-विनोद कुमार विक्की (स्वतंत्र लेखक सह व्यंग्यकार)

"मनुष्य अकेला जन्म लेता है लेकिन हमेशा बंधनों में बंधा रहता है" ये पंक्ति प्रायः सभी धार्मिक संस्थानों में तख़्तियों पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखी नजर आ जाती है।
जिसे पढ़ता तो हर टाइप का भक्त है लेकिन समझने की किडनी मेरा मतलब दिमाग किसी के पास नहीं है।
कहने का आशय यह है कि मनुष्य सिर्फ़ जन्म के समय ही स्वतंत्र है किंतु उसके बाद स्वतंत्रता और मनुष्य के जीवन के बीच कोई सारोकार नहीं रह जाता।फिर भी समस्त चराचर का विवेकशील प्राणी स्वतंत्रता/आजादी/मुक्ति नामक गूढ़ तत्व की चाह में जीवनपर्यन्त भटकता रहता है।भारत भूमि के सामजिक जीव संविधान के अनुच्छेद में आजादी को ढूंढते रहते है।जिसके बूते राष्ट्र को तोड़ने एवं राष्ट्राध्यक्ष को गरियाने तक का जिगरा हासिल कर लेते है।
आजादी एक ऐसा यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब 'अच्छे दिन' की तरह चड्डीधारी,खद्दरधारी,भगवाधारी से लेकर लाइसेंसी व गैर लाइसेंसी फतवाधारी तक लालटेन लेकर ढूंढ रहे हैं।
कभी कश्मीर की आजादी में दो मुल्क उलझते है तो राजनीति में फलाना पार्टी को ढिमकाने पार्टी से आजादी की चाहत।
इसमें दोराय नहीं कि कोई भी पार्टी देश में व्याप्त गरीबी,भूखमरी,भ्रष्टाचार आदि विसंगतियों की आज़ादी से ज्यादा विपक्षी पार्टियों से मुक्त भारत को ज्यादा तवज्जों दे रहे है।
भारत में निवास करने वाले प्राणियों को वैसी ही आजादी चाहिए जैसी की रिलायंस जियो ने शुरूवाती दौर में दे रखी थी।अब एक विवि के तथाकथित स्टूडेंट पर आजादी का खुमार इतना आमदा हो जाता है कि वे भारत के टुकड़े करने की घोषणा तक कर बैठते है।चलो चमड़े की जुबान खोलने की आजादी का इतना असर तो हुआ कि ये लोग देश को पिज्जा समझ कर टुकड़े करने का ख्वाब तो देखने लगे।
चार-पांच साल की गुड़िया को अपने हवस के नीचे रौंदने वाले श्रीमान रैपिस्ट को अपने इस कुकृत्य को महज भूल समझने की आजादी चाहिए जैसा कि यूपी के एक नेताजी ने माना था कि "लड़के है लड़कों से तो गलतियाँ हो ही जाती है"।
घाटी में पत्थर बाजों को सैनिकों पर पत्थर फेंकने की आजादी चाहिए।ईश्वर की अनमोल कृति खादी वस्त्र धारी नैतिक पुरूषों को सरकारी संपत्ति को पारिवारिक संपत्ति बनाने की आज़ादी चाहिए।
बिहार में भतीजा चाचा से आजाद हो कर अपना हूनर दिखाने की चाह रखते है तो चाचाजी शराब की तरह भतीजा एवं उनके परिवार से पूरे बिहार को आजाद करवाने में दिलचस्पी रखते है।
स्विस बैंक में अपनी गाढ़ी मलाई (कमाई)को जमा करने वाले धन्ना सेठ टैक्स हैवेंस देश की तरह भारत में टैक्स (कर) से आजादी चाहता है।
जिनका धरम खतरे में है वो सभी धर्मो को मिटाकर गैर मज़हब से आजादी चाहते है तो दूसरा समुदाय तथाकथित खतरेवाले संप्रदाय से अपने धर्म के उपर संभावित खतरे से आजादी को प्रयत्नशील है।
कई बंदे जन्नत एवं 72 हूर की आस में फिदायीन बन जीवन से आजादी की ख्वाहिश रखते है।इन बंदों को 72 हूर मिले ना मिले लेकिन अपने साथ ये मिनिमम 72 निर्दोष को यमराज शिविर के मेन गेट तक जरूर पहुँचा देते है।ऐसे ही लंबी लंबी दाढ़ी जटा वाले बाबा आइटम लोगों को सांसारिक मोह माया से आजाद होने का ज्ञान बांचते बांचते स्वयं ही इंद्रियों के वशीभूत हो गुलाम हो जाते है।अंततोगत्वा खुले स्थानों पर विहार चलाने वाला बाबा को करागार में आश्रय लेना पड़ता है।
कहने का सार यह है कि आजाद जन्म लेने वाला बंदा आजीवन संकीर्ण सोच,ओछी मानसिकता के गुलाम होकर आजादी सदृश कस्तूरी की तलाश में जीवनपर्यन्त भटकता रहता है और अंततः जीवन मरण के चक्र से ही आजाद हो जाता है पर आजादी बेवफा 'अच्छे दिन' की तरह धोखा दे जाती है।

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