-डॉ प्रदीप उपाध्याय
लोकतंत्र में युवराज पैदा होना या फिर युवराज हो जाना किस्मत की बात है और यदि कोई नाम से ही युवराज हो जाए तो यह चार चाँद लगने वाली बात हो जाती है।ऐसा ही कुछ उनके साथ भी है जिनका नाम ही युवराज है और फिर एक बड़े क्षेत्रीय राजनीतिक दल के यूथ विंग के सेक्रेटरी हैं।
वे युवा हैं तो अतिरिक्त उर्जा से ओतप्रोत तो रहेंगे ही।जिसके पीछे युवाओं की फौज हो,युवा शक्ति हो,वह क्या कुछ नहीँ कर सकता चाहे तो उस रेस्तरां को आग लगा दे जिसने बिरयानी के बिल के पैसे मांगने की जुर्रत कर ली।उन्होंनें बिरयानी ही तो खाई थी….वे दोस्तों के साथ बिरयानी खाएं और इतने बड़े स्टार से एक टुच्चा सा मैनेजर बिल देकर पैसे मांग ले!
आखिर यह सब कैसे हो सकता है।उसे पता नहीं कि इस देश में लोकतंत्र है और यह अमेरिका वाला यानी ट्रम्प वाला लोकतंत्र तो है नहीं ।यहाँ जनता के प्रतिनिधियों पर कितना भार है!ओव्हर बर्डन्ड ! कितना समय डिवोट करते हैं!डिवोटी हैं तब भी क्या हम उनकी सेवाओं के बदले इतना भर नहीं कर सकते कि उन्हें मुफ्त सामग्री,मुफ्त सेवाएँ,मुफ्त आवागमन उपलब्ध कराएँ।कब लोगों को अक्ल आएगी!आखिर कैसे लोगों की समझ विकसित करें।कभी बहती बाढ़ग्रस्त दरिया का भी रास्ता रोका जाता है!इसी तरह जनता के इन सच्चे-मुच्चे सेवाभावी प्रतिनिधियों को भी सारे रास्ते साफ मिलना ही चाहिए!
किसी को कोई अधिकार नहीं है कि वे इन्हें टुच्चे और लुच्चे कहें।उन्हें लफंगा भी नहीं कहा जाना चाहिए क्योंकि वे आम आदमी का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनकी सेवा में दिन रात एक कर देते हैं।ऐसे में उनकी राह का रोड़ा तो नहीं बनना चाहिए।उनसे टोल पर टोल टैक्स की मांग भी नाजायज है।क्योंकि वे ही टैक्स चुकाने लग जाएं, किराया देना शुरू कर दें,बिलों का भुगतान करने लग जाएं तब तो हो गया काम!उनके पास चुल्लूभर पानी में डूब मरने के सिवाय और कोई चारा ही न रह जाएगा।अगर यही सब करना पड़े तब वे कैसे मन लगाकर जनता की सेवा कर सकेंगे, बताइये भला!जब हम आतंक का साम्राज्य स्थापित करने आए अतिथि की राह में कभी रोड़े नहीं अटकाते तब ये बेचारे तो अपनी राजनीति का सिक्का ही जमा रहे हैं।ये अपने चमचों-गुर्गों को क्या मुँह दिखाएंगे जब हर जगह इन्हें काउन्टर पर बिल अदा करते हुए देखेंगे!
जब आतंक के पर्याय कसाब जी उर्फ कसाब साहब को शानदार बिरयानी खिला सकते हैं, दूसरी ओर अपने कर्णधारों के लिए दूध और उससे बने पदार्थ और अधिक पौष्टिक बनाने के लिए काजू-बादाम खिलाकर गाय को दुह सकते हैं तब फिर यह बिरयानी कौन सी बड़ी बात है।जब जनता की सेवा करने वालों को नाममात्र की राशि पर सब्सिडी में बढ़िया पेय और सुस्वादु भोजन मिल सकता है तो क्या युवा सम्राटों के लिए मुफ्त बिरयानी की व्यवस्था नहीं की जाना चाहिए!एक रुपये किलो गेहूँ और दो रुपये किलो चांवल की तर्ज पर इन युवाओं के लिए भी तो कुछ सोचा जाना चाहिए।शायद मुफ्त काउन्टर खोलकर...वैसे भी इस देश का करदाता कहाँ पीछे हटता है।वह इन सभी को बिरयानी खिलाने में सक्षम है।बस एक ही बात का ध्यान रखना जरुरी है कि सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी पहले ही हलाल न हो जाए।


१६,अम्बिका भवन,बाबूजी की कोठी,
उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.
9425030009(m)
pradeepru21@gmail.com

Share this article

AUTHOR

Editor

हमारे बारे में

नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

ताज़ा ख़बरें