने गांव के एक लड़के से संबंध में थी। उन्होंने बताया कि हॉस्टल अधीक्षक को बर्खास्त कर दिया गया है।इसके साथ ही उन्होंने बताया कि छात्रा को ऐसी स्थिति में अस्पताल लाया गया। छात्रा ने नवजात को जन्म दिया हालांकि उस दौरान ही नवजात मृत हो गया था। उन्होंने बताया कि मृत नवजात को छात्रा के परिवारवालों को सौंप दिया गया है। वहीं पूरे मामले की छानबीन हो रही है। उन्होंने बताया कि जांच के आधार पर आगे किसी भी प्रकार का एक्शन लिया जाएगा।
पहले भी हो चुकी ऐसी घटना;-यह ऐसा पहला मामला नहीं है। इससे पहले देशभर में स्कूल में नवजात को जन्म देने के मामले आते रहे हैं। इससे पहले देश की राजधानी दिल्ली में 10वीं क्लास की छात्रा ने एक बच्चे को जन्म दिया था। यह घटना दक्षिणी दिल्ली में मौजूद साकते की थी। जहां पर एक 19 वर्षीय युवक ने छात्रा को अपने हवस का शिकार बनाया था। हैरानी की बात यह रही है कि बेटी के गर्भवती होने की खबर परिवारवालों को तीन दिन तीन पहले पता चला। डॉक्टरों की मानें तो छह महीने में ही पैदा हुआ बच्चा कमजोर, लेकिन वह स्वस्थ था।
आरोपित गिरफ्तार:-अस्पताल से सूचना मिलने के बाद साकेत थाना पुलिस ने नाबालिग के बयान पर केस दर्ज कर आरोपित 19 वर्षीय ध्रुव पाठक को दुष्कर्म के आरोप में गिरफ्तार किया है। आरोपित नाबालिग का वीडियो वायरल करने की धमकी देकर दुष्कर्म करता रहा।पुलिस की मानें तो 15 वर्षीय पीड़िता दुष्कर्म पीड़िता अपने परिवार के साथ पुष्प विहार में रहती है औरवहीं के सरकारी स्कूल में 10वीं में पढ़ती भी है। पुलिस को नाबालिग ने बताया कि आरोपित ध्रुव ने उससे दोस्ती की और बहाने से एक कमरे पर ले जाकर दुष्कर्म किया। उसने पीड़िता से दुष्कर्म का वीडियो बना लिया। बाद में आरोपित वीडियो वायरल करने की धमकी देकर पीड़िता से बार-बार दुष्कर्म करता रहा।

 

 

नई दिल्‍ली। राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो (NCRB) की ओर से सुरक्षा जवानों को लेकर अहम जानकारी दी गई है। इसके अनुसार, 2014 से 2018 के बीच के पांच सालों की अवधि में करीब 2,200 केंद्रीय सशस्‍त्र सेना बल (CAPF) के जवानों की दुर्घटना में मौत हो गई।2018 में कुल 132 जवानों की मौत हुई। 104 जवानों की दुर्घटना में मौत हुई वहीं आत्‍महत्‍या में 28 जवान मारे गए। यह आंकड़ा राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो (NCRB) की ओर से जारी किया गया है। 2014 में जब NCRB ने CAPF से जुड़े ऐसे मामलों को पहली बार एकत्रित किया था तब दुर्घटनाओं में 1,232 मौतें दर्ज की गई जबकि आत्‍महत्‍या के कारण मरने वालों का आंकड़ा 175 था।2017 में दुर्घटना में 113 जवानों की मौत हुई। वहीं 2016 में 260, 2015 में 193 जवान मारे गए। आत्‍महत्‍या की बात करें तो 2017 में 60, 2016 में 74 और 2015 में 60 जवान मारे गए। आंकड़ों के अनुसार, दुर्घटना में 1,902 CAPF जवान वहीं आत्‍महत्‍या की घटना में 397 जवान मारे गए। कुल मिलाकर 2014 से 2018 के बीच के पांच सालों में कुल 2,199 ऐसे हादसे हुए। NCRB ने पांच सेनाओं सीमा सुरक्षा बल (BSF), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF), भारतीय-तिब्‍बती सीमा पुलिस (ITBP), सशस्‍त्र सीमा बल (SSB) के साथ असम राइफल्‍स (AR) और नेशनल सुरक्षा गार्ड (NSG) का कुल डाटा दिया है। मेडिकल विशेषज्ञ ने कहा कि आत्‍महत्‍या गंभीर परेशानी है लेकिन इसे समय से रोका जा सकता है।

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