भारतीय वाणिज्य दूतावास में भगवान महावीर की जयंती मनाई

17 May 2018
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*भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर : डा. नीता जैन
न्यूयॉर्क (हम हिन्दुस्तानी) : न्यूयॉर्क स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास (जनरल कौंसिल ऑफ इंडिया) में भगवान महावीर की जयंती के संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा फाऊंडेशन की अध्यक्षा डा. नीता जैन की अध्यक्षता में विशेष समारोह का आयोजन किया गया। इस समारोह में मुख्यातिथि के रूप में न्यूयॉर्क में भारत के अम्बैसडर संदीप चक्रवर्ती, कांग्रेसमैन जोसफ क्राऊली, असैम्बलीमैन डेविड वैपरिन, कौंसलमैल रॉय लैंचमन, बैरी ग्राऊडचिक, पीटर कू, मनहट्टन ब्राऊट अध्यक्ष गेल ब्रेवर, पूर्व कम्पट्रोलर जोहन ल्यू, प्रो. जैफरी लांग, अनिका जैन, डा. ऊमा मयसोरकर एवं डा. देववबाला रामनाथन एवं प्रमोद जैन आदि उपस्थित थे। इस अवसर पर उपस्थिति को सम्बोधित करते हुए डा. नीता जैन कहा कि भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हं। भगवान महावीर का जन्म करीब अढ़ाई हजार साल पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व), वैशाली के गणतंत्र राज्य क्षत्रिय कुंण्डलपुर में हुआ था। 30 वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्मकल्याण के पथ पर निकल गए। 12 वर्षो की कठिन तपस्या के बाद उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ जिसके पश्चात् उन्होंने समवशरण में ज्ञान प्रसारित किया। 72 वर्ष की आयु में उन्हें पावापुरी से मोक्ष की प्राप्ति हुई। इस दौरान महावीर स्वामी के कई अनुयायी बने जिसमें उस समय के प्रमुख राजा बिम्बिसार, कुनिक और चेटक भी शामिल थे। इस अवसर पर मुख्यातिथि अम्बसैडर संदीप चक्रवर्ती ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैन ग्रन्थों के अनुसार समय समय पर धर्म तीर्थ के प्रवर्तन के लिए तीर्थंकरों का जन्म होता है, जो सभी जीवों को आत्मिक सुख प्राप्ति का उपाय बताते है। तीर्थंकरों की संख्या 24 ही कही गई है। भगवान महावीर वर्तमान अवसर्पिणी काल की चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर थे। उन्होंने दुनिया को जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए, जो अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य विशेष रूप से हैं। उन्होंने अनेकांतवाद, स्यादवाद और अपरिग्रह जैसे अद्भुत सिद्धांत दिए। महावीर के सर्वोदयी तीर्थों में क्षेत्र, काल, समय या जाति की सीमाएं नहीं थीं। भगवान महावीर का आत्म धर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। दुनिया की सभी आत्मा एक-सी हैं इसलिए हम दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखें जो हमें स्वयं को पसंद हो। यही महावीर का 'जीयो और जीने दो' का सिद्धांत है। इसके उपरांत अन्य अतिथियों द्वारा भी सम्बोधित किया गया और भगवान महावीर की जयंती के संदर्भ में विस्तृत चर्चा की गई। इसके उपरांत ताल नृत्य अकादमी के बच्चों ने जैन गीत पेश करके लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया तथा उन्होंने बहुत ही अच्छे ढंग से भगवान महावीर के जीवन के संदर्भ में गीतों के माध्यम से जानकारी दी।

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