बैकुण्ठपुर। एक दौर था जब छत्तीसगढ़ के अंदरूनी इलाकों में घनघोर जंगल हुआ करते थे। उत्तर की सरहद पर कोरिया रियासत थी जो अब जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर के नाम से जानी जाती है। यहां के पुराने लोगों से एक कहानी सुनने को मिली। उस आदमखोर चीते की कहानी, जिसने यहां लंबे समय तक किसी रहस्य के रूप में खौफ पैदा किया था। छोटे-छोटे बच्चे अचानक गायब होने लगे थे। जंगल में वनोपज और लकड़ियां लेने के लिए जाने वाले वापस नहीं आते थे। ये आजादी के वक्त का दौर था।आदमखोर चीते की वजह से कोरिया रियासत के किसी न किसी गांव में आए दिन मातम मनता था। जब यह बात तत्कालीन महाराज रामानुज प्रताप सिंह देव तक पहुंची तो उन्होंने इस चीते के खौफ से जनता को निजात दिलाने का निर्णय लिया। उस वक्त आदमखोर जानवरों के शिकार पर पाबंदी नहीं थी। कहा जाता है कि जिला मुख्यालय से थोड़ी ही दूर पर स्थित सलका के जंगलों में महाराजा रामानुज प्रताप ने उस आदमखोर चीते को मार गिराया था।
क्या यही था भारत का अंतिम चीता?:-भारत से पूरी तरीके से विलुप्त हो चुके चीतों के संबंध में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के दस्तावेजों की मानें तो भारत के आखिरी तीन चीतों को 1947 में छत्तीसगढ़ के कोरिया में महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव ने मार गिराया था। रामानुज के निजी सचिव ने ही यह पूरी जानकारी बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी को भेजी थी। मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में कई सरकारों में मंत्री रहे महाराजा रामानुज के बेटे रामचंद्र सिंहदेव इस तथ्य से सहमत नहीं थे कि कोरिया में एक साथ मारे गए तीनों चीते, देश के आखिरी चीते थे। वे कहते थे कि जिस इलाके की बात कही जाती है, उसी इलाके में दो साल बाद मैंने खुद चीता देखा है।
राजघराने का यह है तर्क:-इस संबंध में नईदुनिया की टीम ने राजघराने के स्वर्गीय रामचंद्र सिंह देव की राजनीतिक विरासत की उत्तराधिकारी उनकी भतीजी अंबिका सिंह देव से बात की तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि मेरा तो जन्म भी उस वक्त नहीं हुआ था तो मैं आपको इस संबंध में जानकारी कैसे दे सकती हूं, वहीं पर उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि आप लोगों के समक्ष जो बातें क्षेत्र के पूर्व विधायक कोरिया कुमार ने कही वही बात मुझसे कही, उससे अधिक जानकारी मेरे पास नहीं है।
गांव वालों ने बताई यह कहानी:-वहीं इस संबंध में हमने क्षेत्र के कई इतिहास के जानकारों से बात की तो उनका भी मानना है कि कोरिया जिले में आजादी के पूर्व चीते पाए जाते थे उसमें से कुछ चीजें तो इतने आदमखोर थे कि उन्होंने गांव वालों को काफी परेशान करके रखा हुआ था और आए दिन उनके जानवरों सहित लोगों को काफी नुकसान पहुंचा रहे थे। जिस कारण से इसकी शिकायत लेकर आए दिन क्षेत्र की जनता अपने राजा रामानुज प्रताप सिंह देव के दरबार में पहुंचती रहती थी और बताया जाता है कि इस दौरान राजा ने लोगों की शिकायत पर ऐसे ही एक खूंखार चीते को बैकुण्ठपुर के समीपस्थ ग्राम सलका में मार गिराया था।स्थानीय गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान के वन्य जीवों के जानकार लोगों से जब चर्चा की तो उसमें से कुछ लोगों का मानना है कि भारत का आखिरी चिता कोरिया रियासत के दौरान रामगढ़ में मारा गया था और उसका भी शिकार राजा रामानुज प्रताप सिंह देव के द्वारा किया गया था। इस बात से किसी ने इनकार भी नहीं किया कि कोरिया रियासत में चीते नहीं थे, किंतु इसकी वास्तविक जानकारी किसी के पास नहीं है। यह मान्यता जरूर है कि उस दौरान राजाओं के द्वारा चीतों समेत अन्य जंगली जानवरों का शिकार करना भारतीय परंपरा का एक हिस्सा रहा है।

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