नई दिल्ली। फेफड़ों, पेट और गर्भाशय समेत कई तरह के कैंसर में इस्तेमाल होने वाली कीमोथेरेपी की एक दवा हृदय में विषाक्तता की वजह बन सकती है। इसके चलते हार्ट फेल होने की नौबत तक आ सकती है। एक भारतवंशी समेत शोधकर्ताओं के दल ने इसके प्रति आगाह किया है। अमेरिका की अलबामा यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार, अध्ययन में पाया गया कि डॉक्सोरुबिसिन दवा से मेटाबोलिज्म गड़बड़ा सकता है। यह मेटाबोलिज्म प्लीहा और हृदय की इम्यून प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है।ये इम्यून प्रतिक्रियाएं हृदय को दुरुस्त रखने और सूजन को नियंत्रित करने के लिए महत्वपूर्ण होती हैं। अलबामा के असिस्टेंट प्रोफेसर गणोश हलदी के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने इम्यूनमेटाबोजिल्म पर डॉक्सोरुबिसिन के प्रभाव का पता लगाने के लिए चूहों पर अध्ययन किया। इस दवा के चलते हृदय की रक्त पंप करने की क्षमता पर असर पाया गया। शोधकर्ताओं ने कहा कि दवा के चलते प्लीहा और हृदय के वजन में कमी भी पाई गई।
दिल की बीमारियों से दोगुनी व कैंसर से तीन गुना बढ़ीं मौतें:-प्रदूषण पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट आने के बाद स्वास्थ्य पर प्रदूषण के दुष्प्रभाव की चर्चा एक बार फिर शुरू हो गई है। डब्ल्यूएचओ ने अपनी रिपोर्ट में आगाह किया है कि प्रदूषण सांस की बीमारियों के अलावा हृदय व फेफड़े के कैंसर से होने वाली मौतों का भी बड़ा कारण बन रहा है। इस बीच दिल्ली में मृत्यु पंजीकरण रिपोर्ट के आंकड़ों से यह बात सामने आई है कि राजधानी में पिछले 12 सालों में दिल की बीमारियों से मौत के मामले दोगुने बढ़े हैं। वहीं, कैंसर से होने वाली मौतों में करीब तीन गुना वृद्धि देखी जा रही है। विशेषज्ञ इन बीमारियों के बढ़ने का एक बड़ा कारण प्रदूषण को मान रहे हैं।रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में हृदय की बीमारी मौत का सबसे बड़ा कारण है। वर्ष 2016 में हार्ट अटैक व हृदय की बीमारियों से 16,665 लोगों की मौत हुई, जिसमें 15,919 लोगों की मौत अस्पतालों में हुई थी। पहले दिल्ली में कैंसर से हर साल करीब दो हजार लोगों की मौत होती थी मगर अब यह आंकड़ा बढ़कर 6000 के आसपास पहुंच गया है। वर्ष 2011 में ऐसा भी वक्त था जब यहां कैंसर से 9925 मरीजों की मौत हुई थी।

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