नई दिल्ली - दिल्ली में कार से यात्रा करने वाले लोग यूरोप व अमेरिका की तुलना में पांच गुना अधिक ब्लैक कार्बन की जद में हैं। यह बात एक नए शोध से सामने आई है। एटमास्फियरिक इन्वायरमेंट जर्नल में प्रकाशित इस शोध रिपोर्ट के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने एशियाई परिवहन माध्यमों (पैदल चलने, कार चलाने, मोटसाइकिल चलाने तथा बस में यात्रा) में सघनता के स्तरों तथा प्रदूषण के खतरे का अध्ययन किया। इस दौरान सामने आया कि एशियाई देशों में भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर पैदल चलने वाले लोग यूरोप और अमेरिकी देशों के लोगों की तुलना में 1.6 गुना अधिक महीन कणों की जद में होते हैं।
वहीं, एशिया में कार चलाने वाले लोग यूरोप और अमेरिका के लोगों की तुलना में नौ गुना अधिक प्रदूषण की जद में होते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि दिल्ली में 2010 में वाहनों की संख्या 47 लाख थी जिसके 2030 में दो करोड़ 56 लाख तक पहुंचने का अनुमान है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी एशिया के विकासशील देशों में समय पूर्व मौतों के 88 प्रतिशत मामलों के लिए वायु प्रदूषण को जिम्मेदार ठहराया है। सरे विश्वविद्यालय के ग्लोबल सेंटर फॉर क्लीन एयर रिसर्च के निदेशक प्रशांत कुमार ने कहा है कि एशियाई देशों में भी ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों की स्थिति ज्यादा चिंताजनक है। इसलिए इस विषय में और भी अध्ययन किए जाने चाहिए। परिवहन के साधनों पर भी अलग-अलग अध्ययन होंगे तो प्रदूषण की रोकथाम और उससे सेहत पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव कम करने पर भी काम किया जा सकेगा।
क्या है ब्लैक कार्बन
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के पूर्व अतिरिक्त निदेशक डॉ. एस के त्यागी बताते हैं कि डीजल वाहनों से निकलने वाले धुएं में दो तरह के प्रदूषक तत्व होते हैं। एक तत्व सफेद होता है और दूसरा काला। सफेद प्रदूषक तत्वों में धूल के कण होते हैं जबकि काले प्रदूषक तत्वों में अत्यंत महीन कण होते हैं। यह श्वास नली से शरीर के भीतर चले जाते हैं और कैंसर सहित अनेक भयंकर बीमारियों का कारण हैं।
हालांकि, दिल्ली में डीजल का प्रयोग अब काफी सीमित हो गया है, लेकिन डीजल चालित कार और ट्रक अभी भी इसका उत्सर्जन कर रहे हैं। ब्लैक कार्बन का दूसरा स्रोत कोयले का जलना भी है। हालांकि, दिल्ली में कोयला जलना भी अब बहुत कम हो गया है। ब्लैक कार्बन की समस्या से निजात पाने के लिए स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना होगा।

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