भ्रष्टाचार के आरोप और कांगे्रस के बयान

12 October 2017
Author 

 

-सुरेश हिन्दुस्थानी
(वरिष्ठ स्तंभकार और राजनीतिक विश्लेषक)

वर्तमान में राजनीतिक दलों में जिस प्रकार से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है, उससे कमोवेश ऐसा ही लग रहा है कि मेरे दामन पर लगे दाग तेरे दागों से अच्छे हैं। पिछले लोकसभा चुनावों के परिणामों ने यह सिद्ध कर दिया था कि कांगे्रस के दामन पर लगे दाग वास्तव में अच्छे नहीं थे, इसीलिए ही देश की जनता ने कांगे्रस को सत्ता से बेदखल कर दिया। आज कांगे्रस जिस प्रकार से आरोप लगा रही है, उससे ऐसा ही लगता है कि भ्रष्टाचार वाले दाग कांगे्रस की संस्कृति के हिसाब से अच्छे कहे जा सकते हों, लेकिन यह सच है कि देश की जनता भ्रष्टाचार को कतई स्वीकार नहीं करती। देश में नरेन्द्र मोदी की सरकार आने से पहले यही कहा जा सकता था कि भ्रष्टाचार और भारत एक दूसरे का पर्याय बनते जा रहे हैं, सरकारी स्तर पर भ्रष्टाचार मिटाने के बड़े बड़े दावे किए जाते थे, लेकिन जब सरकारी स्तर पर भ्रष्टाचार चरम पर था, तब इन दावों का खोखलापन उजागर हो जाता था। वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस धारणा को परिवर्तित किया है। हम जानते हैं कि लम्बे समय तक कांगे्रस के प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में प्रधानमंत्री के पूरे परिवार ने ही सत्ता की सुविधाओं का उपयोग किया था, यह सत्ता का दुरुपयोग ही कहा जाएगा। इतना ही नहीं कांगे्रस के मंत्री और सांसदों के परिवार ने भी सत्ता की मलाई का स्वाद चखा। उनके परिवार का हर सदस्य चाहे जैसे काम करा सकने की हिम्मत रखता था। आज इसके मायने पूरी तरह से बदल गए हैं, प्रधानमंत्री का परिवार जैसा बीस साल पहले था, वैसा आज भी है, कोई सरकारी सुविधा नहीं, और तो और प्रधानमंत्री की पत्नी को भी सरकारी सुविधा नहीं। इसे देश के वास्तविक लोकतंत्र का आदर्श उदाहरण माना जा सकता है।
कांगे्रस और सहित अन्य राजनीतिक दलों में जिस प्रकार की बयानबाजी की जा रही है, उससे यही लगता है कि कम से कम बयानों के आधार पर दूसरे को पटखनी देने की नूराकुश्ती खेल रहे हैं। आज कांगे्रस में सबसे बड़ी कमी यह भी महसूस की जा रही है कि वे आज भी अपने आपको सत्ता धारी दल का नेता समझने की भूल कर रहे हैं। केन्द्र में बैठी भाजपा सरकार को सत्ताधारी दल के रुप में स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, ऐसा में यह कहना समीचीन ही होगा कि लोकसभा में अप्रत्याशित पराजय के बाद भी कांगे्रस नेताओं की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं आया है। कांगे्रस नेताओं को यह भी बताना चाहिए कि उन्होंने लम्बे समय तक सत्ता में रहकर देश में किस प्रकार का शासन किया। कांगे्रस जब सत्ता में रही तब नेताओं का पूरा परिवार ही शासन की सुख सुविधाओं का भरपूर लाभ उठाते थे। इतना ही नहीं पुरस्कार वापसी समूह ने भी बिना किसी अधिकार के ऐसी ही सुविधाओं का लाभ उठाया। वर्तमान में नरेन्द्र मोदी की सरकार कम से कम इस मामले में एक दम साफ कही जा सकती है। जहां तक अमित शाह की बात है तो यह जांच का विषय हो सकता है, लेकिन कांगे्रस के नेताओं ने तो जैसे न्यायालय की तरह निर्णय ही सुना दिया। कांगे्रस अपने शासन काल में कहती रही है कि आरोपों से अपराध सिद्ध नहीं होता, जबकि कांगे्रस और उसके सहयोगी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध ही नहीं हुए, बल्कि उन्हें सजा भी मिली है। इसलिए कांगे्रस इस मामले में दूसरे पर आरोप तो लगा सकती है, पर अपने आपको ईमानदार नहीं बता सकती। आरोपों की राजनीति करके कांगे्रस देश को किस दिशा में ले जाने का प्रयास कर रही है। क्या यह दिशा देश के भविष्य के लिए अच्छी कही जा सकती है, इसका उत्तर देना कठिन तो है ही, लेकिन अंतत: यही कहा जा सकता है कि कांगे्रस पूरी तरह से दिशाहीन हो चुकी है। वह सत्ता प्राप्त करने के लिए तड़प रही है, क्योंकि वर्तमान में उनको सत्ता की सुविधाएं प्राप्त नहीं हो रही हैं। मात्र इसी कारण से कांगे्रस के नेता बिना सोचे समझे आरोप लगा रहे हैं। हम जानते हैं कि राहुल गांधी संघ पर लगाए आरोप को लेकर न्यायालय में प्रकरण का सामना कर रहे हैं। इस बात को पूरा देश जानता है कि कांगे्रस झूठे आरोप लगाकर किसी और का नहीं, बल्कि अपना ही नुकसान कर रही है। क्योंकि उसके आरोपों में न तो पहले कोई दम रही है और न ही अब के आरोपों में कोई दम है। असत्य आरोपों के सहारे कांगे्रस सत्ता तक पहुंचने का मार्ग बनाती हुई दिखाई दे रही है, जिसे किसी भी प्रकार से ठीक नहीं कहा जा सकता। सत्ता तक पहुंचने के लिए देश के विकास के लिए चल रहे रचनात्मक कार्यों को सहयोग करना होगा, लेकिन कांगे्रस इस तथ्य पर विचार करने को तैयार नही है। कांगे्रसी यह भूल गए कि भाजपा उन पर विकास के दामाद मॉडल का पलटवार करेगी। रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ जांच भी चल रही है। राजस्थान और हरियाणा में उन पर अनियमित जमीन सौदे के गम्भीर आरोप हैं। बिना पैसा लगाए पचासों करोड़ के जमीन सौदे के आरोप हैं। ऐसा लग रहा है कांग्रेस को इस मामले में अरविंद केजरीवाल की तरह कदम पीछे समेटने पड़ेंगे।आम आदमी पार्टी जिस रणनीति को पीछे छोड़ आई है, कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी का उस के पीछे चलना अजीब लगता है। किसी पर आरोप लगाने से पहले सबूतों पर ध्यान देना चाहिए। सनसनी फैलाने के लिए आरोप नहीं लगाने चाहिए। ऐसा लगता है कांग्रेस अपनी ही गलतियों से सीखने को तैयार नही हैं।

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