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बीजिंग - दुनिया को अब एहसास हुआ है कि "कोई अच्छा आतंकवादी नहीं है", भारत ने मंगलवार को कहा कि राजनीतिक सुविधा के तर्क आतंकवादी संगठनों के लिए एक अलीबी प्रदान करना अब पाकिस्तान के स्पष्ट संदर्भ में सहनशील नहीं है, जिसे आतंकवादी समूहों को अपने पड़ोसियों पर हमला करने के लिए सुरक्षित आश्रय प्रदान करने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।
शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) रक्षा मंत्रियों की बैठक में यहां बोलते हुए रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने सीमा पार आतंकवाद, चरमपंथ, साइबर सुरक्षा और नशीले पदार्थों की तस्करी जैसे मुद्दों को उठाया। उन्होंने कहा कि इन मुद्दों को सहकारी ढांचे के आधार पर समाधान की आवश्यकता है जिसमें सभी देशों और हितधारकों को शामिल किया गया है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री खुर्रम दास्तगीर खान की उपस्थिति में सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे को उठाते हुए सीतारमण ने कहा कि आतंकवाद के लिए कोई समर्थन अब सहनशील नहीं है।
उन्होंने कहा कि भौतिक समर्थन के तर्क जो आतंकवाद संगठनों के लिए आतंकवाद का समर्थन करते हैं, वे अब सहनशील नहीं हैं। दरअसल, जैसा कि दुनिया को अब एहसास हुआ है, वहां कोई अच्छा आतंकवादी नहीं है।
भारत और अफगानिस्तान ने लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, तालिबान और हक्कानी नेटवर्क जैसे आतंकवादी समूहों को सुरक्षित आश्रय प्रदान करने के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया।
हक्कानी नेटवर्क ने अफगानिस्तान में अमेरिकी हितों के खिलाफ कई अपहरण और हमले किए हैं। इस समूह को अफगानिस्तान में भारतीय हितों के खिलाफ कई घातक हमलों के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है, जिसमें 2008 में काबुल में भारतीय मिशन पर बमबारी में 58 लोगों की मौत हो गई थी।
उन्होंने कहा कि हमें अफगानिस्तान में आतंकवाद के लगातार खतरे की ओर एक असंगत दृष्टिकोण अपनाना होगा। भारत अफगानिस्तान की सुरक्षा क्षमताओं में सहयोग सहित स्थिरता हासिल करने में अफगानिस्तान की सहायता करने के लिए प्रतिबद्ध है।
रक्षा मंत्री बनने के बाद चीन की पहली यात्रा पर गए सीतारमण ने यह भी कहा कि प्रभाव के नए केंद्र विकसित हुए हैं, खासतौर पर एशिया में, भू-सामरिक प्रतिद्वंद्वियों की ओर अग्रसर है।
एससीओ रक्षा मंत्रियों की बैठक में उन्होंने कहा, 'एससीओ सदस्यों के रूप में, हम अधिक समन्वय की दिशा में काम कर सकते हैं और शांति और स्थिरता की ओर बढ़ सकते हैं।'
रक्षा मंत्री ने कहा कि एक युवा और गतिशील भारत, जिसकी अर्थव्यवस्था प्रति वर्ष 7-8 फीसदी बढ़ रही है, सहयोग के नए चरण में प्रवेश करने के लिए एससीओ में शामिल हो जाती है। मैं सभी को भारत के साथ शांति और साझा समृद्धि की साझेदारी के लिए सक्रिय रूप से काम करने के लिए आमंत्रित करता हूं। बीजिंग में एससीओ के मुख्यालय की स्थापना 2001 में हुई थी।
एससीओ का उद्देश्य सदस्य राज्यों चीन, रूस, कज़ाखस्तान, उजबेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य सहयोग करना है और इसमें खुफिया साझाकरण, मध्य एशिया में आतंकवाद विरोधी अभियान और साइबर आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त कार्य शामिल है।
पिछले साल भारत और पाकिस्तान को उस संगठन में भर्ती कराया गया था जिसमें चीन एक प्रभावशाली भूमिका निभाता है।
सीतारमण ने कहा कि भारत इस वर्ष के अंत में रूस में एससीओ के शांति मिशन संयुक्त सैन्य अभ्यास में दृढ़ता से भाग लेगा।
उन्होंने कहा कि हम मानते हैं कि एससीओ ढांचे में सहयोग से इस क्षेत्र में भारत के द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को और मजबूत करने में मदद मिलेगी।

 


नई दिल्‍ली - जर्मनी में म्यूनस्टर की घटना को अभी दो सप्‍ताह से कुछ ही ज्यादा दिन हुए हैं कि उस तरह की एक और घटना ने हमें फिर इस तरफ सोचने को मजबूर कर दिया है। इस बार कनाडा का टोरंटो इस तरह की घटना की गवाही दे रहा है। सोमवार दोपहर करीब ढाई बजे योंग स्‍ट्रीट पर एक बेकाबू ट्रक ने करीब दो दर्जन लोगों को कुचल दिया। इस घटना में अब तक 10 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 15 अन्‍य घायल बताए जा रहे हैं। फिलहाल पुलिस ने ट्रक ड्राइवर को भी गिरफ्तार कर लिया है। स्‍थानीय पुलिस इस घटना की जांच कई पहलुओं पर कर रही है। हालांकि इसको एक आतंकी घटना मानने से पुलिस ने अभी तक इंकार नहीं किया है।
आरोपी ने अपने पास बंदूक होने का किया दावा
पुलिस ने संधिग्‍ध आरोपी का खुलासा करते हुए उसका नाम ऐलेक मिनासेन बताया है। उसकी उम्र 25 वर्ष बताई गई है। इस घटना का एक वीडियो भी सामने आया है जिसमें संदिग्‍ध पुलिस पर जोर-जोर से चिल्‍ला कर कह रहा है कि ‘KILL ME’। इसके बाद बाद पुलिस की तरफ से उसको लगातार हाथ पीछे कर नीचे बैठने के लिए कहा जाता रहा। वहीं आरोपी ने कहा कि उसके पास में बंदूक है। हालांकि आरोपी पर काबू पाने के लिए पुलिस को कोई गोली नहीं चलानी पड़ी और उसपर काबू पा लिया गया। पुलिस आरोपी को मंगलवार स्‍थानीय समयानुसार दस बजे कोर्ट में पेश करेगी।
पहले भी हो चुकी हैं इस तरह की घटनाएं
जर्मनी
बहरहाल, कनाडा में इस तरह की भले ही से पहली घटना हो लेकिन यूरोप के कई देशों में इस तरह की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। पूर्व की इन घटनाओं के पीछे किसी न किसी आतंकी संगठन का भी हाथ रहा है। लिहाजा पूर्व की इन घटनाओं को आतंकी हमले करार दिया गया था। म्‍यूनस्‍टर की घटना भी इन्‍हीं में से एक थी। 8 अप्रैल 2018 को हुए इस हमले में चार लोगों की मौत हो गई थी जबकि तीस लोग घायल हो गए थे। यहां पर भी हमलावर ने एक वैन को हथियार बनाया था। हमले को अंजाम देने के बाद वैन में सवार हमलावर ने भी खुद की भी गोली मारकर आत्‍महत्‍या कर ली। यह घटना जर्मनी के राज्य नॉर्थराइन वेस्टफेलिया के पुराने शहर म्यूनस्टर में घटी थी। आपको बता दें कि म्‍यूनस्‍टर सैलानियों का पसंदीदा शहर है। जर्मनी आने वाले सैलानी एक बार इस खूबसूरत शहर को देखने के लिए काफी संख्‍या में यहां का रुख करते हैं। जिस वक्‍त यह हमला किया गया उस वक्‍त वहां स्थित ओपन रेस्‍त्रां ग्रासर केंपनकर्ल में काफी भीड़ थी। लोग अपने खाने और ड्रिंक का लुत्‍फ उठा रहे थे। इतने में ही एक तेज गति से आते ट्रक ने वहां की खुशियों को मातम में बदल दिया।
19 दिसंबर 2016 को भी एक तेज गति से आते ट्रक ने कई लोगों को बेरहमी से कुचल डाला था। इस हमले में 12 लोगों की मौत हो गई थी जबकि 50 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस हमले को अंजाम देने के लिए हमलावर ने क्रिसमस मार्किट को चुना था, जहां उस वक्‍त काफी भीड़ थी।
फ्रांस
22 दिसंबर 2014 को फ्रांस के नांतेस शहर और 14 जुलाई 2016 को फ्रांस के ही एक अन्‍य शहर नीस में आतंकी ने हमले को अंजाम दिया था। नीस हमले में करीब 86 लोगों की मौत हुई थी जबकि 400 के करीब लोग घायल हुए थे। वहीं नांतेस में दस लोगों की मौत हो गई थी। इसके अलावा 7 अप्रैल 2017 को स्टॉकहोम में भारतीय दूतावास के निकट भीड़ को रौंदते हुए एक ट्रक डिपार्टमेंटल स्टोर में जा घुसा था। इस हमले में पांच लोग मारे गए थे और 15 लोग घायल हो गए थे।
9 अगस्‍त 2017 को पेरिस में एक व्यक्ति ने कुछ सैनिकों को बीएमडब्ल्यू गाड़ी से कुचल दिया था। इसमें छह लोग घायल हो गए थे।
ब्रिटेन
3 जून 2017 को लंदन में तीन जिहादियों ने लंदन ब्रिज पर मौजूद लोगों को तेज रफ्तार वैन से कुचल दिया था। इसके बाद उन्‍होंने लोगों पर चाकू से भी हमला किया था। इसके बाद जून में भी फिंसबरी पार्क में भी इसी तरह की घटना हुई थी।
वहीं 22 मार्च 2017 को वेस्टमिंस्टर पुल पर एक व्यक्ति ने लोगों पर कार चढ़ा दी थी। इसमें पांच लोगों की मौत हो गई थी। इसके पहले 22 मई को मैनचेस्टर में एरियाना ग्रैंड के एक प्रोग्राम में सुसाइड बंबर ने 22 लोगों की हत्या कर दी थी।
अमेरिका
12 अगस्त 2017 को वर्जीनिया के चार्ल्ट्सविले में विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों पर गाड़ी दौड़ा दी थी। जेम्स फ़ील्ड्स नामक एक व्यक्ति को इसका ज़िम्मेदार बताया गया।
26 अक्‍टूबर 2015 को अमेरिका में एक महिला ने ओकलाहोमा यूनिवर्सिटी की होमकमिंग परेड के दौरान भीड़ पर कार चढ़ा दी, जिसमें एक भारतीय एमबीए छात्रा सहित चार लोगों की मौत हो गई और 47 अन्य लोग घायल हो गए। संदेह है कि महिला शराब पीकर गाड़ी चला रही थी।
फिर करना होगा विचार
इस हमले ने एक बार फिर से दुनिया को आतंकवाद से बचाव और उनके हमला करने के तरीकों पर दोबारा विचार करने को बाध्‍य कर दिया है। भले ही यह कोई आतंकी घटना न हो लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यूरोप के कई देश जिसमें ब्रसेल्‍स और ब्रिटेन भी शामिल हैं इस तरह के हमलों की मार झेल चुका है। लिहाजा अब दु‍निया के देशों को इस ओर सोचने की बेहद जरूरत है कि वह अपने यहां भीड़-भाड़ वाले इलाकों, सड़कों या शहरों में इस तरह के वाहनों की आवाजाही को सुनिश्चित करें या उनको रोक दें। आपको बता दें कि आतंकियों के लिए भीड़-भाड़ वाले इलाके बेहद आसान निशाना हुआ करते हैं। इसमें भी यदि हमला किसी वाहन से किया जाना हो तो इसको वक्‍त रहते भांप लेना भी काफी मुश्किल होता है। ऐसे में सावधान रहने की बेहद जरूरत है।

 


नई दिल्ली - आर्कटिक सागर की बर्फ में कई जगह बड़े छिद्र पाए गए हैं, जिसे लेकर नासा ने काफी चिंता व्यक्त की है। मजेदार बात यह है कि इस बारे में नासा किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका है। आमतौर पर आर्कटिक सागर में इन दिनों तापमान काफी नीचे रहता है, लेकिन वहां की बर्फ में मिले इस तरह के पैटर्न के बारे में नासा के हाथ फिलहाल खाली हैं। यह बात इसलिए भी अजीब लगती है क्‍योंकि नासा भविष्‍य में चांद और मंगल ग्रह पर ले जाने और वहां इंसानी बस्‍ती बसाने का दावा करती रहती है।
आर्टिक और अंटार्कटिक क्षेत्र
नासा पिछले एक दशक से पृथ्वी के अहम हिस्से आर्टिक और अंटार्कटिक क्षेत्र में नजर बनाए हुए है। नासा के मुताबिक वो इस बात का अध्ययन कर रहा है कि विश्व के क्लाइमेट चेंज का इस पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। क्लाइमेट चेंज का इन क्षेत्र पर असर जानने के लिए नासा काफी समय से यहां शोध कर रहा है। इस मिशन को जेम्स बांड के नावेल ऑपरेशन आइसब्रिज नाम दिया गया है।
छह महीने तक शोध
नासा ने यहां पर छह महीने तक शोध किया, जिसके तहत दोनों तरफ बर्फ से आच्छादित गोलार्धों का अध्ययन किया गया। इस शोध में कई तरह के संवेदनशील और नए तरह के वैज्ञानिक यंत्रों का प्रयोग किया गया। इलमें लेजर अल्टीमीटर, प्लेन आधारित लिडार और नासा के सैटेलाइट को शामिल किया गया।
नासा के हाथ खाली
इन सबके बावजूद नासा के वैज्ञानिक की ओर से हिम छिद्रों को लेकर कोई जानकारी न होने की बात सामने आई है। आइसब्रिज मिशन में शामिल जॉन सैन्टैंग के मुताबिक हमने बर्फ में इन गोलाकार छिद्रों को देखा। इन छिद्रों की तस्वीर लेने वाले वैज्ञानिक के मुताबिक उन्हें याद नहीं है कि उन्होंने कभी इस तरह के हिम छिद्र पहले कभी देखे हों।
तीन अमीबा आकार के छिद्र
इन तस्वीरों में देखा गया कि पतली बर्फ की एक विशाल शीट पर तीन अमीबा आकार के छिद्र हैं। नासा की ओर से इस तस्वीर को अंतरिक्ष के जानकार लोगों के बीच रखा गया। उनकी ओर से एक अप्रैल 2018 के प्रत्येक माह होने वाली प्रतियोगिता में रहस्यमयी छिद्र वाली एक फोटो पोस्ट की गई, जिसमें सभी दर्शकों से इस छिद्र वाली फोटो के बारे में पूछा गया।
नासा के पोस्ट पर लोगों के जवाब
नासा के पोस्ट पर कुछ लोगों के जवाब आए, उनके मुताबिक इस तरह के छिद्र उल्कापिंडों के अवशेष हो सकते हैं या फिर सूखी नमक की झीलें हो सकती हैं। किसी ने एलियन तो किसी ने कुछ और बताया, जबकि एक व्यक्ति ने कहा कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने बाहरी अंतरिक्ष की एक तस्वीर पोस्ट की है। सैन्टोंग ने ये फोटो 14 अप्रैल को पोस्ट की, जब वो ऑपरेशन आइसब्रिज के तहत पी-3 रिसर्च प्लेस से ब्यूफोर्ट सागर के ऊपर से उड़ान भर रहे थे। वैज्ञानिक इस शोध कार्य में वर्ष 2013 से लगे हैं।
ऐसा भी हो सकता है
नासा के गॉडर्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के ग्लैसियोलॉजिसट क्रिस शुमन ने नासा को बताया कि ये छिद्र प्राकृतिक भी हो सकते है, जैसे कि बर्फ में मोजूद गर्म पार्टिकल की वजह से वहां के आसपास की बर्फ पिघल रही हो, जिसकी वजह से इस तरह के छिद्र बन जाते हों। इसके अलावा ये मुलायम बर्फ में हवा से बने होल हो सकते हैं। यहां की बर्फ आसानी से टूट रही हो। ऐसा भी हो सकता है। नेशनल स्नो एडं आइस डाटा सेंटर के वैज्ञानिक वाल्ट मियर ने नासा से कहा कि ये वृत्ताकार छिद्र जैसी आकृति पानी की तरंगों की वजह से भी हो सकती है। जो कि हिम खंडों से टकराने पर बनती है।
इस तस्वीर से वाकिफ
वाजिब है कि सैन्टोग और उसका कैसरा इस तस्वीर से वाकिफ हो, क्योंकि उसने बहुत सारी बर्फ की फोटोग्राफी की है। वो लंबे समय से नासा के साथ डेवलेपमेंट वैज्ञानिक के तौर पर जुड़े रहे हैं और मौजूदा वक्त में ऑपरेशन आइसब्रिज में काम कर रहे हैं। ये वहीं है, जिसने दुनिया को हिमस्खलन के बारे में काफी जानकारी दी है। इस तरह उसने बहुत सारी बर्फ देखी है और उनकी तस्वीर ली है, जो कि पहले कभी नहीं ली गई।

 


बैंकॉक - थाइलैंड ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के बीच अगले महीने होने वाली बैठक की मेजबानी की इच्छा जताई है। थाइलैंड के विदेश मंत्री डॉन प्रमुदविनाई ने मंगलवार को यहां कहा कि थाइलैंड इस बैठक की मेजबानी के लिए तैयार है।
उन्होंने हालांकि स्पष्ट किया कि इस संबंध में थाइलैंड से अभी किसी ने संपर्क नहीं किया है। अमेरिकी दूतावास ने भी इस पर टिप्पणी करने से इन्कार कर दिया है।
ट्रंप ने इस महीने की शुरुआत में कहा था कि इस बैठक के लिए पांच स्थानों पर मंथन चल रहा है। उन्होंने हालांकि इन जगहों के नाम नहीं बताए थे। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह बैठक मंगोलिया, सिंगापुर या स्कैंडेनेविया में हो सकती है।
थाइलैंड के उप प्रधानमंत्री इन दिनों अमेरिका की यात्रा पर हैं। वह अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस से मुलाकात कर चुके हैं। अमेरिका के अहम सहयोगी थाइलैंड के उत्तर कोरिया के साथ भी कूटनीतिक संबंध हैं।


काठमांडू - भारत और नेपाल के अधिकारियों ने पारगमन संधि में संशोधन को लेकर चर्चा शुरू कर दी है। इसके तहत नेपाल को भारतीय जलमार्ग के जरिये पारगमन की सुविधा दी जाएगी।
न्यूज एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, मंगलवार को यहां अंतर सरकारी समिति के तहत उप समिति स्तर की बैठक शुरू हुई। वाणिज्य सचिव स्तर की बातचीत गुरुवार से शुरू होगी। उद्योग, वाणिज्य और आपूर्ति मंत्रालय में संयुक्त सचिव रवि शंकर सैंजू ने बताया कि दोनों देश इस मसले को पारगमन संधि में शामिल करने की तकनीकियों पर विचार कर रहे हैं। दोनों पक्ष पारगमन सुविधा के रूप में जलमार्ग को शामिल करने पर पहली बार चर्चा कर रहे हैं।
जल एवं ऊर्जा आयोग में संयुक्त सचिव माधव बेलबेस के मुताबिक, भारत और नेपाल को प्रक्रिया पूरी करने के लिए संयुक्त अध्ययन दल का गठन करना होगा।
गौरतलब है कि नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के अप्रैल की शुरुआत में भारत दौरे के समय दोनों देशों ने अंतरदेशीय जलमार्ग के जरिये नई कनेक्टिविटी को लेकर संयुक्त बयान जारी किया था। इससे जलमार्ग के जरिये नेपाल के समुद्र तक पहुंचने का दरवाजा खुल जाएगा।


बीजिंग - दक्षिणी चीन में मंगलवार को कम से कम 18 लोगों की मौत हो गई। स्‍थानीय मीडिया द्वारा ये जानकारी मिली है। चीन की राष्‍ट्रीय एजेंसी शिन्‍हुआ के अनुसार गुआंगडोंग प्रांत के किंगुयान सिटी में आग लगी। पुलिस और फायर ब्रिगेड ने घटना की जानकारी मिलने के कुछ ही देर बाद आग पर काबू पा लिया।
किंगुयान सुरक्षा विभाग की शुरूआती जांच में हादसे के पीछे आगजनी की बात सामने आई है। इससे पहले 2015 में सरकारी कर्मचारियों की लापरवाही के चलते एक नर्सिंग होम में आग लग गई थी। इसमें 38 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना में 21 दोषियों को जेल की सजा दी गई थी।


नई दिल्ली - बीते वित्त वर्ष 2017-18 की चौथी तिमाही में देश की प्रमुख टेलिकॉम कंपनी भारती एयरटेल के कंसोलिडेटिट नेट प्रॉफिट में साल दर साल के आधार पर 77.79 फीसद की गिरावट दर्ज की गई है। यह मुनाफा 83 करोड़ रुपए के स्तर पर रहा है। बीते वर्ष की समान अवधि में कंपनी ने 373.40 करोड़ रुपये का नुकसान दर्ज किया। वहीं पिछली दिसंबर 2017 की तिमाही में कंपनी को 305 करोड़ रुपये का प्रोफिट हुआ था।
कंपनी के अगर साल दर साल के आदार पर कंसोलिडेटिड रेवेन्यू की बात करें तो 10.48 फीसद की कमजोरी के साथ यह 19,634.30 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया है। वहीं बीते वर्ष की समान अवधि में यह आंकड़ा 21934.60 करोड़ के स्तर पर रहा है।
कंपनी के स्टैंडअलोन नेट लॉस की बात करें तो यह 760.20 करोड़ रुपये रहा है जोकि वित्त वर्ष 2017 की चौथी मिताही में 12,176.20 करोड़ रुपये रहा था। कंपनी का एआरपीयू साल दर साल के आधार पर 26.60 फीसद घटकर 116 रुपये के स्तर पर आ गया है। वहीं बीते वर्ष की समान अवधि में यह 158 रुपये के सत्र पर रहा था।
भारती एयरटेल क्या रहा बंद स्तर
बीएसई पर भारती एयरटेल 0.61 फीसद की बढ़त के साछ 406.10 के स्तर पर कारोबार कर बंद हुआ है। इसका दिन का उच्चतम 408.50 और निम्नतम 396 का स्तर रहा है। वहीं 52 हफ्तों का उच्चतम 565 और निम्नतम 336.95 का स्तर रहा है।


नई दिल्ली - करीब 1800 से ज्यादा एंटिटीज ने बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की ओर से लगाए गये जुर्माने का भुगतान नहीं कर पाईं। नियमों के उल्लंघन के चलते पिछले महीने सेबी ने इनपर जुर्माना लगाया था। इसके डिफॉल्टर की सूची में इंडिविजुअल और कंपनियां दोनों शामिल हैं जो सिक्योरिटीज मार्केट से संबंधित कई अपराधों के चलते जुर्माने का भुगतान करने में विफल रहीं। इनमें से कुछ मामले तो करीब दो दशक पुराने हैं।
ये उल्लंघन अनरजिस्टर्ड पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सेवाओं से संबंधित थी। यह निवेशकों की शिकायतों का निवारण करने में विफल, निवेशकों से अनाधिकृत तरीके से पैसे लेने जैसे मामलों शामिल हैं। हालांकि कुछ बकाया महज 15000 रुपये ही है, वहीं, कुछ कि बकाया राशि तो लाख और करोड़ तक है। कुछ बकाया तो वर्ष 1998 से लंबित हैं और अधिकांश कोर्ट और अन्य फोरम में हैं।
31 मार्च, 2017 तक सेबी ओर से लगाए गये जुर्माने का भुगतान करने में विफल रहे कुल डिफॉल्टर्स की संख्या 1847 के स्तर पर रही है। यह सेबी की ओर से जारी किये गये डेटा के अनुसार है।
इन डिफॉल्टर्स में अनिरूद्ध सेठी, पीएसीएल और उसके दो निदेशकों, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, एचबीएन डेयरीज एंड एलायड, प्लेथिको फार्मास्युटिकल्स, आईएचआई डेवलपर्स इंडिया, आईएफसीआई, रोज वैली रीयल एस्टेट और कंस्ट्रक्शंस और बीटल लाइवस्टाक्स एंड फार्म शामिल हैं। सेबी बकाये की रिकवरी के लिए बैंक के साथ-साथ डिमैट एकाउंट को अटैच करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल कर रहा है।


नई दिल्‍ली - कोरियाई प्रायद्वीप के दोनों देशों के बीच 26 अप्रैल को वर्षों बाद पहला शिखर सम्‍मेलन होने वाला है। इसमें उत्तर कोरिया की तरफ से किम जोंग उन हिस्‍सा लेंगे तो दक्षिण कोरिया की तरफ से वहां के राष्‍ट्रपति मून जे इसमें शामिल होंगे। इसके बाद मई में किम की अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप से भी वार्ता होनी है। इन दोनों बैठकों पर पूरी दु‍निया की नजर है। लेकिन इसमें सबसे ज्‍यादा दिलचस्‍पी यदि किसी देश की है तो वो चीन है। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि इस मुद्दे के हल से सबसे ज्यादा फायदा चीन को ही होने वाला है।
चीन से 90 फीसद कारोबार
आपको बता दें कि उत्तर कोरिया का 90 फीसद कारोबार चीन से होता है। चीन ही उसको कई जरूरी चीजों की आपूर्ति करता है चाहे वो तेल हो या फिर कोयला या अन्‍य दूसरी चीजें। इस लिहाज से उत्तर कोरिया में दिन के साथ शुरू होने वाली दिनचर्या का चीन एक अहम हिस्‍सा है। पिछले दिनों जब उत्तर कोरिया को लेकर तनाव चरम पर था और संयुक्‍त राष्‍ट्र ने उसके खिलाफ प्रतिबंध और कड़े कर दिए थे उस वक्‍त भी चीन ने गलत तरीके से ही सही लेकिन कोयला समेत दूसरी चीजों की आपूर्ति उसको की थी। इसका खुलासा पहले जापान ने किया था बाद में अमेरिका ने भी इस तरह का बयान दिया था कि यूएन के लगाए प्रतिबंधों के बावजूद चीन उसकी मदद कर रहा है।
उत्तर कोरिया के लिए चीन अहम
उस वक्‍त विदेश मामलों के जानकारों ने एक बात साफ कर दी थी कि यदि चीन चाहेगा तभी उत्तर कोरिया बातचीत के लिए आगे आएगा। मौजूदा समय में उत्तर कोरिया दक्षिण कोरिया और अमेरिका से वार्ता के लिए राजी हो चुका है। ऐसे में चीन की दिलचस्‍पी इसमें बढ़ गई है। इसकी कुछ वजह काफी अहम है। चीन के सरकारी अखबार ग्‍लोबल टाइम्‍स ने इसको लेकर कुछ बातें कहीं हैं। अखबार ने जहां उत्तर कोरिया के बदले नजरिए का पूरी दुनिया से स्‍वागत करने की अपील की है, वहीं उसने कहा है कि यदि इस मुद्दे का हल निकल गया और कोई समझौता हो सका, तो यह कोरियाई प्रायद्वीप समेत चीन के लिए भी काफी फायदेमंद होगा।
स्‍पेशल इकनॉमिक जोन
इसमें कहा गया है कि शांति की राह पर अग्रसर उत्तर कोरिया यदि चाहेगा तो दक्षिण और चीन के साथ मिलकर एक विशेष आर्थिक जोन बनाकर विकास की राह पर आगे जा सकेगा। आपको यहां पर ये भी बता दें कि रूस और चीन से मिलती सीमा पर उत्तर कोरिया ने एक स्पेशल इकनॉमिक जोन पहले से ही बना रखा है। चीन की तर्ज पर इसको वर्ष 1992 में बनाया गया था। यहां पर ज्यादातर कंपनियां चीन या रूस की हैं। इसके अलावा हाल ही में यहां पर मंगोलिया ने भी अपना खाता खोला है। आपको यहां पर ये भी बता दें कि चीन और उत्तर कोरिया के बीच वर्षों से संबंध रहे हैं। इन संबंधों की मजबूती इस बात से भी जाहिर होती है कि पिछले माह उत्तर कोरिया के प्रमुख किम जोंग उन ने अपनी पहले विदेश यात्रा भी बीजिंग की ही की थी। यह इस बात को बताने के लिए काफी है कि उनके लिए चीन क्‍या मायने रखता है।
चीन की भावी रणनीति का हिस्‍सा
स्‍पेशल इकनॉमिक जोन बनाने की बात कर चीन ने कहीं न कहीं उत्तर को‍रिया को लेकर अपनी भावी रणनीति भी साफ कर दी है। यूं भी स्‍पेशल इकनॉमिक जोन बनाकर वह उत्तर कोरिया में वही दांव खेलना चाहता है जो अब तक दूसरे देशों में खेलता आया है। यहां पर एक चीज और ध्‍यान में रखनी जरूरी हो जाती है कि अभी तक चीन भारत के पड़ोसी देशों को अपनी कर और आर्थिक ढांचे में सुधार करने की बात कर अपनी गिरफ्त में ले रहा था, लेकिन अब उत्तर कोरिया भी कहीं न कहीं उसकी निगाह में आ गया है।
परमाणु रिएक्‍टर में चीन का हाथ
आपको यहां पर ये भी बता दें कि उत्तर कोरिया में मौजूद परमाणु रिएक्‍टरों को लगाने में भी चीन का योगदान रहा है। उत्तर कोरिया में इसको करने में दूसरा साझेदार रूस बना था। हालांकि यह काम कहीं न कहीं अवैध रूप से किया गया था। अवैध इसलिए क्‍योंकि उस वक्‍त भी उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगे हुए थे। लिहाजा यहां पर परमाणु रिएक्‍टर लगाने, इसकी तकनीक और इसको लेकर वहां के लोगों को शिक्षित करने का काम भी इन्‍हीं दोनों के सहयोग से किया गया था।
उत्तर कोरिया का सम्‍मान नहीं कर रहे कुछ देश
जहां तक चीनी मीडिया की बात है तो उसका मानना है कि अमेरिका और कुछ दूसरे देश उत्तर कोरिया द्वारा की गई घोषणा का सम्‍मान नहीं कर रहे हैं। इसकी वजह जरूरत से ज्‍यादा दबाव बताया जा रहा है। ग्‍लोबल टाइम्‍स का कहना है कि उत्तर कोरिया के पास मौजूदा समय में दस हजार से अधिक दूरी तक मार करने वाली मिसाइल है। अखबार का यह भी कहना है कि यदि अमेरिका जबरदस्‍ती या दबाव देकर उत्तर कोरिया से अपनी परमाणु हथियार नष्‍ट करने की बात करेगा तो यह न तो चीन स्‍वीकार करेगा और न ही दक्षिण कोरिया को यह मंजूर होगा। अखबार ने इस तरह के किसी भी कदम को विनाषकारी बताया है।
चीन की अहम भूमिका
चीन की तरफ से बार-बार यह बात कही जाती रही है कि उत्तर कोरिया को लेकर वह काफी अहम भूमिका निभा सकता है। चीन यह भी मान रहा है कि वह दुनिया में उत्तर कोरिया की छवि को सुधारने में भी सहायक हो सकता है। गौरतलब है कि अमेरिका में दो ग्रुप काम करते हैं। एक ग्रुप चाहता है कि अमेरिका को उत्तर कोरिया को लुभाने का काम करना चाहिए। चीन की जिलिन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर झांग हूझी मानते हैं कि दुनिया को उत्तर कोरिया की कही बातों पर विश्‍वास करते हुए ओग बढ़ना चाहिए। उत्तर कोरिया ने दो दिन पहले ही एक प्रस्‍ताव पास कर अपनी बदली रणनीति को सभी के सामने रखा है। इसके तहत दुनिया के सा‍थ मिलकर चलने और बेहतर माहौल बनाने की भी बात कही गई है।
उत्तर कोरिया की सस्‍ती मजदूरी
झांग का ये भी कहना है कि किम जोंग उन के सत्‍ता में आने के बाद उत्तर कोरिया ने काफी तरक्‍की की है। लेकिन इस विकास की गति को अंतरराष्‍ट्रीय प्रतिबंधों ने रोकने का काम किया है। उन्‍होंने उन बातों की तरफ भी इशारा किया है जो चीन की भावी मंशा में प्रकट किए गए हैं। झांग का कहना है उत्तर कोरिया के सस्‍ते मजदूरों का फायदा पूरी दुनिया को मिल सकता है। इसके अलावा उसकी भौगोलिक स्थिति और विदेशी निवेश का भी फायदा उठाया जा सकता है।


नई दिल्‍ली - अमेरिका के सामने उत्तर कोरिया ने जहां मुश्किलें कम करने का काम किया है वहीं ईरान अब भी उसके लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का अहम कारण दोनों देशों के बीच 2015 में हुआ परमाणु करार है, जिससे अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप पीछे हटने की बात कर चुके हैं। ट्रंप ने इस करार को न सिर्फ गलत बताया है बल्कि इसके लिए पूर्व राष्‍ट्रपति को भी आड़े हाथों लिया है। उन्‍होंने इसको दुनिया के कुछ सबसे खराब समझौतों में से एक बताया है। ट्रंप ने इसके लिए 12 मई का दिन भी नि‍धार्रित कर लिया है। वहीं दूसरी तरफ ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा है कि परमाणु समझौते से अमेरिका के हटने का जवाब दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि ईरान की परमाणु एजेंसी इसके लिए अपेक्षित और अप्रत्याशित कदम उठाने के लिए पूरी तरह तैयार है। रूहानी ने सरकारी टेलीविजन पर दिए भाषण में यह बात कही। हालांकि उन्होंने इस संबंध में की जाने वाली कार्रवाई का कोई ब्योरा नहीं दिया है।
अस्थिरता को रोकने की कोशिश
इस भाषण में रुहानी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अगले महीने समझौते से अलग होने के संभावित फैसले का जिक्र किया। रूहानी ने कहा कि उनकी सरकार अमेरिका के समझौते से हटने के बाद विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता को रोकना चाहती है। इसीलिए ईरान के केंद्रीय बैंक ने इस महीने बाजार पर नियंत्रण लगा दिया। आपको बता दें कि इसी वर्ष जनवरी में ट्रंप ने ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी से अमेरिका द्वारा समझौते में पाई गड़बड़ियों पर सहमति जताने को कहा था। इसके अलावा दो दिन पहले ही अमेरिका के निरस्त्रीकरण राजदूत रॉबर्ट वुड ने कहा था कि अमेरिका समझौते से हटने की 12 मई की समय सीमा को लेकर यूरोपीय सहयोगियों से गहन चर्चा कर रहा है, जबकि ईरान का कहना है कि जब तक अन्य पक्ष समझौते का सम्मान करेंगे, वह इससे जुड़ा रहेगा। लेकिन अमेरिका के हटने पर वह समझौते को तोड़ देगा।
परमाणु संवर्धन दोबारा शुरू करने की धमकी
ईरान ने अमेरिका के परमाणु समझौते से हटने पर पूरे जोर से परमाणु संवर्धन दोबारा शुरू करने की धमकी दी है। साथ ही कहा है कि अमेरिका को जवाब देने के लिए अन्य सख्त कदम उठाने पर भी विचार किया जा रहा है। ईरान के विदेश मंत्री मुहम्मद जावेद जरीफ ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि ईरान परमाणु बम हासिल करना नहीं चाहता है, लेकिन अमेरिका के समझौते से हटने के जवाब में ईरान संवर्धित यूरेनियम का उत्पादन फिर शुरू कर देगा। संवर्धित यूरेनियम परमाणु बम बनाने में इस्तेमाल होता है। उन्होंने कहा कि ईरान के परमाणु बम बनाने को लेकर अमेरिका को भयभीत नहीं होना चाहिए, लेकिन हम जोरशोर से परमाणु संवर्धन करेंगे। गौरतलब है कि इस मामले को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है।
इससे पहले ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा था कि समझौते से हटने को लेकर अमेरिका माफी मांगे और अगर ऐसा हुआ तो ईरान एक हफ्ते के भीतर इसका जवाब देगा। सोमवार को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और शुक्रवार को जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल की अमेरिका यात्रा के दौरान 2015 के परमाणु समझौते का भविष्य तय होगा। जरीफ ने कहा कि यूरोपीय नेताओं को ट्रंप को समझौते पर कायम रहने के लिए दबाव बनाना चाहिए। ईरान से और ज्यादा मांग करने के बजाय ट्रंप समझौते का पालन करें। उन्होंने ट्रंप को किसी भी तरह की छूट देने से इन्कार किया।
उत्तर कोरिया ने किया ईरान का बचाव
कुछ दिन पहले ही उत्तर कोरिया ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम का बचाव करते हुए इसको सही बताया था। तीन दिन पहले ही उत्तर कोरिया के अखबार रोडोंग सिनमुन ने लिखा था कि ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार बनाने और रखने का पूरा हक है। वह अमेरिका से हुई डील को मानने के लिए बाध्‍य नहीं है। अखबार में यह भी कहा गया कि ईरान की सरकार को इस मुद्दे पर अपनी जनता का पूरा समर्थन हासिल है। अखबार में इससे पीछे हटने के लिए ट्रंप की जमकर आलोचना भी की थी। अखबार ने अमेरिका की यह कहते हुए आलोचना की थी कि पहले वह कहते थे कि उत्तर कोरिया को ईरान से सबक लेना चाहिए और अब वही करार से पीछे हट रहे हैं। इसके साथ ही उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु कार्यक्रम का भी बचाव करते हुए कहा कि उत्तर कोरिया ने इस बाबत किसी की न तो कोई बात सुनी और न ही किसी से डरा। यही वजह है कि उसने अपना परमाणु कार्यक्रम सफलता प्राप्‍त होने तक जारी रखा।
ट्रंप और मैक्रों में बातचीत
आपको यहां पर ये भी बता दें कि ईरान के साथ हुई परमाणु डील में शामिल फ्रांस भी इससे पीछे हटने की बात पर ट्रंप की आलोचना कर चुका है। यहां पर ये बताना भी जरूरी होगा कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों सोमवार को तीन दिवसीय दौरे पर अमेरिका जा रहे हैं। इस दौरान उनकी और ट्रंप के बीच होने वाली वार्ता में ईरान का मुद्दा भी शीर्ष पर होगा। इसके अलावा सीरिया के मुद्दे पर भी दोनों नेताओं में बात होगी। सीरिया के मुद्दे पर भी ईरान और अमेरिका के बीच तनाव है। वहीं दूसरी तरफ इस मुद्दे पर फ्रांस अमेरिका के साथ है। वहीं रूस ने भी कहा है कि सभी को इस डील का सम्‍मान करना चाहिए। हालांकि रूस पहले ये भी कह चुका है कि अमेरिका हमेशा से ही इस तरह की चीजें करता रहा है। वह कोई भी डील को पूरा नहीं करता और बीच में साथ छोड़ देता है।
केंद्र में होगा ईरान का मुद्दा
यहां पर एक और बात ध्‍यान रखने वाली है और वो ये है कि ट्रंप ने इस संधि से हटने के लिए 12 मई की तारीख तय की है। हालांकि अमेरिकी अधिकारी का मानना है कि ट्रंप अभी इस बारे में अंतिम फैसला लेने के लिए तैयार नहीं हैं, लेकिन यह तय है कि मैक्रों के साथ बातचीत के केंद्र में नाभिकीय समझौता भी होगा। अधिकारी ने कहा, यह कहना कठिन है कि ट्रंप और मैक्रों के बीच इस मामले में किस स्तर की बातचीत होगी, लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि दोनों नेता इस कदम के संभावित असर के बारे में गहराई से चर्चा करेंगे। ट्रंप का मानना है कि ईरान ने इस समझौते के अनुसार अपने नाभिकीय कार्यक्रम में कटौती नहीं की है।
2015 में हुआ था समझौता
गौरतलब है कि ईरान, जर्मनी और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्यों - ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, रूस और अमेरिका के बीच जुलाई 2015 में जेसीपीओए समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत ईरान आर्थिक मदद और खुद पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाने की एवज में अपने परमाणु हथियार कार्यक्रमों को रोकने पर सहमत हुआ था। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अक्टूबर 2017 में इस समझौते को रद करने का आह्वान किया था और ईरान पर समझौते का कई बार उल्लंघन करने का आरोप लगाया था। हालांकि ईरान ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था। ईरान ने साफ किया है कि वह समझौते में कोई परिवर्तन स्वीकार नहीं करेगा।

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