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बीजिंग - विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की विभिन्न बैठकों में हिस्सा लेने के लिए 24 अप्रैल को बीजिंग में मौजूद रहेंगी। दोनों केंद्रीय मंत्री चीन सहित अन्य सदस्य देशों के अपने समकक्षों से बातचीत भी करेंगी।
आठ सदस्यीय एससीओ में भारत और पाकिस्तान हाल ही में शामिल हुए हैं। जून में चीनी शहर क्यिंगडाओ में होने वाले शिखर सम्मेलन में दोनों देश शामिल होंगे। इस शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाग लेने की उम्मीद है। इस दौरान प्रधानमंत्री चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से बातचीत भी करेंगे। एससीओ में चीन, कजाखिस्तान, किरगिस्तान, रूस, ताजाकिस्तान, उजबेकिस्तान, भारत और पाकिस्तान शामिल हैं।
शिखर सम्मेलन से पहले आतंकवाद विरोध पर केंद्रित संगठन के मंत्रीस्तरीय और अधिकारी स्तर की बैठकें की जा रही हैं। इसका उद्देश्य शिखर सम्मेलन के लिए ठोस एजेंडा तैयार करना है जिससे समूह को नई दिशा मिला सके। एससीओ की विदेश और रक्षा मंत्रियों की बैठक एक ही दिन 24 अप्रैल को रखी गई है। दोनों बैठकों का समय भी एक ही होगा। पिछले वर्ष 73 दिनों तक चले डोकलाम विवाद के बाद पहली बार दो भारतीय मंत्री स्वराज और सीतारमण चीन में होंगी।


इस्लामाबाद - अमेरिका और पाकिस्तान के बीच चल रहे कूटनीतिक विवाद से उनके राजदूत प्रभावित हो सकते हैं। दोनों देशों के राजनयिकों की आवाजाही पर एक मई से कठोर प्रतिबंध लग सकता है। यह आशंका गुरुवार को मीडिया रिपोर्ट में व्यक्त की गई है।
मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान को सूचित किया है कि वाशिंगटन में उसके दूतावास और अन्य शहरों में वाणिज्य दूतावास के राजनयिक बिना अनुमति अपनी जगह से 40 किलोमीटर से ज्यादा दूरी की यात्रा नहीं कर सकेंगे। पाकिस्तानी अखबार डान ने लिखा है, 'वाशिंगटन में पाकिस्तानी दूतावास को नोटिस थमाया गया है और इस्लामाबाद में विदेश मंत्रालय को भी भेजा गया है। इससे पता चलता है कि यदि कुछ मुद्दे अनसुलझे रह जाते हैं तो एक मई से प्रतिबंध लग सकता है।'
दोनों देशों ने प्रतिबंध से इन्कार किया
हालांकि अमेरिकी विदेश विभाग और पाकिस्तानी दूतावास ने राजनयिकों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाए जाने से इन्कार किया है। एक ईमेल के जवाब में अमेरिकी स्टेटमेंट विभाग के प्रवक्ता ने कहा है, 'मैं पुष्टि कर सकता हूं कि अमेरिका में पाकिस्तानी राजनयिकों की यात्रा पर कोई प्रतिबंध नहीं है।' भविष्य में प्रतिबंध लगाए जाने की संभावना के बारे में पूछे जाने पर अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि इस समय हम अभी कुछ भी घोषणा नहीं कर सकते हैं।
अमेरिका में पाकिस्तानी दूतावास के प्रवक्ता ने भी ऐसा ही जवाब दिया है। उन्होंने कहा है कि अभी तक अमेरिका में पाकिस्तानी राजनयिकों की आवाजाही पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। लेकिन दूतावास को भविष्य में प्रतिबंध लगाए जाने के बारे में कोई सूचना नहीं है।
अधिकारियों ने कहा, पाकिस्तान में हुई सड़क दुर्घटना से कोई संबंध नहीं
अमेरिका और पाकिस्तान के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि नोटिस का इस्लामाबाद में अमेरिकी दूतावास में अमेरिकी सैन्य अटैची की सड़क दुर्घटना मामले से कोई लेनादेना नहीं है। अमेरिकी अधिकारी पर शनिवार को हुई सड़क दुर्घटना में एक पाकिस्तानी नागरिक की जान लेने और दूसरे को घायल करने का आरोप है।


इस्लामाबाद - पाकिस्तान को इस साल मिलने वाली करोड़ों डॉलर की अमेरिकी असैनिक सहायता पर तलवार लटक रही है। ट्रंप प्रशासन ने चेतावनी दी है कि पाकिस्तान ने मानव तस्करी से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं किया तो यह सहायता रोकी जा सकती है। इस सहायता कटौती से अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों को ताजा झटका लगेगा। बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने पर जनवरी में पाकिस्तान को करीब दो अरब डॉलर (करीब 13059 करोड़ रुपये) की सुरक्षा सहायता रोक दी थी।
इस्लामाबाद स्थित अमेरिकी दूतावास सूत्र के मुताबिक, अमेरिकी असैनिक सहायता 2017 का एक बड़ा हिस्सा 26.5 करोड़ डॉलर (करीब 1730 करोड़ रुपये) रोका जा सकता है। ऐसा अमेरिकी विदेश मंत्रालय द्वारा पाकिस्तान को मानव तस्करी के मामले में दुनिया भर में सबसे खराब काम करने वालों की सूची में रखे जाने पर किया जा सकता है। इस मामले विदेश मंत्रालय की वार्षिक ट्रैफिकिंग इन पर्सन (टीआइपी) रिपोर्ट जून में आने वाली है। अमेरिका के संघीय कानून के तहत मानव तस्करी के मामले में सबसे नीचे ग्रेड में रहने वाले देश पर यह प्रतिबंध लगाया जा सकता है। हालांकि ट्रंप इसमें पूरी या आंशिक छूट दे सकते हैं। यह सहायता राशि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के आकार के हिसाब से काफी मामूली है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) और विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से मिलने वाली नई सहायता पर अमेरिका के विरोध करने पर पाकिस्तान को तगड़ा झटका लग सकता है। ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इस पर फैसला नहीं हुआ है लेकिन पाकिस्तान को सहायता कटौती से बचने के लिए अपनी रैंकिंग सुधारने को कहा गया है।
क्या है टीआइपी रिपोर्ट
अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ट्रैफिकिंग इन पर्सन (टीआइपी) रिपोर्ट में करीब 180 देशों में मानव तस्करी से जुड़े मसलों से निपटने के लिए किए जा रहे काम का आकलन किया जाता है। पाकिस्तान पिछले चार वर्षों से इस सूची में टीयर-2 में है। अगर पाकिस्तान ने सुधार नहीं किया तो सबसे निचली रैंकिंग टीयर-3 में ईरान, उत्तर कोरिया, सीरिया और अन्य के साथ शामिल हो जाएगा। टीयर-3 रैंकिंग का मतलब मानव तस्करी पर अमेरिका के न्यूनतम मानदंड का पालन नहीं किया जाना है।

 


नई दिल्ली - अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव के दौरान ‘अमेरिका पहले’ की नीति की घोषणा की थी जिसे वे कार्यान्वित करने में लगे हुए हैं। पहले वीजा पर प्रतिबंध और अब चीन की अमेरिकी बाजार में घुसपैठ कम करने की नीतिया अमेरिकी राष्ट्रवाद को बढ़ावा देंगे इसमें संदेह नहीं, किंतु इनके दूरगामी प्रभाव न केवल इन दोनों देशों, अपितु पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर पड़ेंगे। गौरतलब है कि चीन अमेरिका का सबसे बड़ा व्यावसायिक साङोदार है। पिछले वर्ष अमेरिका ने चीन से 500 अरब डॉलर से अधिक का आयात किया था, किंतु चीन ने कुल 130 अरब डॉलर का आयात अमेरिका से किया था। चीन के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा बढ़ता जा रहा है। वर्षो से यही स्थिति बनी हुई है। चीनी इस्पात और एल्युमिनियम का अमेरिका सबसे बड़ा खरीदार है। अमेरिकी कंपनियों का इन वस्तुओं का उत्पादन लागत चीन से अधिक है जिससे चीनी स्पर्धा में वे टिक नहीं पाते हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप ने जब पिछले महीने चीनी स्टील और एल्युमीनियम पर क्रमश: 25 प्रतिशत एवं 10 प्रतिशत टैरिफ यानी प्रवेश शुल्क बढ़ाने की घोषणा की तो चीन तिलमिला उठा और उसने जवाबी कार्रवाई की धमकी दी। विश्व में इसे दोनों देशों के बीच टेड वार की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसा नहीं मानते। उनका कहना है कि अमेरिका पूर्ववर्ती शासकों और अधिकारियों की गलत नीतियों के कारण टेड वार पहले ही हार चुका है। वास्तव में पिछले एक वर्ष से ट्रंप प्रशासन चीनी आयात पर प्रतिबंध लगाने के उपायों पर सोच रहा था। चीन के अनुचित व्यापार के तरीकों और बौद्धिक संपदा की चोरी की जांच के लिए उन्होंने एक समिति बनाई थी जिसके नतीजों के आधार पर फरवरी 2018 में अमेरिकी वाणिज्य मंत्रलय ने चीनी स्टील और एल्युमीनियम पर टैरिफ बढ़ाने की सिफारिश की।
ट्रंप की घोषणा के जवाब में चीन ने अप्रैल के पहले सप्ताह में 120 अमेरिकी पदार्थो पर शुल्क बढ़ाने का निर्णय किया। उसके तुरंत बाद अमेरिका ने 50 अरब डॉलर के चीनी उत्पादों पर 25 प्रतिशत टैरिफ बढ़ाने की घोषणा की जिससे अमेरिका को आयात होने वाली 1300 वस्तुएं बढ़ी टैरिफ की गिरफ्त में आएंगी। उसके जवाब में चीन ने 106 अमेरिकी वस्तुओं, जो चीन उससे आयात करता है, पर 25 प्रतिशत टैरिफ बढ़ाने का निर्णय लिया।1चीन और अमेरिका, दोनों देशों ने एक दूसरे से आयात पर जो टैरिफ बढ़ाए हैं उनके कार्यान्वयन की तिथि अभी तक नहीं दी है जो इस बात का संकेत देता है कि आपस में सुलह की गुंजाइश अभी शेष है। हालांकि बाजार में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है।
यह व्यापार यु़द्ध चलेगा या बंदर घुड़की ही रह जाएगा? राष्ट्रपति ट्रंप की उत्तर कोरिया नीति से इस संभावना को बल मिलता है कि वे शुरू में तीखे प्रहार करते हैं फिर नरम पड़ने लग जाते हैं। चीन संभवत: इस स्थिति से परिचित होने के कारण उनकी बातों का प्रतिवाद नपे तुले शब्दों में कर रहा है। स्थिति को अपनी ओर से आग देने से बच रहा है, क्योंकि यदि व्यापार युद्ध हुआ तो उसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। अमेरिका में भी उद्योगपति और बड़ी कंपनियां आशंकित हैं, क्योंकि उन्होंने बड़े पैमाने पर चीन में निवेश किया है। जो अमेरिकी उद्योग चीनी स्टील व एल्युमीनियम आयात करते हैं उन्हें डर है कि उनकी उत्पाद लागत बढ़ जाएगी। शुरू में ही चीन अमेरिका का यह व्यापार युद्ध थम गया तो विश्व अर्थव्यवस्था के लिए हितकर होगा, किंतु यदि यह आगे बढ़ा तो दुनिया के बहुत सारे देश इसकी चपेट में आ जाएंगे, विशेषकर बड़े औद्योगिक देश जापान, कोरिया, जर्मनी और यूरोपीय देश जिनका दोनों देशों के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार है।
चीन जिन हाईटेक वस्तुओं का निर्माण करता है उनमें उसका अपना भाग बहुत कम है। अधिकांश कच्चा माल, प्रोसेस्ड वस्तुएं, मशीनरी और तकनीक विदेशी कंपनियां लाती हैं जो दुनिया के बहुत से देशों से खरीदी जाती हैं। वे सभी देश जो इन कंपनियों को माल सप्लाई करते हैं इस टेड वार से प्रभावित होंगे। सप्लाई चेन से देश एक-दूसरे से ऐसे जुड़े हैं कि व्यापार नीति में कहीं भी परिवर्तन होगा तो उनके ऊपर असर पड़ेगा। 1930 की विश्वव्यापी मंदी की शुरुआत अमेरिका से ही प्रारंभ हुई थी। अमेरिकी टैरिफ एक्ट 1930 के अंतर्गत जब वहां सरकार ने विदेशी आयात पर टैरिफ बढ़ाने शुरू किए और अपने उद्योगों के संरक्षण की नीति तेजी से लागू की तो विश्व के कई देश बुरी तरह प्रभावित हुए। सभी देशों ने वैसी ही नीति अपनानी शुरू की। फलस्वरूप विश्व बाजार में भयानक मंदी आई। आखिरकार सरकारों ने यह अनुभव किया कि व्यापार युद्ध सबके लिए घातक है। यह टैरिफ वार विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की नीतियों की अवहेलना है।
चीन और अमेरिका के संबंध यदि बिगड़े तो भारत को अपनी व्यापार रणनीति पर दोबारा विचार करना होगा। दोनों ही देशों के साथ भारत एक बड़ा व्यापारिक साझेदारी है। चीन और भारत के बीच 70 अरब डॉलर से अधिक का व्यापार है। चीन भारत को 60 अरब डॉलर के लगभग निर्यात करता है और भारत चीन को मात्र 10 अरब डॉलर के आसपास। चीन के प्रति भारत की व्यापार नीति जरूरत से ज्यादा उदार रही है। इसका परिणाम है चीन के साथ भारत का बढ़ता घाटा।1भारत अमेरिका का 9वां बड़ा व्यापारिक साङोदार है। दोनों देशों के बीच साल 2016 में 114 अरब डॉलर का व्यापार हुआ है जो चीन से दो गुना है। भारत ने अमेरिका से 67 अरब डॉलर का माल आयात किया बाकी व्यापार सेवाओं का है। भारत का व्यापार घाटा 30 अरब डॉलर का है जो चीन से बहुत कम है। भारत और अमेरिका के संबंधों में पिछले कुछ वर्षो में तेजी से सुधार हुए हैं। जाहिर है अमेरिका के साथ व्यापार बढ़ाने की बड़ी संभावना है। कुल मिलाकर व्यापार युद्ध की स्थिति में भारत अमेरिका के व्यापारिक संबंधों में गति आ सकती है जो दोनों देशों के हित में होगा।


सिओल - उत्तर कोरियाई तानाशाह की नीतियों पर मुहर लगाने के लिए संसद (सुप्रीम पीपुल्स असेंबली) का सत्र बुलाया गया है। लेकिन देश के शासक किम जोंग उन संसदीय कार्यवाही में भाग नहीं ले रहे हैं। यह जानकारी गुरुवार को मीडिया रिपोर्ट से मिली। सरकारी मीडिया में आई तस्वीरों में भी उनकी कुर्सी खाली नजर आ रही है।
दक्षिण कोरियाई एकीकरण मंत्रालय के अनुसार, छह साल पहले पार्टी के सर्वोच्च नेता बनने के बाद से किम संसद (सुप्रीम पीपल्स असेंबली) के आठ में से छह सत्रों में उपस्थित रहे। लेकिन, ऐसा लगता है कि किम मौजूदा सत्र में भाग नहीं ले रहे हैं।
उत्तर कोरियाई समाचार एजेंसी केसीएनए ने भी गुरुवार की बैठक की खबरों में उनकी उपस्थिति का जिक्र नहीं किया है। ऐसा माना जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ शिखर वार्ता के मद्देनजर किम रणनीति बनाने में व्यस्त हैं। इसी वजह से शायद वह संसद की कार्यवाही के दौरान अनुपस्थित हैं।


वाशिंगटन - अमेरिका के भावी विदेश मंत्री माइक पोम्पीओ ने कहा कि दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में चीन का उकसाने वाला कदम लगातार जारी है। वह कूटनीतिक, सैन्य और आर्थिक मोर्चो पर अमेरिका से बराबरी करने के लिए सुनियोजित प्रयास कर रहा है।
विदेश मंत्री पद के लिए नामित किए गए पोम्पीओ फिलहाल अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआइए के निदेशक हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि चीन नीति को बनाने और क्रियान्वयन के केंद्र में विदेश विभाग को होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने रूस, ईरान और उत्तर कोरिया समेत विदेश नीति से जुड़े कुछ मसलों पर सख्त रुख अपनाने की जरूरत पर भी बल दिया।
54 वर्षीय पोम्पीओ ने कहा, 'हमारे राजनयिक संबंधों में अमेरिकी ने फिर से अपनी मजबूत स्थिति को स्थापित किया है, लेकिन चीन राजनयिक, सैन्य और आर्थिक मोर्चे पर अमेरिका से प्रतिस्पर्धा करने के लिए सुनियोजित प्रयास कर रहा है। चीन सालों से अमेरिका की कमजोर व्यापार नीति का फायदा उठाता रहा और हमारी अर्थव्यवस्था से धन और गोपनीय जानकारियां एकत्र कीं। जबकि वह सैन्य मोर्चे पर दक्षिण और पूर्वी चीन सागर, साइबरस्पेस और बाहरी अंतरिक्ष में भी उकसाने का काम जारी रखे हुए है।' अमेरिकी सीनेट की विदेश मामलों की समिति में पेशी के लिए तैयार किए गए अपने बयान में पोम्पीओ ने कहा कि द्विपक्षीय संबंधों को ज्यादा रचनात्मक बनाने के लिए मौजूदा प्रशासन चीन के साथ कूटनीतिक तरीके से काम कर रहा है।
अमेरिका के लिए रूस बड़ा खतरा
माइक पोम्पीओ ने रूस को अमेरिका के लिए बड़ा खतरा करार दिया। उन्होंने कहा कि सालों की लचीली नीति के चलते रूस का बर्ताव आक्रामक हुआ है, लेकिन यह दौर अब समाप्त हो गया है। हमने रूस पर सख्त प्रतिबंध लगाए और उसके कई राजनयिकों को निष्कासित किया है।

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