नई दिल्ली - देश में महाराजा का दर्जा प्राप्त प्रमुख सरकारी कंपनी एयर इंडिया बिक्री की शुरुआत में ही मुश्किलों का सामना कर रही है। नरेंद्र मोदी सरकार ने एयर इंडिया की एसेट बिक्री के लिए अब तक का सबसे बोल्ड स्टेप लिया है लेकिन इसका विनिवेश प्रस्ताव अब तक आना बाकी है। ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ संभावित बोलीदाताओं ने सरकार की नियम व शर्तों से नाखुश होकर बिक्री प्रक्रिया में शामिल होने से किनारा कर लिया है।
एयर इंडिया की बिक्री प्रक्रिया की शुरुआत न होना इसलिए भी नरेंद्र मोदी सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ा रहा है क्योंकि अब से ठीक एक साल बाद आम जनता को फिर से तय करना है कि क्या नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है या नहीं। एयर इंडिया की बिक्री के लिए जारी प्रतिरोध न सिर्फ मोदी सरकार की खुद की पार्टी के भीतर हो रहा है बल्कि विभिन्न विपक्षी समूहों और यूनियनों के भीतर भी चल रहा है।
वहीं एयर इंडिया के कुछ कर्मचारी विमानन कंपनी के बिक्री फैसले का विरोध कर चुके हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के लिए सबसे मुश्किल चुनौती देश के राजनीतिक वर्ग को यह समझना है कि आखिर क्यों एयर इंडिया की बिक्री करना देश के सर्वोत्तम हित में है।
एयर इंडिया को खरीदने में फिलहाल किसी को दिलचस्पी नहीं
बीते दिनों जेट एयरवेज और इंडिगो स्पष्ट तौर पर कह चुकी हैं कि वे एयर इंडिया के लिए बोली नहीं लगाएंगी। अब टाटा ग्रुप द्वारा बोली नहीं लगाने के संकेतों से सरकार पर शर्तो में ढील देने का दबाव बनता दिख रहा है। एक सूत्र का कहना था कि सरकार की मौजूदा शर्तों के साथ टाटा ग्रुप का एयर इंडिया को खरीद पाने की संभावना नहीं के बराबर है। चाहे वह टाटा ग्रुप हो या कोई और, एयर इंडिया पर निवेश करने वाली कोई भी कंपनी उस पर पूरा नियंत्रण चाहेगी।
क्यों बिडिंग से किनारा कर रही हैं कंपनियां
बिक्री के लिए तैयार एयर इंडिया के सबसे प्रमुख संभावित खरीदारों की सूची से टाटा ग्रुप भी बाहर निकलता नजर आ रहा है। सूत्रों का कहना है कि सरकार ने एयर इंडिया की खरीद की शर्ते इतनी कठिन कर रखी हैं कि टाटा ग्रुप द्वारा बोली लगाने की संभावनाएं बेहद कम हैं। सरकार ने एयर इंडिया में 76 फीसद हिस्सेदारी के विनिवेश का लक्ष्य रखा है। इसके साथ ही वह एयर इंडिया की बजट एयरलाइन एयर इंडिया एक्सप्रेस की पूरी, और बैगेज हैंडलिंग व एयरपोर्ट सर्विसेज यूनिट की 50 फीसद हिस्सेदारी का भी विनिवेश करना चाहती है।
लेकिन सरकार ने शर्त रखी है कि एयर इंडिया में उसकी हिस्सेदारी रहने तक खरीदने वाली कंपनी उसका विलय अपने मौजूदा कारोबार में नहीं कर सकती। इसके साथ ही संभावित खरीदार को एयर इंडिया को शेयर बाजारों में सूचीबद्ध कराना पड़ सकता है।

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