खामोशी तेरा ही आसरा

10 November 2017
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-प्रदीप उपाध्याय
बचपन में यह ज्ञान दिया जाता रहा कि जो मन को अच्छा लगे वही करना लेकिन अब समझ में नहीं आता कि करें तो क्या करें।इंसान जैसे जैसे उम्र के साथ परिपक्व होता जाता है अपरिपक्वतापूर्ण बात करने लगता है।यही बात बोलने और मौन रहने पर भी लागू होती है।यदि ज्यादा बोलो तो गुनाह और नहीं बोलो तब भी गुनाह!यहाँ तो सभी एक दूसरे को गुनहगार ठहराने पर तुले हुए हैं।देश की कमान संभाल चुके दो प्रमुख जनों को उनके मौन रहने पर बहुत टारगेट बनाया गया।एक तो दुनिया छोड़कर चले गए लेकिन कुछ नहीं बोले,दूसरे को जितना कहा जाता है उतना ही बोलते हैं न कम न ज्यादा!कोई नमक मिर्च नहीं!दोनों का नाम घोटालों में घसीटा गया और उनके नाम पर गंदगी फैलाई गई।वैसे आजकल गंदगी के दाग मिटाने के एक से बढ़कर एक डिटर्जेन्ट आ गये हैं।एक तरीका यह भी है कि अपने से ज्यादा गंदगी दूसरे पर उंडेल दो ,तब अपने दाग वैसे ही कम लगने लगेंगे और लोगों का ध्यान भी बंट जायेगा।
खैर,यह तो हुई मौन साधकों की बात;इनके विपरीत कई लोग इतने वाचाल होते हैं कि उनका बड़बोलापन ही उनके गले की हड्डी बन जाता है।वैसे यह बात भी सही है कि यदि बोलेंगे नहीं तो पूछेगा कौन!बोलने वाले का तो हर सामान बिक जाएगा,नहीं बोलने वाला अपनी फेरी का सामान लेकर वापस खाली हाथ घर लौट आता है।तब क्या बोलते रहना चाहिए?वाचाल बने रहना चाहिए?
ज्यादा बोलने वाले के साथ दिक्कत यही रहती है कि उन्हें बिना सोचे विचारे बोलना पड़ता है, परिणाम यह रहता है कि कुछ पल पहले क्या बोला,यह भी याद नहीं रह पाता,तब कल क्या कह गये,यह कैसे बतायेंगे!ये हालात किसी को पप्पू तो किसी को फेकू बना देते हैं लेकिन करें तो क्या करें,यह लोकतंत्र है भाई,यहाँ बिना बोले तो किसी की दाल गलती भी नहीं है।
हाँ नहीं बोलने के बहुतेरे फायदे हैं, कोई आपकी जुबान नहीं पकड़ सकता।कोई आपकी बात नहीं उगलवा सकता।मन की बात मन के अन्दर ही रहती है, टी वी या रेडियो पर प्रसारित नहीं हो पाती और सोशल मीडिया पर बहस का मुद्दा भी नहीं बनती।मौन साधक को कोई वादे नहीं करना पड़ते;इसका फायदा यह रहता है कि कोई यह नहीं कह सकता कि क्या हुआ तेरा वादा वो कसम वो इरादा।
मौन रहने वाले को अपनी किसी बात का स्पष्टीकरण नहीं देना पड़ता है और न ही खेद प्रकट करना पड़ता है जबकि सदैव बकबक करने वाले को अपनी बात के स्पष्टीकरण देने पड़ते हैं।कई बार अपनी गलत बयानी के लिए खेद भी प्रकट करना पड़ता है, माफ़ी मांगना पड़ती है।ज्यादा बकबक करने वालों को पकाऊ तक की संज्ञा दे दी जाती है।बहिर्मुखी प्रतिभा का कुछ सीमा तक वाचाल होना तो ठीक हो सकता है लेकिन इतना भी न हो कि लोग ‘भागो सिरदर्द आया’कहकर पीछा छुड़ाने लगे।अन्तर्मुखी व्यक्ति यदि मौन साध लेता है तो इसे उसकी कमजोरी के रूप में आंका जाता है लेकिन यही उसकी ताकत भी हो सकती है।
बहरहाल,आज के हालात में जो मौन रह लिये,वे तो अपनी सफलता के झण्डे गाड़ चुके,जितना सत्ता सुख भोगना था ;भोग चुके।परेशानी तो उन लोगों के साथ है जिन्हें मालुम ही नहीं है कि क्या बोलना है,कहाँ बोलना है और क्यूँ बोलना है।मुझे तो लगता है कि इंसान को कम से कम बोलना चाहिए और अधिक से अधिक लिखना चाहिए ताकि लिखा हुआ सनद रहे।कहा भी गया है कि सौ बका एक लिखा।सौ बार बकबक कर लो तब भी उसकी विश्वसनीयता नहीं रह जाती जितनी एक बार के लिखे हुए की।किसी विशेषण से बचना हो और अपनी विश्वसनीयता बनाये रखना है तो चुप रहना ही श्रेयस्कर है भाई!फिर भी किसी शायर की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य है-
लफ़्जों के बोझ से थक जाती है ज़ुबान कभी कभी।
पता नहीं खामोशी मजबूरी है या के समझदारी।।

16,अम्बिका भवन,उपाध्याय नगर,मेंढ़की रोड़,देवास,म.प्र.
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