नई दिल्ली - देश की विभिन्न परीक्षाओं में विभिन्न स्तरों पर अनियमितताओं, अनगिनत पेपर लीक के मामले और फिर परीक्षा आयोजन में सिस्टम की लेटलतीफी से आज हर कोई वाकिफ है। हालिया एसएससी परीक्षा में कथित अनियमितता और हजारों छात्रों के सड़कों पर उतरने की खबर इसी का दूसरा पहलू है। एसएससी पेपर लीक मामले में भले ही केंद्र सरकार ने सीबीआइ जांच की मांग मान ली हो, लेकिन कथित रूप से अनियमितताओं की खबर अपने पीछे फिर कई सवाल छोड़ गई है। सवाल परीक्षा आयोजित कराने वाली संस्थाओं की शुचिता का और युवाओं के भविष्य का है। सवाल दर्जनों पेपर लीक के मामले के बाद भी सरकार की गफलत का और सरकारी अमले की काबिलियत का है।
हम याद करें तो शायद ही कोई ऐसा आयोग हो जिसके परीक्षा प्रश्न-पत्र लीक न हुए हों। पिछले वर्ष ही एमटीएस परीक्षा के कई पेपर दोबारा कराए गए थे। इसी वर्ष उत्तर प्रदेश में दसवीं के प्रश्न पत्र के लीक होने का मामला सामने आया है। उससे पहले जाएं तो 2015 में राज्य की पीसीएस परीक्षा का भी पर्चा लीक हो गया था। पिछले वर्ष मई में ही राजस्थान विश्वविद्यालय की स्नातक परीक्षा के पेपर लीक का मामला सामने आया था। 2013 में राजस्थान प्रशासनिक सेवा परीक्षा का पर्चा भी लीक हुआ था। इसके अलावा उत्तर प्रदेश कंबाइंड प्री मेडिकल टेस्ट, यूपी सीएमटी, ओएनजीसी, रेलवे भर्ती बोर्ड जैसे कई परीक्षाओं का प्रश्न पत्र लीक हो चुका है। अर्थात पूरे देश भर में ढेरों ऐसे उदाहरण हैं जब आयोग की गफलत और गड़बड़ियां सामने आईं।
इससे जाहिर होता है कि गड़बड़ियों को आयोग के अंदर से ही अंजाम दिया जा रहा है। लिहाजा पहले अंदर के तंत्र को ही मजबूत बनाने की कवायद करनी होगी।1क्या आपने कभी सोचा है कि संघ लोक सेवा आयोग भी एक सरकारी निकाय ही है, लेकिन उसके द्वारा लिए गए परीक्षाओं का न तो पेपर लीक होता है और न ही किसी अनियमितता की खबर आती है? जबकि इस आयोग पर भी ढेरों परीक्षाएं आयोजित कराने का दबाव रहता है। फिर अन्य सरकारी आयोगों की सुरक्षा इतनी चाक-चौबंद क्यों नहीं रहती? कैसे ये आयोग गड़बड़ी करने वालों के चंगुल में आसानी से फंस जाते हैं? दरअसल समस्याओं की एक लंबी फेहरिस्त है। पहले परीक्षाफल और फिर नियुक्ति पत्र देर से जारी करने में भी इन आयोगों का कोई जवाब नहीं है।
क्या यह सरकारी अमले की काबिलियत पर सवाल खड़े नहीं करता कि जिस सिविल सेवा की परीक्षा की प्रकिया को संपन्न कराने में यूपीएससी महज 10 महीने लेती है, उसी परीक्षा को राज्यों के लोक सेवा आयोग 2 वर्ष में भी पूरा नहीं कर पाते? बावजूद इसके कार्यपालिका और न्यायपालिका कोई संज्ञान नहीं ले रही हैं। क्या यह सरकार की नीयत पर सवाल खड़े नहीं करता कि युवा देश का दम भरने वाली सरकारें ही युवाओं के हितों को लेकर गंभीर नहीं हैं? यकीनन इस प्रकार की लेटलतीफी युवा और समाज के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता का ही नतीजा है।1एक ऐसे समय में जब नौकरियों के लिए बेहद सीमित विकल्प हों, युवाओं के भविष्य के साथ ऐसा खिलवाड़ चिंता का सबब है। सवाल यह है कि विकास की गंगा बहाने के दावे करने वाले रहनुमाओं ने सिस्टम की इस विफलता पर क्या कार्रवाई की?
यकीनन इस प्रकार की लापरवाही को रोकने में सरकारें सक्षम हैं, लेकिन हैरानी की बात है कि साल दर साल उनकी बेरूखी बढ़ती ही जा रही है। सवाल है कि यह कैसी राजनीति है जिसमें युवाओं का भविष्य दांव पर लगा है? सरकारों को यह समझना होगा कि इस प्रकार की गड़बड़ियों को शह देकर वे बेरोजगारों की एक जमात पैदा कर रही हैं जो देश की राजनीतिक भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। अगर इसी प्रकार से युवाओं में असंतोष फैलता रहा तो हमारा देश अच्छे राजनीतिज्ञ पैदा नहीं कर सकेगा।1चुनाव आते हैं, राजनीतिक दल ढेरों वादे करते हैं, लेकिन नतीजा सिफर ही रहता है। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की रही, हालात कभी भी बेहतर नहीं हो सके। आजादी के सत्तर वर्षो के बाद भी अगर हम इस मामूली सी चूक को सही कर पाने में सक्षम नहीं हैं तो यकीनन यह एक बड़ा सवाल है।
परीक्षा आयोजित कराने वाली सभी संस्थाएं केंद्र या राज्य सरकार के देख-रेख में ही काम करती हैं, लेकिन सत्ता का स्वाद चखने वाली सभी पार्टियों ने बुनियादी समस्याओं को दरकिनार किया है। क्या यह समझना मुश्किल है कि इस प्रकार परीक्षाओं के रद होने से देश को करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान सहना पड़ता है? संसाधनों और समय की बर्बादी अलग से होती है। हम कुछ क्षण ठहर कर सोचें कि महज कुछ अपराधियों की वजह से हमारा देश कितना पीछे चला जाता है। देश के लिए नासूर बन चुके इन अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने में क्या समस्या हो सकती है? क्यों न ऐसे तंत्र विकसित किए जाएं जो इन अपराधियों पर शिकंजा कसने में सक्षम हों?सरकार को दलगत राजनीति से उठकर देश के लगभग 70 करोड़ युवाओं के लिए फिक्रमंद होना चाहिए। यह समझना होगा कि सरकारें आती जाती रहती हैं, लेकिन देशहित एक स्थाई संकल्पना है, जिसके साथ समझौता नहीं होना चाहिए।
मामले की जांच को सीबीआइ को सौंपना एक अच्छी बात है, लेकिन यकीनन यह गड़बड़ियों को रोकने की गारंटी नहीं है। इसके बजाय सिस्टम को मजबूत बनाने की कवायद करनी होगी। यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी परीक्षा अंदर या बाहर से प्रभावित न हो। इसके लिए जरूरी है कि सिस्टम में बैठे जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाए। ऐसे कड़े कानून बनाए जाएं जो युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को सबक सिखा सकें। बिना सख्ती बरते, सिस्टम के सुधरने की उम्मीद बेमानी होगी। बहरहाल सरकार को संजीदगी के साथ एक भरोसेमंद योजना को अमल में लाना होगा। समझना होगा कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ देश में समस्या की जड़ों को गहरा करने जैसा होगा।

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