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नई दिल्‍ली। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपने मंत्रियों का एलान कर दिया है। उनके मंत्रिमंडल में 21 सदस्य होंगे। इनमें 16 लोग मंत्री और अन्य प्रधानमंत्री के सलाहकार होंगे। इनमें कम-से-कम 12 मंत्री पूर्व सैन्य तानाशाह परवेज मुशर्रफ के शासनकाल में अहम पदों पर रह चुके हैं। मुशर्रफ के प्रवक्ता, उनके वकील और मंत्री रह चुके लोगों पर इमरान ने भी भरोसा जताया है। इन्‍हें सोमवार को राष्ट्रपति भवन में शपथ दिलाए जाने की उम्मीद है। लेकिन इन सभी के बीच जिस नाम की सबसे अधिक चर्चा है उनका नाम शाह महमूद कुरैशी है, जिन्‍हें पाकिस्‍तान का नया विदेश मंत्री बनाया जाना है।
पहले भी रह चुके हैं विदेश मंत्री:-आपको बता दें कि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के उपाध्यक्ष कुरैशी शाह मेहमूद कुरैशी का नाम भारत के लिए नया नहीं है। इसके पहले भी वह वर्ष 2008-2011 तक पाकिस्तान के विदेश मंत्री रह चुके हैं और इस दौरान उन्होंने न सिर्फ दोनों देशों के बीच शुरू हुई समग्र वार्ता में पाकिस्तान की अगुवाई की थी बल्कि तत्कालीन विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के साथ कई द्विपक्षीय वार्ताएं भी कीं थीं। पीपीपी के तत्कालीन मुखिया आसिफ अली जरदारी से मनमुटाव होने के बाद उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। तब से वह इमरान खान से जुड़े हुए थे और उन्हें विदेश मामलों पर सुझाव दे रहे थे।
पहले से तय था कुरैशी का पद:-पाकिस्तान के आम चुनाव में कुरैशी और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ को मिली जीत के बाद से ही उनका विदेश मंत्री बनाया जाना लगभग तय माना जा रहा था। लेकिन वह भारत से संबंध सुधारने में कितने कारगर साबित होंगे ये तो वक्‍त ही बताएगा। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि अभी तक भारत से पाक सरकार के संबंध कैसे होंगे इसका फैसला वहां की सरकार नहीं बल्कि वहां की आर्मी करती आई है। यूं भी जानकार इस बात से इंकार नहीं करते हैं कि इमरान को सत्ता तक पहुंचाने में सेना का सबसे अहम रोल रहा है। विदेश मामलों के जानकार कमर आगा इस बात को पहले भी कह चुके हैं।
सेना मजबूत स्थिति में;-दैनिक जागरण से बात करते हुए उन्‍होंने कहा कि सेना पाकिस्‍तान में हमेशा से ही मजबूत स्थिति में रही है। यही वजह है कि वहां पर कोई भी सरकार सेना का हुक्‍म नहीं टालती है। मौजूदा हालातों की बात करें तो सेना अपने हाथों में सीधेतौर पर सत्ता हासिल करने की पक्षधर नहीं है। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि इससे देश और उसकी किरकिरी होती है। वैसे भी सैन्‍य सत्ता को आज दुनिया में मान्‍यता मिलना मुश्किल है। यही वजह है कि सेना ने इमरान को इसके लिए चुना है। जबतक वह सेना का कहा मानेंगे तब तक सत्ता पर बने रहेंगे।
मिला-जुला कार्यकाल;-जहां तक बतौर विदेश मंत्री कुरैशी का पहले के कार्यकाल का सवाल है तो वह काफी मिला-जुला रहा था। वर्ष 2008 में जिस दिन मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था उस दिन कुरैशी भारत में ही थे। इसका जिक्र पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा में भी किया है। मुखर्जी तब भारत के विदेश मंत्री थे। उन्होंने लिखा है कि जब उन्हें पता चला कि कुरैशी नई दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं तो उन्होंने तत्काल उनसे संपर्क साधा और कहा कि वह बगैर किसी देरी के पाकिस्तान लौट जाएं। यही नहीं मुखर्जी ने उनसे यह भी कहा कि इसके लिए वह अपना आधिकारिक विमान भी कुरैशी को देने को तैयार हैं। कुरैशी ने उनकी बात मानी और कुछ ही घंटों में वह पाकिस्तान लौट गये।
वादों पर नहीं किया काम:-कुरैशी ने बाद में मुंबई हमले को लेकर अपना दुख भी जताया और कई बार भारत को जांच में मदद करने का आश्वासन भी दिया। लेकिन असलियत में पाकिस्तान की तरफ से भारत को मुंबई हमले के दोषियों को पकड़ने में कोई मदद नहीं मिली। बीती सरकारों ने इस बाबत कभी भी ठोस कदम नहीं उठाए हैं। कुरैशी का एक दूसरा पहलू भी है। वर्ष 2010 में भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के साथ इस्लामाबाद में संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में बहुत ही आपत्तिजनक व्यवहार किया था। यह प्रेस कांफ्रेंस दोनो देशों के बीच हुई समग्र वार्ता के बाद आयोजित हुई थी। लेकिन प्रेस कांफ्रेंस में सार्वजनिक तौर पर कुरैशी ने भारतीय विदेश मंत्री के अधिकार को लेकर सवाल उठा दिए।
कुरैशी ने की थी गलत टिप्‍पणी:-उन्होंने कहा कि भारतीय विदेश मंत्री ने कई बार वार्ता को बीच में रोक कर नई दिल्ली बात की, उन्हें पूरे अधिकार के साथ वार्ता के लिए नहीं भेजा गया था। सार्वजनिक तौर पर उनकी इस तरह की टिप्पणी को न सिर्फ बहुत असभ्य माना गया बल्कि तब भारत के सभी राजनीतिक दलों ने इसकी जोरदार भ‌र्त्सना की। पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने उन्हें विदेश मंत्रालय के दूसरे दर्जे के सचिव के पद के योग्य भी नहीं होने की बात कही। हालांकि कुछ ही दिनों में यह बात साफ हो जाएगी कि पाकिस्‍तान की नई सरकार भारत से संबंध सुधारने के लिए कितनी गंभीर है। इसके अलावा सार्क सम्‍मेलन को लेकर भी उसकी छवि सभी के सामने आ जाएगी। वर्ष 2016 में हुए उड़ी हमले की वजह से भारत ने पाकिस्‍तान में होने वाले सार्क सम्‍मेलन का बहिष्‍कार किया था। इसके बाद पाकिस्‍तान को यह सम्‍मेलन रद करना पड़ा था। हालांकि यह सम्‍मेलन अब भी हो सकेगा इसको लेकर बड़ा सवालिया निशान अब भी मौजूद है।
पाकिस्‍तान के दूसरे अहम मंत्री:-परवेज खट्टक को रक्षा मंत्री बनाया गया है। इससे पहले 2013-18 तक वे खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल मुहम्मद उमर के बेटे असद उमर नई सरकार में वित्त मंत्री होंगे। 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय मुहम्मद उमर पाकिस्तानी सेना में शामिल थे। 'द न्यूज' की रिपोर्ट के मुताबिक, खट्टक और कुरैशी समेत पांच मंत्री इससे पहले पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं। मुशर्रफ के समय रेल मंत्री रह चुके शेख राशिद को वही पद मिला है। इमरान ने अपनी सरकार में तीन महिलाओं-शिरीन मजारी, जुबैदा जलाल और फहमिदा मिर्जा को भी शामिल किया है।

इस्लामाबाद। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने देशद्रोह मामले में कोर्ट में पेश होने के लिए राष्ट्रपति स्तर की सुरक्षा मांगी है। दुबई में रह रहे मुशर्रफ ने अपनी जान को खतरा बताते हुए यह मांग की है। विशेष अदालत में सोमवार को मामले की सुनवाई के दौरान उनके वकील अख्तर शाह ने कहा, 'मुशर्रफ की जान को खतरा है। पहले भी दो बार उनकी हत्या के प्रयास हो चुके हैं।इस्लामाबाद कोर्ट और क्वेटा में अकबर बुगती मामले की सुनवाई के दौरान उन पर हमला हुआ था। वह तभी कोर्ट में हाजिर होंगे जब रक्षा मंत्रालय उन्हें उच्च स्तरीय सुरक्षा मुहैया कराएगा।' इस पर मामले की सुनवाई कर रही दो सदस्यीय पीठ ने कहा, 'मुशर्रफ के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया है। इसके चलते उनकी सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है।'नवंबर, 2007 में देश में आपातकाल लगाने के लिए पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) की पिछली सरकार ने मुशर्रफ पर देशद्रोह का मुकदमा किया था। मार्च, 2014 में उनके खिलाफ आरोप तय किए गए थे। 2016 में वह इलाज के लिए दुबई चले गए थे। तब से वह वहीं हैं।अदालत की ओर से कई बार तलब किए जाने के बावजूद वह पेश नहीं हुए। कोर्ट फिलहाल उनके बयान लिए बगैर ही इस मामले की सुनवाई आगे बढ़ाने पर विचार कर रही है।

माउंट अराफात।सालाना हज के अगले चरण के तहत मुस्लिम श्रद्धालु सोमवार को सऊदी अरब के अराफात की पहाड़ी पर एकत्र हुए। यह स्थान मक्का से करीब 20 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में है। इस साल 20 लाख से ज्यादा श्रद्धालु हज कर रहे हैं। सुबह होते ही श्रद्धालुओं का सैलाब अराफात की पहाड़ी की ओर उमड़ पड़ा। इसे जबाल अल-रहम के नाम से भी जाना जाता है और मुस्लिमों का विश्वास है कि यहीं पर पैगंबर मुहम्मद ने अपना आखिरी प्रवचन दिया था।सफेद कपड़े पहने कुछ पुरुष और महिला श्रद्धालु अपने बुजुर्ग रिश्तेदारों को व्हीलचेयर से पहाड़ी पर चढ़ने में मदद कर रहे थे। रविवार की शाम बारिश के बाद से पूरे इलाके में गर्म हवा चल रही है। कुछ श्रद्धालुओं को बोतलबंद पानी से प्यास बुझाते देखा जा सकता है। सूर्यास्त के बाद हज यात्री नजदीक के मुजदलिफा की ओर रवाना होंगे।
हज के लिए 1.28 लाख भारतीय पहुंचे:-वार्षिक हज यात्रा के लिए 1.28 लाख भारतीय श्रद्धालु सऊदी अरब पहुंच गए हैं। सरकार ने हज कमेटी के माध्यम से 1,28,702 भारतीय हज यात्रियों को पहुंचने में मदद की है। इन्हें 466 उड़ानों में ले जाया गया। भारतीय दूतावास के अनुसार अंतिम उड़ान शुक्रवार को यहां पहुंची।इस साल रिकॉर्ड 1,75,025 भारतीय मुस्लिम यात्री हज के लिए गए हैं। इनमें 47 फीसदी से अधिक महिलाएं हैं। इससे पहले कभी भी भारत से इतनी संख्या में महिलाएं हज करने नहीं पहुंचीं। पिछले साल तक यह जरूरी था कि महिला के साथ उसका पति या मेहरम हो। इस साल पहली बार महिलाओं को बिना पुरुष रिश्तेदार के साथ होने के हज पर जाना की छूट मिली है।

 

 

 

काठमांडू। नेपाल के नागरिक उड्डयन प्राधिकरण (सीएएएन) ने भारतीय तीर्थयात्री की मौत के बाद निजी हेलीकॉप्टर कंपनी मनांग एयर की सेवाएं अस्थायी रूप से निलंबित कर दी हैं। कैलास मानसरोवर यात्रा पर आए मुंबई के कार्तिक नागेंद्र कुमार मेहता (42) हाल में हिल्सा क्षेत्र के एक हेलीपैड पर दुर्घटना का शिकार हो गए थे।हेलीकॉप्टर में बैठने के लिए दौड़कर हेलीपैड की तरफ आते वक्त वह हेलीकॉप्टर के पिछले हिस्से में लगी पंखुड़ी की चपेट में आ गए थे। उनकी मौके पर ही मौत हो गई थी। इस हादसे की जांच के लिए चार सदस्यीय समिति गठित की गई है। समिति को 30 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट देनी है। समिति इस बात की भी जांच करेगी कि हेलीकॉप्टर ऑपरेटर कंपनी सभी तकनीकी मानकों पर खरी है या नहीं।मनांग एयर ने सीएएएन से एयर ऑपरेटर सर्टिफिकेट हासिल कर अपनी कमर्शियल सेवा शुरू की थी। यह सर्टिफिकेट उन ऑपरेटर को ही दिया जाता है जो अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन द्वारा तय सुरक्षा मानकों पर खरे उतरते हैं।

वाशिंगटन। द्वितीय विश्व युद्ध में इस्तेमाल हुए एक समुद्री जंंगी जहाज यूएसएस एब्‍नर का 75 फुट लंबा ठोस हिस्सा वैज्ञानिकों ने खोज निकाला है। यह जहाज पनडुब्बियों की निगरानी के दौरान हुए धमाके में क्षतिग्रस्त हो गया था। तभी से इसकी खोज की जा रही थी। धमाके के बाद 71 अमेरिकी नौसैनिक भी लापता हो गए थे। लगभग 75 वर्ष पहले अमेरिकी सेना का यह विध्वंसक जहाज किस्का के एल्युटियन द्वीप के समीप बेरिंग समुद्र की अंधेरी सतह में कहीं गुम हुआ था।
बचा लिया गया जहाज:-यह अमेरिका के उन दो क्षेत्रों में से एक है जो बीते 200 साल में कभी विदेशी अधिकार में रहे हैं। बताया जाता है कि जहाज के सदस्यों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए जहाज को तो बचा लिया था, लेकिन यह हिस्सा लापता हो गया था। इस जहाज को दो महीने में पुन: तैयार करके फिर से युद्ध में उतारा गया था और इसने कई महत्वपूर्ण युद्धों में भाग लिया। अनुमान है कि उस समय एक जापानी माइन से हुए हादसे में ये क्षतिग्रस्त होकर बिखर गया था। 18 अगस्त 1943 के बाद इस घटना में लापता हुए सैनिकों के परिवारीजन इस इंतजार में थे कि उन्हें अपने प्रियजनों के अंतिम स्थल के बारे में पता चले।
जापान की भूमिका:-अमेरिकी नौसेना के पूर्व रीयर एडमिरल और यूएस नेशनल ओसिएनिक एंड एटमोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के प्रभारी टिम गैलोडेट का का कहना है कि इतिहास के अब तक सबसे कम जाने गए अध्याय पर प्रकाश डालने की दिशा में ये महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसके साथ अभूतपूर्व बलिदान देने वाले इन नौसेनिकों का सम्मान भी जरूरी है। उन्होंने बताया कि जहाज अलास्का टाइम जोन के अनुसार देर रात करीब 1:50 बजे पेट्रोलिंग पर था। दूसरे विश्‍वयुद्ध में जापान की भूमिका काफी अहम रही।
पर्ल हार्बर और परमाणु हमला:-जापान ने 7 दिसंबर 1941 को अमेरिका के पारो हर्बल पर हमला किया उसके चार दिन बाद हिटलर ने अमेरिका के साथ युद्ध की घोषणा कर दी थी। जर्मनी की हार के बाद और हिटलर की मौत के बाद पूरा विश्व युद्ध खत्म हो गया लेकिन एशिया में जापान अभी भी युद्ध लड़ रहा था जापान ने मित्र देशों के नाक में दम कर दिया था उसने अमेरिका का भी बहुत सा नुकसान किया अमेरिकन तथा संस्थाओं को जीत लिया जापान उस समय इतना उस समय इतना ताकतवर था कि वह हार मानने के लिए तैयार नहीं था और यहां पर मित्र देशों से हराकर पूरी तरह युद्ध को खत्म करना था इसलिए अमेरिका में 6 और 9 अगस्त 1945 को 2 दिन एक – एक करके जापान के हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बम से हमला किया जिसमें हजारों निर्दोष जापानी लोगों की मृत्यु हुई और उसके साथ ही दूसरे विश्व युद्ध का अंत हो गया
दस करोड़ सैनिकों ने लिया हिस्‍सा:-द्वितीय विश्व युद्ध 1939 से 1945 तक चलने वाला विश्व-स्तरीय युद्ध था। लगभग 70 देशों की थल-जल-वायु सेनाएं इस युद्ध में सम्मलित थीं। इस युद्ध में विश्व दो भागों मे बंटा हुआ था- मित्र राष्ट्र और धुरी राष्ट्र। इस युद्ध में विभिन्न राष्ट्रों के लगभग 10 करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया। इस युद्ध में लिप्त सारी महाशक्तियों ने अपनी आर्थिक, औद्योगिक और वैज्ञानिक क्षमता इस युद्ध में झोंक दी थी। यह मानव इतिहास का सबसे ज्‍यादा घातक युद्ध साबित हुआ। इस महायुद्ध में 5 से 7 करोड़ लोगों की जानें गईं क्योंकि इसके महत्वपूर्ण घटनाक्रम में असैनिक नागरिकों का नरसंहार- जिसमें होलोकॉस्ट और परमाणु हथियारों का एकमात्र इस्तेमाल शामिल है

नई दिल्‍ली। करीब सात दशक बीत जाने के बाद कुछ लोगों के लिए खुशी के पल सोमवार को उस वक्‍त आए जब वह उनसे मिले जिन्‍हें करीब 68 वर्ष पहले उन्‍होंने खो दिया था। आप शायद इस भावनात्‍मक पलों के बारे में अंदाजा भी नहीं लगा सकेंगे। लेकिन यह सच है। दरअसल यह नजारा उत्तर और दक्षिण कोरिया के सीमावर्ती इलाके का है, जिसे गैरसैन्‍य क्षेत्र घोषित किया हुआ है। आज के इस दिन के लिए पचास हजार लोगों ने आवेदन किया था, लेकिन जिन लोगों के आवेदन मंजूर किए गए उनकी संख्‍या महज 95 थी। ये वो लोग थे जो कोरियाई युद्ध के दौरान बिछड़ गए थे। सरकार की पहल के बाद वर्षों बाद इन लोगों को अपनों से एक बार फिर मिलने का मौका मिला था। हालांकि इससे पहले 2015 में भी इस तरह का मौका दिया गया था। वर्षों पहले बिछड़े इन लोगों की अपनों से मुलाकात उत्तर कोरिया के माउंट कुमगांग रिजॉर्ट में कराई गई।
नहीं रोक सकी आंसू:-वर्ष 1950 से 1953 तक उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच हुए युद्ध की वजह से हजारों लोग अपने सगे-संबंधियों से बिछड़ गए थे। ऐसे ही लोगों में शामिल थीं 92 वर्षीय केयूम सियोम। वह पहली बार अपने 71 वर्षीय बेटे से मिलीं तो अपने आंसुओं को रोक नहीं सकी। उनकी कहानी आपको भी झकझोर देगी। यह कहानी उस वक्‍त की है जब कोरियाई युद्ध अपने चरम पर था और अमेरिका युद्ध में हावी हो चुका था। जगह-जगह गोलाबारी हो रही थी। ऐसे में केयूम अपने पति और दो बच्‍चों के साथ गोलाबारी से बचते हुए सुरक्षित ठिकाना तलाश रही थीं। हर तरफ से धमाकों और गोलियों की आवाजें आ रही थीं। इस बीच जैसे तैसे वह उस राह पर निकल गई जहां पर उनके जैसे कई दूसरे लोग भी थे। यह राह उत्तर कोरिया की ओर जाती थी।
जीवन का सबसे बुरा पल:-इसी बीच उनकी बेटी को भूख लगी और वह भूख के मारे रोने लगी। लेकिन सड़क पर लोगों की भीड़ को देखते हुए वह नवजात को दूध नहीं पिला सकी। इसके लिए उन्‍होंने सड़क से सटे जंगल को चुना और अपने पति को बताकर वह पेड़ों के झुरमुट की तरफ बच्‍ची को दूध पिलाने निकल गई। 68 वर्ष पूर्व हुई ये घटना उनके जीवन की सबसे बुरी घटना थी। ऐसा इसलिए क्‍योंकि जब वह अपनी बच्‍ची को लेकर सड़क पर वापस आई तब वहां पर कोई नहीं था। उन्‍होंने अपने पति और बच्‍चे को काफी तलाशा लेकिन कहीं कोई नहीं मिला। हारकर वह बचते बचाते वापस लौट गईं। उन्‍हें खुद नहीं मालूम कि कितने दिन उन्‍हें इस तरह से बिताने पड़े। अपने बेटे और पति की आस में उनके आंसू बंद होने का नाम नहीं ले रहे थे। हालांकि कुछ समय बाद उन्‍हें एक सुरक्षित ठिकाना जरूर मिल गया था।
टापू पर बसाया गया:-बाद में दक्षिण कोरियाई सरकार की तरफ से ऐसे लोगों को दूसरे टापू पर बसाने का फैसला किया गया और एक आदेश जारी किया गया। इसमें कहा गया कि एक ट्रेन उन्‍हें समुद्री किनारे तक ले जाएगी और फिर वहां से उन्‍हें टापू पर ले जाया जाएगा। इत्तफाक से इसी ट्रेन में उनके पति के परिजन भी मौजूद थे। यहां से उन्‍होंने अपने जीवन की नई शुरुआत की। वह बताती हैं कि बाद में उन्‍होंने दूसरी शादी भी की लेकिन अपने बेटे को नहीं भूल सकी। इस बीच उनके पति की भी मौत हो गई थी। यह 68 वर्ष उन्‍होंने किस जद्दोजहद में गुजारे इसका वही जानती हैं।
पहली बार अपने भाई को देखा:-अब इतने वर्षों के बाद केयूम अपनी बेटी के साथ माउंट कुमगांग पहुंची थीं। सियोम के साथ उनकी बेटी भी पहली बार अपने भाई से मिली। सियोम ने कहा, 'मुझे नहीं पता मैं क्या महसूस कर रही हूं, अच्छा या बुरा। यह सपना है या हकीकत।' ग्‍यारह घंटो के दौरान इन लोगों की मुलाकात करीब छह बार होगी। दोनों देशों के बीच बेहतर होते संबंधों की बदौलत ही यह सब कुछ हो पाया है। उत्तर कोरिया की तरफ से री-यूनियन के लिए 83 लोगों को चुना गया था। इस मौके पर उत्तर कोरिया की तरफ से इन सभी लोगों को होटल में लंच कराया जाएगा। यह पल इन लोगों के लिए सबसे यादगार पल है।
सबसे यादगार पल:-इनके अलावा भी कुछ और लोग वहां पर मौजूद थे जो वर्षों बाद अपनों से मिले थे। 80 वर्षीय क्‍वांग हो अपने 78 वर्षीय भाई किम क्‍वांग, 89 वर्षीय यूग्‍वान सिक अपनी 67 वर्षीय बेटी यूयोन ओक, 93 वर्षीय हाम सुंग चान 79 वर्षीय भाई हाम डोंग चान, 81 वर्षीय जोंग टे भी अपने 56 वर्षीय भतीजे किम हाकसू, 95 वर्षीय ली मून ह्यूक अपने 80 वर्षीय भतीजे रीक्‍वान ह्यूक, 99 वर्षीय हान शिन जा अपनी 72 वर्षीय बेटी किमकिम क्‍योंग योंग से वर्षों बाद मिली थी।

नई दिल्ली। दुनिया भर में साइकलिंग ट्रिप पर निकले आदर्शवादी युवा अमेरिकन दंपति को बीते महीने आईएस आतंकियों ने मौत के घाट उतार दिया। 29 वर्षीय जे ऑस्टिन और लॉरेन जियोफेगन ने अपनी यात्रा शुरू करने के लिए बीते साल वॉशिंटन में अपनी नौकरी छोड़ दी थी। अमेरिकी आवास विभाग और शहरी विकास विभाग के लिए काम करने वाले ऑस्टिन और जोर्जटाउन विश्वविद्यालय प्रवेश कार्यालय में काम करने वाली जियोगेन…
बर्लिन। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सीरिया के पुननिर्माण और लाखों शरणार्थियों की मदद के लिए यूरोप से वित्तीय मदद की अपील की है। जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल के साथ मुलाकात से पहले उन्होंने कहा कि हमें सीरियाई संघर्ष में मानवीय प्रयास को मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यूरोप को सीरिया में पुननिर्माण में मदद करनी चाहिए, जिसके जरिए विदेशों में रहने वाले शरणार्थी वापस अपने…
वाशिंगटन। यमन में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने गत नौ अगस्त को एक स्कूल बस पर हमला करने में अमेरिकी बम का इस्तेमाल किया था। सीएनएन ने एक युद्ध विशेषज्ञ के हवाले से बताया है कि अमेरिका से हथियार संधि के तहत सऊदी को ये खतरनाक बम मिले हैं।सीएनएन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी सैन्य गठबंधन ने स्कूल बस पर हवाई हमला यह…
लंबोक। इंडोनेशिया में भूकंप के छोटे-बड़े झटकों का सिलसिला जारी है। रविवार को एक बार फिर लोम्बोक द्वीप में 6.3 तीव्रता के भूकंप के तेज झटके महसूस किए गए। हालांकि किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है। अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे ने बताया कि भूकंप की तीव्रता 6.3 मापी गई। यूएसजीएस ने बताया कि पूर्वी लोम्बोक के बेलेंटिंग शहर के दक्षिण-पश्चिम में भूकंप आया जिसका केन्द्र जमीन से सात किलोमीटर…
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नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

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