Editor

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-बाल मुकुंद ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)


पेट्रोल के लगातार बढ़ते दाम से आम आदमी हलकान है और उस पर तेल कंपनियों ने एक बार फिर पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए हैं। यानी अब आदमी को और महंगाई का बोझ सहना पड़ेगा। तेल के भावों में निरंतर वृद्धि से रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में आग लग गयी है। सब्जी फल महंगे हो जाने से रसोई का हिसाब बिगड़ गया है। ट्रकों ने मालभाड़ा बढ़ा दिया है जिससे आम उपभोग की वस्तुओं का महंगा होने स्वाभाविक है। दूसरी तरफ केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने टैक्स में कोई कमी नहीं की है। यदि टैक्स में कमी हो तो जनता को राहत मिल सकती है। मगर जनता को राहत कोई देना नहीं चाहता।
पेट्रोलयम पदार्थों के भाव अनियंत्रित हो जाने से समाज के हर वर्ग का बजट बिगड़ा है और जनता कराहने को मजबूर है। आम बजट से पहले कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें मोदी सरकार के लिए मुसीबत बन गई हैं। ब्रेंट क्रूड की कीमतें दिसंबर 2014 के बाद पहली बार 70 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई हैं। इस तेजी का असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर देखा जा रहा है। इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड की लगातार बढ़ रही कीमतें मोदी सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती हैं। देश में रिटेल महंगाई अपने 17 महीनों के टॉप पर है। वहीं, क्रूड महंगा होने से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भी इजाफा हो रहा है। डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर हैं। क्रूड अगले 2 महीनों में 75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। पिछले 6 माह की बात करें तो क्रूड में 57 फीसदी से ज्यादा तेजी आ चुकी है। जून में क्रूड 44.48 डॉलर के लेवल पर था। शनिवार को दिल्ली में पेट्रोल 71.7 रुपए प्रति लीटर तो डीजल 62.44 रुपए प्रति लीटर के रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गया। वहीं, पेट्रोल-डीजल महंगा होने से आम आदमी की जेब पर बोझ लगातार बढ़ रहा है। देश भर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में केवल 12 रुपये का अंतर रह गया है। डीजल का रेट देश में 67 रुपये प्रति लीटर के पार चला गया है, वहीं पेट्रोल भी 80 रुपये के करीब पहुंच गया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के चलते अभी पेट्रो उत्पादों के रेट में जल्द राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। इससे इनको जीएसटी में शामिल करने की मांग भी जोर पकड़ती जा रही है। देश में यहां पहुंचा पेट्रोल का 80 रुपये दाम देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में शनिवार को पेट्रोल का दाम 80 रुपये प्रति लीटर के करीब पहुंच गया है। मुंबई में यह 79.58 रुपये प्रति लीटर है। दिल्ली में भी पेट्रोल 70 रुपये के पार जाकर के 71ण्89 रुपये है। कोलकाता में पेट्रोल का भाव 74.60 रुपए और चेन्नई में 74.55 रुपए प्रति लीटर है। जयपुर शनिवार को पेट्रोल का दाम आज 74.64 रुपये प्रति लीटर और डीजल 66.89 रुपये में बिक रहा है। सभी तेल कंपनियों के पेट्रोल पंपों पर कीमतें समान हैं। देश के दो बड़े शहरों में प्राइस में केवल 8 रुपये का अंतर देखने को मिला है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो फरवरी-मार्च तक पेट्रोल के दाम 100 रुपये प्रति लीटर हो जाएंगे। इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में भारी बढ़ोत्तरी कहें या डॉलर के मुकाबले पैसे का कमजोर होना, लेकिन एक बात तो साफ है कि अगर इसपर लगाम नहीं लगाई गई तो देश में आम लोगों का तेल निकल जाएगा।
क्रूड की कीमतों में आई तेजी से इंपोर्ट करने वाले देशों की चिंता बढ़ती जा रही है। सोमवार को ब्रेंट क्रूड की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं जो पिछले 3 साल का टॉप लेवल है। पिछले 6 माह की बात करें तो क्रूड में 57: से ज्यादा की तेजी आ चुकी है। जून में क्रूड 44.48 डॉलर के लेवल पर था। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ओपेक देशों के अलावा रूस में तेल का प्रोडक्शन घटा देने से मार्केट में सप्लाई कमजोर हुई है। वहीं, पिछले कुछ दिनों से यूएसए में भी रिग्स काउंट की संख्या घटी है। इन वजहों से मार्केट में ओवरबॉट की स्थिति बनी है, जिसका असर क्रूड की कीमतों पर दिख रहा है। ऐसे में ब्रेंट क्रूड 70 डॉलर के पार पहुंच गया, वहीं डबल्यूटीआई क्रूड की कीमतें भी 64.53 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑइल के वायदा सौदे होते हैं तो ये कंपनिया वर्तमान परिस्थितियों का रोना रोकर पेट्रोल डीजल के दाम क्यों बढ़ाती हैं? हर बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे क्रूड ऑइल को लगातार बढ़ रही पेट्रोल डीजल की कीमत का कारण बताया जाता है, लेकिन सच तो यह कि भारतीय बाजार में बेचे जाने वाले कुल पेट्रोलियम पदार्थ का 80 प्रतिशत भाग अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदा जाता है, जबकि 20 प्रतिशत देश के प्राकृतिक संसाधनों से आता है। ऐसे में क्या कंपनियों के लिए पेट्रोलियम पदार्थ के दाम बढ़ाना इतना जरूरी है? 3 अक्टूबर को एक्साइज ड्यूटी में कटौती किए जाने के बाद से क्रूड में लगातार तेजी बनी हुई है। 3 अक्टूबर के बाद से जहां इंटरनेशन मार्केट में क्रूड 27 प्रतिशत महंगा हो चुका है, वहीं इंडियन बास्केट में क्रूड की कीमतें 17 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ चुकी हैं। इस रेश्यो (अनुपात) में पेट्रोल-डीजल की कीमतें न बढ़ने से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के मार्जिन पर भी दबाव बना हुआ है।
भारत विश्व में ऊर्जा का चैथा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, लेकिन यहाँ प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत कम है। निजी वाहनों की संख्या में बढ़ोत्तरी के साथ, भारत में पेट्रोल और पेट्रोलियम उत्पादों की समग्र खपत बढ़ रही है। वर्ष 2011-12 में 5 प्रतिशत की एक पंजीकृत वृद्धि हुई थी और बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सरकार को अधिक से अधिक पेट्रोल आयात करना पड़ता है। यदि संपूर्ण देश का खर्च माना जाता है तो पेट्रोलियम उत्पादों पर आयात बिल का भुगतान करने के लिए 80-90 प्रतिशत किया जाता है, जो देशों के व्यय के रूप में माना जाता है। इसलिए आपूर्ति की तुलना में पेट्रोल की अधिक मांग भारत में इसकी बढ़ती कीमत का एक प्रमुख कारक है। लेकिन पेट्रोल के दाम में बढ़ोत्तरी का एक उल्टा प्रभाव है। चूंकि सभी वस्तुओं को भारत भर में पेट्रोल या डीजल पर चलने वाले वाहनों पर ले जाया जाता है, इसलिए पेट्रोल के मूल्य में वृद्धि से इन वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी के परिणाम भी मिलते हैं। इन सब से आम आदमी सबसे अधिक पीड़ित होता है। वह पहले से ही मुद्रास्फीति का दबाव सहन कर रहा है और पेट्रोल की कीमत में कोई भी वृद्धि उसकी वास्तविक घरेलू आय को कम कर देगा। आज हर भारतीय खाद्य पदार्थों पर अपनी आय का लगभग आधा खर्च करता है। अगर भारत में पेट्रोल की कीमत बढ़ती रहती है तो सभी खाद्य पदार्थ महंगे हो जाएंगे। इससे बचत कम और व्यय अधिक होगा। इसके परिणाम स्वरूप भारत में रियल एस्टेट, बैंकिंग और अन्य क्षेत्रों पर असर पड़ेगा। अंत में अधिक से अधिक लोगों को गरीबी रेखा की ओर धकेल दिया जाएगा।

 

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मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-भारतीय सिनेमा जगत में हर साल कई नए कलाकार आते हैं; नोरा फतेही भी ऐसे ही प्रतिभाशाली कलाकारों में शामिल हैं, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत से लेकर आज तक अपना नृत्य कौशल दिखाया है।
मॉडलिंग और डांसिंग के बाद अभिनय के क्षेत्र में कदम रखने वाली नोरा, अब संजय सूरी के साथ बॉलीवुड की फिल्म में अपनी नई पारी शुरू करने जा रही है। 'द बर्थडे सॉंग' एक साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म है, जिसके जरिए नोरा पहली बार अपने अभिनय की प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगी।
विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, नोरा बॉलीवुड की एक और नई अदाकारा इसाबेल कैफ से प्रतिस्पर्धा कर रही हैं- जो सफल अभिनेत्री कैटरीना कैफ की बहन हैं। अब तक दो बार दोनों अभिनेत्रियां आमने-सामने आ चुकी हैं। हमने सुना है कि, दोनों ही आदाकाराएं अपनी पृष्ठभूमि एवं अन्य समानताओं के कारण अब समान भूमिकाओं के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। इतना ही नहीं, दोनों के लिए आने वाले प्रस्ताव भी समान हैं जिसके कारण दोनों के बीच टकराव की संभावनाएं काफी बढ़ गई हैं। दोनों अभिनेत्रियां अपनी-अपनी खास शैली के लिए जानी जाती हैं, और उन्हें बड़े पर्दे पर देखने का अनुभव भी बिल्कुल नया होगा, लेकिन इन दो आकर्षक अदाकाराओं में से एक को चुनना निर्माताओं के लिए बेहद कठिन होगा।


-डॉ मोनिका ओझा खत्री
(लेखक वाणिजय एवं अर्थशास्त्र की व्याख्याता है)

इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च अगले वित्त वर्ष के लिए ने देश की इकोनॉमिक ग्रोथ बढ़कर 7.1 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। इस साल के लिए यह अनुमान 6.5 फीसदी है। कंजम्प्शन डिमांड बढ़ने और कमोडिटी की कीमतें नीचे रहने से इकोनॉमिक ग्रोथ को तेजी मिलेगी। इंडिया रेटिंग्स ने 2018-19 के अपने आउटलुक में कहा है कि जीएसटी और इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) जैसे स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स के चलते ग्रोथ में धीरे-धीरे तेजी आएगी। फिच रेटिंग्स की सब्सिडियरी इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च ने कहा है कि जीएसटी का असर इकोनॉमी पर मीडियम टर्म से लॉन्ग टर्म में हो सकता है। हालांकि, नोटबंदी के इम्पैक्ट के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। इंडिया रेटिंग्स ने साल दर साल आधार पर 2018-19 में जीडीपी ग्रोथ रेट 7.1 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। यह एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) और इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (आईएमएफ) के 7.4 फीसदी के अनुमान से कम है।
इंडिया रेटिंग्स ने अनुसार, ग्लोबल मार्केट में क्रूड की कीमतों में तेजी का असर महंगाई पर भी होगा। 2018-19 में रिटेल महंगाई 4.6 फीसदी और थोक महंगाई 4.4 फीसदी रह सकती है। एजेंसी का कहना है कि 2017-18 में फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटा) 3.5 फीसदी रह सकता है। यह 3.2 फीसदी के बजट अनुमान से ज्यादा है। ऐसा अनुमान है कि प्री-इलेक्शन बजट साल होने के बावजूद 2018-19 आम बजट बहुत अधिक लोकलुभावन नहीं होगा। हालांकि, इस बात की उम्मीद है कि रूरल और एग्रीकल्चर सेक्टर पर सरकार खर्च बढ़ा सकती है।
भारत की अर्थव्यवस्था में लगातार सुधार के संकेत मिल रहे है। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने सोमवार को एक रिपोर्ट में कहा कि जबर्दस्त निजी उपभोग, सार्वजनिक निवेश और संरचनात्मक सुधारों के कारण 2018 में भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.2 प्रतिशत होगी जबकि 2019 में यह बढ़कर 7.4 प्रतिशत पर पहुंच जाएगी। वर्ल्ड इकोनोमिक सिचुएशन एंड प्रोस्पेक्ट 2018 रिपोर्ट जारी करते हुए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (यूएन डीईएसए) ने कहा है कि कुल मिलाकर दक्षिण एशिया के लिए आर्थिक परिदृश्य बहुत अनुकूल नजर आ रहा है और उल्लेखनीय मध्यम अवधि की चुनौतियों के बावजूद अल्पावधि के लिए स्थिर है।
दूसरी तरफ ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक नोमुरा ने भी भारत की इकोनॉमिक ग्रोथ को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया है। नोमुरा का कहना है कि 2018 में भारत की विकास दर 7.5 फीसदी रहने का अनुमान है। इन्वेस्टमेंट बैंक के अनुसार भारत में मैक्रोइकोनॉमिक आउटलुक मजबूत है और इकोनॉमी रिकवरी के रास्ते पर है। नोमुरा ने एशियन इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में ये बातें कही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत के सकल घरेलू उत्पाद (ळक्च्) की विकास दर 2017 की दूसरी तिमाही में सालाना आधार पर 5.7 फीसदी पर आ गई थी, जो तीसरी तिमाही में बढ़कर 6.3 फीसदी हो गई। नोमुरा ने 2017 के अंतिम तिमाही में विकास दर 6.7 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। वहीं, पूरे साल के लिए विकास दर 6.2 फीसदी रहने का अनुमान है। नोमुरा की रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में विकास दर बेहतर होकर 7.5 फीसदी होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में मैक्रोइकोनॉमिक वातावरण बेहतर बना हुआ है। सरकार ने पिछेल दिनों कई रिफॉर्म किए हैं। आगे भी सरकार द्वारा स्ट्रक्चरल रिफॉर्म जारी रहेगा। इससे देश में स्पेंडिंग बढ़ेगी, जिसका फायदा इकोनॉमी को होगा। फिलहाल भारत में निवेश और ग्रोथ के लिए पॉजिटिव आउटलुक बना हुआ है।
अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने सोमवार को भारत की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान वित्त वर्ष 2017-18 के लिए घटाकर 6.7 फीसदी कर दिया है । इससे पहले एजेंसी ने यह दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था । एजेंसी का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार अपेक्षा से कमजोर है, इसलिए उसने अपने वृद्धि दर अनुमान में कटौती की है ।एजेंसी ने कहा है कि अगले वर्ष 2018-19 में भारत की वृद्धि दर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि अपने सितंबर वैश्विक आर्थिक परिदृश्य (जीईओ) में उसने यह अनुमान 7.4 प्रतिशत रखा था ।
इससे पूर्व विभिन्न वैश्विक संस्थाओं ने भारत की आर्थिक क्षेत्र में गति और प्रगति की सराहना की । अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष विश्व आर्थिक मंच, क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज और विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में उठाए गए कदमों की भरपूर सराहना की है। इन वैश्विक संस्थाओं ने एक स्वर से यह माना है की भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से सुधार कार्यक्रम लागू कर अपनी स्थिति में सुधार किया है। दूसरी तरफ विपक्षी दल नोटबंदी और जीएसटी के खिलाफ देशभर में माहौल गरमाए हुए हैं ऐसे में इन वैश्विक संस्थाओं द्वारा मोदी सरकार के कदमों का समर्थन करने से निश्चय ही सरकार को राहत मिली है ।


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मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-सारेगामा की यूडली प्रोडक्शंस ने अपनी दूसरी फिल्म ‘कुछ भीगे अल्फाज़’ के साथ वापसी की है जो सोशल मीडिया के इस युग में एक प्रेम कहानी होगी। फिल्म का निर्देशन अॅवार्ड-विनिंग फिल्मों माई ब्रदर निखिल तथा आई एम के निर्देशक ओनिर द्वारा किया गया है। इस फिल्म से मॉडल जेन खान दुर्रानी डेब्यू करेंगे तथा राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री गीतांजली थापा के साथ प्रमुख भूमिका निभायेंगे।
ट्रेलर से पहले ‘कुछ भीगे अल्फाज़’ का टीजर रिलीज़ किया गया। इस टीज़र की शुरूआत में फिल्म के लीड किरदार आरजे अल्फाज शायरी पढ़ते हुए दिखाई दिये। पार्श्व संगीत में सदाबहार गाना ‘पहला नशा’ चलता है जो इस प्रेम कहानी को मधुर यादों की पृष्ठभूमि में स्थापित करता है।
‘कुछ भीगे अल्फाज़’ आधुनिक युग प्रेम पर आधारित एक दिलचस्प फिल्म है, जिसमें दो अजनबी डिजिटल स्क्रीन के पीछे छिपे रहकर एक अविश्वसनीय रोमांटिक स्टोरी को जन्म देते हैं। यह फिल्म वेलेंटाइन वीकेंड के अवसर पर 16 फरवरी को रिलीज़ होगी।

 

-डा. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा


मासानां मार्गशीर्षों अहम् ऋतूनां कुसुमाकरः गीता में भगवान श्री क्ृष्ण कहते हैं कि छह ऋतुओं में वसंत मैं हूं। वसंत ज्ञान, विद्या, कलाओं की धात्री मां सरस्वती के स्मरण का पर्व, मदनोत्सव का पर्व, प्रकृति के निखार का पर्व, संपूर्ण चराचर में नवचेतना लाने वाला पर्व है। प्रकृति अपने संपूर्ण निखार के साथ वसन्त ऋतु में निखर कर आती है और ऐसा लगता है जैसे नवयौवना सोलह श्रृंगार करके अपने प्रियतम का स्वागत करने को आतुर हो। वसंत के आगमन से संसार का चित्त जाग उठता है। महाकाव्यों के अनुसार वसंत पंचमी कामदेव के अवतार का दिन है। कामदेव अर्थात् इन्द्र के प्रिय सखा, ऋषियों-मुनियों तक के सत् को डिगा देने वाले। अपने पांच बाणों से क्या-क्या नहीं किया है कामदेव ने। इसी कामदेव के अवतार दिवस यानि वसंत के आगमन के साथ ही चारों तरफ पुष्प ही पुष्प पल्लवित हो जाते हैं, नई कोपलें आती है, हरितमा फैल जाती है, ऐसा लगता है मानों प्रकृति का सर्वोत्तम सुन्दरतम रुप निखर आया हो, पृथ्वी पर स्वर्ग उतर आया हो।
अंग्रेजी भाषा में हम वसंत को स्प्रिंग कह कर पुकारते हैं। स्प्रिंग जर्मन भाषा का शब्द है। इसका मतलब है उछलना। दूसरे अर्थों में वसंत में पेड-पौधों की पूरानी पत्तियां गिरती है नई कोपलें आती है। प्रकृति का इसी तरह से स्वागत करती है नवकोपलें। इस मौसम को स्पिं्रग नाम देने का भी यही कारण है। वसंत प्रकृति के उल्लास का पर्व है। प्राचीन भारतीय साहित्य में वसंत को ज्ञान की अधिष्ठार्थी सरस्वती के पूजा का पर्व माना गया है तो नाच-गान का, खेल-तमाशे यथा उत्सवों की ऋतु भी माना गया है। वसंत के आगमन के साथ ही वृक्ष पुष्पों से लद जाते हैं। कालिदास ने ऋतु संहार के छठे सर्ग में वसंत का ऐसा मनोहारी वर्णन किया है। ऋतु संहार ही क्यों प्राचीन भारत की अधिकतर कृतियों में वसंत का वर्णन मिलता है। कालिदास के मेघदूत जिसे वर्षा ऋतु के वर्णन और यक्ष द्वारा यक्ष प्रिया को मेघ द्वारा संदेश भेजने में तल्लीन यक्ष, अवसर मिलते ही ज्योंही यक्ष प्रिया के उद्यान की चर्चा आती है, कालिदास वसंत का वर्णन करते समय प्रिया के नूपुरयुक्त वाम चरणों के मृदुल आघात से कन्धे पर से फूट उठने वाले अशोक और वकुल की चर्चा में लीन हो जाते हैं।
कालिदास ने अपनी रचनाओं में वसंत का जीवंत वर्णन किया है चाहे रघुवंश, मालविकाग्निमित्र, कुमार संभव, अभिज्ञान शाकुन्तलम् हो चाहे मेघदूत, ऋतुसंहार हो उसमें वसंत की चर्चा अवश्य होती है। मत्स पुराण, कामसूत्र, मालती-माधव, रत्नावलि, और तो और गीता तक मेें मदनोत्सव या मदन देवता का वर्णन किसी न किसी रुप में अवश्य ही हुआ है। गीता में भगवान श्री क्ृष्ण तो यहां तक कहते हैं कि मैं, जीवन मात्र में धर्म के अवरुद्घ रहने वाला काम हूं।
वसंत का उत्सव प्राचीन भारतीय वांग्मय के अनुसार मदनोत्सव या वसंतावतार का उत्सव है। ऐसा ही माना जाता रहा है कि वसंत के दिन मदन देवता की पूजा करने से भगवान श्री कृष्ण प्रसन्न होते हैं। मदन भगवान श्री कृष्ण का एक नाम भी है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार तांत्रिक आचार से विष्णु पूजन के करने वाले बताते हैं कि काम गायत्री ही कृष्ण गायत्री है। कामदेव को श्रीकृष्ण के अभिन्न देवता सिद्ध करने का भी कुछ लोगों द्वारा प्रयास किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण के प्रद्युम्न नामक पुत्र का शम्बर नामक असुर ने हरण करके समुद्र में फिकवा दिया था। संयोगवश प्रद्युम्न एक मछली के पेट में चले गए तथा वह मछली शम्बर की रसोई मेें आ गई। रतिदेवी वहां पहले से मौजूद थी जिसे नारद ने सारा प्रकरण समझाया, फलतः प्रद्युम्न वहां पाले गए और शम्बर असुर मारा गया।
वसंत का सबसे जीवन्त वर्णन कालिदास के ऋतु संहार में मिलता है। वसंत का प्रादुर्भाव आम व अशोक में सबसे पहले माना जाता है। इस अवसर पर अशोक के वृक्ष की पूजा महिलाओं द्वारा की जाती है। मत्स पुराण में भी मदन पूजा की चर्चा है। मालविकाग्निमित्र के अनुसार तो मदन देवता की पूजा के बाद ही अशोक के फूल खिला देने का अनुष्ठान होता है।
श्रीहर्ष की रत्नावली में वसंत पूजन का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसके अनुसार अनुष्ठान की रुपरेखा कुछ इस प्रकार थी- कोई सुन्दरी सर्वाभरण भूषिता पैरों को अलक्तकरण से रंजित करके नुपूर सहित बाएं चरण से अशोक वृक्ष पर आघात करती थी। इधर नुपूर की हल्की झनझनाहट, उधर अशोक का सौल्लास कंधे पर से फूल उठना। प्रायः यह कार्य महारानी करती थी पर मालविकाग्निमित्र के अनुसार रानी के पांव में चोट आ जाने के कारण महारानी ने मालविका को भेज दिया था। इसके बाद का प्रकरण कालिदास के रसिक पाठकों को ज्ञात ही है। ऐसा भी माना जाता है कि कन्या अपने इच्छुक वर की कामना करके मदन देवता का पूजन अर्थात् अशोक वृक्ष का पूजन करके भृंगार से जल डालते समय अपने प्रिय की दिषा में मुंह करके प्रिय का ध्यान करते हुए जल डालती है, तो उसे प्रिय की प्राप्ति होती है। यह कार्य कन्दर्प द्वारा कराया जाता था। क्योंकि कामदेव को कन्दर्प भी माना जाता रहा है। अशोक की तरह आम भी वसंत से निकट से जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि वसन्त पंचमी के पहले अगर आम्र-मंजरी दिख जाए तो उसे हथेली पर रगड़ लेने से ऐसी हथेली से साल भर तक बिच्छू के जहर को आसानी से उतारा जा सकता है।
काम के दो रुप है। एक धर्म का अविरोधी और दूसरा धर्म का विरोधी। अविरोधी रुप साक्षात् विष्णु है। यदि काम ही न हो तो संसार की कल्पना करना ही बेकार है। यह भी सत्य है कि आदमी की सहजात वृत्तियों को सुरुचिपूर्ण, संयत और कल्याणोन्मुखी बनाकर ही मनुष्य मनुष्य बना है अन्यथा वह पशु ही रह जाता है। धर्म का विरोधी रुप काम ही बलात्कार, वेश्यागमन आदि का कारण ही मनुष्य को पशु बना देता है। इसी कारण काम को अंधा माना जाता है। पश्चिम के देशों में भी किडनिय (अपेदवता) नामक देवता को अंधा माना गया है तथा भारत में भी वारवनिताओं द्वारा पूजा की जाने वाली कामदेव की मूर्ति की आंखें पट्टी से बंद होती है। वसंत के अवसर पर यही कामना की जानी चाहिए कि जिस प्रकार वसंत में प्रकृति अपने संयमित पूर्ण यौवन में होती है उसी प्रकार मानवता में भी संयमितता का होना आवश्यक है। इसी में मानवता का कल्याण है। मां वाग्देवी सरस्वती को नमन। 

 

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-ओम प्रकाश उनियाल
पूर्वोत्तर के मेघालय, त्रिपुरा और नागालैंड में विधानसभा चुनाव की तारीखें घोषित होने के बाद इन राज्यों में राजनीतिक दलों ने अपने-अपने पांसे फेंकने शुरू कर दिये हैं।अगले महीने इन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा इन राज्यों में भी भगवा फहराना चाहती है। तीनों राज्यों पर विशेष फोकस केंद्रित किया गया है। जिस प्रकार असम, मणिपुर, अरुणाचल, सिक्किम में कमल खिला इसी प्रकार तीनों राज्यों में भी कमल खिलाने के सपने देख रही है भाजपा। तीनों राज्यों के चुनाव में भगवा फहराने को लेकर सितंबर 2017 में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने नई दिल्ली में तीनों राज्यों के भाजपा कोर कमेटी की एक बैठक की थी। हर दल अपने अपने दम पर चलता है। भाजपा भी नई रणनीति बनाकर चल रही है। हालांकि, जीत हासिल करना टेढ़ी खीर है। तीनों राज्यों में 60-60 सदस्यों वाली विधानसभाएं हैं। त्रिपुरा में 1993 से लेकर वर्तमान तक लगातार वाम दल की सत्ता काबिज रही है। 2013 के चुनाव पर नजर डाली जाए तो मुकाबला कांग्रेस और वाम दल के बीच ही था। वाम दल में माकपा, फारवर्ड ब्लाॅक, आरएसबी व भाकपा हैं। जबकि कांग्रेस गठबंधन में आईएनपीटी और नेशनल कांफ्रेंस ऑफ त्रिपुरा। यहां सदस्य अभियान में भी भाजपा ने काफी मेहनत की है। इसीलिए भाजपा को काफी उम्मीद है। मेघालय में तो वर्तमान में कांग्रेस सत्तासीन है। कांग्रेस की स्थिति ऊहापोह की नजर आती है। जिसका कुछ फायदा भाजपा को मिल सकता है। नागालैंड में भाजपा समर्थित एनपीएफ की सरकार है। भाजपा चाहती है कि इस बार तस्वीर कुछ बदली हुई हो। चुनाव ज्यादा दूर नहीं है। जैसा कि भाजापा तीनों राज्यों में अपनी सरकार बनाना चाहती है। देखना है कि मोदी लहर का प्रभाव होता है या विकास को गति देने वालों का। लेकिन इन राज्यों में क्षेत्रीय दलों के चक्रव्यूह को भेदना इतना आसान नहीं है। भाजपा को क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर ही चलना होगा तभी उसे शत-प्रतिशत सफलता हासिल होगी। कांग्रेस और अन्य दल भी अपनी-अपनी ताकत आंक रहे हैं।

 

शिक्षा के मंदिरों में बाल-अपराध
-ओम प्रकाश उनियाल गुरुग्राम, लखनऊ एवं यमुनानगर के स्कूलों में घटित बाल अपराधों ने सबके सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बच्चे इस प्रकार की हरकतों को क्यों अंजाम दे रहे हैं। हिंसात्मक व्यवहार क्यों अपना रहे हैं। बच्चों के बदलते व्यवहार पर गहन अध्ययन करने की आवश्यकता है। घर-परिवार का वातारण, पढ़ाई का जोर, पढ़ाई के प्रति अरुचि, स्वाभाविक स्वभाव, किसी बीमारी से ग्रसित, चिड़चिड़ापन, टीवी पर देखे जाने वाले अपराध नाटकों का असर, हिंसात्मक फिल्मों का प्रभाव, संगति का असर, किसी के बहकावे में जल्दी आना, नैतिक शिक्षा का अभाव, अध्यापक-अध्यापिकाओं की डाँट का बदला लेना,सोशल मीडिया,छोटी-छोटी बातों को लेकर बदला लेने की भावना जैसे कारण बच्चों में विकृति पैदा कर रहे हैं। इसके अलावा स्कूलों की लापरवाही व अभिभावकों का बच्चों पर नजर न रखना भी एक कारण हो सकता है। तो क्या अब निजी विद्यालयों के अध्यापकों और छात्र-छात्राओं को डर-डर कर विद्यालयों में जाना होगा। मगर ऐसा कब तक? विद्यालयों में गेट पर प्रत्येक छात्र की नियमित चैकिंग फिलहाल एक आॅप्शन है जो विद्यालय परिसरों में इस प्रकार की घटनाओं को रोक सकता है। अन्य प्रक्रियाएं तो कई बातों पर निर्भर करती हैं।
> ऐसे नाबालिग अपराधियों पर कानूनी शिकंजा भी सोच-समझकर ही कसना पड़ता है। घर एवं विद्यालयों में विद्यार्थियों को इस बात का पाठ पढ़ाना होगा कि किसी भी अपराध की सजा उसके पूरे जीवन पर दाग लगा सकती है। जब तक बच्चों के मन में डर पैदा नहीं होगा तब तक इस प्रकार की घटनाएं कम नहीं होंगी। विदेशों में भी ऐसी घटनाएं घटती हैं। वहां कानून सख्त है। परंतु भारत का कानून काफी लचर होने के कारण मामले लटकते रहते हैं। बाल-सुधार गृहों में उनको अपराध की सजा के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। दूसरे, ऐसे मामलों में सामाजिक समर्थन कदापि नहीं करना चाहिए।

 


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देहरादून(उत्तराखंड) (हम हिन्दुस्तानी)-उद्यान विभाग की पहल पर पौड़ी में आयोजित प्रशिक्षण एवं गोष्ठी कार्यक्रम में काश्त बागवानी के लिए प्रेरित किया गया। विशेषज्ञों ने अखरोट को न सिर्फ आर्थिकी के लिए बेहतर बताया बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि गुणकारी बताया। अखरोट प्रक्षेत्र दिवस के उपलक्ष्य में राजकीय प्रजनन उद्यान खाण्डयूसैंण में आयोजित एक दिवसीय प्रशिक्षण एवं गोष्ठी कार्यक्रम में मुख्य उद्यान अधिकारी डा. नरेंद्र कुमार ने अखरोट की फसल को पर्वतीय क्षेत्रों के लिए बहुत उपयोगी बताया। उन्होंने कहा कि जनपद में अखरोट की खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से समय-समय पर काश्तकारों को प्रशिक्षण एवं प्रेरक कार्यक्रमों के माध्यम से निरन्तर रूप से जागरूक किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष शीतकाल में 24 हैक्टेअर क्षेत्रफल में बीजू पौधों एवं 3 हैक्टेअर क्षेत्रफल में ग्राफ्टेड पौधों का रोपण किया जाना है। उन्हांेंने काश्तकारों को अखरोट फल पौध रोपण तथा उसके रख रखाव को लेकर कई तकनीकी जानकारी दी । इस मौके पर विषय विशेषज्ञों ने काश्तकारों को अखरोट की कटाई, छंटाई, बडिंग, ग्राफ्टिंग की तकनीकों को प्रदर्शन कर बतायी। अखरोट समेत अन्य मौसमी फल उत्पादक फसलों की तकनीकि विधियां तथा विपणन की जानकारियाें से रूबरू किया। किसानों ने ग्राफ्टिंग व बडिंग की तकनीकों का प्रदर्शन किया।

 

-राहुल लाल (कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ)


बाहरी दिल्ली के बवना औद्योगिक क्षेत्र के सेक्टर-5 में अवैध रूप से चल रहे पटाखे की एक फैक्ट्री में भीषण आग से शनिवार को 17 मजदूर जिंदा जलकर मर गए। मरने वालों में 9 महिलाएँ तथा 1 नाबालिग लड़की भी हैं। आग लगने के बाद फैक्टरी में मौजूद लोगों की क्या स्थिति रही होगी,इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जान बचाने के लिए कुछ श्रमिकों ने सीढ़ी के नीचे छुपने का प्रयत्न किया,तो कोई पहली मंजिल की की ओर भाग गया।लेकिन आग की भयावहता ऐसी थी कि जो जहाँ छुपा ,वहीं आग की चपेट में जिंदा जलकर मर गया।आग की भयावहता को इससे भी समझा जा सकता है कि शव इतने बुरी तरह से झुलस गए हैं कि इससे उनकी पहचान तक नहीं हो पा रही थी।काफी मुश्किल से अब तक 7 शवों की पहचान हो पाई है।जीवित बचे मजदूरों के अनुसार आग के समय लगभग 45 मजदूर काम कर रहे थे,ऐसे में लगभग 23 श्रमिक अभी भी लापता हैं।दिल्ली सरकार ने मृतकों के परिवारों को 5-5 लाख रुपये और घायल हुए परिवारों को 1-1 लाख रुपये सहायता राशि देने की घोषणा की है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी दिल्ली के बवाना में फैक्ट्री में आग लगने की घटना में लोगों की मौत होने पर दुख जताया है।उन्होंने ट्वीट कर भी अपना दुख प्रकट किया है,वहीं दिल्ली सरकार ने मामले के जांच के आदेश दिए हैं।
अब प्रश्न उठता है कि आखिर इन 17 मौतों का जिम्मेदार कौन है?देश भर के औद्योगिक क्षेत्रों से आग से जनहानि की समाचार लगातार आते रहते हैं,परंतु इससे संबंधित नियमन को लेकर कोई ठोस व्यवस्था क्यों नहीं दिखती? कुछ दिन पूर्व ही मुंबई के कमला मिल आग हादसे में 15 लोग जिंदा जलकर मर गए थे,उसके बाद अब दिल्ली में यह घटना।इसके पूर्व नवंबर 2017 में उत्तर प्रदेश के रायबरेली में ऊंचाहार एनटीपीसी में बॉयलर फटने से भड़की आग में 26 लोग जिंदा जलकर मर गए थे,जबकि 200 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इससे स्पष्ट है कि पहले के इन भीषण हादसों से भी हमारे नीति निर्माताओं ने कोई सीख नहीं ली।
बवाना औद्योगिक क्षेत्र के इस अवैध फैक्ट्री में आगजनी पर काबू पाने के लिए प्रारंभिक स्तर पर ऐसे कोई उपकरण नहीं थे,जिससे तुरंत आग पर काबू पाया जा सके।यही कारण है कि मजदूर चाह कर भी कुछ नहीं कर पाए।बारूद होने के कारण चंद मिनटों में ही आग ने पूरे फैक्ट्री को अपने चपेट में ले लिया।
जिस कारखाने में आग लगी उसके मालिक ने दिल्ली दमकल से अनापत्ति प्रमाण पत्र भी नहीं लिया था। राजधानी दिल्ली,जहाँ सत्ता के सभी सर्वोच्च केंद्र मौजूद हैं,अगर वहाँ यह स्थिति है,तो देश के दूर-दराज के औद्योगिक केंद्रों में आग से निपटने के लिए कैसी व्यवस्था होगी,इसकी महज कल्पना ही की जा सकती है।दिल्ली के औद्योगिक क्षेत्र के इस ह्रदय विदारक घटना के बाद औद्योगिक क्षेत्रों में आग से बचाव के उपाय व परिसर की जांच पर सवाल खड़े हो रहे हैं।जिस स्थान पर आग लगी है,वहाँ पटाखे का गोदाम है,जबकि दिल्ली में पटाखा निर्माण और उसका भंडारण दोनों अवैध है।इसके बावजूद यहाँ हो रहे पटाखे कारोबार पर किसी भी सक्षम ऑथोरिटी को भनक नहीं लगी,यह काफी आश्चर्यजनक है।
हैरानी की बात यह है कि इस पटाखे फैक्ट्री के गोदाम में आने जाने के लिए केवल एक ही रास्ता था।इस वजह से आग लगने के बाद भी कर्मचारी गोदाम से समय रहते नहीं निकल नहीं पाए।गोदाम के अंदर महिलाओं की लाश एक दूसरे के ऊपर पड़ी मिली।कई महिलाएँ गोदाम में उसी स्थान पर मृत मिली हैं,जहाँ पर वे बैठकर काम कर रही थी।इससे स्पष्ट है कि यदि दो रास्ते होते तो शायद कुछ और लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
सबसे दुखद बात यह है कि इस अवैध फैक्ट्री में आग बुझाने के लिए रेत तक का इंतजार नहीं था।फैक्ट्री के अंदर आग बुझाने के लिए बाल्टियों में भरी रेत आग सुरक्षा के बुनियादी संरचनाओं में से एक है।यह महंगा भी नहीं है,जिसे उपलब्ध कराना फैक्ट्री मालिक के लिए कठिन हो।इस तरह अगर इस फैक्ट्री में आग से संबंधित आपदा संकट से निपटने के लिए एक भी इंतजाम नहीं था।

प्लास्टिक फैक्ट्री में आखिर पटाखों का अवैध निर्माण कैसे हो रहा था?यह भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
पुलिस के अनुसार इस कारखाने को प्लास्टिक के दाने बनाने के लिए लाइसेंस दिया गया था,परंतु इसमें बाहर से पटाखे मंगाकर ,उसकी पैंकिंग की जाती थी।
दिल्ली अग्निशमन विभाग के अधिकारी भी गोदाम के अवैध होने की बात कह रहे हैं।हांलाकि इसके मालिक के खिलाफ पहले कार्यवाई क्यों नहीं हुई?अगर यही कार्रवाई अगर पहले हो जाती तो शनिवार को यह भयावह अग्निकांड नहीं होता।दिल्ली सरकार के अनुसार दिल्ली में बवाना,नरेला,पीरागड़ी,ओखला,झिलमिल, रोहतक रोड व मायापुरी इत्यादि 22 औद्योगिक क्षेत्र हैं।इन औद्योगिक क्षेत्रों की आड़ में चल रही अवैध गतिविधियाँ खतरे का सबब बनी हुई है।अग्निशमन विभाग के अनुसार इस प्रकार के परिसरों में आग से बचाव के पुख्ता इंतजाम के बाद विभाग गैर अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करता है।इसके बाद ही कारोबार शुरू किया जाता है।वहीं हर तीन वर्ष में वहाँ आग के बचाव के उपाय दुरुस्त पाए जाने के बाद ही दोबारा से प्रमाणपत्र का नवीनीकरण किया जाता है।अगर इस संपूर्ण प्रक्रिया का पालन बवाना के इस अवैध कारखाने में होता तो आज इन 17 निर्दोष मजदूरों को अपने जीवन खोना नहीं पड़ता।
दिल्ली अग्निशमन विभाग और पुलिस आयुक्त के अनुसार हादसे में जिन महिला मजदूरों की मौत हुई है,उसमें कुछ नाबालिग भी बताई जा रही हैं।साथ ही कई प्रत्यक्षदर्शियों ने भी मीडिया से बात में इस बात की पुष्टि की है कि इन फैक्ट्रियों में काफी संख्या में नाबालिग लड़कियाँ भी काम करती है।अगर राजधानी दिल्ली में खुलेआम बाल मजदूरी हो रही है,उस पर कार्यवाई क्यों नहीं हो रही है?इसके फैक्ट्री मालिक को देर रात गिरफ्तार किया गया,लेकिन उसके खिलाफ यह कार्यवाई पहले ही क्यों नहीं हुई? यह प्रश्न मेरे मन में बार-बार उठ रहा है। यह अत्यंत दुखद है।सच में देखा जाए तो बवाना अग्नि कांड ने भारतीय औद्योगिक स्थिति को लेकर हमारे अत्यंत लचर क्रियान्वयन व्यवस्था की पोल खोल दी है।अब यह आवश्यक हो गया है कि इस मामले में सभी सक्षम अधिकारियों पर कठोर कार्यवाई की जाएँ।
हमारे देश में कानूनों और नियमों की कोई कमी नहीं है।आवश्यकता इस बात की है कि इसका समुचित और कठोर रूप से क्रियान्वयन हो।बवाना मामले से स्पष्ट है कि वहाँ अवैध कार्यों एवं नियमों को तोड़ने में फैक्ट्री मालिक की ओर से कोई कमी नहीं की गई थी।अगर किसी भी मामले में प्रशासन या पुलिस एक भी कार्यवाई करती,तो इस दुर्घटना को टाला जा सकता था।केवल दुर्घटनाओं के बाद जाँच कराना और मामले को टालने से समस्याओं का समाधान नहीं मिलेगा।अभी कुछ दिन पहले ही मुंबई कमला मिल आग हादसे की जांच रिपोर्ट आई,उसके बाद अब दिल्ली की दुर्घटना। इतने सारे प्रशासनिक लापरवाही के बाद बवाना अग्नि कांड को अगर सुनियोजित हत्या.कहा जाए,तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।अगर हम शीघ्र इन मामलों पर गंभीर नहीं हुए,तो पुन:किसी ऐसे घटना की पुनरावृत्ति अवश्यंभावी है।

 

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-तनवीर जाफ़री
निश्चित रूप से दुनिया के अधिकांश देश ऐसे हैं जो न केवल दिन-प्रतिदिन तरक्की कर रहे हैं बल्कि ऐसे देशों का सामाजिक ढांचा भी परिवर्तित होता जा रहा है। दुनिया के अनेक देश रूढ़ीवाद से मुक्ति पाने की कोशिश में हैं। समाज से बुराईयों को अलविदा कहने के प्रयास किए जा रहे हैं। अशिक्षा तथा अंधविश्वास से दुनिया पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रही है। सारी दुनिया इस समय मान-सम्मान व प्रतिष्ठा अर्जित करने के पीछे दौड़ रही है। ज़ाहिर है इस दौड़ में दुनिया के अनेक देशों को सफलता भी हासिल हो रही है। परंतु यदि हम अपने देश की हक़ीक़त को निष्पक्ष रूप से देखने की कोशिश करें तो भले ही हमारा देश प्रथम दृष्टया देखने में तो अन्य देशों की तुलना में विकास और प्रगति की राह पर आगे बढ़ता हुआ ज़रूर दिखाई देगा। परंतु दरअसल हमारे समाज ने अपने ऊपर दोहरेपन का एक ऐसा आवरण डाल रखा है जिससे हम भीतर से तो कुछ और होते हैं परंतु दिखाई कुछ और देना चाहते हैं। हमारे देश के लोकतंत्र के चारों स्तंभों का इस समय लगभग यही हाल हो चुका है। देशवासी पहले न्यायपालिका पर थोड़ा-बहुत विश्वास भी रखते थे परंतु पिछले दिनों जिस प्रकार उच्चतम न्यायालय की सर्वोच्च पीठ के चार सबसे वरिष्ठ न्यायधीश उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायधीश के तथाकथित पक्षपातपूर्ण व कथित पूर्वाग्रही फैसलों से दु:खी होकर स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार मीडिया के माध्यम से देशवासियों को संबोधित करते हुए अपनी बेबसी का इज़हार कर रहे थे उससे साफ ज़ाहिर हुआ कि भारतीय लोकतंत्र के चारों स्तंभ इस समय भीषण संक्रमणकालीन दौर से गुज़र रहे हैं।
इस समय भारतीय मीडिया को गोदी मीडिया,बिकाऊ मीडिया,दलाल मीडिया और भक्त मीडिया जैसे तरह-तरह के नामों से नवाज़ा जा रहा है। मीडिया को इस प्रकार के ‘विशेषणों’ से और कोई नहीं बल्कि मीडिया का ही एक ऐसा छोटा सा वर्ग ’सुशोभित’ कर रहा है जो मीडिया की चौथे स्तंभ के रूप में बनी लाज को बचाए रखने का ख़्वाहिशमंद है। परंतु ऐसे में बुनियादी सवाल यह है कि जो व्यक्ति अपनी अंतर्रात्मा से ही चोर-उचक्का,बिकाऊ,दलाल या अपराधी प्रवृति का है, फिर आख़िर ऐसे व्यक्ति को किसी वैचारिक उपदेशों या नियमों अथवा क़ानूनों या मीडिया की संहिता से कैसे बांधा जा सकता है? और ख़ुदा न ख़्वास्ता यदि किसी मीडिया घराने के संपादक महोदय या मीडिया समूह के स्वामी ही चौथे स्तंभ की मर्यादाओं को ताक़ पर रखकर इस पावन पेशे को ‘धनार्जन का धंधा’ समझकर अपना रहे हों,इस पेशे को अय्याशी,ऐशपरस्ती,देश-विदेश में वीवीआईपी के साथ घूमने-फिरने का साधन,पत्रकारिता के माध्यम से अपने ऊंचे रुसूख़ का व्यवसायिक दुरुपयोग करने तथा पेशे का आर्थिक लाभ उठाने की जुगत में ही लगे रहते हों फिर ऐसे स्वामी के अधीनस्थ स्टाफ से आख़िर क्या उम्मीद लगाई जा सकती है?
पिछले दिनों बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी एक सरकारी दौरे पर लंदन गई थीं। उनके साथ बंगाल के वरिष्ठ पत्रकारों का एक समूह भी साथ गया था। इन पत्रकारों मे में कई मीडिया समूहों के स्वामी तथा मुख्य संपादक व संपादक स्तर के वरिष्ठ पत्रकार भी शामिल थे। इन महानुभाव ‘पत्थरकारों’ ने न केवल अपने राज्य की मुख्यमंत्री व समूचे राज्य की बल्कि पूरे देश की खासतौर पर पत्रकार बिरादरी व पेशे की ऐसी नाक कटाई जिसकी दूसरी मिसाल अब तक सुनने को नहीं मिली। खबरों के मुताबिक लंदन के एक आलीशान पांच सितारा होटल में रात्रिभोज के समय जिस क्राकरी का प्रयोग किया गया था उसमें कथित रूप से चांदी के चम्मच,छुरी व कांटे उपलब्ध कराए गए थे। बताया जाता है कि रात्रिभोज समाप्त होने के बाद पत्रकारों की उस टोली में डिनर पर बैठे सबसे वरिष्ठ मुख्य संपादक स्तर के एक पत्रकार ने सर्वप्रथम चांदी के उन चम्मच,कांटे व छुरी को छुपा कर अपने कोट की जेब में रख लिया। उसे ऐसा करते देख शेष पत्रकारों को भी ‘प्रेरणा’ हासिल हुई और उनमें से भी कई ‘पत्थरकारों’ को चांदी की वह कटलरी टेबल पर रखी हुई अच्छी नहीं लगी और उन सभी ने भी एक-एक कर उसे अपनी जेबों में छुपा लिया। परंतु अक़्ल के अंधे इन ज़मीरफरोश ‘पत्थरकारों’ को इतने आलीशन होटल में चारों ओर लगे हुए वह कैमरे नहीं दिखाई दिए जो उनकी ‘क्रंातिकारी पत्थरकारिता’ का राक्षसी रूप देख रहे थे।
इस घटना के बारे में यह भी बताया जाता है कि इनमें एक चोर तो इतना ढीठ था कि उसने अपने चोरी किए गए चम्मचों व कांटों को किसी दूसरे साथी पत्रकार के बैग में डाल दिया। और जब उसकी तलाशी लेने का समय आया तो वह अपनी ‘पारसाई’ पर अकडक़र बोला कि मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। चाहे मेरी तलाशी क्यों न ले लो। उसकी इस ढिठाई पर उसे फिर याद दिलाया गया कि उसकी चोरी करने से लेकर अपने साथी के बैग में चोरी का सामान डालने तक की सारी करतूतें सीसीटीवी कैमरे में कैद हो चुकी हैं। यह जताने पर वह महाशय अपनी कारगुज़ारी पर शर्मसार हुए। यह भी बताया जा रहा है कि वहां के होटल स्टाफ ने नरमी बरतते हुए पुलिस,कचहरी के चक्कर में इन्हें उलझाने के बजाए पचास पाऊंड का जुर्माना लगा दिया। इस घटनाक्रम से देश व इस जि़म्मेदार पावन पेशे को कितनी ठेस पहुंची है क्या इसका अंदाज़ा इस प्रकार के चोर-उचक्के िकस्म के पत्रकार लगा सकते हैं? शायद नहीं। क्योंकि इनकी नज़रों में किसी पेशे,उनके अपने परिवार व खानदान यहां तक कि उनके प्रदेश व देश की मान-प्रतिष्ठा से अधिक चमक उन चोरी के चांदी के चम्मचों में नज़र आती है। अन्यथा चांदी तो क्या सोने या हीरे की भी कोई वस्तु यदि किसी दूसरे व्यक्ति या संस्थान की अमानत है तो कम से कम अच्छी नीयत व अच्छे संस्कारों वाला कोई भी व्यक्ति तो उस ओर अपनी नज़रें उठाकर भी देखना नहीं चाहेगा।
यह परिस्थितियां हमें बार-बार यही सोचने के लिए मजबूर करती हैं कि आिखर ऐसे समय में जबकि हम दुनिया में भारत की छवि एक ‘विश्वगुरु’ रह चुके राष्ट्र के रूप में प्रचारित करते रहते हों, हम बार-बार अपनी पीठ इस प्रकार की बातें कहकर थपथपाते रहते हों कि यह संस्कारों, विचारवानों,त्यागी-तपस्वी,ऋषियों-मुनियों,संतों-फकीरों तथा आविष्कारकों का देश है और इसी बीच में हमें ऐसी खबरें मिलने लग जाएं कि इसी कथित विश्वगुरु राष्ट्र में छुआछूत अब भी यहां की सबसे बड़ी समस्या है, धर्म-जाति के झगड़ों में आए दिन हत्याएं होती रहती हैं, कृषि प्रधान देश कहे जाने के बावजूद सबसे अधिक किसान इसी देश में आत्महत्या करते हों,कोई दिन ऐसा नहीं होता जिस दिन देश के विभिन्न हिस्सों से बलात्कार यहां तक कि मासूम व नाबालिग बच्चों से बलात्कार की खबरें न आती हों, जहां के राजनेता वैचारिक राजनीति नहीं बल्कि अपने उज्जवल राजनैतिक भविष्य अर्थात् सत्ता को लेकर अधिक चिंतित रहते हों,जहां कि न्यायपालिका,कार्यपालिका सबकुछ विवादित व संदिग्ध होती जा रही हो, जहां निष्पक्षता का परचम बुलंद रखने वाला देश के लोकतंत्र का स्वयंभू चौथा स्तंभ दलाली,चाटुकारिता तथा व्यवसायीकरण का शिकार होने के बाद अब वह विदेश की धरती पर अपने अति विशिष्ट मेहमान के साथ जाकर चोरी जैसी कारगुज़ारियों को अंजाम देने लग जाए फिर आख़िर संपूर्ण राष्ट्र के चरित्र के उत्थान की बात हम कैसे सोच सकते हैं?

 

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देहरादून(उत्तराखंड) (ओम प्रकाश उनियाल)-उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन एक गंभीर समस्या बनी हुई है। कई गांव
तो पूरी तरह खाली हैं। वहां के घर खंडहर बन चुके हैं, खेती बंजर। कहीं-कहीं तो बूढ़े पुरुष-महिलाएं ही हैं। कुछ अपनी जन्मभूमि नहीं छोड़ना चाहते। तो कईयों के परिवार उन्हें छोड़कर दूसरे शहरों में बस चुके हैं। अब बात करें उनकी जो पहाड़ में सरकारी रोजगार में हैं या सेना में। उनमें से अधिकतर ने देहरादून, कोटद्वार, रिषिकेश, रामनगर, रुद्रपुर, रुड़की, काशीपुर जैसे मैदानी इलाकों में अपने आवास बनाए हुए हैं। यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। मोटी तनख्वाह लेने वाले ये लोग यही दलीलें देते फिरते हैं कि 'बच्चों का भविष्य बनाना है तो बाहर निकलना जरूरी है। पहाड़ में क्या रखा है।' पहाड़ से पलायन की व्यथा नयी नहीं है। रोजगार के साधन न होने के कारण लोग बाहर निकलते रहे। सेना में ए होना या फिर खेती पर निर्भर रहना। देखा जाए तो साठ के दशक से धीरे-धीरे पहाड़ से पलायन होने लगा था। दिल्ली, फरीदाबाद, मुंबई, चंडीगढ़ आदि शहरों में जो लोग नौकरी करते थेे ज्यादातर वहीं बस गए। विदेशों में भी कई पहाड़ के लोग हैं जिन्होंने वहीं की नागरिकता ग्रहण कर ली है। पहाड़ में ये लोग अब पर्यटक बनकर आते हैं। जरा एक नजर टिहरी क्षेत्र पर डाली जाए तो टिहरी बाँध बनने से डूब क्षेत्र के कई परिवारों को पहाड़ में बसाने के बजाय देहरादून, रिषिकेश, कालागढ़ व अन्य मैदानी क्षेत्रों में बसाया गया। पहाड़ की जो हालत पहले थी अब काफी बदल चुकी है। सड़क, परिवहन जैसी सुविधाएं बढ़ चुकी हैं । लेकिन कई संसाधनों की कमी कहीं न कहीं जरूर अखरती है। आपदाओं के कारण भी पलायन हो रहा है। जो परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं वे तो किसी भी तरह अपना गुजर-बसर पहाड़ में ही कर रहे हैं। किसी भी प्रकार के संकट हों उन्हें तो वहीं डटे रहना है। इसके अलावा जो कर्मठ लोग हैं वे यहां की धरती से सोना उगलवा रहे हैं, खेती, बागवानी व पशुपालन से। यह बात ठीक है कि रोजगार आवश्यक है। लेकिन इस सच्चाई को भी पहाड़ को स्वीकारना होगा कि सक्षम परिवार एक-दूसरे की होड़ में भी पहाड़ छोड़ते आ रहे हैं। राज्य बनने के बाद तो हालात और भी बदतर हो चुके हैं। पहाड़ में गैर-पहाड़ी बस रहे हैं। राज्य में जो भी सरकार रही वह पलायन की चिंता ही करती रही धरातल पर कार्य करने की नहीं। उत्तराखंड के लोग यह नहीं सोच रहे हैं कि गांव खाली होने से देश की सुरक्षा को पड़ौसी मुल्क से खतरा पैदा हो सकता है। सरकार हो या यहां का जनमानस सबको ऐसी सोच बनानी होगी जिससे पहाड़ आबाद रहे । सरकार की नीति ऐसी होनी चाहिए की जो भी यहां की संपदा है उसका पूरा-पूरा लाभ यहां के लोगों को ही दिया जाए। युवाओं को रोजगारकपरक शिक्षा देने के साथ-साथ रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराए जाएं। इसके लिए पहाड़ों में प्रदूषण रहित उद्योग लगाए जाएं। प्रवासी उत्तराखंडी निवेश करें। मगर पलायन की चिंता किसे है। राजनीतिज्ञ आश्वासनों पर जनता को बरगलाते हैं और सक्षम लोग आपसी होड़ में लगे रहते हैं। जरा-सी भी किसी को चिंता होती तो आज पहाड़
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