-बाल मुकुंद ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)
इस वर्ष होने वाले राजस्थान विधान सभा के चुनाव में राष्ट्रीय दलों के सामने तीसरा मोर्चा भी अंगड़ाइयां लेने लगा है। हालाँकि धोरां धरती तीसरे मोर्चे के लिए कभी उर्वरा नहीं रही मगर समय समय पर कांग्रेस और भाजपा से निकलने वाले नेताओं ने तीसरे मोर्चे को गठित कर राष्ट्रीय दलों को चुनौती अवश्य दी। तीसरे मोर्चे का ध्वज फहराने के लिए प्रदेश के कई कद्दावर नेताओं ने पसीना बहाया मगर उनके प्रयास सफलीभूत नहीं हुए। हार फिर कर ये नेता वापस अपनी मूल पार्टी में शामिल होने में ही अपनी भलाई समझी।
आजादी के बाद से ही राजस्थान में बहुकोणीय मुकाबला होता आया । कांग्रेस के समक्ष उस समय राम राज्य पार्टी ,जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी ,समाजवादी, भारतीय क्रांति दल, लोक दल और जनता दल अलग अलग चुनाव लड़ते थे। किसान नेता कुम्भा राम आर्य, दौलत राम सारण और नाथूराम मिर्धा ने प्रदेश में किसान मुख्यमंत्री बनाने को लेकर तीसरे मोर्चे की हुंकार भरी थी मगर सफल नहीं हुए। 2003 में कद्दावर राजपूत नेता देवी सिंह भाटी ने सामाजिक न्याय मंच के बैनर तले तीसरे मोर्चे की नींव रखी मगर भाटी के अलावा कोई चुनाव नहीं जीत सका और यह मोर्चा भी चुनाव के साथ ही दफन हो गया। पिछले चुनाव में डॉ किरोड़ी मीणा ने तीसरे मोर्चे का जज्बा जगाया था मगर 5 सीटों पर सिमट कर वह भी फेल हो गया।
दिसम्बर 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले किरोड़ी मीणा तीसरे मोर्चे को त्याग कर भाजपा में शामिल हो गए है और पिछले विधानसभा चुनाव में सर्वाधिक वोटों से जीतने वाले विधायक घनश्याम तिवाड़ी भाजपा से निकल कर मीणा की जगह ले ली है। तिवाड़ी ने भाजपा से बाहर आकर भारत वाहिनी पार्टी बनाली है। दूसरी तरफ विधायक हनुमान बेनीवाल प्रदेश में जगह जगह किसान रैली का आयोजन कर अपनी अलग दुंदुभी बजा रहे है। करणी सेना भी तीन चार वर्षों से अपनी सियासी ताकत बढ़ाने में लगी है हालाँकि करणी सेना भी दो टुकड़ों में विभाजित है। आनदपाल की मौत के बाद करणी सेना अधिक मुखर हो रही है।
चुनावी साल में राजस्थान में भाजपा से नाराज नेताओं ने तीसरा मोर्चा गठित करने की कवायद शुरू कर दी है। तीसरा मोर्चा बनाकर चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को टक्कर देने का चक्रव्यूह रचा जा रहा है और इसके रचयिता इस बार भाजपा छोड़कर आने वाले वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवारी है। तिवारी चाहते है कि बेनीवाल के रूप में उन्हें हनुमान मिल जाये। साथ ही करणी सेना के नाम से वसुंधरा से नाराज राजपूतों का समर्थन हासिल हो। दलितों के नाम पर भी किसी नेता को उभारने के प्रयास किये जा रहे है ताकि दलितों की नाराजगी को भुनाया जा सके। यदि इनके साथ वसुंधरा से नाराज गुर्जर नेता किरोड़ी सिंह बैंसला. पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सुमित्रा सिंह राजपूत नेता मानवेन्द्र सिंह और लोकेन्द्र कालवी भी आजाते है तो प्रदेश में वसुंधरा के नेतृत्व को चुनौती देने और तीसरे मोर्चे के बनने में देर नहीं लगेगी। जाट, गुर्जर ,मीना और राजपूत प्रदेश की मार्शल जाति में गिने जाते है। हाल ही में हुए अजमेर और अलवर लोकसभा उपचुनाव में सभी 17 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा की करारी हार के पीछे इन जातियों के गहरी नाराजगी थी जिसका खामियाजा वसुंधरा राजे को उठाना पड़ा। ये चारों ही जातियां विभिन्न कारणों से वसुंधरा से नाराज है। तिवाड़ी के साथ ब्राह्मण भी इनके साथ आजाते है तो प्रदेश की राजनीति में बदलाव की बयार को बहने से कोई नहीं रोक पायेगा। तिवाड़ी का नेतृत्व इन सभी जातियों के लिए सोने में सुहाग होगा। कमोवेश ये सभी नेता वसुंधरा को राजस्थान से निपटाना चाहते है और इससे अधिक अच्छा मौका इन्हें दुबारा नहीं मिलेगा। यह तो भविष्य ही बताएगा कि तीसरे मोर्चे का यह सपना पूरा होगा या पूर्व की भांति राजनीति के गर्भ में ही समा जायेगा। फिलहाल अंदरखाने शतरंज की गोटियां बैठाये जाने लगी है।
राजस्थान में कई बार तीसरे मोर्चे की बुनियाद रखी गई मगर हर बार दीवार खड़ी होने से पहले ही धराशाही हो गई। आजादी के बाद राज्य में तीस साल तक कांग्रेस का एकछत्र राज रहा। 1977 में पहली बार कांग्रेस का राज पलटा और विभिन्न दलों को मिलाकर बनी जनता पार्टी सत्तारूढ़ हुई। बाद के दो दशकों में राज्य की राजनीति अस्थिर रही। जनता पार्टी टुकड़े टुकड़े होकर बिखर गई। भाजपा के रूप में जनसंघ का पुनः उदय हुआ। इस पार्टी ने कद्दावर नेता भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में विभिन्न क्षेत्रीय और अपने अपने इलाकों में जमीन से जुड़े नेताओं को भाजपा में शामिल कर पार्टी को मजबूत बनाया। इस भांति प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा में सीधे मुकाबले की स्थिति बनी। साम्यवादी समाजवादी और अन्य जातीय दल मिलकर तीसरा मोर्चा खड़ा नहीं कर पाए। राजपूत नेता कल्याण सिंह कालवी देवीसिंह भाटी जाट नेता कुंभा राम आर्य नाथू राम मिर्घा दौलत राम सहारन लाख प्रयासों के बाद भी राज्य में तीसरा मोर्चा खड़ा नहीं कर पाए। 2013 के विधान सभा चुनाव में एक बार फिर तीसरे मोर्चे की नीवं खड़ी करने के लिए किरोड़ी लाल मीना और हनुमान बेनीवाल ने हुंकार भरी। एक बारगी लगा कि 20-30 सीटें जीत कर यह मोर्चा कामयाब होगा मगर मात्र 5 सीटों तक सीमित रहकर यह सपना साकार होने से पूर्व खंडित हो गया। इस चुनाव में नरेंद्र मोदी और वसुंधरा के करिश्में के आगे किसी की नहीं चली।
राजस्थान विधानसभा के आम चुनाव में अब 5 महीने रह गए है। राजनीतिक पार्टियों ने अपने अपने चुनावी हथियार संभाल लिए है और गर्जना शुरू करदी है। चुनाव के नगाड़े बजने शुरू हो गये हैं। राजनीतिक दलों ने व्यूह रचना और नेताओं ने चक्रव्यूह की तैयारी शुरू कर दी है। राजनीतिक दल अपने अपने स्तर पर चुनावी तैयारियों में व्यस्त होगये है। सत्तारूढ़ भाजपा को एंटी इंकमबेंसी का सामना करना पड़ रहा है। प्रदेश की पिछले कई सालों से यह परम्परा रही है कि सत्तारूढ़ पार्टी दूसरा चुनाव फतेह नहीं कर सकी। इस भांति इस बार कांग्रेस की बारी है मगर भाजपा हर हालत में दूसरी विजय हासिल करने के लिए युद्धस्तर पर प्रयत्नशील है। दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को तीसरे मोर्चे के गठन से अपनी चुनावी जीत की संभावनाओं में चिंता सताने लगी है।

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218, E-mail : bmojha53@gmail.com

Share this article

AUTHOR

Editor

हमारे बारे में

नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

ताज़ा ख़बरें