Editor

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- योगेश कुमार गोयल
रंगों के त्यौहार होली पर भला कौन ऐसा व्यक्ति होगा, जो आपसी द्वेषभाव भुलाकर रंग-बिरंगे रंगों में रंग जाना नहीं चाहेगा। लोग एक-दूसरे पर रंग डालकर, गुलाल लगाकर अपनी खुशी का इजहार करते हैं लेकिन होली के दिन प्राकृतिक रंगों के बजाय चटकीले रासायनिक रंगों का बढ़ता उपयोग चिन्ता का सबब बनने लगा है। ज्यादातर रंग अम्लीय अथवा क्षारीय होते हैं, जो व्यावसायिक उद्देश्य से ही तैयार किए जाते हैं और थोड़ी सी मात्रा में पानी में मिलाने पर भी बहुत चटक रंग देते हैं, जिससे होली पर इनका उपयोग अंधाधुंध होता है। ऐसे रंगों का त्वचा पर बहुत हानिकारक प्रभाव पड़ता है। शुष्क त्वचा वाले लोगों और खासकर महिलाओं व बच्चों की कोमल त्वचा पर तो इन रंगों का सर्वाधिक दुष्प्रभाव पड़ता है। अम्ल तथा क्षार के प्रभाव से त्वचा पर खुजलाहट होने लगती है और कुछ समय बाद छोटे-छोटे सफेद रंग के दाने त्वचा पर उभरने शुरू हो जाते हैं, जिनमें मवाद भरा होता है। यदि तुरंत इसका सही उपचार कर लिया जाए तो ठीक, अन्यथा त्वचा संबंधी गंभीर बीमारियां भी पनप सकती हैं। घटिया क्वालिटी के बाजारू रंगों से एलर्जी, चर्म रोग, जलन, आंखों को नुकसान, सिरदर्द इत्यादि विभिन्न हानियां हो सकती हैं। कई बार होली पर बरती जाने वाली छोटी-छोटी असावधानियां भी जिंदगी भर का दर्द दे जाती हैं। इसलिए अगर आप अपनी होली को खुशनुमा और यादगार बनाना चाहते हैं तो इन बातों पर अवश्य ध्यान दें:-
- रासायनिक रंगों के स्थान पर प्राकृतिक रंगों का ही इस्तेमाल करें। ज्यादातर बाजारू रंगों में इंजन ऑयल तथा विभिन्न घातक केमिकल मिले होते हैं, जिनका त्वचा पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।
- होली खेलने से पहले चेहरे तथा पूरे शरीर पर सरसों अथवा नारियल का तेल या कोल्डक्रीम अथवा सनस्क्रीनक्रीम लगा लें ताकि रोमछिद्र बंद हो जाएं और रंग त्वचा के ऊपरी हिस्से पर ही रह जाएं। इससे होली खेलने के बाद त्वचा से रंग छुड़ाने में भी आसानी होगी।
- होली खेलने से पहले बालों में अच्छी तरह तेल लगा लें और नाखूनों पर कैस्टर ऑयल लगाएं ताकि बाद में रंग आसानी से छुड़ाया जा सके।
- होली खेलने जाने से पूर्व आंखों में गुलाब जल डालें और जहां तक संभव हो, आंखों पर चश्मा लगाकर होली खेलें ताकि रंगों का असर आंखों पर न पड़ सके।
- महिलाएं होली खेलते समय मोटे तथा ढ़ीले-ढ़ाले सूती तथा गहरे रंग के वस्त्र पहनें। सफेद अथवा हल्के रंग के वस्त्र पानी में भीगकर शरीर से चिपक जाते हैं, जिससे सार्वजनिक रूप से महिला को शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ सकता है।
- आप ऐसा व्यवहार हरगिज न करें, जिससे आपके रिश्तेदारों, पति के मित्रों अथवा अन्य पुरूषों को आपसे छेड़छाड़ करने का अनुचित अवसर मिल सके। अपना व्यवहार पूर्णतः संयमित, शालीन और मर्यादित रखें और सामने वाले की कोई गलत हरकत देखने के बाद भी उस पर मौन साधकर उसे और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित न करें।
- होली खेलने के तुरंत बाद स्नान अवश्य करें लेकिन त्वचा से रंग छुड़ाने के लिए कपड़े धोने के साबुन, मिट्टी के तेल, चूने के पानी, दही, हल्दी इत्यादि का प्रयोग हानिकारक है। चेहरे पर लगे गुलाल को सूखे कपड़े से अच्छी तरह पोंछ लें और रंग लगा हो तो नारियल तेल में रूई डुबोकर अथवा क्लींजिंगमिल्क से हल्के हाथ से त्वचा पर लगा रंग साफ करें। रंग छुड़ाने के लिए नहाने के पानी में थोड़ी सी फिटकरी डाल लें और ठंडे पानी से ही स्नान करें। गर्म पानी से रंग और भी पक्के हो जाते हैं। डिटर्जेंटसोप के बजाय नहाने के अच्छी क्वालिटी के साबुन का उपयोग किया जा सकता है।
- स्नान के बाद भी त्वचा पर खुजली या जलन महसूस हो तो गुलाब जल में ग्लिसरीन मिलाकर लगाएं।
- बालों से रंग छुड़ाने के लिए बालों को शैम्पू करें।
- स्नान के बाद आंखों में गुलाब जल डालें। होली खेलते समय यदि आंखों में रंग चला जाए अथवा आंखों में जलन महसूस हो तो आंखों को मलें नहीं बल्कि तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से मिलें।
*लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं

114, गली नं. 6, वेस्ट गोपाल नगर, एम. डी. मार्ग, नजफगढ़, नई दिल्ली-110043.
फोन: 9416740584, 9034304041.
ई मेल: mediacaregroup@gmail.com


. श्वेतागोयल
होली का त्यौहार है ही ऐसा मस्ती भरा कि हर किसी का मन इसके मतवाले रंगों में रंगने को मचल उठता है लेकिन दिनभर की मस्ती के बाद शरीर पर रंग इस कदर रच जाते हैं कि इन्हें छुड़ाना मुश्किल हो जाता है। आपकी इसी परेशानी को दूर करने के लिए हम आपको कुछ ऐसे नुस्खे बता रहे हैं, जिन्हें अपनाकर आप अपनी त्वचा से रंगों को आसानी से छुड़ा सकते हैं और त्वचा पर रंगों के रचने के डर से बेखबर होकर होली का भरपूर मजा ले सकते हैं:-
- शरीर के किसी भी हिस्से पर रंग लग जाने पर त्वचा को किसी खुरदरी वस्तु से घिस-घिसकर रंग उतारने की कोशिश न करें क्योंकि इससे आपकी त्वचा छिल सकती है।
- अगर त्वचा पर ज्यादा रंग लग जाए तो रंग छुड़ाने का आसान और बेहतर उपाय यही है कि नारियल या सरसों के तेल में रूई भिगो-भिगोकर धीरे-धीरे हल्के हाथ से रगड़कर रंग छुड़ाएं।
- गहरे रंग के ऑयल पेंट को छुड़ाने के लिए भी यही उपाय अपनाएं।
- रंग छुड़ाने के लिए नारियल तेल या सरसों के तेल के बजाय क्लींजिंगमिल्क का भी प्रयोग कर सकते हैं।
- त्वचा को रंग या गुलाल के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए होली खेलने के बाद शरीर को नहाने के साबुन से अच्छी तरह साफ कर लें और नहाने के बाद त्वचा पर कोई एंटीसेप्टिकक्रीम लगा लें।
- रंग छुड़ाने के लिए डिटरजेंट साबुन, मिट्टी के तेल, दही, हल्दी इत्यादि का उपयोग न करें क्योंकि ये त्वचा को नुकसान पहुंचाते हैं।
- रंग छुड़ाने के लिए नहाने के पानी में थोड़ी सी फिटकरी डाल लें और ठंडे अथवा ताजा पानी से ही स्नान करें। गर्म पानी से स्नान करने पर रंग और भी पक्के हो जाते हैं।
- त्वचा का रंग उतारने के लिए बेसन, हल्दी व सरसों का तेल मिलाकर उबटन धीरे-धीरे रगड़ने से भी रंग बहुत जल्दी उतरता है और त्वचा पर इसका कोई दुष्प्रभाव भी नहीं पड़ता।
- सिर में रंग भरा हो तो सिर का रंग उतारने अथवा साफ करने के लिए सिर को किसी अच्छे शैम्पू से अच्छी तरह से धोएं।
- सिर का रंग छुड़ाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि यह शरीर की त्वचा पर न गिरे और सिर धोते समय आंखें भी बंद हों।
- गुलाल को कभी भी सिर्फ पानी से ही धोने की कोशिश न करें क्योंकि इससे इसका रंग और भी फैलता है। इसे साफ करने के लिए किसी अच्छे बाथसोप का प्रयोग करें।
- होली के रंग कई बार इतने पक्के होते हैं कि एक ही बार में नहीं छूटते। इसलिए शरीर की त्वचा अथवा चेहरे को रगड़-रगड़कर एक ही बार में सारा रंग उतारने की कोशिश में अपनी त्वचा के साथ ज्यादती न करें। एक बार में जितना रंग आसानी से छूट जाए, बेहतर है। बाकी का रंग धीरे-धीरे अपने आप उतरता जाएगा।
- चेहरे से होली के रंग छुड़ाने के बाद यदि थोड़ी-बहुत जलन महसूस हो तो गुलाब जल में थोड़ी सी ग्लिसरीन मिलाकर लगाएं और कुछ देर बाद चेहरा गुनगुने पानी से धो लें।

-114, गली नं. 6, वेस्ट गोपाल नगर, एम. डी. मार्ग, नजफगढ़, नई दिल्ली-110043.
फोन: 9416740584, 9034304041.
ई मेल: mediacaregroup@gmail.com


-राज शेखर भट्ट
एक परिवार के राष्ट्रीय युवा मुखिया उत्तराखण्ड पहुंचे। उनके परिवार के लोग तो बेहद खुशी से झूम रहे थे, जैसे कि धरती पर चांद उतर आया हो। लेकिन दूसरे परिवार के सदस्यों ने भी उनका पूरे दम-खम से स्वागत किया। दूसरे परिवार के सदस्य भी परिवर्तन रैली में जाने के लिए दौड़ लगाते रहे। सभी सदस्य रैली स्थल के पास सोना बनाने के लिए आलू लेकर पहुंच गए। सभी ने साथ मिलकर जोश-खरोस के साथ युवा मुखिया का स्वागत किया और आलू से सोना बनाने को कहा। क्योंकि सभी सदस्यों के दिमाग में एक पुरानी बात घर कर गयी थी। गत् वर्ष आलू को लेकर नेताजी के भाषण के बाद युवा मुखिया ने अपनी जनसभा में कहा था कि ‘ऐसी मशीन लगाउंगा, इधर से आलू घुसेगा और उस साइड से सोना निकलेगा। इस साइड से आलू डालो, उधर से सोना निकालो। इतना पैसा बनेगा, आपको पता नहीं होगा क्या करना है पैसों का।’ इस मैसेज के वायरल होने के बाद युवा मुखिया के परिवार वालों ने सफाई भी दी और कहा कि यह वीडियो तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। लेकिन वायरल तो हो ही गया कि आलू से सोना बनाने की मशीन लगने वाली है। बाकी राम जाने आलू से सोना बनेगा या सोना ही आलू बन जाएगा।
खैर, इतना जरूर है कि देश में केवल दो परिवार ही ऐसे हैं, जो बेतहाशा उछल-कूद करने के लिए मशहूर हैं। क्योंकि ये दोनों परिवार एक-दूजे को टुकर-टुकर देखते रहते हैं और कसते रहते हैं तंज पे तंज। अब युवा मुखिया की बात करें तो वो भी तंज कसने में कम नहीं हैं। इन्होंने उत्तराखण्ड जनता के लिए मीठी खीर बनाई और उसमें नमक मिला दिया। इन्होंने तो नेता जी को भी ‘चोर’ का ताज पहना दिया और रैली में ‘चैकीदार चोर है’ के नारे भी लगवाए। नेताजी पर आरोप लगाते हुये, इन्होंने बोल दिया कि इनके परिवार में ‘सच बोलने की भी सजा’ मिलती है। क्या कर लिया इनके परिवार ने दो इंजन की बात करके? किसानों को हाशिये पर धकेल दिया और नेताजी ने क्या अच्छा कर दिया। सीधी सी बात है कि राजनीति में तो तंज कसने का रिवाज होता है। अब युवा मुखिया भी बोल उठे और नेताजी का बखान कागज के हवाई जहाज को राफेल से जोड़कर कर दिया। अरे नेताजी, जिसको राफेल का सौदा दे दिया उसे तो कागज का हवाई जहाज तो बनाना भी आता नहीं, राफेल क्या खाक लायेगा। युवा मुखिया तो मंच पर ऐसे गोले दाग रहते थे, जैसे कि सब्जी वाला चिल्ला रहा हो।
चुनावी कुरूक्षेत्र में भी इन्होंने तंज कसने शुरू किया और कहा कि इस बार दूसरे परिवार की वापसी एक चुनौति है। एक बात तो ये भी भूल गये कि आलू से सोना बनाने वाले और देश के चैकीदार में बहुत अंतर होता है। राफेल को लेकर भी नेताजी पर गंभीर आरोप लगाए और जमकर निशाना साधा। अपने निबंध में तो इन्होंने सारे तोड़-मरोड़कर बनायी गयी पंक्तियां सुना दीं। नेताजी के लिए तंजों में महाघोटाले के खुलासे और हिन्दू समाचार का जिक्र किया। इन्होंने कहा कि नेताजी तो डरपोक हैं, तभी तो सीबीआई को हटा दिया। हमारा देश रोजगार सम्पन्न है और नेताजी ने रोजगार समाप्त कर दिया। बार-बार रटे-रटाये शब्दों को सुनाकर यह लगने लगा है कि युवा मुखिया के उपरी मंजिल में कुछ कमी सी है। युवा मुखिया तो धड़ल्ले से जनता को कह गये हैं कि इस बार हमारी सरकार आयेगी और विकास होगा। बहरहाल, कल्पना तो कोई भी कर सकता है। लेकिन केवल तंज कस के ही कल्पना को साकार नहीं किया जा सकता। युवा मुखिया को तो अपने अनुज, अपने भ्राता से ट्यूशन लेनी चाहिए। जिससे कि इनको राजनीति के अ-आ-क-ख का ज्ञान हो जाय। जनता को सुना-सुनाकर बताना क्या है। चाहे युवा मुखिया सही हों या नेता जी सही हों, जनता को सब पता है। ये रैली, ये मंच, ये भाषण और ऐसे तंज कसना केवल लोकसभा चुनाव के लिए वोटों की राजनीति है।


83/1, बकराल वाला, देहरादून (उत्तराखण्ड)
8859969483, 7455811113
rajshekharbhatt@gmail.com


-अनिल शर्मा
लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी यही है कि लापरवाही, अनियमितता और भ्रष्टाचार का बोलबाला रहता है। और इसी वजह से लोकतांत्रिक चुनाव में मतदान का प्रतिशत कम होता है। ये लापरवाही, अनियमितता और भ्रष्टाचार जनता की तरफ से जहां होता है, वहीं सरकारी मशीनरी यानी सरकारी नुमाइंदे भी इसमें बराबर के शरीक कहे जा सकते हैं। यही वजह है कि सरकार को मतदाताओं को जगाने के लिए लाखों रुपए खर्च करना पड़ते हैं, लेकिन शत-प्रतिशत मतदान नहीं हो पाता। आबादी में गुणात्मक वृद्धि होने के साथ-साथ मतदान प्रतिशत में भी इजाफा होना चाहिए, बल्कि हो इसका उल्टा रहा है। आबादी जहां बढ़ रही है, मतदाताओं की संख्या में कमी आती जा रही है।
मतदान करता कौन? सच्चाई के धरातल पर देखा जाए तो मतदान करने में निम्न आय वर्ग के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा होती है, यानी निम्न आय वर्ग की आबादी का लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा मतदान करता है। इससे पहले निम्न आय वर्ग के मतदाताओं की संख्या प्रथम लोकसभा चुनाव से लेकर आठवें लोकसभा चुनाव तक लगभग 55 प्रतिशत मानी जा सकती है। इस वर्ग में मतदाताओं की संख्या में वृद्धि का सबसे बड़ा कारण प्रलोभन माना जा सकता है। मतदाताओं को प्रत्याशियों द्वारा दी जाने वाली सुविधा। उन्हें लाने-ले जाने में अपरोक्ष मदद। और यहां तक कि उनके शराब पाव आदि की व्यवस्था। चूंकि निम्न आय वर्ग वोटरों की संख्या ज्यादा होने से प्रत्याशी सबसे पहले उनका ध्यान रखते हैं क्योंकि जीत-हार में इनके मतदान का काफी महत्व होता है। निम्न आय वर्ग के मतदाताओं के लिए प्रलोभन बहुत काम की चीज है। सरकार ने बरसों से शिक्षा के विभिन्न कार्यक्रम चला रखे हैं, फिर भी आबादी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अशिक्षित है और इसीलिए निम्न आय वर्ग के मतदाता केवल प्रलोभन में आकर ही मतदान करते हैं। मतदान के आंकड़ों का यह संकेत भी उभर कर आ रहा है कि साक्षरता दर बढ़ने के बावजूद मतदान प्रतिशत नहीं बढ़ रहा है। अब तो युवा मतदाताओं की संख्या में इजाफा हुआ है। यह भी माना जा रहा है कि युवा मतदाता चुनावों में आगे बढ़कर हिस्सा ले रहे हैं, ऐसे में कम मतदान होना मतदान के प्रति उदासीनता ही दशार्ता है।
मध्यम आय वर्ग के मतदाताओं की संख्या वर्तमान में लगभग 65 से 70 प्रतिशत कही जा सकती है। आगे भविष्य में यह संख्या हर लोकसभा या विधानसभा चुनाव में लगभग 10 से 15 प्रतिशत के हिसाब से कम होने लगेगी। इसका सबसे बड़ा कारण है मध्यम आय वर्ग के मतदाताओं की लापरवाही। उच्च आय वर्ग के मतदाताओं की संख्या लगभग 10 से 15 प्रतिशत कही जा सकती है। इसका सबसे बड़ा कारण है उच्च आय वर्ग के मतदाता विशेषकर नई पीढ़ी के युवा मतदाता मतदान दिवस पर एंजाय करने, पार्टी-वार्टी करने में ज्यादा इंट्रेस्ट लेते हैं। उच्च आय वर्ग की आबादी का 50 से ऊपर आयु वर्ग का लगभग 40 से 60 प्रतिशत हिस्सा मतदान करता है, जबकि 18 से 25 आयु वर्ग का लगभग 5 से 7 प्रतिशत और 25 से 45 आयु वर्ग का लगभग 22 से 25 प्रतिशत के लगभग हिस्सा मतदान करता है। इन्हीं के नक्शे कदम पर मध्यम आय वर्ग के मतदाता भी चलते हैं जिनमें मतदान न करने वाले 18 से 25 आयु वर्ग के युवा मतदाताओं की ंसंख्या लगभग 45 प्रतिशत होती है, वहीं 25 से 40 आयु वर्ग के मतदान न करने वाले इस आय वर्ग के लोगों की संख्या लगभग 20 प्रतिशत होती है। 40 आयु वर्ग से ऊपर के मतदान न करने वालों की संख्या लगभग 10 से 15 प्रतिशत होती है।
किराएदार
मतदान कम होने के कारकों में किराएदार सबसे पहला कारक माना जा सकता है। किराएदार जो मकान में किराए से रहते हैं। निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोग ही किराएदार होते हैं। किराएदारों की संख्या सम्पूर्ण आबादी का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा माना जा सकता है। इसमें से भी लगभग 60 से 65 प्रतिशत हिस्सा उन किराएदारों का माना जा सकता है जिनकी पीढ़ियां किराएदार के रूप में जीवन खपा चुकी हैं और खपा रही हैं। इनमें से भी लगभग 55 प्रतिशत किराएदार कहीं ज्यादा नहीं रहते यानी उनका आवागमन जारी रहता है। आज इस मुहल्ले में तो कल उस मोहल्ले में। ऐसे में मतदाता सूची में नाम जुड़ने से रह जाता है। या तो ऐसे मतदाता नाम नहीं जुड़वाते या फिर सरकारी मशीनरी वाले कर्मचारी नाम नहीं जोड़ते। सबसे बड़ी दिक्कत मूल निवास का पता होता है। जिन किराएदारों को शहर या गांव में किराए से रहते हुए ही लगभग 50 साल से ज्यादा हो गए हैं वे तो अपने मकान मालिक का एड्रेस मूल नाम पते में लिखा देंगे लेकिन जो मकान बदलते रहते हैं, वे किराएदार कहां से मूल पता लाएं। जबकि उसी शहर में उनकी जिंदगी व्यतीत हो गई है।
सरकारी नुमाइंदों द्वारा मतदाताओं का नामांकन आदि का काम सरकारी तरीके से होता है। कहीं नाम गलत तो कहीं उम्र गलत तो कहीं फोटो तक गलत। वैसे ऐसे हादसे कम होते हैं, फिर भी सरकारी नुमाइंदों की लापरवाही का खामियाजा मतदाताओं को भुगतना पड़ता है। कायदे से तो मतदान के पूर्व ही (जैसा कि होता है) मतदाताओं की सूची का पुनरीक्षण और नए मतदाताओं का नामांकन किया जाना चाहिए। और इसके साथ ही बार-बार मकान और मुहल्ला बदलने वालों के लिए मूल पते के स्थान पर कोई अन्य विकल्प होना चाहिए। जो किराएदार पुराना मोहल्ला या मकान छोड़कर नए मकान में है उसका वहीं का पता मान्य किया जाना चाहिए। पुराना एड्रेस तो पहले ही काट दिया जाता है। मतदान से पहले वोटर लिस्ट में अगर ऐसे किराएदारों को शुमार किया जाए जो कहीं भी रहें तो मतदान का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा बढ़ सकता है।
मतदान न करने पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जो वोट नहीं देते उन्हें सरकार से कुछ सवाल पूछने या सरकार को दोष देने का हक भी नहीं है वास्तव में लोकतंत्र का मजाक उड़ाने वालों के गाल पर बड़ा तमाचा है।
मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए मतदान से पहले ही सबकुछ व्यवस्थित करने के अलावा मतदाताओं विशेषकर उच्च और मध्यम आय वर्ग के उन मतदाताओं को साधने का प्रयास करना होगा जो मतदान के दिन एंजाय करते हैं। मतदाता जागरूकता में लाखों-करोड़ों खर्च करने के बजाए वास्तविक रूप से काम किया जाए तो ही मतदान का प्रतिशत बढ़ सकता है।


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- राजेंद्र जांगिड़
डिजिटल इंडिया भारत सरकार की एक पहल है जिसके तहत सरकारी विभागों को देश
की जनता से जोड़ना है इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बिना कागज
के इस्तेमाल के सरकारी सेवाएं इलेक्ट्रॉनिक रूप से जनता तक पहुंच सकें।
इस योजना का एक उद्देश्य ग्रामीण इलाकों को हाई स्पीड इंटरनेट के माध्यम
से जोड़ना भी है डिजिटल तकनीक अब ज्यादातर भारतीयों को छूती है डिजिटल
बुनियादी ढांचे ने लेन देन में घर्षण को बहुत कम कर दिया है चाहे वह
वित्तीय हो या अन्य। यह बुनियादी ढांचा और निकट भविष्य में इस पर निर्मित
होगा जो महत्वपूर्ण उत्पादकता लाभ का वादा करता है भारत के डिजिटल
बुनियादी ढांचे के सबसे प्रसिद्ध घटक जिसे अब हम JAM या त्रिमूर्ति कहते
हैं इसमें जन धन बैंक खाते,आधार बायोमेट्रिक पहचान और मोबाइल-टेलीफोन
शामिल हैं जबकि ये तीन घटक सामने के छोर का प्रतिनिधित्व करते हैं, हमारे
डिजिटल बुनियादी ढांचे के लिए बहुत कुछ है इस बुनियादी ढांचे के दो
अतिरिक्त महत्वपूर्ण स्तंभ सार्वजनिक वित्त प्रबंधन प्रणाली (पीएफएमएस)
और एकीकृत भुगतान इंटरफेस(यूपीआई) हैं। पीएफएमएस प्रसंस्करण,
ट्रैकिंग,निगरानी, लेखा, सामंजस्य और केंद्र सरकार के भीतर और बाहर
वित्तीय प्रवाह की रिपोर्टिंग के लिए एक अंत-से-अंत समाधान है। यह
वित्तीय प्रवाह के रिलीज पर नज़र रखने और अंतिम मील तक उनके उपयोग के लिए
एक एकीकृत मंच का गठन करता है।बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से, यह केंद्र
सरकार के वित्तीय प्रवाह को राज्य सरकारों, व्यवसायों और यहां तक कि घरों
से जोड़ता है यूपीआई एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो दो बैंक खातों के बीच फंड
के वास्तविक समय में हस्तांतरण की अनुमति देता है चाहे वह एक ही या दो
अलग-अलग बैंकों में स्थित हो।नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया द्वारा
बनाया गया, यह भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा प्रवर्तित इकाई है। फरवरी 2019
तक, 134 बैंकों ने इसकी सदस्यता ली। इसलिए,यह लगभग सभी बैंक खातों को
जोड़ता है,चाहे केंद्र और राज्य सरकारों, व्यवसायों या घरों द्वारा
आयोजित किया गया हो। अलग-अलग यूजर इंटरफेस के बीच इसकी पूरीअंतर-क्षमता
है, जिसका अर्थ है कि प्रेषक और प्राप्तकर्ता के मोबाइल पर अलग-अलग ऐप हो
सकते हैं और उनके अलग-अलग बैंकों मे खाते हो सकते हैं और फिर भी वे सीधे
एक-दूसरे के साथ लेनदेन कर सकते हैं इस प्रणाली का विशेष रूप से उपयोग कि
हाल ही में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी एक माउस के कुछ क्लिक के साथ
पीएम-किसान योजना के तहत 10 मिलियन किसानों के बैंक खातों में 2,000
रुपये का हस्तांतरण कर सकते हैं आज, सरकारी स्थानांतरण पीएफएमएस से शुरू
किए जा सकते हैं और बैंकों द्वारा बिना किसी हस्तक्षेप के राज्य सरकारों,
विक्रेताओं और व्यक्तियों के बैंक खातों में सीधे प्रवाहित किए जा सकते
हैं।

यूपीआई-आधारित लेन-देन की लागत में मामूली वृद्धि हुई है नतीजन,लंबे समय
से निजी क्षेत्र के खिलाड़ी अपने स्वयं के पर्स के साथ-साथ यूपीआई आधारित
स्थानान्तरण का उपयोग करके व्यवसायों और ग्राहकों को बड़े पैमाने पर
डिजिटल लेनदेन करने में मदद कर रहे हैं अकेले डिजिटल वॉलेट पेटीएम के 300
मिलियन पंजीकृत उपयोगकर्ता हैं जिनमें से 80 मिलियन सेवा का सक्रिय रूप
से उपयोग करते हैं इसके उपयोगकर्ताओं के रूप में सात मिलियन व्यापारी भी
हैं। इसी के साथ दूसरी ओर टेलीकॉम मार्केट में जिओ की एंट्री, जिसने
हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड की कीमत कुछ रुपये प्रति गीगाबाइट तक घटा दी है, ने
भारत को दुनिया भर में डेटा के शीर्ष उपभोक्ताओं में से एक में बदल दिया
है इन मुद्दों पर चर्चा के साथ जहां तक हम बात करें गुड्स एंड सर्विसेज
टैक्स नेटवर्क (GSTN)भारत के डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर का एक और प्रमुख
घटक बनकर उभरा है जिसमें वर्तमान में,इसमें 12 मिलियन पंजीकृत करदाता
हैं बैंकऋण के लिए व्यवसायों का मूल्यांकन करने के लिए इसके द्वारा
उत्पन्न जानकारी का उपयोग कर सकते हैं हाल ही में छोटे और मध्यम उद्यमों
के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के ऑनलाइन ऋण अनुमोदन मंच ने इस
बिंदु को दर्शाया है जीएसटीएन और अन्य डेटा द्वारा उत्पन्न जानकारी का
उपयोग करते हुए, मंच एक घंटे से भी कम समय में ऋण की मंजूरी प्रदान करता
है क्रेडिट सुइस की रिपोर्ट के अनुसार, तीन महीनों से भी कम समय में,
प्लेटफॉर्म सबसे बड़ा ऑनलाइन ऋण देने वाला मंच बनकर उभरा है इसने पहले ही
300 अरब रुपये के ऋण को मंजूरी दे दी है।

भारत में सार्वजनिक रूप से प्रदान किए जाने वाले अन्य महत्वपूर्ण डिजिटल
प्लेटफ़ॉर्म में से एक डिजिटल लॉकर है, जो उपयोगकर्ताओ को अपने
दस्तावेज़ों और प्रमाणपत्रों कोस्वतंत्र रूप से संग्रहीत और सत्यापित
करनेकी अनुमति देता है ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार,जो किसानों को अपनी उपज
को उच्चतम बोलीदाता को इलेक्ट्रॉनिक रूप से नीलाम करने की अनुमति देता है
और नए युग के शासन या उमंग के लिए एकीकृत मोबाइल एप्लिकेशन, जो केंद्र,
राज्य और स्थानीय सरकारों द्वारा प्रदान की गई 350 डिजिटली उपलब्ध सेवाओं
को एक ही एप्लीकेशन में पैक करता है भारत नेट ने वाई-फाई लाने केलिए
1,24,315 ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर केबल से जोड़ा है 41,139
पंचायतों में वाई-फाई लगाया गया है इस एक क्षेत्र के बावजूद जहां एक
स्पष्ट सफलता ने हमें अलग कर दिया है, हम थोड़े समय में डिजिटल बुनियादी
ढांचे और उद्यमिता के निर्माण में हाल केवर्षों में हुई समग्र प्रगति में
बहुत संतुष्टि ले सकते हैं देश में ई कॉर्मस का मौजूदा बाजार करीब 13 अरब
डॉलर का है इस व्यापारिक मॉडल में न्यूनतम रोजगार के नकारात्मक पहलू के
अलावा देश का पैसा ई- कॉमर्स प्लेटफॉर्म से विदेश जा रहा है इन कंपनियों
द्वारा करोड़ों की टैक्स चोरी भी की जाती है डिजिटल इंडिया बढ़ते कदम से
इनके हौसले और बुलंद होते जा रहे हैं लगातार परिवर्तित हो रहे डिजिटल
इंडिया से इनकी पैठ भारत के उपभोक्ताओं तक तेजी से बढ़ रही हैं इन सभी
सुविधाओं के उपयोग हेतु सबसे पहले डिजिटल शिक्षा का होना जरूरी है डिजिलट
इंडिया में टेक्नोलॉजी से आम इंसान का काम तो आसान बनेगा, लेकिन उन्हीं
का जिन्हें इंटरनेट का पूर्ण ज्ञान हो। अब अगर गांव में रहने वाले लोगों
की बात की जाए तो आज भी इंटरनेट प्रशिक्षण में पीछे हैं ऐसे में जालसाजी
और धोखाधड़ी का भी डर बना हुआ है इसके लिए जरूरी है कि तकनीक के बदलाव
साथ साथ तकनीक शिक्षा का पूरा ज्ञान देना जरूरी है, उसके बाद ही आने वाले
समय में भारत को डिजिटल बनाने में बेहतर साबित होंगे।


जूनामीठाखेड़ा , बाड़मेर, राजस्थान
rj.rajendrajangid@gmail.com


-रमेश सर्राफ धमोरा (स्वतंत्र पत्रकार)


लोकसभा चुनाव 2019 की घोषणा के साथ ही देश की महिलाओ के हित में कुछ अच्छी खबरें आ रही हैं। राजनीति में घटी दो तीन घटनाओं से लगने लगा है कि आने वाला समय महिलाओ की प्रगति का होगा। चुनावों की घोषणा के साथ ही ओडीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कहा कि उनकी पार्टी बीजू जनता दल आगामी लोकसभा चुनाव में 33 प्रतिशत महिला उम्मीदवारो को टिकट देगी। ओडीसा में कुल 21 लोकसभा सीट है जिनमें से बीजू जनतादल सात महिलाओं को प्रत्याशी बनायेगा। वर्तमान में बीजू जनतादल के पास लोकसभा की 20 सीट है जिनमें से मात्र दो पर ही महिला सांसद हैं।
नवीन पटनायक का बयान ओडीसा की महिलाओं को राजनीति में आगे बढ़ाने की एक अच्छी शुरूआत माना जा सकती है। आदिवासी बहुल ओडीसा की गिनती देश के पिछड़े प्रदेशो में की जाती है जहां फिलहाल राजनीति में महिलाओं की संख्या ज्यादा नहीं हैं। वहां की विधानसभा के 147 सदस्यों में से मात्र दस महिला विधायक भी नहीं हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के इस बयान का स्वागत किया जाना चाहिये। आखिर उन्होने महिलाओं को आगे बढ़ाने में दिलचस्पी तो दिखायी।
नवीन पटनायक के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने भी महिलाओं को लेकर एक बड़ी घोषणा कर दी। उन्होने लोकसभा चुनाव में 40 प्रतिशत महिलाओं को टिकट देने की घोषणा ही नहीं की बल्कि टिकट दे भी दिया। पश्चिम बंगाल की कुल 42 लोकसभा सीटो पर ममता दीदी ने प्रत्याशियों के नामो की घोषणा कर दी जिसमें से उन्होने 17 सीटो पर महिलाओं को प्रत्याशी बनाया है। अभी उनकी पार्टी की लोकसभा में 12 महिला सांसद है। ममता बनर्जी नि:संदेह ही महिलाओं को आगे बढ़ाने में सैदव अग्रसर रहती है।
चुनावी माहौल में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी चेन्नई में पत्रकारो से बात करते हुये कहा कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो वो संसद में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिलवाने वाला कानून पास करवायेगें। साथ ही उन्होने कहा कि ना केवल संसद व विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिलवाया जायेगा बल्कि सरकारी नौकरियों में भी महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिलवायेगें। हालांकि राहुल गांधी आगामी चुनावो के कारण ये सब घोषणायें करते घूम रहे हैं। जब उनकी पार्टी सरकार में होती है तब उनको महिलाओं को आरक्षण दिलवाने की बात याद नहीं रहती हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 44 सीटे जीती थी जिनमें से महज चार पर ही महिलायें जीत पायी थी।
यदि राहुल गांधी वास्तव में महिलाओं को लेकर संवेदनशील है तो उनको भी नवीन पटनायक, ममता बनर्जी की तरह लोकसभा चुनाव में कम से कम 33 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देनी चाहिये। कांग्रेस ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिये 36 प्रत्याशियों की दो सूची जारी की है जिनमें महिलाओं के मात्र 8 ही नाम शामिल किये गये हैं।
देश की आबादी में आधी संख्या महिलाओं की है इसके उपरान्त भी उनको संसद व विधानसभाओं में बराबरी का दर्जा क्यों नहीं मिल पाता है यह देश के सामने एक मुख्य सवाल है। महिलाओं के वोट लेने में सभी राजनीतिक दल आगे रहते हैं मगर उनको बराबरी का दर्जा कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं देना चाहती हैं। राजनीतिक दल महिलाओं को एक मतदाता से अधिक कुछ भी मानने को तैयार ही नहीं होते हैं। आज हमारे देश की लोकसभा में 543 सदस्यो में से मात्र 61 ही महिला सदस्य है जो यह दर्शाता है कि हम महिलाओं की तरक्की को लेकर कितने गम्भीर हैं।
वर्तमान में देश के 20 राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों से ही महिलायें जीत कर आयी है बाकी प्रदेशों में एक भी महिला सांसद नही हैं। 2014 में पश्चिम बंगाल से सर्वाधिक 13 महिला तो उत्तर प्रदेश से 11 महिला सांसद चुन कर आयी थी। भाजपा की 24 महिला सांसद बनी तो कांग्रेस से मात्र 4 ही महिला सांसद बन पायी। सोनिया गांधी लम्बे समय तक कांग्रेस अध्यक्ष रही। उनके कांग्रेस अध्यक्ष रहने के दौरान दस वर्षो तक केन्द्र में उनकी पार्टी की सरकार थी मगर महिला आरक्षण को लेकर उन्होने भी कुछ नहीं किया। यहां तक की उनके समय में पार्टी पदाधिकारियों में 33 प्रतिशत महिलाओं को नियुक्त किया जायेगा की घोषणा भी महज कागजी साबित हो कर रह गयी।
देश में प्रथम आम चुनाव से लेकर अब तक के आंकड़ो पर गौर करे तो स्थिति ज्यादा उत्सावर्धक नहीं रही है। 1952 के पहले आम चुनाव में 24 महिला सांसद चुन कर आयी थी। तो 1957 में 22, 1962 में 31, 1967 में 29, 1972 में 21, 1977 में मात्र 19 महिला ही चुनाव जीत पायी। 1980 में 28, 1984 में 42, 1989 में 29, 1991 में 37, 1996 में 40, 1998 में 43, 1999 में 49, 2004 में 45, 2009 में 59 महिला सांसद बनी थी। जबकि 2014 में 16वीं लोकसभा में 61 महिला उम्मीदवार जीत कर पहुंची हैं। यह अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा है।
चुनाव आयोग के 2014 के आंकड़ों के अनुसार देश में लोकसभा की 543 सीटों में 73 सीटें ऐसी हैं, जहां 2014 में महिला वोटरों की संख्या पुरुष वोटरों से ज्यादा थी। इसके अलावा इन सीटों पर महिला वोटरों का वोटिंग प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा था। 2014 के आंकड़ों के अनुसार इन 73 सीटों पर वोटरों की कुल संख्या 9 करोड़ 59 लाख थी, जिनमें से 6 करोड़ 87 लाख वोटरों ने वोट डाले थे। इनमें से 3 करोड़ 36 लाख पुरुष वोटर और 3 करोड़ 50 लाख महिला वोटर थीं।
राज्यवार महिला वोटरो की अधिक संख्या वाली सीटो में आंध्र प्रदेश में सर्वाधिक 19, अरुणाचल प्रदेश में 2, बिहार में 10, गोवा में 2, हिमाचल प्रदेश में 1, जम्मू-कश्मीर में 1, कर्नाटक में 1, केरल में 10, महाराष्ट्र में 1, मणिपुर में 1, ओडिशा में 2, राजस्थान में 1, तमिलनाडू में 16, त्रिपुरा में में 1, पश्चिम बंगाल में 1, उत्तराखंड में 2, दमन और दीव की 1 सीट शामिल है।
आज देश में छ: महिला सांसद केन्द्र सरकार में मंत्री पद के दायित्व का कुशलता से निर्वहन कर रही हैं। देश में रक्षा व विदेश जैसे महत्वपूर्ण विभागो की कमान महिला मंत्रियों के हाथों में हैं। लोकसभा की अध्यक्ष महिला है। इसके उपरान्त भी महिलाओं को अपने अधिकारो को लेकर संघर्ष करना पड़ता है। देश के राजनीतिक दलो को महिलाओं को लेकर अपने नजरिये में बदलाव करना होगा। आगामी आम चुनाव में सभी दलों को अधिक से अधिक संख्या में महिलाओं को टिकट देना चाहिये। इतना भी ना कर पाये तो जहां से महिला प्रत्याशी चुनाव लड़ रहीं हैं उनके सामने महिला को ही टिकट देनी चाहिये ताकि जिस दल की भी जीते वो महिला ही जीते। इस तरह से धीरे- धीरे महिलाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी होने लगेगी।
महिलाओं ने भारत में आजादी की लड़ाई में और उसके बाद राजनीति में बड़ी भूमिका निभायी है। जब भी उन्हें अवसर मिला है महिलाओं ने खुद को बेहतर साबित किया है। 1952 के पहले आम चुनाव के बाद पण्डित नेहरू की अगुवाई में पहले मंत्रीमंडल का गठन किया गया तो उसमें राजकुमारी अमृत कौर को स्वास्थ्य विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। राज्यों में भी कई बार महिलाओं ने कुशलता के साथ नेतृत्व किया है। 1963 में उत्तर प्रदेश में सुचेता कृपालानी देश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी। उसके बाद तो महिलाओं के लिये आगे बढऩे का रास्ता खुल गया। नंदिनी सतपथी, शशिकला काकोडकर, सईदा अनवारा तैमूर, जानकी रामचंद्रन, जयललिता, मायावती, राजिंदर कौर भट्टल, राबड़ी देवी,सुषमा स्वराज, शीला दीक्षित, वसुंधरा राजे, ममता बनर्जी, आनन्दीबेन पटेल, महबूबा मुफ्ती समय- समय पर उसी परंपरा को आगे बढ़ाती रहीं हैं।
आज देश के हर क्षेत्र में महिला अपनी हिम्मत, क्षमता व स्वावलम्बन से अपनी विशिष्ठ पहचान बना रही है। हर कार्य को पुरूषों के साथ कंधा से कंघा मिलाकर कर रही है। ऐसे में उनको राजनीति के क्षेत्र में पीछे रखना उनके नेतृत्व क्षमता को कमजोर करना ही है। पुरूषो के वर्चस्व वाले राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं को उचित भागीदारी मिलने पर देश, समाज और अधिक तेजी से तरक्की कर पायेगा।

झुंझुनू, राजस्थान 9414255034


नई दिल्ली (शम्भू पंवार) प्रमुख साहित्यिक संस्था "युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच द्वारा आयोजित होली स्नेह मिलन समारोह विभिन्न आयोजनों के साथ बड़े उत्साह और हर्षोउल्लास से मनाया गया।
दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी में आयोजित समारोह के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ लक्ष्मी शंकर वाजपेयी एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में देश की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ट्रू मीडिया एवं चेनल के सी ओ डॉ ॐ प्रकाश प्रजापति,डॉ बृजपाल सिंह ,राकेश पांडे संपादक,(प्रवासी भारतीय)उपस्थिति थे।अध्यक्षता प्रो विशंभर शुक्ल,ने की।
समारोह का आरंभ वीणा दायिनी के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं श्वेताभ पाठक की सरस्वती वंदना से हुआ।
साहित्यिक मंच के अध्यक्ष एवं नामचीन साहित्यकार रामकिशोर उपाध्याय, महासचिव ओमप्रकाश शुक्ल,कोषाध्यक्ष सुरेश पाल वर्मा,सुश्री मीरा शलभ,जगदीश मीणा,मंजू वशिष्ठ,श्वेताभ पाठक ने अतिथियों का पुष्प हार,शॉल एवं प्रतीक चिन्ह भेंट कर सम्मान किया।
*कवि विजय प्रशांत की 2 पुस्तकों का लोकार्पण*
प्रसिद्ध कवि विजय प्रशांत की 2 पुस्तक, "नदी से जल सा बहना,व हास्यम" का अतिथियों ने लोकार्पण किया।
*साहित्यिक मंच सम्मान*
इस अवसर पर साहित्यिक मंच द्वारा कवि विजय प्रशांत को "वाग्देवी"सम्मान से विभूषित किया गया।
तथा मुक्त लोक साहित्यिक पटल को श्रेष्ठ साहित्यिक संस्था 2018 से नवाजा गया।यह सम्मान संस्था की ओर से प्रो विशंभर शुक्ल ने प्राप्त किया।
*ट्रू मीडिया सम्मान*

प्रमुख साहित्यिक पत्रिका "ट्रू मीडिया" एवं चेनल के सी ओ डॉ ॐ प्रकाश प्रजापति,उप संपादक डॉ पुष्पा जोशी ने शायर दिलदार देहलवी,कवि विवेक आस्तिक,लोकेश मुद्व ल को उनकी विशिष्ट साहित्यिक सेवाओ के लिए ट्रू मीडिया साहित्यिक शिखर सम्मान 2019 से सम्मानित किया।
*अट्ट हास के अंक का विमोचन*
प्रसिद्ध व्यंग्यकार सुभाष चंद्र के अतिथि संपादन में हिंदी साहित्य की हास्य
व्यंग्य की प्रतिष्टित पत्रिका अट्टहास के मार्च के अंक का लोकार्पण भी किया गया।
*कवि सम्मेलन*
इस अवसर पर कवि पवन विजय,दिलदार देहलवी,डॉ पुष्पा जोशी,मीरा शलभ,अनिमेष शर्मा,स्वेताभ पाठक,विवेक आस्तिक,चरणजीत सिंह,ओमप्रकाश शुक्ल,शारदा मदरा,अशोक कश्यप,सुषमा शैली, मिलन सिंह,पुष्पलता ,डॉ किरन पांचाल,मीनाक्षी भटनागर, वंदना गोयल,जगदीश मीणा,सहित अन्य कवियों ने अपनी बेहतरीन काव्य पाठ किया।मंच का सुंदर संचालन पुष्पलता ने किया।
अंत मे सभी साहित्यिक विभूतियों ने एक दूसरे को होली के रंग लगाकर शुभकामनाये दी।
समारोह में दिल्ली व एन सी आर के वरिष्ठ कवि, साहित्यिकार एवं प्रबुद्धजनो की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को ओर बेहतरीन बना दिया।
मंच द्वारा आभार जताने के पश्चात राष्ट्रगान भी प्रस्तुत किया।


-राहुल लाल (कूटनीतिक मामलों के जानकार)

मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद तेजी से गोवा के राजनीतिक घटनाक्रम में बदलाव हुआ।इसके बाद बीजेपी ने गोवा विधान सभा अध्यक्ष प्रमोद सावंत को पर्रिकर का उत्तराधिकारी चुना।प्रमोद सावंत का शपथ ग्रहण समारोह सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा।सोमवार को दिन भर चली गहमागहमी के बाद सावंत के नाम पर मुहर लगी।हालांकि उनके नाम पर सहमति बनाने में बीजेपी आलाकमान और खासकर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को काफी मेहनत करनी पड़ी।रात्रि 1:50 बजे प्रमोद सावंत को राज्यपाल मृदुला सिंह ने पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।प्रमोद सावंत की सरकार में सहयोगी महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के सुधीन धवलीकर और गोवा फॉरवर्ड ब्लॉक पार्टी के विजय सरदेसाई ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
सोमवार को दिनभर बीजेपी अपने सहयोगियों को मनाती रही।पहले कहा गया कि रात 9 बजे शपथ ग्रहण समारोह होगा,फिर कहा गया कि ये समारोह रात 11 बजे होगा।इसके बाद पौने दो बजे अर्द्ध रात्रि में शपथ ग्रहण हुआ।इस तरह कहा जा सकता है कि काफी मशक्कत के बाद और आखिरी समय करीब 8 घंटे की मैराथन बैठकों के बाथ बीजेपी किसी तरह अपने राज्य को बचाने में कामयाब रही।स्थिति कितनी जटिल थी,इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सोमवार की शाम को कहा कि गोवा में अगले मुख्यमंत्री को लेकर भाजपा और उसके सहयोगी पार्टियों के बीच सहमति नहीं बन पाई है,जबकि रविवार देर रात से बैठकों की दौर लगातार जारी थी।
दरअसल मनोहर पर्रिकर के निधन की खबर आते ही गोवा में सरकार बनाने की जिम्मेदारी केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को दी गई थी।पर्रिकर के निधन की खबर आते ही गडकरी 17 मार्च देर रात गोवा पहुँच गए थे।वहाँ पहुँचते ही गडकरी ने सबसे पहले अपने सहयोगी दल महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी(एमजीपी) और गोवा फॉरवर्ड ब्लॉक पार्टी और तीन अन्य निर्दलीयों से संपर्क कर वार्ता प्रारंभ कर दी।करीब 2 घंटे चली इस मुलाकात में नितिन गडकरी ने उनसे समर्थन माँगा।लेकिन 6 विधायकों का एक दल बना चुके विजय सरदेसाई को यह पता था कि सरकार का रिमोट कंट्रोल उनके पास है।बीजेपी पर दबाव बनाने के लिए विजय सरदेसाई का साथ एमजीपी के सुधीन धवलीकर ने भी दिया।दोनों ने पहले तो बीजेपी की तरफ से दिए गए श्रीपाद नाइक के नाम को नामंजूर किया और बीजेपी के सामने विजय सरदेसाई को ही मुख्यमंत्री पद देने की माँग कर दी।लेकिन यह माँग बीजेपी को मंजूर नहीं थी।वह भी जानते थे कि बीजेपी उनके उस प्रस्ताव को नहीं मानेगी,लेकिन बीजेपी पर दबाव बनाकर ज्यादा से ज्यादा लाभ लेने के लिए उनकी एक महत्वपूर्ण चाल थी।इस संपूर्ण मामले को गहराई से समझने के लिए सबसे पहले गोवा विधानसभा के वर्तमान स्थिति को समझना आवश्यक है।

गोवा विधानसभा में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी---
इस समय कांग्रेस 14 विधायकों के साथ राज्य में सबसे बड़ी पार्टी है। 40 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा के 12 विधायक हैं।भाजपा विधायक फ्रांसिस डिसूजा के निधन तथा रविवार को पर्रिकर के निधन और पिछले वर्ष कांग्रेस के दो विधायकों सुभाष शिरोडकर तथा दयानंद सोप्ते के इस्तीफे के कारण विधानसभा की क्षमता घटकर अब 36 हो गई।इस तरह गोवा में सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 19 है।स्पष्ट है कि कांग्रेस इस आँकड़े से 5 अंकों से दूर तथा बीजेपी 7 अंकों से दूर थी।

आखिर मध्य रात्रि में शपथ ग्रहण क्यों?
गोवा में कांग्रेस चुनाव में 16 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी।लेकिन पिछले वर्ष ही कांग्रेस की क्षमता को कमजोर करने के लिए बीजेपी ने प्रलोभन देकर कांग्रेस के दो विधायकों का त्यागपत्र करा दिया था,जिससे वर्तमान में कांग्रेस के पास केवल 14 विधायक हैं।गोवा कांग्रेस के सभी विधायकों ने सोमवार को राज्यपाल मृदुला सिंहा से मुलाकात की और तटीय राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश किया।विपक्ष के नेता चन्द्रकांत कावलेकर के नेतृत्व में सभी 14 कांग्रेसी विधायक राजभवन गए और सिंहा को यह कहते हुए एक पत्र सौंपा कि उनकी विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है और उन्हें सरकार बनाने की अनुमति दी जानी चाहिए।स्पष्ट है कि कांग्रेस के इस दावे के कारण बीजेपी खेमे में डर था कि अगर वे जल्द सहयोगियों से वार्ता कर सरकार नहीं बनाते हैं,तो अंततः कांग्रेस सरकार बना सकती है।यही कारण है कि बीजेपी ने मध्य रात्रि में ही शपथ ग्रहण करा दी।


गडकरी के चेतावनी के बाद कमजोर पड़ गए गठबंधन सहयोगियों के सुर
गडकरी लगातार विजय सरदेसाई और दवलीकर को मनाने की कोशिश करते रहे।लेकिन दोनों ने बीजेपी के सामने बड़ी माँग रखते गए।नाराज गडकरी ने सोमवार दोपहर को हुई बैठक में सीधे कह दिया कि अगर वे लोग सहमति नहीं बनाते हैं,तो बीजेपी हाउस निलंबित करने या डिजॉल्व करने से नहीं कतराएगी।गडकरी की चेतावनी के बाद दोनों पार्टियों के सुर कमजोर पड़ गए।लेकिन बीजेपी के सामने नया प्रस्ताव रखने के लिए सोमवार दोपहर को महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी और गोवा फॉरवर्ड पार्टी के बीच पुनः बैठक हुई।इस बैठक में प्रमोद सावंत के नाम पर सहमति बनी,लेकिन महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के सुधीन धवलीकर और गोवा फॉरवर्ड पार्टी के विजय सरदेसाई ने उप मुख्यमंत्री पद की मांग कर दी।साथ में गृहमंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग भी मांग लिए।
बीजेपी राज्य में दो उपमुख्यमंत्री नहीं बनाना चाहती थी,लेकिन सहयोगी दल इस पर अड़े रहे।अंतत: बीजेपी आलाकमान ने एक नई रणनीति बनाई।उन्होंने विजय सरदेसाई को एक उपमुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव देकर 6 विधायक अपने साथ कर लिया।वहीं महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी(एमजीपी) पर दबाव बनाने के लिए बीजेपी ने एमजीपी के दो विधायक बाबू अझगांवकर और दीपक पाउसकर से संपर्क करना शुरू कर दिया,जो इससे पहले भी बीजेपी में शामिल होने के लिए संपर्क कर चुके थे।इस संपूर्ण मामले को समझने के लिए वर्तमान के एंटी डिफेक्शन लॉ को समझना आवश्यक है।


एंटी डिफेक्शन लॉ(दल-बदल कानून) और गोवा---
52 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1985 में प्रावधान था कि यदि किसी राजनीतिक दल के एक तिहाई सदस्य दल-बदल करते हैं,तो उस समूह को अलग दल का दर्जा मिलेगा और उनकी सदस्यता समाप्त नहीं होगी।लेकिन इसके बावजूद दल-बदल की घटनाओं पर अंकुश नहीं लगी।फलतः 91 वें संविधान संशोधन 2003 द्वारा 10 वीं अनुसूची में उपरोक्त प्रावधानों को और भी बहुत कठोर कर दिया गया।इसके अंतर्गत अब केवल किसी राजनीतिक दल के दो तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में विलय करा सकते हैं।इसका आशय है कि जहाँ पहले कम से कम एक तिहाई सदस्य अलग होकर दल बना सकते थे,वहीं अब ऐसा संभव नहीं है।इस तरह 91 वें संविधान संशोधन में दल छोड़ने वालों को "टूट या Split" के आधार पर अब कोई संरक्षण प्राप्त नहीं है।यही कारण है कि अब राजनीतिक दल विलय या इस्तीफे जैसे माध्यमों द्वारा दल बदल को पराश्रय देते हैं।यही कारण है कि गोवा विधानसभा में कांग्रेस की स्थिति कमजोर करने के लिए दो विधायकों से विगत में बीजेपी ने इस्तीफा दिलवाया था।उदाहरण के लिए झारखंड में झारखंड विकास मोर्चा के 8 में से भी विधायकों का बीजेपी में विलय करा लिया था।इससे अल्पमत वाली बीजेपी की झारखंड सरकार बहुमत में भी आ गई थी।

गोवा में भी बीजेपी ने एमजीपी को स्पष्ट संकेत दे दिया कि या तो वे बीजेपी को समर्थन करें,अथवा पार्टी में टूट के लिए तैयार रहें।अभी के घटनाक्रम में महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के कुल तीन विधायकों में से,यदि दो पार्टी छोड़ कर बीजेपी में विलय करा लेते तो,दल-बदल कानून लागू नहीं होता।ऐसे में बीजेपी ने सुधीन धवलीकर को स्पष्ट संकेत दे दिया कि या तो वे बीजेपी के माँगों से सहमत हो या पार्टी के टूट के लिए तैयार रहें।इस दाँव के कारण रात करीब 10 बजे सुदीन गडकरी के पास पहुँचे।इसके बाद गडकरी ने एमजीपी के दोनों विधायकों बाबू आझगांवकर और दीपक पाउसकर से भी भेंट की।इसके बाद वे गोवा फॉरवर्ड ब्लॉक के विजय सरदेसाई और तीन निर्दलीय विधायकों से मिले।रात करीब 11:30 बजे ये बैठक शुरू हुई और एक घंटे बाद गडकरी ने एलान कर दिया कि बीजेपी सरकार बनाने जा रही है।
बीजेपी ने ऐसा करके गोवा फोरवर्ड पार्टी पर काफी दबाव बनाया।साथ ही विजय सरदेसाई गुट के निर्दलीय विधायक प्रसाद गांवकर से भी मुलाकात की।बीजेपी को सरकार बनानी थी और उनके सहयोगियों को चुनाव नहीं चाहिए थे।ऐसे में बीजेपी ने दोनों को उपमुख्यमंत्री पद देकर महत्वपूर्ण विभाग अपने पास रख लिया और यह गठबंधन तय हुआ।वैसे सुप्रीम कोर्ट ने 1994 के महत्वपूर्ण एस आर बोम्मई केस में स्पष्ट रुप से कहा था कि विधानसभा भंग करने से पहले राज्यपाल सरकार बनाने की सभी संभावनाओं को देखकर ही निर्णय लेंगे।

निष्कर्ष---
स्पष्ट है कि मध्यरात्रि में शपथ ग्रहण से बीजेपी गोवा में अपनी सत्ता बचाने में सफल रही।लेकिन इस छोटे से खूबसूरत तटीय राज्य में जिस तरह से सरकार का निर्माण हुआ,उससे एंटी डिफेक्शन लॉ और राज्यपाल की भूमिका पर पुनः बहस प्रारंभ हो गई है।आखिर कर्नाटक में राज्यपाल बीजेपी को सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में आमंत्रित करते हैं,लेकिन वहीं पड़ोसी गोवा में मापदंड बदल जाते हैं।ऐसे में राज्यपाल द्वारा गोवा में मध्यरात्रि शपथ ग्रहण कराने से राज्यपाल पद की गरिमा पुनः धूमिल हुई है।साथ ही राजनीतिक दल लगातार दल-बदल कानून के कमियों का अपने पक्ष में लगातार प्रयोग कर रहे हैं।इसके लिए आवश्यक है कि दल-बदल कानून को और भी कठोर किया जाए।इसमें 'दो तिहाई' वाले प्रावधान को भी हटाने की जरूरत है।वास्तव में अब समय आ गया है कि किसी भी प्रकार के दल बदल को असंवैधानिक घोषित किया जाएं।राज्यपाल को मध्य रात्रि में अत्यधिक हड़बड़ी वाले शपथ ग्रहण जैसे निर्णयों से दूर रहकर अपने पद की गरिमा को बनाएँ रखना चाहिए।अंततः राजनीति में नैतिकता के लगातार पतन से राजनीतिक दलों की भी छवि धूमिल हो रही है।इसलिए उन्हें भी राजनीति में न्यूनतम नैतिकता पालन अवश्य करना चाहिए।

FLAT NO-703, TOWER NO-02
PARASHAVNATH REGALIA
NEAR RAJBAGH METRO STATION
SAHIBABAD GHAZIABAD UP-201005
MN-7678603825


-प्रकाश दर्पे
अस्पताल कैम्पस में एक वृद्धा ने पहले प्रवेश किया।पीछे पीछे एक युवा व्यक्ति दाखिल हुआ। असहाय वृद्धा खुद को जैसे तैसे संभालते हुए नपे तुले कदमो से अंदर रिसेप्शन काउंटर की ओर चली आ रही थी। पर सक्षम युवा अपनी तेज गति से रिसेप्शन पर उस महिला के पहले ही पहुँच गया। रिसेप्शनिष्ट ने उससे कहा , " जल्दी से अपना नाम बताईये । इसके बाद डॉक्टर साहब किसी को नही देखेंगे।
तो उसने अपने स्वाभाविक गति से चली आ रही वृद्धा की ओर इशारा करते हुए कहा, "पहले उनका नम्बर लगाईये ।
" कितना खयाल रखते है आप दूसरों का । अपना नम्बर उनको दे दिया ।
' नही । नंबर की सही हकदार तो वो वृद्धा ही है। मैं तो नाहक ही स्पर्धा समझ लंबे डग भरता चला आया। लेकिन वो तो अपनी गति से ही चलेगी न। यह मैं भूल गया था।
इतनी गहराई से भी कोई सोचता होगा , यह उसने पहलीबार महसूस किया। वह उस युवा को अचरज भरी नजरों से देखती रही और वह वृद्धा कृतज्ञ भाव से।


A 105, गणेषणभंगन, रायकर नगर, धायरी
पुणे 41, मोब 9922730092


-मेराज रज़ा, समस्तीपुर
"कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों" इसे चरितार्थ कर दिखाया है समस्तीपुर जिले के मोहिउद्दीननगर प्रखंड स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय सिवैंसिंहपुर के प्रधानाध्यापक श्री मेघन सहनी ने। जो लोग कहते हैं कि सरकारी स्कूलों का कुछ नहीं हो सकता उनके लिए कराड़ा जवाब है उत्क्रमित मध्य विद्यालय सिवैंसिंहपुर। मोटी फीस लेने वाले प्राइवेट स्कूलों को मात देता यह स्कूल सफलता के कई सोपान गढ़, नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। जिला मुख्यालय से लगभग 40-45 किलोमीटर दूर यह विद्यालय लोगों को अपनी ओर खींच रही है। दूर-दूर से लोग इस विद्यालय को विजीट करने आ रहे हैं। अन्य विद्यालयों से हटकर, अपने नये रंग-रूप लिए विद्यालय चर्चा के केन्द्र में है। इस विद्यालय को देखकर कोई भी गच्चा खा सकता है कि विद्यालय है या कोई चलती ट्रेन। जी हां आप सही पढ़ रहे हैं। यहां अब 'शिक्षा एक्सप्रेस' नाम से कक्षाएं संचालित होती है। प्रधानाध्यापक श्री मेघन सहनी जी के विद्यालय के प्रति सकारात्मक सोच ने विद्यालय को 'शिक्षा एक्सप्रेस' में तब्दील कर दिया है। विद्यालय की दीवारों को इस तरह पेंट किया गया है मानो सचमुच में कोई ट्रेन हों। इसका असर सीधे बच्चों की उपस्थिति पर तो हुआ ही है उनमें सीखने के प्रति ललक भी जगा है। विद्यालय के प्रधानाध्यापक श्री मेघन सहनी कहते हैं-"हम अपने विद्यालय के बच्चों और विद्यालय के बेहतरीन प्रदर्शन के लिए समर्पित हैं! विद्यालय पहले और बाद में अपना परिवार को देखते है!"
विदित हो कि इससे पहले इसी प्रखंड के मध्य विद्यालय नंदनी के प्रधानाध्यापक श्री राम प्रवेश ठाकुर ने अपने विद्यालय की दीवारों पर 'शिक्षा एक्सप्रेस' जैसे नवाचार किए थे जिसकी सराहना राज्य ही नहीं अपितु देश स्तर पर हुई थी।

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नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

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