-डॉ मोनिका ओझा खत्री*
भारतीय अर्थव्यवस्था पर परस्पर विरोधी खबरों के बावजूद कुछ अच्छी खबरें मिलने से मोदी सरकार एक बार फिर बल्ले बल्ले है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने जहाँ अर्थव्यवस्था ध्वस्त होने का बयान दिया है वहीँ विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में अर्थ व्यवस्था में व्यापक सुधार के संकेत दिए है।
भारतीय अर्थव्यवस्था नोटबंदी और जीएसटी के असर से धीरे-धीरे उबर रही है इसी का असर है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है। विश्व बैंक ने 2017 के अपडेटेड आंकड़े पेश करते हुए ये बात कही है। विश्व बैंक की तरफ से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने फ्रांस को 7वें पायदान पर ढकेल दिया है। इस रिपोर्ट में भारत जहां छठे पायदान पर है. वहीं, इस टेबल में सबसे आगे यूनाइटेड स्टेट्स की इकोनॉमी है। चीन ने इस टेबल में दूसरा रैंक हासिल किया है। चीन के बाद जापान, जर्मनी और ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था काबिज हुई है। भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर पेश किए गए ये आंकड़े 2017 में किए गए रिफॉर्म और बदलावों के आधार पर है। रिपोर्ट के मुताबिक 2017 के अंत तक भारत की अर्थव्यवस्था 2.597 खरब डॉलर की थी. इसी दौरान फ्रांस की इकोनॉमी 2.582 खबर डॉलर के बराबर थी।
विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा, कुछ तिमाही तक भारत की इकोनॉमी में गिरावट रही है. लेकिन बाद में मोदी सरकार की तरफ से शुरू किए गए रिफॉर्म्स ने सूरत बदली और अर्थव्यवस्था को रफ्तार मिली है। हालांकि प्रति व्यक्ति आय जीडीपी की बात करें तो इस मामले में भारत फ्रांस से अभी भी पीछे है. फ्रांस की प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत से 20 गुना ज्यादा है. इसके लिए भारत की जनसंख्या का ज्यादा होना वजह है. जहां भारत की जनसंख्या 134 करोड़ के पार है. वहीं, फ्रांस की जनसंख्या महज 6.7 करोड़ है। विश्व बैंक के मुताबिक भारत को मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आई बढ़त का सहारा मिला है। बैंक ने कहा कि भारतीय इकोनॉमी की रफ्तार अगर धीमी हुई है, तो इसके लिए नोटबंदी और जीएसटी जिम्मेदार थी. हालांकि संपूर्ण रूप में भारतीय अर्थव्यवस्था ने तेज विकास किया है. पिछले 10 साल में भारत की जीडीपी का आकार दोगुना हुआ है।
देश की अर्थव्यवस्था में मिले सुधार के संकेतों से मोदी सरकार को जहाँ सुकून मिला है वहीँ कांग्रेस अभी भी हमलावर है। मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल में सालाना औसत विकास दर सात प्रतिशत से अधिक रही तथा मुद्रास्फीति भी काबू में रही। आम लोगों को आसमान छूती महंगाई से राहत मिली। खाने पीने की चीजों के भाव भी उपभोक्ताओं की पकड़ में रहे। शुरू के दो सालों विशेषकर नोटबंदी के बाद आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं के भाव आम नागरिक की पहुँच से बाहर हो गए थे वे अब जाकर काबू में आये है जिससे जन साधारण को रहत मिली है। साथ ही राजकोषीय अनुशासन बरतते हुए राजकोषीय घाटे को भी नीचे लाने का काम किया गया। कांग्रेस ने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि नोटबंदी करने और वस्तु एवं सेवाकर को गलत ढंग से लागू करने के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था तबाही के कगार पर पहुंच गयी है और आम जनता का जीवन दुश्वार हो गया है।
अर्थव्यवस्था की सेहत का सबसे प्रमुख सूचक विकास दर है। मोदी सरकार से पहले 2013-14 में विकास दर 6.4 प्रतिशत थी जो 2015-16 में 8.1 प्रतिशत पर पहुंचने के बाद 2017-18 में 6.7 प्रतिशत पर आ गयी है। वित्त वर्ष 2017-18 की अंतिम तिमाही (जनवरी-मार्च) में देश की विकास दर 7.7 प्रतिशत रही है जो कि विश्वभर में उभरती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सर्वाधिक है। मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था में संतुलन स्थापित किया है। पेट्रोल और डीजल के मूल्य में हुई बढ़ोतरी का कारण वैश्विक बाजार है जिस पर किसी का खास नियंत्रण नहीं है। इस पर विभिन्न प्रकार के कर लगाकर सरकार अपने राजस्व में वृद्धि करती है। तेल के भावों में अप्रत्याशित वृद्धि से हालाँकि आम जन आहत हुआ है और हमारी अर्थव्यवस्था पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है मगर हमारे लिए यह संतोष की बात है कि अन्य उपभोक्ता वस्तुए सस्ती होने से सरकार की साख बिगड़ने से बची रही। हालाँकि सरकार चाहे तो करों में कमी लेकर तेल के भाव नीचे ला सकती है। मगर बताया जाता है तेल के राजस्व में कमी के दूरगामी परिणाम विकास को अवरुद्ध करसकते है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि मोदी सरकार ने महंगाई पर काबू पाने में निश्चय ही सफलता हासिल की है। गरीबों को सताने वाली महंगाई पर लगाम लग गयी है। महंगाई को थामने के लिए मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के रूप में न सिर्फ एक तंत्र बनाया बल्कि राजकोषीय अनुशासन बनाए रखाजिससे मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाना संभव हुआ। वित्त वर्ष 2012-13 में औसतन 10 प्रतिशत और 2013-14 में 9.4 प्रतिशत के स्तर पर रहने वाली खुदरा महंगाई दर 2016-17 में साढ़े चार प्रतिशत तथा पिछले वित्त वर्ष में चार प्रतिशत के आस-पास आ गयी है। थोक महंगाई दर भी इस अवधि में छह-सात प्रतिशत के स्तर कम होकर एक-दो फीसद के आस-पास आ गयी है। हालांकि कुछ महीनों से महंगाई दर में फिर बढ़ोत्तरी का ट्रेंड देखने को मिला है।

*लेखक वाणिजय एवं अर्थशास्त्र की व्याख्याता है
डॉ मोनिका ओझा खत्री
134 गुरुनानक पुरा, राजापार्क
जयपुर ,राज

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