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दक्षिण कोरिया के डॉक्टरों ने उत्तर कोरिया के एक जख्मी सैनिक की आंतों में से 11 इंच लंबे गोल कृमि समेत दर्जनों परजीवी निकाले हैं। यह कुपोषण की निशानी है। यह सैनिक पिछले सोमवार को उत्तर कोरिया से भाग कर दक्षिण कोरिया आने के दौरान गोलीबारी में गंभीर रूप से जख्मी हो गया था।सैनिक के नाम और रैंक को उजागर नहीं किया गया है। वह उत्तर और दक्षिण कोरिया को बांटने वाली रेखा के करीब सैन्य जीप से दक्षिण कोरिया आ गया था। अस्पताल अधिकारियों ने कल बताया कि अभी कहना बहुत जल्दी होगी कि वह ठीक होगा या नहीं। अस्पताल में उसके जख्मों के उपचार के दौरान डॉक्टरों को बड़े परजीवी मिले जो खराब पोषण और उत्तर कोरिया की सेना में खराब स्वास्थ्य को दशार्ते हैं।डॉक्टरों ने केहा कि सैनिक का कद 5.6 फुट है लेकिन उसका वजन 60 किलोग्राम है। सैनिक का इलाज करने वाले डॉक्टरों के दल की अगुवाई करने वाले ली कूक जॉन्ग ने कहा, एक सर्जन के तौर पर मुझे 20 साल से ज्यादा का अनुभव है लेकिन मुझे किसी दक्षिण कोरियाई की आंतों में इतना बड़ा परजीवी कभी नहीं मिला।

जर्मनी के वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन द्वारा लिखित और हस्ताक्षरित एक पत्र को अमेरिका में नीलामी के लिए रखा गया है और इसकी दस हजार डॉलर तक बोली लग सकती है।इस पत्र में एक धनी व्यवसायी से जर्मनी में हिटलर के शासन में भागे यहूदी बुद्धिजीवियों की मदद के वास्ते अपनी धनराशि दान करने के लिए कहा गया था।जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर के यहूदी विरोधी नियमों और सघन कानूनों के कारण हजारों की संख्या में यहूदी लोगों को अपनी नौकरियां छोड़नी पड़ी थीं और अपने देश से बाहर होना पड़ा था। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इन शिक्षित प्रवासियों को अपने देशों में नागरिक सेवा, विश्वविद्यालय और कानूनी पदों तथा वैज्ञानिक अनुसंधान क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया।कई संगठन इन मूल्यवान नये नागरिकों के आगमन पर उनकी मदद के लिए आगे आये थे। सबसे महत्वपूर्ण यहूदी वैज्ञानिक आइंस्टीन ने इस तरह के संगठनों की तरफ से काम किया। आरआर ऑक्शन के अनुसार आइंस्टीन ने तीन अप्रैल, 1951 को कपड़ा निर्माता कंपनी हार्ट, शैफ़ेनर एंड मार्क्स, के धनी निदेशक जोसेफ हाल्ले शैफेनर को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने हिटलर के शासन में भागे यहूदी बुद्धिजीवियों की मदद के वास्ते अपनी धनराशि दान करने के लिए कहा था।

वैज्ञानिकों ने एक बार फिर ब्लैक होल में गुरुत्वाकर्षण तरंगों यानी ग्रेवीटेशनल वेव्स की खोज की है। पृथ्वी से करीब एक अरब प्रकाश वर्ष दूर और सूर्य से क्रमश: 7 और 12 गुना अधिक भार वाले दो हल्के ब्लैक होल के आपस में मिलने से इन तरंगों की खोज हुई। दोनों ब्लैक होल जब आपस मिले तो इनका द्रव्यमान सूर्य से 18 गुना ज्यादा था। वैज्ञानिकों के अनुसार ब्लैकहोलों के टकराने पर स्पेस और समय के संबंध का पता लगता है।लेजर इन्फ्रोमीटर ग्रेवीटेशनल वेव्स ऑब्जर्वेटरी यानी लिगो परियोजना और इटली स्थित वर्गो डिटेक्टर से जुड़े वैज्ञानिकों ने इस घटना का 8 जून को पता लगाया था। हालांकि दो अन्य खोजों को समझने के लिए आवश्यक समय की वजह से इसकी घोषणा में देरी हुई। GW170608 सबसे हल्का ब्लैक होल है। ऐसा पहली बार हुआ है जब गुरुत्वाकर्षण तरंगों के माध्यम से ब्लैक होल का पता लगाया गया है।गौरतलब है कि महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने सौ साल पहले ग्रेवीटेशनल वेव्स की परिकल्पना की थी। पहली बार 14 सितंबर, 2015 को इन वेव्स की खोज हुई। तब इसे सदी की महान खोज कहा गया था। 2017 का भौतिक विज्ञान का पुरस्कार लिगो परियोजना को शुरू करने वाले वैज्ञानिकों राइनर वाइस, बैरी बैरिश और किप थोर्ने को मिला था। वैज्ञानिकों के मुताबिक गुरुत्वाकर्षण तरंगों के पता लगने से ब्रह्मांड के बारे में समझ का नया युग शुरू होगा।
गुरुत्वाकर्षण तरंगें आती कहां से हैं?
वैज्ञानिक मानते हैं कि कई खरब साल पहले जब इस सृष्टि की शुरुआत भी नहीं हुई थी, तो दो विशालकाय ब्लैक होल आपस में टकराए थे। उनकी टक्कर से बड़ी मात्रा में ऊर्जा निकली थी। इतनी ऊर्जा कि हजारों सूर्य की ऊर्जा भी मिला दें, तो उसके सामने फीकी पड़ जाए। इसी के साथ ही कई तरंगें भी पैदा हुईं और पूरे ब्रह्मांड में फैल गईं। इन्हीं तरंगों को गुरुत्वाकर्षण तरंग कहा जाता है और माना जाता है कि ये तरंगें आज भी भटक रही हैं, जो अक्सर हमसे और हमारी धरती से टकराती हैं, पर असर इतना कम होता है कि हम इन्हें महसूस नहीं कर पाते, इन्हें सिर्फ अति-संवेदनशील उपकरणों के जरिये ही पकड़ा जा सकता है।
डॉर्क मेटर समझने में मिलेगी मदद
माना जाता है कि गुरुत्वाकर्षण तरंगें क्योंकि सृष्टि के आरंभ से जुड़ी हैं, इसलिए हम सृष्टि की शुरुआत के बहुत से रहस्यों को समझ सकते हैं। कहा जाता है कि उस ‘डार्क मैटर’ को समझने की कुंजी भी गुरुत्वाकर्षण तरंगों में छिपी है, जो हमारे अस्तित्व का एक बड़ा हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें हम जान, समझ और देख नहीं पाए हैं।

ऑस्ट्रोलिया के शोधकर्ताओं ने पाया कि देशी घास की प्रजातियों में एक ऐसी घास है जो बिल्कुल चिप्स जैसा स्वाद देती है। वैज्ञानिकों ने जब इस घास को चखा तो पाया कि ये इस घास का स्वाद CHIPS जैसा था और अगर इसमें सिरका डाल दिया जाए तो और भी स्वादिष्ट हो जाती है। यूनीवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया (यूडब्ल्यूए) ने यह शोध किया था। इस घास का नाम 'ट्रियोडिया साइनटिलन्स' है जो ऑस्ट्रेलिया के पर्थ सिटी में पाई जाती है।उन्होंने बताया कि घास की खोज ऐसे हुई कि जब एक रिसर्च टीम काम में लगी थी तब गलती से एक ने अपनी उंगली को चाट लिया तो उसे घास का स्वाद आया। ऑस्ट्रेलिया में कम से कम 64 अलग-अलग त्रियोडिया प्रजाति की घास पाई जाती है।

 


इस्लामाबाद - गिलगिट-बल्टिस्तान में पाकिस्तान सरकार की ओर से लागू किए गए टैक्सेसन सिस्टम को अवैध बताते हुए हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक स्कार्डू में पाक्स्तिान सरकार की टैक्स नीति के विरोध में बड़ी संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। गिलगिट बल्टिस्तान के व्यापारियों का कहना है कि वे इसी जोश और नाराजगी के साथ पाकिस्तान सरकार के फैसले के खिलाफ विरोध जारी रखेंगे, जबतक इसे वापस नहीं लिया जाता।
पाकिस्तान सरकार के खिलाफ यह विरोध प्रदर्शन मुज्जफराबाद, रावलाकोट, कोटली, गिलगिट और हजिरा सहित अन्य कई स्थानों पर भी जारी है। लोग पाकिस्तान विरोधी नारे लगा रहे हैं और सरकार से इस क्षेत्र से सेना को हटाने की मांग कर रहे हैं।
गौरतलब है कि इससे पहले भी गत 22 अक्टूबर को गिलगिट बल्टिस्तान क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था और 'ब्लैक डे' मनाया था। दरअसल, 22 अक्टूबर 1947 को ही पाकिस्तानी सेना ने तत्कालीन जम्मू-कश्मीर रियासत के इस हिस्से में घुसपैठ कर कब्जा कर लिया था। गिलगित बल्टिस्तान के लोग पाकिस्तान से अपनी आजादी की मांग करते हैं और इसके विरोध में ही 22 अक्टूबर को 'काला दिवस' के रूप में मनाते हैं।


नई दिल्ली - रंग-बिरंगी और डिजिटल नंबर दिखने वाली स्मार्टवॉच बच्चों को काफी पसंद आती है मगर क्या आप जानते हैं कि जर्मनी की टेलिकॉम अथॉरिटी फेडरल नेटवर्क एजेंसी ने शुक्रवार को बच्चों के लिए बिकने वाली स्मार्टवॉच पर प्रतिबंध लगा दिया है। साथ ही अभिभावकों को सलाह दी गई है कि वह अपने बच्चों के हाथ पर बंधी स्मार्टवॉच को उतार दें और उसे तोड़ दें। एजेंसी ने इसे 'सुनने वाली प्रतिबंधित डिवाइस' की श्रेणी में रखा है जो प्राइवेसी के लिए खतरा बन सकती है।
अथॉरिटी फेडरल नेटवर्क एजेंसी के मुताबिक यह डिवाइस आस-पास होने वाली बातों को रिकॉर्ड करती है और वो भी बिना किसी जानकारी के। बच्चों के स्मार्ट डिवाइस यानी स्मार्टवॉच, कैमरा और अन्य खिलौने जिनमें इंटरनेट होता है, वे जानकारी को इकट्ठा करते हैं और उसे थर्ड पार्टी तक पहुंचाते हैं। स्मार्टवॉच लगातार कैमरा, माइक्रोफोन और जीपीएस का इस्तेमाल करती है जिस वजह से कोई अन्य व्यक्ति माता-पिता की रियल टाइम लोकेशन जानकर उन्हें हानि पहुंचा सकता है। यह लोगों की निजी जिंदगी में दखल देने के जैसा है जिसको लेकर जर्मन एजेंसी गंभीर है।
इससे पहले गुड़िया पर लगा था प्रतिबंध
फेडरल नेटवर्क एजेंसी ने ऐसा पहली बार नहीं किया है कि बच्चों के किसी डिवाइस पर प्रतिबंध लगाया हो। एक साल पहले इस एजेंसी ने 'माई फ्रेंड कायला' नाम की स्मार्ट डॉल पर प्रतिबंध लगाया था। एजेंसी ने इस गुड़िया पर संदेह व्यक्त किया था कि इसमें मौजूद कैमरा बच्चों और अभिभावक की जानकारी थर्ड पार्टी तक पुहंचा रहा है। इससे लोगों की निजी जिंदगी में दखलअंदाजी हो रही है।

नई दिल्ली - फ्रैंकफर्ट में रहने वाले एक शख्स अपनी कार पार्क कर उसकी लोकेशन भूल गए थे। अब 20 साल बाद उन्हें अपनी कार दोबारा वापस मिल गई। जी हां! जानकर आपको आश्चर्य होगा लेकिन इस शख्स ने अपनी कार एक इंडस्ट्रियल बिल्डिंग के बाहर सन 1997 में पार्क की थी और भूल गए थे। काफी देर तलाशने के बाद उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दी। 20 साल बाद…
नई दिल्ली - मिकी माउस करीब 90 साल से बच्चों को हंसा रहा है। मिकी माउस दुनिया के सबसे पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर में से एक है। 1928 में वॉल्ट डिजनी ने मिकी माउस के किरदार को जन्म दिया था। 1930 में मिकी माउस सफलता की ऊंचाईयों पर पहुंच गया और इसने वॉल्ट डिजनी को सफल व्यक्ति बना दिया। इसके सामने आने की कहानी भी बड़ी मजेदार है। वॉल्ट डिज्नी को…
संयुक्त राष्ट्र - रूस ने गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सीरिया के विरुद्ध लाए गए रासायनिक हमले की जांच संबंधी प्रस्ताव को दसवीं बार वीटो कर दिया। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में शामिल रूस के वीटो करते ही प्रस्ताव खारिज हो गया। अमेरिका के इस प्रस्ताव के पक्ष में 11 और विपक्ष में दो वोट पड़े। विपक्ष में वोट करने वालों में रूस और बोलीविया शामिल…
वॉशिंगटन - चीनी मामलों के एक शीर्ष अमेरिकी विशेषज्ञ ने कहा है कि पीएम मोदी विश्व के एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्होंने चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना 'बेल्ट एंड रोड' की मुखालफ़त की थी। विदेश नीति खासकर चीनी मामलों पर नजर रखने वाले एक बड़े थिंक टैंक ने कहा है कि यहां तक अमेरिका ने भी इस परियोजना पर चुप्पी साध ली है। अमेरिका के जाने-माने थिंक-टैंक हडसन इंस्टीट्यूट के सेंटर…
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