गहराता कोरियाई परमाणु संकट और कूटनीति के घटते विकल्प

30 November 2017
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-राहुल लाल (कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ)

उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच टकराव में लगातार वृद्धि हो रही है।हाइड्रोजन बम बनाकर अमेरिका को चुनौती देने वाले उत्तर कोरिया ने आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद एक और अंतर्महाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया है।इससे पूरे कोरियाई प्रायद्वीप पर परमाणु युद्ध का खतरा मंडरा गया है।उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन ने बुधवार(29 नवंबर) को कहा कि उनका देश अमेरिका में कहीं भी मार करने की क्षमता रखने वाली नई
मिसाइल का सफल परीक्षण कर पूर्ण परमाणु शक्ति बन गया।29 नवंबर को उत्तर कोरिया ने ह्नासोंग-15 नामक आईसीबीएम का सफल परीक्षण कर संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक प्रतिबंधों समेत संपूर्ण दुनिया के चेतावनियों को दरकिनार कर दिया।भारी हथियार के परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम ह्नासोंग-15 की क्षमता 13,000 किमी से अधिक है,जबकि अमेरिका की दूरी 10,000 किमी है।अमेरिका,जापान और दक्षिण कोरिया के अधिकारियों ने माना है कि जापान के नजदीक गिरी मिसाइल लंबी दूरी की बैलस्टिक मिसाइल थी।अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने इसे पूरी दुनिया के लिए खतरा बताया है।ज्ञात हो 3 सितंबर को 6 ठे परमाणु परीक्षण के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 11 सितंबर को उत्तर कोरिया का अब तक का सबसे कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाया था।लेकिन प्रतिबंध के केवल 4 दिन बाद ही उत्तर कोरिया ने 15 सितंबर को ह्नासोंग-12 का परीक्षण कर दुनिया के सामने अपने इरादें स्पष्ट कर दिए थे।ढाई माह बाद अब 29 नवंबर को उत्तर कोरिया के नवीनतम मिसाइल परीक्षण का चीन और रुस सहित पूरी दुनिया ने आलोचना की है। उत्तर कोरिया वैसे तो बैलेस्टिक मिसाइलों के दर्जनों परीक्षण कर चुका है,लेकिन अमेरिकी शहरों तक पहुँच होने का दावा उसने पहली बार किया है।बीते अगस्त में अमेरिकी द्वीप गुआम के नजदीक उत्तर कोरिया दो बार बैलेस्टिक मिसाइल पहुंचा चुका है।उत्तर कोरिया के ह्नासोंग-15 के बाद कोरियाई प्रायद्वीप के तनाव को इससे ही समझा जा सकता है कि परीक्षण के तुरंत बाद दक्षिण कोरिया ने भी जवाबी मिसाइल परीक्षण किया।अभी एक सप्ताह पूर्व ही अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने उत्तर कोरिया को आतंकवाद का समर्थन करने वालज देशों की सूची में डाला था।इस सूची में आने वाले देशों पर अमेरिका और प्रतिबंध लगा सकता है।

अंतरिक्ष भी सुरक्षित नहीं--
उत्तर कोरिया ने ह्नासोंग-15 के इस नवीनतम परीक्षण में एक ओर जहाँ उसके मिसाइल प्रौद्योगिकी के आधुनिकम तकनीक का शक्ति प्रदर्शन किया है,वहीं अब कोरियाई संकट की आंच अंतरिक्ष तक भी पहुंच गई है।ताजे परीक्षण में उत्तर कोरियाई मिसाइल सबसे ज्यादा ऊंचाई और सबसे ज्यादा दूरी जाकर जापान के नजदीक समुद्र में गिरी।उत्तर कोरिया ने बयान जारी कर कहा है कि यह मिसाइल आकाश में 4,475 किमी की ऊंचाई तक गई और उसने 950 किमी लंबा सफर तय किया।अंतरिक्ष में जितनी ऊंचाई पर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन मौजूद है,उत्तर कोरिया की मिसाइल उससे 10 गुना ज्यादा ऊंचाई तक गई।इसके चलते उत्तर कोरियाई मिसाइलों के खतरे से अब अंतरिक्ष भी सुरक्षित नहीं रह गया।इतना ही नहीं रात्रि में मिसाइल परीक्षण करना कठिन होता है,लेकिन उत्तर कोरिया ने दुनिया को यह संकेत दे दिया कि वह लगातार मिसाइल प्रोद्योगिकी को उन्नत कर रहा है।
इस मामले की गंभीरता को इससे ही समझा जा सकता है कि बैलस्टिक मिसाइल के परीक्षण करते ही बुधवार मध्य रात्रि को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक बुलाकर उत्तर कोरिया के इस कार्यवाई के लिए चेतावनी दी गई।तमाम अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के बाद भी उत्तर कोरिया का दावा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरा होने वाला है।वहीं 16 सितंबर को ही ट्रंप ने उत्तर कोरिया एवं उसके सहयोगियों को चेतावनी देते हुए कहा था कि उत्तर कोरिया पर सैन्य कार्यवाही पर भी विचार किया जा रहा है।उत्तर कोरियाई हाइड्रोजन बम विस्फोट के बाद मिसाइल परीक्षण और चेतावनियों के इन दौरों से संपूर्ण विश्व में खलबली मच गई है।

वहीं उत्तर कोरिया की सैन्य तैयारियों को देखते हुए
सितंबर से हीअमेरिका अपने मित्र देशों दक्षिण कोरिया और जापान के साथ मिलकर उत्तर कोरियाई सीमा के पास कई युद्धाभ्यास भी किया।।ट्रंप उत्तर कोरिया के खिलाफ सैन्य कार्यवाई को विचारणीय विकल्प बताते हैं,जबकि रूस और चीन टकराव टालने के लिए बातचीत को श्रेष्ठ विकल्प मानते हैं।लेकिन उत्तर कोरिया अब तक इस संपूर्ण मामले में किसी को भी सुनने के लिए तैयार नहीं है।वह इसे आत्मरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बता रहा है।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर उत्तर कोरिया का गहराता संकट किस ओर जा रहा है?क्या इस संपूर्ण मामले में कूटनीति की भूमिका घटती जा रही है?
उत्तर कोरिया मसले को केंद्र मेंं रखकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एशियाई दौरे के दो हफ्ते बाद ही उत्तर कोरिया ने अमेरिका के समक्ष नई चुनौती पेश कर दी है।ट्रंप ने ह्नासोंग-15 के परीक्षण को लेकर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बात की है।अब ट्रंप उत्तर कोरिया पर और भी कड़े प्रतिबंध लगाने की तैयारी में हैं।उत्तर कोरिया को लेकर सुरक्षा परिषद भी हरकत में है।अमेरिका के प्रयास से इसके पूर्व 11 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उत्तर कोरिया पर अब तक का सबसे कठोर प्रतिबंध प्रस्ताव संख्या 2375 के द्वारा लगाया है।इन प्रतिबंधों के कठोरता को इससे ही समझा जा सकता है कि इसके समुचित क्रियान्वयन से उत्तर कोरिया के 90% निर्यात तथा तेल आपूर्ति पर 30% की कटौती हो सकेगी।लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सुरक्षा परिषद में चीन और रूस के दबाव में अमेरिका ने पहले के जो कठोरतम प्रतिबंध का प्रस्ताव दिया था,उसमें संशोधन करते हुए प्रतिबंधों में कई छूट दी। इसमेें किम जोंग उन के परिसंपत्तियों को जब्त करने और उनके यात्रा प्रतिबंध को वापस लिया जाना शामिल है।इसके अतिरिक्त तेल आयात पर पूर्व प्रस्ताव में 80% कटौती होती,लेकिन अब लगभग 30% कटौती होगी।11 सितंबर के सबसे कठोर आर्थिक प्रतिबंध के महत्वपूर्ण घटक हैं-तेल आयातों तथा टैक्सटाइल निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध,उत्तर कोरियाई विदेशी श्रमिकों के अतिरिक्त कॉन्ट्रैक्ट पर रोक,उत्तर कोरियाई स्मगलिंग तथा उत्तर कोरिया के साथ संयुक्त उद्यम पर रोक इत्यादि।
लेकिन इन कठोर प्रतिबंधों के बावजूद उत्तर कोरिया ने 15 सितंबर को ह्नासोंग-12 तथा 29 नवंबर को ह्नासोंग-15 मिसाइल का परीक्षण किया।इसके पूर्व 5 अगस्त को भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगाए थे,जबकि प्रतिक्रिया में उत्तर कोरिया ने 3 सितंबर को हाइड्रोजन बम का परीक्षण ही कर लिया।इससे स्पष्ट है कि अब तक उत्तर कोरिया पर जितने भी आर्थिक प्रतिबंध लगे,वे पूर्णतः बेअसर ही रहे।ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ट्रंप उत्तर कोरिया पर और जिन कठोर प्रतिबंधों को लगाने के लिए प्रयत्नशील हैं,उससे कोरियाई संकट का समाधान निकलेगा?
कोरियाई प्रायद्वीप में अब भी स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।स्थिति के गंभीरता को इससे ही समझा जा सकता है कि अमेरिका दक्षिण कोरिया में "थाड" डिफेंस सिस्टम की तैनाती में लगा हुआ है।जापान,दक्षिण कोरिया और अमरीकी द्वीप गुआम में लोगों को परमाणु हथियारों से बचाव का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।उत्तर कोरिया ने सीमावर्ती क्षेत्रों में एंटी बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती की है।वहीं अमेरिका भी लगातार कोरियाई क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाता जा रहा है।
पिछले दिनों जब ट्रंप एशिया की लंबी यात्रा पर आए थे तो लगा था कि वे इस बारे में चीन से मिलकर कोई कारगर कदम उठाएंगे।पिछले दिनों जब चीन के विशेष प्रतिनिधि उत्तर कोरिया पहुँचे,तो लगा कि इन प्रयासों को और भी गति मिल रही है।लेकिन अंततः परिणाम शून्य ही रहा।सवाल यही उठता रहा कि आखिर अमेरिका के पास और क्या विकल्प है?

इस संपूर्ण मामले में आखिर अमेरिका इतना कमजोर क्यों नजर आ रहा है??
चाहे उत्तर कोरिया द्वारा लगातार किए जा रहे महाद्वीपीय मिसाइल परीक्षण हो या हाइड्रोजन बम परीक्षण इसने संपूर्ण दुनिया में दशहत पैदा किया है ।एक तरह से उत्तर कोरिया जहाँ मिसाइल एवं परमाणु परीक्षणों के साथ अपने क्षमता में वृद्धि कर रहा है,वहीं उसका यह पैटर्न 1960 के दशक वाला ही है।इस पैटर्न के अंतर्गत उत्तर कोरिया युद्ध उन्माद भड़काता भी रहा है और शक्ति संतुलन की ओर भी अग्रसर हो रहा है।
उत्तर कोरिया का दावा है कि अब उसके मिसाइलों के दायरे में अमेरिका भी है।माना ज उत्तर कोरिया की जद में में अमेरिका का अलास्का आया है।अलास्का का आना प्रतीकात्मक और व्यवाहरिक दोनों कसौटियों पर स्पष्ट रुप से गेमचेंजर है।पहली बार जुलाई 2017 में अमरीकी राष्ट्रपति ने भी इसे स्वीकार करते हुए कहा कि "उत्तर कोरिया संकट वास्तविक और वर्तमान"खतरा है।"यह खतरा न केवल उत्तर पूर्वी एशिया और अमेरिकी मित्रों के लिए खतरा है बल्कि स्वयं अमेरिका के लिए भी खतरा है।इस संपूर्ण मामले में ट्रंप केवल चेतावनी देते नजर आए ,जबकि अपनी रक्षात्मक तैयारी भी नहीं की।


यूएसए का विन्सन कार्ल बैटल की तैनाती भी उत्तर को डरा नहीं पाया-
ट्रंप ने उत्तर कोरिया से निपटने के लिए कोरियाई प्रायद्वीप में शुरुआती कदम के तहत जहाजी बेड़े की तैनाती की।इसके अंतर्गत ट्रंप ने यूएसएस विंसन कार्ल ग्रुप को तैनात किया।इसकी तैनाती का कोई गौरवशाली इतिहास भी नहीं रहा है।यही कारण रहा कि इसके तैनाती से ट्रंप उत्तर कोरिया को डराने में पूर्णतः विफल रहा।वास्तव में अमेरिका दुनिया सबसे शक्तिशाली देश है,जबकि उत्तर कोरिया बिल्कुल छोटा- सा देश है।परंतु उत्तर कोरिया में अमेरिका का कोई भय नहीं दिखना ही ट्रंप की सबसे बड़ी समस्या है।

 

अमेरिका के लिए युद्ध के विकल्प का चयन करना आसान नहीं---
वास्तविकता यह है कि अमेरिका के पास उत्तर कोरिया के खिलाफ तत्काल कदम उठाने के सीमित विकल्प हैं।उत्तर कोरिया के खिलाफ सैन्य कार्यवाई भी आसान नहीं है।अंतत: वह अब परमाणु शक्ति संपन्न देश बन चुका है।रिपब्लिकन सीनेटर्स जॉन मैक्केन और लिंडसे ग्राहम की युद्धकारी सिफारिशों के बावजूद अमेरिका के लिए युद्ध का जोखिम उठाना आसान नहीं है।उत्तर कोरिया पर प्रथमत: सैन्य कार्यवाई का विकल्प चयन ही कठिन है।साथ ही इस विकल्प के चयन के बाद कोरियाई प्रायद्वीप युद्ध के समय की स्थितियाँ अमेरिका के नियंत्रण में रहे,यह भी काफी मुश्किल है।


कोरिया संकट में अमेरिका के लिए कूटनीतिक विकल्प भी सीमित हैं---
3 सितंबर के हाइड्रोजन बम परीक्षण के बाद 13 सितंबर को उत्तर कोरिया पर लगा आर्थिक प्रतिबंध भी बेअसर रहा।उत्तर कोरिया अब तक संयुक्त राष्ट्र के कई प्रतिबंधों के बीच भी मिसाइल और आणविक तकनीक में प्रगति करता रहा है।ये प्रतिबंध उत्तर कोरिया को अभी भी रोकने में सक्षम नहीं हैं,जब तक चीन और रूस का समर्थन उसे प्राप्त है।उत्तर कोरिया का पूर्ण प्रयास होगा कि वह जल्द से जल्द परमाणु शक्ति संपन्न देश के दर्जे के बाद अमेरिका से वार्ता के टेबल पर जाए।वास्तव में इन प्रतिबंधों के बाद उत्तर कोरिया अपने परमाणु एवं मिसाइल कार्यक्रमों को और गति प्रदान करेगा।अमेरिका ने स्वयं रूस पर कई प्रतिबंध लगाएं है,ऐसे में रूस क्या इस अमरीकी इच्छा वाले प्रतिबंध को जमीनी स्तर पर क्रियान्वित करेगा??इसके साथ ही इस प्रतिबंध में उत्तर कोरिया के अधिकृत 90 % निर्यात को रोकने का प्रावधान है।उत्तर कोरिया 2006 से संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है।इसलिए संभव है कि उसने निर्यात के कई बड़े घटकों को प्राधिकृत रूप से नहीं दिखाया हो।ऐसे में वे उत्पाद भी प्रतिबंध से बाहर रह सकते हैं।इससे स्पष्ट है कि आर्थिक प्रतिबंध जैसे कूटनीतिक विकल्प भी अमेरिका के पास नहीं रहे।
इसके अतिरिक्त कूटनीतिक वार्ता का विकल्प भी काफी सीमित है।यहाँ बातचीत भी पूर्णतः एकतरफा होती है।अभी हालात भी उत्तर कोरिया के पक्ष में है,ऐसे में वह अमेरिका के साथ बात क्यों करेगा।जैसा मैंने पहले भी कहा है कि उत्तर कोरिया अपने शक्तियों मेंं यथोचित वृद्धि करके ही वार्ता के लिए तैयार होगा।उत्तर कोरिया लगातार अपने सैन्य आधुनिकीकरण में संलग्न है।

लगातार मिसाइल परीक्षणों तथा परमाणु परीक्षणों से आत्मविश्वास में उत्तर कोरिया--
उत्तर कोरिया द्वारा लगातार किए जा रहे परमाणु एवं मिसाइल परीक्षणों से तानाशाह किम जोंग उन का हौसला और भी बुलंद हुआ है।उत्तर कोरिया को जोखिम उठाने का साहस मिला है।ऐसे में सैन्य अस्थिरता बढ़ेगी।यहाँ सैन्य अस्थिरता बढ़ने का मतलब है कि अनुमान के उलट परिघटनाओं का सामने आना।इससे अमेरिका को बेहद अरूचिकर दशाओं का सामना करना पड़ सकता है।साथ ही अमेरिका को भी बार-बार यह लग रहा है कि उत्तर कोरिया बातचीत की सभी संभावनाओं को स्वयं खत्म कर रहा है।अगर ऐसे में ट्रंप इस मामले को अभी टालने अथवा नजरअंदाज करने का प्रयास करते हैं तो संभव है कि अभी तत्काल अमेरिका इस संकट से बाहर जा सकता है,परंतु इससे दीर्घकाल में समस्या और भी गंभीर बन जाएगी,जिसे सुलझाना अभी से भी कई गुणा कठिन होगा।

 

क्या अमेरिकी कूटनीतिक प्रयासोंपर चीन और रूस का जमीनी समर्थन मिलेगा??
चीन और रूस ही उत्तर कोरिया के सबसे बड़े व्यापार साझीदार हैं।उत्तर कोरिया का 89% व्यापार चीन के साथ है,जबकि रूस द्वितीय सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है।दोनों ही देश उत्तर कोरिया में तेल सप्लाई करते हैं और इन दोनों के पास संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो की शक्ति शामिल है।रूसी राष्ट्रीय पुतिन का कहना है कि उनका देश उत्तर कोरिया को 40 हजार टन तक ही तेल की सप्लाई करता है,जो कि बहुत ही कम मात्रा है।उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया पर और अधिक प्रतिबंध लगाना कोई उपाय नहीं है।उन्होंने कहा था,"उत्तर कोरिया घास खाकर गुजारा कर लेगा,लेकिन अपना परमाणु कार्यक्रम नहीं छोड़ेगा।पुतिन ने उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण की आलोचना करते हुए भी उसका बचाव करते हुए कहा कि उत्तर कोरिया के लोग इराक में सद्दाम हुसैन के कथित हथियार बढ़ाने के कार्यक्रम को लेकर उस पर हुए अमरीकी हमलों को नहीं भूले हैं और इसलिए उन लोगों को लगता है कि अपनी सुरक्षा के लिए उसे परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ाना होगा। यही कारण है कि चीन और रूस दोनोंं ने ही सुरक्षा परिषद में इसे पूर्ण समर्थन दिया था,लेकिन जमीनी स्तर पर समर्थन नहीं दिया।
11 सितंबर के कठोर आर्थिक प्रतिबंधों के असफल होने के कारण यही रहा कि आंतरिक तौर पर उत्तर कोरिया को रूस और चीन का समर्थन प्राप्त रहता है।यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों एवं वैश्विक गोलबंदी के बावजूद उत्तर कोरिया अनियंत्रित ही है।वास्तव में जब तक महाशक्तियाँ अपने स्वार्थों से अलग होकर निशस्त्रीकरण जैसे मामलों पर गंभीर नहीं होंगे,तब तक कोरियाई संकट का समाधान संभव नहीं है।


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