Editor

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मुंबई - संजय लीला भंसाली निर्देशित फिल्म पद्मावत इस साल 25 जनवरी को रिलीज़ हुई थी। फिल्म विवादों रही थी लेकिन आखिरकार दर्शकों को पसंद आई थी। अब फिल्म को लेकर नई खबर आ रही है कि 21वें शंघाई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में पद्मावत की स्क्रीनिंग होगी।
फिल्म पद्मावत इस साल की ही नहीं बल्कि सिनेमा जगत की अभी तक की सबसे विवादित और बहु चर्चित फिल्म की सूची में शुमार है। फिल्म को लेकर राजपूत संगठनों के विरोध के कारण फिल्म की रिलीज़ कई बार टली थी। आखिरकार विवाद थमा और फिल्म दर्शकों के सामने आई थी। दर्शकों ने भी फिल्म को अच्छे रूप में स्वीकार किया था। फिल्म को लेकर अच्छी खबर यह आ रही है कि, 21वें शंघाई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में संजय लीला भंसाली निर्देशित फिल्म पद्मावत की स्क्रीनिंग होगी। जानकारी के मुताबिक फेस्टिवल के नॉन कॉम्पीटीटिव सेक्शन में फोकस इंडिया के तहत पद्मावत को शामिल किया गया है। फेस्ट 16 जून से शुरू हो चुका है जो कि 25 जून तक चलेगा।
पद्मावत एक पीरियड ड्रामा फिल्म थी जिसने वर्ल्डवाइड 585 करोड़ से ज्यादा की कमाई की थी। आपको बता दें कि फिल्म पद्मवात में रणवीर सिंह ने नेगेटिव रोल किया था। रणवीर ने अलाउद्दीन खिलजी का किरदार निभाया था। फिल्म में दीपिका पादुकोण ने पद्मावती और शाहिद कपूर ने महारावल रतन सिंह की भूमिका अदा की थी। इस फिल्म को लेकर रणवीर सिंह के अभिनय की बहुत सराहना की गई थी। दर्शकों से लेकर बॉलीवुड सितारों को रणवीर का यह किरदार और अभिनय पसंद आया था। हमने आपको बताया था कि, रणवीर सिंह ने कुछ दिनों पहले एक कार्यक्रम में फिल्म पद्मावत को लेकर कहा था कि उनकी फिल्म पद्मावत लंबे समय तक याद रखी जाएगी। इस बारे में बताते हुए रणवीर सिंह ने कहा था, 'पद्मावत' ने जो कर दिखाया है मैंने उसकी कामना नहीं की थी। यह उन चुनिंदा फिल्मों में से है जिसके पास सब कुछ है फिर वह बॉक्स ऑफिस सक्सेस हो या क्रिटिकली अक्लेम होना हो। जिस प्रकार फिल्म को दर्शकों ने हाथों हाथ लिया, वह एक लंबे समय तक याद रखा जायेगा। मैं भी ऐसी ही फिल्मों का हिस्सा बनना चाहता था। फिल्में आती हैं और चली जाती हैं, लेकिन वही फिल्में मायने रखती हैं जोकि एक लंबे समय तक याद रखी जाएंगी। फिर 10-15 सालों के बाद फिल्म को याद किया जायेगा और देखा जायेगा। वैसी फिल्में आप आपके फिल्मी जीवन में रखना चाहते हो। मुझे लगता है 'पद्मावत' इसी प्रकार की फिल्म है।'
प्रसिद्ध निर्देशकों की सूची में शुमार नाम संजय लीला भंसाली ने इससे पहले भी कई भव्य फिल्मों का निर्देशन किया है। वे शाहरुख़ खान, एेश्वर्या राय बच्चन और माधुरी दीक्षित स्टारर फिल्म देवदास का निर्देशन कर चुके हैं। इसके साथ फिल्म बाजीराव मस्तानी का निर्देशन भी भंसाली ने किया था जिसमें अहम भूमिका में दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह थे। बता दें कि, शंघाई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में रानी मुखर्जी स्टारर फिल्म हिचकी को काफी तारीफें मिली है। रानी की इस कमबैक फिल्म को देखने के बाद दर्शकों ने खड़े होकर तालियां बजाई थी। इस अवसर पर फिल्म के डायरेक्टर सिद्धार्थ मल्होत्रा मौजूद थे जिन्होंने ट्विटर पर भी इसके बारे में शेयर किया था।

 


मुंबई - बाॅलीवुड एक्टर इरफान खान इन दिनों लंदन में अपनी बीमारी न्यूरोएंडोक्राइन कैंसर का इलाज करवा रहे हैं। इरफान जल्द ही फिल्म 'कारवां' में नजर आएंगे। ऐसे समय में बॉलीवुड का हर छोटा-बड़ा कलाकार इरफान की मदद और उनके जल्दी ठीक होने की कामना कर रहा है। फैंस के साथ बॉलीवुड के किंग खान ने इरफान की मदद के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया है।
खबरों के मुताबिक इलाज करवाने के लिए के लिए लंदन जाने से पहले इरफान की पत्नी सुतापा ने शाहरुख को फोन किया था और उन्हें बताया कि इरफान उनसे मिलना चाहते हैं। सुतापा ने शाहरुख को अपने मुंबई वाले घर मध आईलैंड पर बुलाया। शाहरुख उस समय इरफान के घर से कुछ दूरी पर महबूब स्टूडियो में शूटिंग कर रहे थे। शाहरुख उनसे मिलने पहुंचे। दोनों ने लगभग दो घंटे एक- साथ बिताए।
इस दौरान उन्होंने न सिर्फ इरफान का हौसला बढ़ाया, बल्क‍ि उन्हें अपने लंदन वाले घर की चाबी भी दी। शाहरुख के काफई जिद करने के बाद इरफान ने इसे स्वीकार कर लिया। शाहरुख का मानना था कि इरफान की फैमिली उनके घर को अपना घर जैसा महसूस करेंगे। इरफान शाहरुख को अपना बेहद करीबी मानते हैं।


नई दिल्‍ली - उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच इसी माह हुए सिंगापुर सम्‍मेलन से जो शांति की राह खुली है उसके दूर तक जाने की संभावना दिखाई देने लगी है। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि अमेरिका ने दक्षिण कोरिया से होने वाले युद्धाभ्‍यास को रद कर उत्तर कोरिया से दोस्‍ती की तरफ कदम बढ़ाने का साफ संकेत दिया है। गौरतलब है कि 12 जून को पहली बार दोनों देशों के राष्‍ट्राध्‍यक्षों के बीच मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात के बाद न सिर्फ दोनों नेताओं ने एक दूसरे की तारीफ की बल्कि कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु शस्‍त्र मुक्‍त करने पर भी सहमति बनी थी। इसके बाद उत्तर कोरिया ने अपनी एक और परमाणु साइट को तबाह कर दिया था। जिसके बाद यह साफ हो गया था कि उत्तर कोरिया अपने वादे को निभाने की तरफ आगे बढ़ रहा है।
युद्धाभ्‍यास को लेकर किम का डर
आपको बता दें कि इन दोनों देशों के बीच पहले भी कई बार युद्धाभ्‍यास किया गया है। विंटर ओलंपिक के बाद दक्षिण कोरिया और अमेरिका के बीच अब तक दो बार युद्धाभ्‍यास हो चुका है। इस दौरान उत्तर कोरिया की तरफ से सिंगापुर वार्ता रद करने की आशंका तक जताई जाने लगी थी। किम का मानना है कि इस तरह के युद्धाभ्‍यास उस पर हमले की तैयारी के लिए किए जाते रहे हैं। यही वजह है कि इनको लेकर उत्तर कोरिया हमेशा से ही चिंता व्‍यक्‍त करता रहा है। लेकिन अब जबकि अमेरिका ने आगामी युद्धाभ्‍यास को रद कर दिया है तो माना जा रहा है कि उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच खुली ये शांति की राह लंबी दूरी तय कर सकती है।
जानकारों की राय में एक अच्‍छा कदम
दोनों देशों की तरफ से अगस्त में होने वाले इस युद्धाभ्‍यास उलूची फ्रीडम गार्जियन (यूएफजी) को रद करने की पुष्टि करने के बाद जानकार इसको बेहतर कदम मान रहे हैं। दोनों देशों के अधिकारियों की तरफ से इसकी पुष्टि करते हुए कहा गया है कि उत्तर कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रयासों पर हो रही चर्चा के मद्देनजर यह फैसला लिया गया है। आपको यहां पर ये भी बता दें कि सिंगापुर वार्ता के बाद ही ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ इस तरह के सैन्‍याभ्यास पर विराम लगाने की योजना का खुलासा किया था। उल्ची फ्रीडम गार्डियन सैन्य अभ्यास में करीब 17,500 अमेरिकी सैनिक हिस्सा लेने वाले थे।
पिछले वर्ष भी किए गए थे इस तरह के युद्धाभ्‍यास
पिछले वर्ष अक्‍टूबर में भी दोनों देशों ने इसी तरह का अभ्‍यास किया था। उस वक्‍त किम ने अमेरिका को चेताते हुए यहां तक कहा था कि उसने जंगी जहाज उत्तर कोरिया की मिसाइलों की रेंज में हैं। इसके अलावा दिसंबर में भी दोनों देशों ने युद्धाभ्‍यास किया था। पांच दिवसीय इस युद्धाभ्‍यास में लड़ाकू विमानों समेत हजारों सैनिकों ने हिस्‍सा लिया था। इसको ‘विजिलेंट ऐस’ का नाम दिया गया था।
उत्तर कोरिया का आखिरी परमाणु परिक्षण
गौरतलब है कि सिंतबर 2017 में उत्तर कोरिया ने अब तक का आखिरी परमाणु परिक्षण किया था, जिसको उसने न सिर्फ सफल बताया था बल्कि इसके बाद उसने अपने को परमाणु शक्ति संपन्‍न राष्‍ट्र भी घोषित कर दिया था। इस परिक्षण के बाद अमेरिका की तरफ से उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध और कड़े कर दिए गए थे, जिसकी वजह से ही उत्तर कोरिया की अर्थव्‍यवस्‍था चरमरा गई थी। इन प्रतिबंधों के बाद ही किम अमेरिका से वार्ता के लिए तैयार भी हुए थे। लेकिन इन सभी के बीच अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच युद्धाभ्‍यास एक बड़ा रोड़ा बना हुआ था। उत्तर कोरिया से बढ़ते तनाव के मद्देनजर अमेरिका ने यहां पर अपना थाड मिसाइल सिस्‍टम तक लगा रखा था।
चीन और उत्तर कोरिया की जुगलबंदी
आपको यहां पर ये भी बता दें कि दक्षिण कोरिया और अमेरिका के बीच युद्धाभ्‍यासों को चीन भी पसंद नहीं करता है। यहां तक कि चीन को दक्षिण कोरिया में तैनात अमेरिकी थाड मिसाइल सिस्‍टम पर भी ऐतराज है। वहीं दूसरी तरफ चीन उत्तर कोरिया का सबसे करीबी देश है। यही वजह है कि सिंगापुर में अमेरिका से हुई वार्ता के बाद उत्तर कोरिया के प्रमुख किम जोंग उन ने 19 जून को चीन की आधिकारिक यात्रा की थी। इस दौरान दोनों देशों के बीच परमाणु निशस्‍त्रीकरण को लेकर भी एक समझौता हुआ था। आपको यहां पर ये भी बता दें कि इस वर्ष किम जोंग उन की यह तीसरी चीन यात्रा थी।
किम की चीन यात्रा
किम पहली बार मार्च में चीन गए थे और उस समय वह अपनी एक खास हथियारों से लैस ट्रेन से चीन पहुंचे थे। दो दिनों तक किम राजधानी बीजिंग में थे और यहां पर उन्‍होंने राष्‍ट्रपति जिनपिंग के साथ वार्ता की थी। दूसरी बार मई में किम, चीन की पोर्ट सिटी डालियान पहुंचे थे और यहां पर उन्‍होंने जिनपिंग के साथ भी कुछ समय बिताया था। विदेश मामलों के जानकार मानते हैं कि हाल के कुछ समय में किम ने नॉर्थ कोरिया की विदेश नीति में कुछ बदलाव किए हैं। हालांकि सिंगापुर वार्ता के बाद 19 जून को तीसरी बार किम ने ऐसे वक्‍त चीन की यात्रा की थी जब अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार बढ़ने की आशंका जताई जा रही थी।

 


भारत ने अमेरिका से आयातित कुछ कृषि व स्टील उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाने की घोषणा कर दी है। गौरतलब है कि अमेरिका ने पिछले दिनों चुनिंदा स्टील एवं एल्युमिनियम सहित कई वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाया था, जिससे भारत भी प्रभावित हुआ था और उसी के जवाब में भारत की यह अमेरिका पर आर्थिक दबाव की शुरुआत है। साफ है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के चलते ग्लोबल ट्रेड वॉर के हालात बनते दिख रहे हैं, जो निश्चित ही हमारे लिए भी चिंता की बात होनी चाहिए। बीते 19 जून को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा कि नोटबंदी और जीएसटी की मुश्किलों के बाद पटरी पर आई भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्विक व्यापार युद्ध गहराने का प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और इससे भारत की विकास दर कम होने की आशंका है। हाल ही में प्रकाशित कई वैश्विक सर्वेक्षण भी इस बात की ओर इशारा करते हैं कि अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों की वजह से भारत के कृषि, उद्योग-कारोबार तथा सेवा क्षेत्र की मुश्किलें बढ़ेंगी। ऐसे में विदेशी संस्थागत निवेशक भी भारत से मुंह मोड़ सकते हैं और भारतीय निर्यात व भारत के शेयर व बांड्स बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
विश्व व्यापार संगठन
गौरतलब है कि पिछले दिनों अमेरिकी कारोबार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) रॉबर्ट लाइटहाइजर के कार्यालय ने भारत सरकार द्वारा वस्तुओं के निर्यात को लेकर चलाई जाने वाली योजनाओं तथा निर्यात से जुड़ी इकाइयों की योजनाओं व अन्य ऐसी योजनाओं को लेकर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत के खिलाफ कारोबारी विवाद आपत्तियों के निपटारे हेतु कठोर आवेदन प्रस्तुत किया था। अमेरिका की इन आपत्तियों पर भारत सरकार ने दलील दी कि उसके द्वारा दी जा रही विभिन्न राहत और सुविधाएं डब्ल्यूटीओ के नियमों के तहत ही हैं। लेकिन अमेरिका अनुचित और अन्यायपूर्ण ढंग से भारत पर व्यापार प्रतिबंध बढ़ाते हुए दिखाई दे रहा है। ऐसे में भारत ने विगत 18 मई को डब्ल्यूटीओ को अमेरिका से आयातित 30 उत्पादों की सूची सौंपी थी, जिन पर वह आयात शुल्क बढ़ाना चाहता था। अब भारत ने इनमें से 29 वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है।
वर्ल्‍ड ट्रेड वॉर
इससे यही लगता है कि बीते कुछ दिनों से वर्ल्‍ड ट्रेड वॉर यानी वैश्विक व्यापार युद्ध को लेकर जो आशंका जताई जा रही थी, वह सही साबित होने लगी है। यह सही है कि अमेरिका ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कोई सात दशक तक वैश्विक व्यापार, पूंजी प्रवाह और कुशल श्रमिकों के लिए न्यायसंगत आर्थिक व्यवस्था के निर्माण और पोषण में उल्लेखनीय योगदान दिया है, लेकिन अब वही वैश्विक व्यवस्था मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कदमों से जोखिम में है। इस साल अमेरिका ने चीन, मैक्सिको, कनाडा, ब्राजील, अर्जेटीना, जापान, दक्षिण कोरिया व यूरोपीय संघ के विभिन्न देशों के साथ-साथ भारत की कई वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाए हैं। जैसे-जैसे अमेरिका विभिन्न देशों के आयातों पर शुल्क बढ़ा रहा है, जवाब में वे देश भी वैसा ही कर रहे हैं। इसका दुष्प्रभाव भी भारत के वैश्विक कारोबार पर पड़ रहा है। गौरतलब है कि 19 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के 200 अरब डॉलर के आयात पर 10 फीसद शुल्क लगाने की चेतावना दी।
चीन ने लगाया शुल्‍क
इसके चार दिन पूर्व ही ट्रंप ने चीन से 50 अरब डॉलर मूल्य के सामान के आयात पर 25 फीसद शुल्क लगाने को मंजूरी दे दी। इसके बाद चीन ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह भी 50 अरब डॉलर मूल्य की अमेरिकी वस्तुओं पर 25 फीसद शुल्क लगाएगा। इससे दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच ट्रेड वॉर की आशंका बढ़ गई। उल्लेखनीय है कि इसी माह कनाडा के क्यूबेक सिटी में आयोजित जी-7 देशों का दो दिवसीय शिखर सम्मेलन भी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयानों और नीतियों की वजह से तमाशा बनकर रह गया। जी-7 के सदस्य देश कनाडा, जर्मनी, इटली, जापान, फ्रांस तथा ब्रिटेन जहां पहले ही ट्रंप की ट्रेड पॉलिसी को लेकर नाखुश थे, वहीं जी-7 सम्मेलन के तुरंत बाद अमेरिका ने इस समूह के विभिन्न देशों से होने वाले कुछ आयातों पर नए व्यापारिक प्रतिबंध घोषित करते हुए ग्लोबल ट्रेड वॉर की आशंका को और गहरा दिया।
डब्ल्यूटीओ की भूमिका
इस संदर्भ में डब्ल्यूटीओ की भूमिका अहम हो जाती है। डब्ल्यूटीओ एक ऐसा संगठन है, जो सदस्य देशों के बीच व्यापार तथा वाणिज्य को सहज-सुगम बनाने का उद्देश्य रखता है। यद्यपि डब्ल्यूटीओ एक जनवरी, 1995 से प्रभावी हुआ, परंतु वास्तव में यह 1947 में स्थापित एक बहुपक्षीय व्यापारिक व्यवस्था प्रशुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौता (गैट) के नए एवं बहुआयामी रूप में अस्तित्व में आया। जहां गैट वार्ता वस्तुओं के व्यापार एवं बाजारों में पहुंच के लिए प्रशुल्क संबंधी कटौतियों तक सीमित रही थीं, वहीं इससे आगे बढ़कर डब्ल्यूटीओ का लक्ष्य वैश्विक व्यापारिक नियमों को अधिक कारगर बनाने के प्रयास के साथ-साथ सेवाओं एवं कृषि में व्यापार संबंधी वार्ता को व्यापक बनाने का रहा है। किंतु वैश्विक व्यापार को सरल और न्यायसंगत बनाने के 71 वर्ष बाद तथा डब्ल्यूटीओ के कार्यशील होने के 23 वर्ष बाद भारत सहित विकासशील देशों के करोड़ों लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि डब्ल्यूटीओ के तहत विकासशील देशों का शोषण हो रहा है।
आर्थिक विशेषज्ञों की राय
ऐसे में दुनिया के आर्थिक विशेषज्ञ यही आशंका जता रहे हैं कि अमेरिका के संरक्षणवादी रवैये से वैश्विक व्यापार युद्ध की शुरुआत हो गई है। लिहाजा इस बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करना जरूरी है कि यदि विश्व व्यापार व्यवस्था वैसे काम नहीं करती, जैसे उसे करना चाहिए तो डब्ल्यूटीओ ही एक ऐसा संगठन है, जो इसे दुरुस्त कर सकता है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो दुनियाभर में घातक व्यापार लड़ाइयां 21वीं सदी की हकीकत बन जाएंगी। बेहतर यही होगा कि विभिन्न देश एक-दूसरे को व्यापारिक हानि पहुंचाने की होड़ में उलझने के बजाय डब्ल्यूटीओ के मंच से ही आसन्न ग्लोबल ट्रेड वॉर के नकारात्मक प्रभावों का उपयुक्त हल निकालें। यद्यपि भारत ने कुछ अमेरिकी वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है, लेकिन अब बेहतर यही होगा कि वह इस मामले में धैर्य का परिचय दे और अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापारिक हितों के व्यापक पहलुओं पर गौर करे।
सबसे बड़ा निर्यातक बाजार
यह इसलिए भी जरूरी है कि जहां भारत के लिए अमेरिका दुनिया का सबसे पहले क्रम का निर्यातक बाजार है, वहीं अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी है। पिछले वित्त-वर्ष में भारत ने अमेरिका को 47.9 अरब डॉलर मूल्य का निर्यात किया था। हम उम्मीद करें कि भारत सरकार और भारतीय उद्यमी निर्यात की नई उभरती चुनौतियों के बीच विभिन्न देशों में विभिन्न वस्तुओं के निर्यात के नए मौके ढूंढने की डगर पर आगे बढ़ेंगे। खासकर चीन व अन्य देशों में अमेरिकी वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ने के कारण अमेरिका से आयातित सोयाबीन, तंबाकू, फल, गेहूं, मक्का तथा रसायन जैसी जो कई चीजें महंगी हो गई हैं, वहां के बाजारों में ये भारतीय उत्पाद सस्ते होने के कारण सरलता से अपनी पैठ बना सकते हैं। ग्लोबल ट्रेड वॉर की स्थिति के चलते हमारे निर्यात, निवेश व आर्थिक विकास दर घटने की जो आशंकाएं बढ़ गई हैं, उनसे निपटने हेतु सरकार को पुख्ता रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा।


दुबई - संयुक्त अरब अमीरात में भारतीय दूतावास के हस्तक्षेप के बाद हाथ और पैर गंवाने वाले गुरबिंदर सिंह को 2,02,000 दिरहम (करीब 38 लाख रुपये) का मुआवजा मिला। गुरबिंदर पंजाब से ताल्लुक रखते हैं। वह अबु धाबी की एक निजी कंपनी में क्रेन चालक के रूप में काम करते थे। काम के दौरान उनके घुटने में चोट लग गई थी। चोट की वजह से उनके हाथ-पैर में संक्रमण फैल गया था, जिसके बाद उनके दोनों हाथ और पैर काटने पड़े थे। खलीज टाइम्स के मुताबिक, अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद कंपनी ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया और सिर्फ 5,750 रुपये मुआवजे के रूप में दिए।
अखबार के मुताबिक, जब इस बात की जानकारी भारतीय दूतावस को मिली तो उन्होंने मामले में हस्तक्षेप किया। भारतीय दूतावास ने सिंह के नियोक्ता से बात की। दूतावास के अधिकारी लगातार सिंह और नियोक्ता के संपर्क में बने रहें। आखिर में नियोक्ता ने अंतिम निपटारे के लिए करीब 38 लाख रुपये की राशि दी। संयुक्त अरब अमीरात में भारतीय राजदूत नवदीप सुरी ने बताया कि समय पर दूतावास के हस्तक्षेप की वजह से परिवार को मदद मिल गई।


अपने पड़ोसियों को सबक सिखाना हो तो कोई सऊदी अरब से सीखे। आतंकवाद को संरक्षण देने वाले उसके पड़ोसी देश कतर जब अपनी कारगुजारियों से बाज नहीं आया तो सऊदी अरब ने पहले उससे अपने राजनयिक संबंध खत्म किए। अब उसे द्वीप बनाकर दुनिया से अलग-थलग करने की तैयारी में है।
सऊदी अरब साल्वा नहर खुदवाकर एक ओर से जमीन से जुड़े कतर को किसी द्वीप सरीखा कर देगा। 60 किमी लंबी इस नहर का निर्माण तीन माह में शुरू हो जाएगा। इस नहर के निर्माण के लिए पांच विदेशी कंपनियां शामिल हुई हैं। जिसे भी इसका ठेका मिलेगा, उसे एक साल की भीतर निर्माण कार्य पूरा करना होगा। इस नहर से 295 मीटर लंबे और 33 मी चौड़े जलपोतों का सुचारु आवागमन संभव होगा।
कुवैत ढूंढ़ रहा मध्यस्थ
1981 में गठित खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्य कुवैत और ओमान ने कतर के खिलाफ सऊदी अरब एवं उनका सहयोग देने वाले देशों का साथ नहीं दिया। कुवैत चाहता है कि इस मामले में कोई वार्ताकार मध्यस्थता करे और चल रहे तनाव को कम किया जाए। हालांकि इस बीच जो भी प्रयास हुए, वह विफल रहे।
खत्म हैं राजनयिक संबंध
सऊदी अरब ने आंतरिक मामलों में दखल, ईरान और आतंकी संगठनों को समर्थन देने के कारण जून 2017 में कतर से अपने राजनयिक संबंध खत्म कर दिए थे। बहरीन, मिस्र और संयुक्त राज्य अमीरात भी इसके साथ खड़े हळ्ए। इन चारों ने कतर को 13 मांगों पर अमल करने की बात कही जो पूरी नहीं हुई।
साल्वा क्रॉसिंग पर कब्जा
इस वर्ष अप्रैल में सऊदी अरब के सीमा पर तैनात गार्डों ने साल्वा क्रॉसिंग पर नियंत्रण कर लिया। इससे बाहरी दुनिया से कतर का एकमात्र स्थलीय संपर्क कट गया।
दूरदर्शी सोच
सऊदी अरब कतर से सटी अपनी सीमा के एक किमी पहले यह नहर बना रहा है। नहर और सीमा के बीच के स्थान में वह अपने परमाणु कचरे को डंप करता है। साथ ही यहीं पर रणनीतिक रूप से सळ्रक्षा के लिए सैन्य बेस भी बना रखा है।
एक तीर से दो निशाने
कतर के विरोध के साथ सऊदी अरब अपना आर्थिक पक्ष भी मजबूत करने की जुगत में है। पर्यटकों को लुभाने के लिए साल्वा नहर के किनारे रिजार्ट, बंदरगाह जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी। पर्यटकों को आकर्षित करने को वाटर स्पोर्ट्स और नौकायन की व्यवस्था रहेगी। यह पूरा इलाका खाड़ी क्षेत्र का सबसे खूबसूरत क्षेत्र में तब्दील होगा।


अमेरिकी नागरिक बन जाने की प्रबल इच्छा रखने वाले भारतीयों के लिए बुरी खबर सामने आई है। यहां ग्रीन कार्ड प्राप्त करने वालों की सूची इतनी लंबी हो गई है कि कई लोगों को 151 साल तक इंतजार करना पड़ सकता है। अमेरिका के केटो इंस्टीट्यूट ने एक अध्ययन के बाद यह जानकारी दी है। यह जानकारी अमेरिका के नागरिकता व आव्रजन सेवा विभाग द्वारा हाल ही में जारी आवेदानों की संख्या पर आधारित है।1अमेरिकी ग्रीन कार्ड पाने की लालसा में जिन भारतीयों ने अर्जियां लगाई हुई हैं, उनकी संख्या 6,32,219 है। मसलन अमेरिका में ग्रीन-कार्ड हासिल कर वहां के मूल-निवासी बन जाने की अभिलाषा रखने वाले भारतीयों की संख्या तीन-चौथाई है। जबकि अमेरिकी कानून के हिसाब से किसी एक देश को कुल जारी किए जाने वाले ग्रीन कार्ड का 7 प्रतिशत से ज्यादा देने का प्रावधान ही नहीं है।
भारतीयों पर सबसे अधिक असर
इस कोटे के चलते सबसे ज्यादा असर भारतीयों पर पड़ रहा है, क्योंकि सबसे लंबी सूची उन्हीं की है। नतीजतन उन्हें भविष्य में अपने बोरिया-बिस्तर समेटकर भारत आना ही होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी-प्रथम की जो धारणा बनाई हुई है, उसके चलते यह गुंजाइश भी न्यूनतम है कि उनके चलते कोटे में कोई बढ़ोतरी की जाएगी? 2017 में 22,602 भारतीयों को ग्रीन कार्ड जारी किए गए थे। ग्रीन कार्ड धारकों को अमेरिका में वैध रूप से स्थाई निवास मिल जाता है, यह अमेरिकी नागरिकता पाने का पहला कदम है।1अमेरिका में बसने की इच्छा रखने वालों में दूसरे पायदान पर चीनी नागरिक हैं। इनकी संख्या 67,031 है। जो अवसरों और उपलब्धियों से भरा देश माना जाता रहा है, उसमें विदेशी प्रवासियों के लिए रास्ते बंद हो रहे हैं। यही नहीं, इसी जून माह में अमेरिका उन लाखों भारतीय महिलाओं को भी नमस्ते कर सकता है, जिनके जीवनसाथी वहां पहले से ही नौकरियों में हैं।
एच-1 बी वीजा
दरअसल ट्रंप-प्रशासन एच-1 बी वीजा के उस प्रावधान को रद कर सकता है, जिसके तहत पति व पत्नी, दोनों अमेरिका में रहकर नौकरी कर सकते थे।1अमेरिका की कुल जनसंख्या 31.50 करोड़ है, इस आबादी की तुलना में उसका भू-क्षेत्र बहुत बड़ा यानी 98,33,520 वर्ग किमी है। इतने बड़े भू-लोक के मालिक अमेरिका के साथ विडंबना यह भी रही है कि 15वीं शताब्दी तक उसकी कोई स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में पहचान नहीं थी। दुनिया केवल एशिया, यूरोप और अफ्रीका महाद्वीपों से ही परिचित थी। कालांतर में यहां अनेक औपनिवेशिक शक्तियों ने अतिक्रमण किया। इसीलिए कहा जाता है कि अमेरिका के इतिहास व अस्तित्व में दुनिया के प्रवासियों का बड़ा योगदान रहा है। साथ ही यहां एक बड़ा प्रश्न यह भी खड़ा हुआ कि अमेरिका महाद्वीप के मूल निवासी थे वे हाशिये पर चले गए।
बेरोजगारी का कारण
इस विरोधाभास का मूल्याकंन करके ही ट्रंप चिंतित हैं कि आइटी टेक्नोक्रेट के बहाने जो आइटी प्रोफेशनल्स अमेरिकी संस्थाओं व कंपनियों पर प्रभावी होते जा रहे हैं वे मूल-अमेरिकियों के लिए अमेरिकी संस्थाओं में बेदखली और बेरोजगारी का कारण भी बन रहे हैं। इसी लिहाज में ट्रंप अमेरिका-फर्स्‍ट की नीति को महत्व दे रहे हैं, लेकिन आज अमेरिका जिस विकास और समृद्धि को प्राप्त कर पूंजीपति व शक्ति-संपन्न राष्ट्र बना दुनिया पर अपना प्रभुत्व जमाए बैठा है, उसकी पृष्ठभूमि में दुनिया के प्रवासियों का ही प्रमुख योगदान रहा है। लिहाजा ट्रंप को प्रवासियों को अमेरिका में ही बसाए रखने की नीति और उपाय बदस्तूर रखने चाहिए।


असंभव को संभव करना कोई चीन से सीखे। चाहे गगनचुंबी पहाड़ों का सीना चीरकर बुलेट ट्रेन चलाने की बात हो, महासागर के अगाध वक्षस्थल पर सैन्य बेस बनाना हो या दुनिया के सबसे बड़े बांध बनाने की बात हो, चीन के लिए ये चुटकी बजाने जैसा काम लगता है। अब वह करीब छह हजार फीट ऊंची पहाड़ की चोटी को एयरपोर्ट में तब्दील कर रहा है। वुशान शहर में बन रहे इस एयरपोर्ट के इसी महीने के अंत तक पूरा होने की उम्मीद है। अगले साल तक इस पर विमान उतरने लगेंगे।
कहां बन रहा
दक्षिण पश्चिम चीन के चोंगक्विंग स्थित वुशान कस्बे में पिछले छह साल से इसे तैयार किया जा रहा है। यहां के ताओहुआ पहाड़ की चोटी पर एक रनवे वाले एयरपोर्ट को अगले साल विमानों की आवाजाही के लिए खोल दिया जाएगा। यह रनवे 2600 मी लंबा और 45 मी चौड़ा होगा।
निर्माण के लिए झोंकी ताकत
माना जाता है कि अगर चीन ने अपने किसी परियोजना के पूरा होने की तारीख तय कर दी है, तो उसे उसी समयसीमा के भीतर येन-केन-प्रकारेण पूरा किया जाता है। उसे विस्तार देने की रवायत में वे यकीन नहीं करते हैं। लिहाजा इस एयरपोर्ट को तय समय के भीतर बनाने के लिए 2000 लोग और 800
मशीनें एक साथ लगातार काम कर रही हैं।
डायनामाइट का इस्तेमाल
यह पूरा इलाका पहाड़ी है। लिहाजा स्थानीय इस्तेमाल के लिए एयरपोर्ट सुविधा तैयार करने के लिए पहाड़ की चोटी को चुना गया। चोटी को समतल करने के लिए पत्थरों को डायनामाइट से तोड़ा गया।
पर्यटन से बढ़ेगी कमाई
यह एयरपोर्ट जहां स्थित है, वहां से गॉडेस पीक और थ्री जॉर्ज डैम करीब ही हैं। ये दोनों वहां बड़े पर्यटन स्थल हैं। इस एयरपोर्ट से बीजिंग, शंघाई, गुआंगझाऊ, चोंगक्विंग सहित सभी प्रमुख शहरों के लिए उड़ानें उपलब्ध होंगी। लिहाजा पर्यटन से कमाई बढ़ेगी।
एयर ट्रैफिक प्रबंधन है लक्ष्य
चोंगक्विंग जियांगबी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर एयर ट्रैफिक का बोझ कम करने के लिए इसे तैयार किया जा रहा है। पिछले साल इस इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर करीब चार करोड़ यात्रियों ने आवाजाही की थी। उम्मीद है कि 2020 तक वुशान एयरपोर्ट 2.8 लाख यात्रियों और 1200 टन माल के आवागमन में सहायक होगा। करीब 3333 लैंडिंग सालाना संभव होंगी।


मुंबई - बॉलीवुड फिल्म 'द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर' में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका राम अवतार भारद्वाज निभाएंगे। हाल ही में उनकी कुछ तस्वीरें सामने आई हैं जिसमें वह मनमोहन सिंह यानि अनुपम खेर के साथ हाथ मिलाते हुए नजर आ रहे हैं।
फिल्म में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भूमिका निभा रहे अनुपम खेर ने अपनी और राम की फिल्म के किरदार के तौर पर तस्वीर के साथ यह खबर साझा की। अनुपम ने शुक्रवार को ट्वीट कर कहा, फिल्म 'द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर' में राम अवतार भारद्वाज को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में पेश कर रहा हूं।
इस फिल्म का निर्देशन विजय रत्नाकर कर रहे हैं और हंसल मेहता इसके क्रिएटिव निमार्ता हैं। फिल्म में अक्षय खन्ना संजय बारू के रूप में नजर आएंगे. फिल्म 21 दिसंबर को रिलीज होगी।

 


मुंबई - बॉलीवुड एक्ट्रेस कृति सैनन और दिलजीत दोसांझ स्टारर फिल्म ‘अर्जुन पटियाला’ में अब जल्द ही सनी लियोनी की एंट्री होने वाली है। फिल्म में वो एक डांस नंबर करती हुई नजर आएंगी।
इस फिल्म का फर्स्ट लुक पहले ही रिलीज हो चुका है। फिल्म 13 सितंबर को रिलीज होने वाली है। फिल्म में वरुण शर्मा हर बार की तरह जबरदस्त कॉमेडी करते हुए नजर आएंगे। फिल्म के जारी हुए फर्स्ट लुक में दिलजीत जहां पुलिस की वर्दी में नजर आ रहे थे तो कृति मस्त अंदाज में कुर्सी पर बैठे और बंदूक ताने आंख मारती हुई दिखाई दीं थी। इस फिल्म में कृति का किरदार क्राइम रिपोर्टर का है। फिल्म की बात करें तो ‘अर्जुन पटियाला’ को रोहित जुगराज ने डायरेक्ट किया है।

 

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