नई दिल्ली - हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा है कि दो बालिगों की शादी में तीसरे की दखल की जरूरत नहीं है। अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि माता-पिता, परिवार और समाज कोई भी इसमें दखल नहीं दे सकता है। यह फैसला देश में जातिगत पंचायतों की भूमिका, अंतरजातीय-अंतरधर्मी शादी करनेवाले युवाओं का उत्पीड़न तथा उनकी हत्याओं आदि के संदर्भ में दायर एक केस के संदर्भ में आया है। इस ताजा फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीश दीपक मिश्र की अगुआई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने बाकायदा कहा है कि जब तक इस मामले में कानून नहीं बनता तब तक यही दिशानिर्देश जारी रहेंगे।निश्चित ही यह पहली बार नहीं है कि अदालतों के स्तर पर देश में जाति पंचायतों की मनमानी पर अंकुश लगाने की कोशिशें चली हैं। कुछ समय पहले पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने संविधान प्रदत्त कानूनों को धता बतानेवाली कुछ जाति पंचायतों पर अंकुश लगाने के लिए इन्हें गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम के दायरे में लेने की बात की थी।
हरियाणा सरकार की दलील
मालूम हो कि उच्च न्यायालय के प्रस्ताव पर हरियाणा सरकार ने यह दलील दी थी कि इन जाति पंचायतों पर ऐसे अधिनियम का इस्तेमाल होगा तो सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है। वैसे अदालत की सख्ती के बाद प्रशासन को भी सख्त होना पड़ा था और फिर उसने रोहतक के चंद राजस्व अधिकारियों को निलंबित किया था जिन्होंने एक ऐसी पंचायत में हिस्सेदारी की थी जिसने सगोत्र विवाह करनेवाले पति-पत्नी को एक-दूसरे को भाई-बहन कहने का आदेश दिया था। उसके पहले करनाल के सत्र न्यायालय ने 2007 में ग्राम करोरा में सामने आए मनोज-बबली हत्याकांड के खिलाफ दोषियों को दंडित करने का एलान किया था। याद रहे कि इन दोनों ने शादी करने के बाद पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से सुरक्षा की गुहार भी लगाई थी, लेकिन प्रशासन ने अपने स्तर पर इस मामले में सुस्ती बरती थी। एक तरह से देखें तो यह ऐतिहासिक फैसला था।
पूरे समाज का मामला
हमारे समाज में शादी दो व्यक्तियों का आपसी मामला समझा ही नहीं जाता है। वह दो परिवारों के अलावा पूरे समाज का भी मामला बन जाता है, यदि इसमें जाति, समुदाय, धर्म या गोत्र जैसा मसला आ जाए। युवा जोड़ों को इनकी राय या सलाह की जरूरत भले ही न हो, परंतु वे सलाह नहीं फैसला देते हैं। जाति पंचायतें स्वयंभू ठेकेदार की भूमिका में होती हैं, क्योंकि इन्हें कोई चुनता नहीं, न ही उनकी सहमति की मुहर के लिए कोई याची उनके पास याचिका दायर करने जाता है, बल्कि वे ‘स्वत: संज्ञान’ लेकर ‘रक्षक’ बन जाती हैं अपनी संस्कृति, परंपरा बचाने के लिए। ज्ञात हो कि शक्तिवाहिनी नाम की एक संस्था ने 2010 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर मांग की थी कि केंद्र तथा राज्य सरकारें इज्जत के नाम पर होने वाली हत्याओं को रोकने के लिए दिशानिर्देश तैयार करें। उच्चतम न्यायालय ने इस फरवरी तथा मार्च में सुनवाई के दौरान जाति पंचायतों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वे दो बालिगाें की शादी में कोई दखल नहीं दे सकती हैं और समाज का ठेकेदार नहीं बन सकती हैं।
घर, परिवार तथा समाज की तरफ से बंदिशें
अंतरजातीय, अंतरधर्मी शादियों को लेकर हमारे देश के अधिकतर हिस्सों में घर, परिवार तथा समाज की तरफ से तमाम बंदिशें हैं। इसी के साथ हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गोत्र का मामला भी गंभीर है। इन इलाकों की जाति पंचायतें बहुत ताकतवर हैं और जबरन लोगों के निजी मामलों में हस्तक्षेप करती हैं। वे सरेआम पंचायत की बैठक बुला कर हिंसक फैसले सुनाती हैं तथा युवाओं के साथ परिवारों द्वारा किए गए हिंसा तथा हत्याओं को जायज ठहराती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हादिया मामले में भी व्यक्ति के अधिकार की अंतत: रक्षा की, भले ही इस मसले पर निर्णय सुनाने में उसे काफी वक्त लगा। हादिया ने अंतरधर्मी शादी की थी। कोर्ट ने कहा कि हादिया 24 साल की वयस्क महिला है। उसकी शादी वैध है या नहीं इसकी जांच राष्ट्रीय एजेंसी नहीं कर सकती है।
सरकारों को पंचायतों के प्रति नरम रवैया
यह भी देखने समझने लायक है कि सभी राजनीतिक पार्टियां तथा चुनी हुई सरकारें चाहे वह किसी भी पार्टी की हों, इन पंचायतों के प्रति नरम रवैया रखती हैं। गांवों में इनके दबदबे के कारण वोट की राजनीति सभी को चुप रहने के लिए मजबूर कर देती है। पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने तो इन जाति पंचायतों को जनविरोधी कहा था और बताया था कि वे भारतीय संस्कृति का हिस्सा कतई नहीं हैं। इन जाति पंचायतों को कुछ लोग गैरसरकारी संस्था यानी एनजीओ भी कहते हैं। वैसे इन्हें एनजीओ कहना गलत भी नहीं है, क्योंकि वे तो तरह-तरह के होते हैं जिनमें प्रतिगामी मूल्योंवाले भी अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए संस्थाएं रजिस्टर कराते हैं। इन कथित गैरराजनीतिक संस्थाओं का गहरा राजनीतिक एजेंडा होता है। न केवल चुनावबाज पार्टियां, बल्कि लोकरंजकता के शिकार कई बुद्धिजीवी तथा समाज सुधारक लोग भी इनमें लोकहित के कामों की तलाश करने लगते हैं।
क्यों नहीं बन पाया कानून
सवाल यह उठता है कि इज्जत हत्याओं में ऐसे सामुदायिक पंचायतों की नजर आती भूमिका के बावजूद अभी इनको लेकर कानून क्यों नहीं बन पाया है? सभी जानते हैं कि व्यक्तिगत अधिकारों का निषेध करनेवाली ऐसी जाति पंचायतों की भारत जैसे पिछड़े समाज में अपने समुदायों पर अभी भी अच्छी खासी पकड़ रहती है। इसी पकड़ का प्रतिबिंबन इस बात में भी दिखता है कि चुनावों के मद्देनजर हर नेता का इनके प्रति मोह गहराने लगता है। किसे पता नहीं है कि भारतीय संविधान के तहत पंचायतों के प्रतिनिधियों का चुनाव होता है, जबकि जाति पंचायतों को कोई नहीं चुनता है। यह भी हकीकत है कि इनके कारण चुनी हुई पंचायतों की सत्ता भी कायम नहीं हो पाती है। समुदाय के सम्मान के रक्षा के नाम पर किसी का हुक्का पानी बंद करवा देना, किसी का सामाजिक बहिष्कार करवा देना इनके लिए कोई बड़ी बात नहीं समझी जाती। ऐसे में यह विचारणीय है कि इन इलाकों में कोई मजबूत समाज सुधार आंदोलन अपनी जड़ क्यों नहीं जमा पा रहा है? पितृसत्ता की जड़ें भी इतनी गहरी हैं कि महिलाएं भी उन्हीं विचारों के प्रभाव में नजर आने लगती हैं।

 

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