-अब्दुल रशीद
विश्व का प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन 9 अगस्त 1994 में जेनेवा शहर में आदिवासियों को उनके अधिकार दिलाने और उनकी समस्याओं का निराकरण, भाषा संस्कृति, इतिहास आदि के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आयोजित किया गया था। इस आयोजन में विश्व के सभी देशों से आदिवासियों के प्रतिनिधियों ने सिरकत किया,तभी से सभी देशों में 9 अगस्त को आदिवासी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा,लेकिन भारत के आदिवासी समुदाय आज भी उपेक्षित हैं जो चिंता का विषय है।
अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस सिर्फ उत्सव मनाने का दिन नहीं, बल्कि आदिवासी अस्तित्व, संघर्ष, अधिकारों और उनके स्वर्णिम इतिहास को याद करने का दिन है। अफ़सोस यह है की भारत जैसी मजबूत अर्थव्यवस्था वाले देश में ज्यादातर आदिवासियों की मौजूदा स्थिति ऐसी नही कि वह अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस पर रोजीरोटी की जद्दोजहद को छोड़कर अपने स्वर्णिम इतिहास को याद भी कर सके।
जंगल आदिवासीयों के लिए न केवल उनके रोजीरोटी का साधन है बल्कि उनकी पहचान है। नए दौर में जो विकास कि गाथा लिखी जा रही है उसमें आदिवासी कहीं गुम होते जा रहें हैं। मूल बाशिंदो को विस्थापित कर नए को स्थापित करने का काम जिस गति से हो रहा है ऐसा प्रतीत होता है इतिहास के पन्नों में कहीं मूल ही दुर्लभ बनकर न रह जाए।
राजनीति में आदिवासीयों कि चर्चा तो खूब होती है लेकिन एक कड़वा सच यह भी है के जंगल उजड़ रहा है, और या तो अपनी आजीविका के लिए आदिवासी शहर की ओर पलायन कर दिहाड़ी मजदूर बन रहें हैं,या फिर आधे पेट जीने के लिए संघर्ष कर रहें।
आदिवासी समाज को जल-जंगल-जमीन विहीन होने से बचाने के लिए कानून भी बनाये गये। ये कानून न तो अंग्रेजों ने उपहार में दिया और न ही आजाद भारत में लोकतांत्रिक सरकारों ने आदिवासी के हितों को ध्यान में रख कर दिया। यह सब आदिवासी नायकों जैसे बिरसा मुंडा, तात्या टोपे के संघर्ष की देन है। यदि सरकारें आदिवासियों के हितों को ध्यान देती और उनके नायकों का सम्मान करती तो क्या बिरसा मुंडा के जन्मदिवस को राष्ट्रीय आदिवासी दिवस घोषित नहीं कर दिया गया होता? आजाद भारत में वोट बैंक की राजनीती को साधने के लिए सरकारें आदिवासी समुदाय उनके कल्याण की योजनाएं एवं कानून तो बनाती रही है, लेकिन उन योजनाओं और कानून का फ़ायदा आदिवासी समाज को नहीं मिला,हां उन कानूनों का दुष्प्रभाव जरुर उनपर पड़ता रहा है।
भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2017 के अनुसार देश में वनों और वृक्षों से आच्छादित कुल क्षेत्रफल 8,02,088 वर्ग किमी. (24.39%)और भौगोलिक क्षेत्रफल में वनों का हिस्सा 7,08,273 वर्ग किमी. (21.54%)। आदिवासियों कि ज्यादातर आबादी मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र, उड़ीसा और गुजरात में बसी है। जंगल में आदिवासियों का निवास स्वाभाविक है लेकिन अब स्थिति बदल रही है कॉरपोरेट घराना अपने कल कारखानों के लिए जंगल कि ओर रुख कर रहें हैं। ऐसे में जंगल का आकार सिमट रहा है और आदिवासी या तो पलायन कर रहें हैं या फिर अभाव प्रभाव से ग्रसित हो कर लुप्त हो रहें हैं। आंकड़ो को आधा गिलास भरा या आधा गिलास खाली समझना स्वःविवेक के ऊपर निर्भर करता है। आंकड़ो कि हकीकत को ईमानदारी से पढ़ा जाए तो आदिवासियों का जीवन सुखमय है यह बात कतई नहीं कहा जा सकता है।
आदिवासियों के विकास के लिए देश में मंत्रालय है, पूरा का पूरा एक सरकारी तंत्र है। लेकिन हकीकत में तन्त्र और मंत्रालयों द्वारा आदिवासियों के लिए किया जाने वाला विकास महज़ कागज़ी लगता है क्योंकि आदिवासीयों तक यदि विकास पहुँच रहा होता तो नज़र भी आता। आदिवासियों के रहन सहन का स्तर देखिए, शिक्षा,राजनीति खेल और सरकारी नौकरियों में कितना उनकों मौक़ा मिला है यह बात किसी से छुपा नहीं। क्या सब के सब नकारे और अयोग्य हैं? या उन्हें उनके हक़ से वंचित किया जा रहा है ?
आदिवासियों के विकास कि झांकी देखनी है तो देश के जंगल बाहुल्य इलाके में जा कर देखिए कैसे जीते है ये लोगों को कितनी सुविधा सरकार द्वारा दी जा रही है, कैसे विकास के नाम पर इनको विस्थापित किया जा रहा है, यकीन मानिए नीति नियति और नीयत तीनों से आपका साक्षात्कार हो जाएगा।
विकास और विस्थापन के कुचक्र में फंसी आदिवासी कौम इस कुचक्र को तोड़कर विकास की नई सुबह तो देखना चाहती है लेकिन क्या उसके लिए क़ीमत चुकाना होगा, उन्हें अपने पहचान को खोना होगा? क्या कारपोरेट घराना और सरकार आदिवासियों का विस्थापन करते समय पैकेज और मुआवजा के बज़ाय मानवीय दृष्टिकोण को अपना कर उनकों उनकी पहचान के साथ विकास कि नई सुबह दिखा सकती है,काश ऐसा हो, तो विकास के साथ साथ सभ्यता और संस्कृतियों का भी विकास हुआ होता।

सिंगरौली मध्यप्रदेश
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