परमाणु एवं रासायनिक जनसंहारक युद्धों का मूक शिकार बन रहा पर्यावरण

10 November 2017
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-राहुल लाल (कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ)

महाशक्तियों के वर्चस्व के संघर्ष,शक्ति प्रदर्शन, विरोधाभासों के कारण दुनिया परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी है।राष्ट्रपति ट्रंप के एशिया दौरे शुरू होने से पहले 3 नवंबर को परमाणु बम हमले में सक्षम 2 अमेरिकी अत्याधुनिक 1-बी बमवर्षकों ने कोरियाई प्रायद्वीप के ऊपर से उड़ान भरी,जिसमें जापानी एवं दक्षिण कोरियाई लड़ाकू विमान भी थे।उत्तर कोरिया ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि वह गैंगस्टर अंदाज में कोरियाई प्रायद्वीप में परमाणु युद्ध भड़काना चाहता है।1945 में जापान पर परमाणु बम गिराने के 72 वर्ष बाद दुनिया पुन:परमाणु बम के संकट से बुरी तरह घिरी हुई है।परमाणु हथियारों के रुप में आज पहली बार ऐसा सर्वव्यापी संकट उत्पन्न हो गया है,जिससे मानव समूची मानव जाति को महाविनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है।इससे पर्यावरण को जो व्यापक क्षति पहुँचेगी, उसका मूल्यांकन करने के लिए कोई मनुष्य बचेगा भी नहीं।
विज्ञान के इसी विनाशक स्थिति से पर्यावरणीय मूल्यों को संरक्षित करने हेतु 6 नवंबर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा 'इंटरनेशनल डे फॉर प्रीवेंटिंग एक्सप्लॉयटेशन ऑफ एनवायरमेंट इन वार एंड आर्म्ड कनफ्लिक्टÓअर्थात युद्ध और सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण की रोकथाम के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस।इस दिवस को मनाने का उद्देश्य युद्ध एवं सशस्त्र संघर्षों में होने वाली पर्यावरण क्षति के संरक्षण के प्रति सदस्यों को जागरूक करना है।
विश्व भर में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को लेकर पहले से ही हाहाकार मचा है।ऐसे में अक्सर यह तथ्य कहीं खो जाता है कि पर्यावरण को परमाणु परीक्षणों,रासायनिक हमलों,युद्धों तथा सशस्त्र संघर्षों से भी भारी नुकसान झेलना पड़ता है।संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार पिछले 60 वर्षों में 40त्न आंतरिक सशस्त्र विद्रोह के कारण प्राकृतिक संसाधनों का भारी नुकसान हुआ है।
उत्तर कोरिया के सनकी तानाशाह किम जोंग उन के कारण परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी दुनिया तथा भारी पर्यावरणीय क्षति : आज संपूर्ण विश्व परमाणु युद्ध के आशंका से डरी सहमी हुई है।कोरियाई प्रायद्वीप में परमाणु युद्ध की आशंकाएँ आज सबसे तीव्र है।पिछले 3 सितंबर को दुनिया के तमाम विरोधों तथा दबावों को दरकिनार करते हुए,उत्तर कोरिया ने 6ठा परमाणु परीक्षण किया,जो मूलत: हाइड्रोजन बम परीक्षण था।इस हाइड्रोजन बम की ताकत नागासाकी पर गिराए परमाणु बम से 8 गुना ज्यादा थी।यह इतना जोरदार था कि रूस के ब्लालिवोस्तक तक इसने भूगर्भीय पर्यावरणीय दशाओं को भारी नुकसान पहुंचाया।इस परीक्षण से गहराई में मौजूद प्लेट्स क्षतिग्रस्त हुई और जब वे व्यवस्थित हो रही हैं,तब भूकंप के झटकें तथा भूस्खलन हो रहे है।इन परीक्षणों ने तटवर्ती क्षेत्रों के सागरीय जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया।
उत्तर कोरियाई परमाणु परीक्षण स्थल वाले सुरंग में 200 लोगों की मौत तथा रेडिएशन फैलाव की गंभीर संभावनाएँ : उत्तर कोरिया ने साल 2006 से अब तक कुल 6 परमाणु परीक्षण किए हैं और हर बार उसने इसके लिए पुंग-री पहाड़ी के पास माउंट मनटाप के नीचे बनी सुरंगों का प्रयोग किया है।3 सितंबर को परमाणु परीक्षण से एक सुरंग ढह गई थी।जापानी टीवी 'असाही'के अनुसार इससे 200 से ज्यादा लोग मारे गए थे।जापानी टीवी 'असाही'ने इसी मंगलवार को बताया कि 3 सितंबर के हाइड्रोजन बम परीक्षण के बाद 10 सितंबर के आस-पास सुरंग ढह गई।उस समय करीब 100 श्रमिकों की मौत हुई।जब बचाव अभियान चलाया जा रहा था,तब पुन:सुरंग में हादसे से मृतकों की संख्या 200 से ज्यादा हुई।विशेषज्ञ पहले ही कह चुके हैं कि परीक्षण स्थल के समीप के इलाकों में झटकों और भूस्खलन से संपू्र्ण क्षेत्र अस्थिर हो चुका है।
इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में रेडिएशन की गंभीर संभावनाएँ व्यक्त की जा रही है।अगर और भी परीक्षण होता है तो यह पहाड़ भी ढह सकता है और चीन की सीमा तक रेडिएशन फैल सकता है।ज्ञात हो 3 सितंबर को उत्तर कोरिया के 6ठे परमाणु परीक्षण के समय 6.3तीव्रता वाले भूकंप की तरह धरती डोली थी।कई विशेषज्ञ इसे दुनिया का सबसे शक्तिशाली कृत्रिम विस्फोट मानते हैं।
उत्तर कोरियाई हाइड्रोजन बम की विनाशलीला का अध्ययन : जहाँ एक ओर मानवता की रक्षा के लिए परमाणु निशस्त्रीकरण की बात हो रही है,वहीं उत्तर कोरिया तथा महाशक्तियाँ हाइड्रोजन बम की ओर अग्रसर हो रही हैं।ऐसे में हाइड्रोजन बम की विनाशलीला को समझना आवश्यक है।हाल ही में सियोल के कुकमिन यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने न्यूयॉर्क जैसे शहर पर उत्तर कोरियाई हाइड्रोजन बम से हमले की कल्पना कर संपूर्ण दुनिया को उसकी विनाशलीला से अवगत कराया।अगर उत्तर कोरिया अपने हाइड्रोजन बम का प्रयोग न्यूयॉर्क शहर पर करता है,तो पूरा न्यूयॉर्क शहर तबाह हो जाएगा और एक भी मनुष्य जीवित नहीं बचेगा ,जबकि परमाणु हमले में शहर का केवल एक हिस्सा नष्ट होगा।ऐसे में न्यूयॉर्क के शहर पर्यावरण संबंधी अभूतपूर्व क्षति को समझा जा सकता है।
भारत-पाकिस्तान परमाणु युद्ध का पर्यावरणीय दुष्प्रभाव तथा 'परमाणु अकालÓ : कोरियाई प्रायद्वीप के अतिरिक्त भारतीय उपमहाद्वीप में भी पाकिस्तान हमेशा भारत को परमाणु बमों की धमकी देता रहता है।पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा को लेकर प्रश्न उठते रहते हैं।ऐसे में भारतीय महाद्वीप में परमाणु युद्ध के तीव्रतम खतरों को समझा जा सकता है।
इंटरनेशनल फिजियंस फॉर द प्रिवेंशन ऑफ न्यूक्लियर वार(आईपीपीएनडब्ल्यू) के जरिए जारी की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध होने से पूरी दुनिया में पर्यावरण पर इसका असर पड़ेगा और चीन,अमेरिका तथा दूसरे देशों में खाद्य उत्पादन में कमी आएगी।इससे पहले ही कुपोषण के शिकार करोड़ो लोगों के लिए खतरा गंभीर होगा।इसे रिपोर्ट में"परमाणु अकाल"कहा गया है।इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले इरा हेल्फैंड का कहना है कि भारत-पाकिस्तान परमाणु युद्ध न केवल मानव सभ्यता पर खतरा है,कपितु परमाणु अकाल के संभावित खतरों को देखते हुए परमाणु हथियारों के प्रति हमारी सोच में बुनियादी बदलाव की आवश्यकता है।इस रिपोर्ट के अनुसार परमाणु धमाकों से तापमान अप्रत्याशित रुप से गिर जाएगा और संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सदैव के लिए नष्ट हो जाएगा।
सोमालियाई युद्ध में पर्यावरणीय क्षति : पिछले माह ही सोमालिया के राजधानी मोगादिशू में इस दशक के सबसे बड़े आतंकवादी हमले में 400 लोग मारे गए थे।लंबे समय से गृहयुद्ध के संकट को झेल रहे सोमालिया में समुद्र में सेना की गतिविधियों में तीव्र वृद्धि से समुद्र का जल अपने वास्तविक स्थान से पिछे चला गया और बालू सड़क तक आ गई।इससे वहाँ की समुद्री जैवविविधता बुरी तरह प्रभावित हुई।
म्यांमार के रखाइन में सशस्त्र संघर्ष से बांग्लादेश पहुँचे रोहिंग्या शरणार्थियों के भारी उपस्थिति से 'कॉक्स बाजारÓ के संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्र में भारी नुकसान : संपूर्ण दुनिया में रोहिंग्या शरणार्थी का मामला छाया रहा।करीब 4 लाख रोहिंग्या शरणार्थी इस समय छोटे से कॉक्स बाजार क्षेत्र में अमानवीय दशाओं में रह रहे हैं।ऐसे में दुनिया के सबसे बड़े समुद्री बीच 'कॉक्स बाजारÓभारी पर्यावरणीय नुकसान भी झेलना पड़ रहा है।जगह की कमी के कारण रोहिंग्या शरणार्थियों के कैंप बनाने हेतु जंगलों की कटाई करनी पड़ रही है।ऐसे में लाखों लोगों को मानवीय गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करने तथा पर्यावरणीय नुकसान से बचने के लिए इस संकट का जल्द से जल्द शांतिपूर्ण समाधान अपरिहार्य हो गया है।
अफगानिस्तान में अमेरिका के मदर ऑफ ऑल बम से पर्यावरणीय क्षति : अमेरिका ने अप्रैल मध्य में अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट्स के ठिकानों पर दुनिया का सबसे बड़ा बम जीबीयू-43 गिराया,जिसे 'मदर ऑफ ऑल बमÓभी कहा जाता है।इसमें आईएस के 36 आतंकवादी मारे गए,परंतु 10000 किलो के इस वजनी बम से वहाँ के पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँची।यही कारण है कि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति ने इस बम को आतंकवाद के खिलाफ नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ बताया।अमेरिका का कहना है कि गुफाओं में छिपे आतंकियों को मारने का इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था।
सीरिया के रासायनिक युद्ध में पर्यावरणीय नुकसान : आतंकवाद के समाप्ति के नाम पर अमेरिका और रूस इस समय सीरिया में आमने -सामने हैं।यहाँ इसी वर्ष 4 अप्रैल को विद्रोही गुटों के कब्जे वाले इदबिल प्रांत में रूस और सीरिया के तरफ से रासायनिक सम से हमले में 70 लोग मारे गए थे।विश्व के रासायनिक हथियारों पर निगरानी करने वाले एक वाच डॉग एजेंसी ओपीसीडब्लू के अनुसार इस रासायनिक हमलों से 5 दिन पहले भी सीरिया में सरीन नर्व एजेंट का प्रयोग रासायनिक हथियार के लिए किया गया था।रासायनिक बमों से किए गए हमलें न सिर्फ वहाँ के नागरिकों के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं,बल्कि उस पूरे क्षेत्र के पर्यावरण और वनस्पति को भी बर्बाद कर देते हैं।इससे वहाँ के हवा,पानी,मिट्टी में हमेशा के लिए इन खतरनाक रसायनों का भारी प्रवेश हो गया,जो संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रहा है।वियतनाम युद्ध में भी अमेरिकी रासायनिक हथियारों के प्रयोग से 20 लाख एकड़ वन नष्ट हो गए थे।साथ ही अमेरिकी सेना के इस प्रयोग से प्रकृति का फेफड़ा कहे जाने वाले अतिमहत्वपूर्ण 50त्न मैग्रोव वन नष्ट हो गए थे।
ऐसे में संपू्र्ण मानवता तथा पर्यावरण के संरक्षण के लिए आवश्यक है कि विश्व को परमाणु हथियारों एवं रासायनिक हथियारों से रहित बनाने के लिए गंभीर प्रयास हो तथा विज्ञान का केवल रचनात्मक प्रयोग ही सुनिश्चित किया जाए।इसके लिए इस संपूर्ण आंदोलन को गाँधीवादी शैली में जन आंदोलन बनाना ही एकमात्र विकल्प है।


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