-डा. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

केन्द्र सरकार ने जल्दी ही करीब सवा दो लाख कंपनियों को बंद करने के संकेत दे दिए है। इससे पहले गए साल सरकार ने 2 लाख 26 हजार 166 फर्जी कंपनियां चिन्हित कर डीरजिस्टर्ड करने का कठोर कदम उठा चुकी है। 3 लाख से अधिक निदेशकों को अयोग्य घोषित किया जा चुका है। विचारणीय यह है कि गए साल 2 लाख 26 हजार कंपनियों के डीरजिस्टर्ड होने और इस साल भी कंपनियों के डीरजिस्टर्ड करने के संकेत देने के बावजूद अभी तक हंगामा नहीं बरफा है। इसका कारण भी साफ हो गया है कि देश में फर्जी कंपनियों की संख्या हजारों में ना होकर लाखों में हैं और इन कंपनियों के माध्यम से कंपनी धारकों द्वारा अपने अनियमित हित साधे जाते हैं। इन कंपनियों द्वारा गत दो सालों से रिटर्न दाखिल नहीं किए गए हैं। इससे साफ हो जाता है कि इन कंपनियों ने आय के खातें में कुछ दिखाया ही नहीं है। सरकार ने फर्जी या यों कहे कि कागजी कंपनियों के खिलाफ कार्यवाही का पिछले दो साल से अभियान सा चला रखा है। यह सबसे बड़ी कार्यवाही है। हांलाकि विपक्षी व प्रतिक्रियावादियों की यह प्रतिक्रिया हो सकती है कि सरकारी नीतियों के चलते केवल एक माह में ही एक लाख से अधिक कंपनियां बंद हो गई और औद्योगिक विकास प्रभावित हो गया। बेरोजगारी बढ़ गई। पर समझना यह होगा कि यह सभी कंपनियां केवल कागजी कंपनियां थी और इन कंपनियांे के माध्यम से केवल और केवल सरकार के चूना लगाना उद्देश्य था।
''एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में इस समय यही कोई 15-16 लाख कंपनियां पंजीकृत है। इनमें से एक तिहाई कंपनियों द्वारा रिटर्न या लेखे ही प्रस्तुत नहीं करना अपने आप में गंभीर प्रश्न है। प्रश्न यह उठता है कि जब सालाना आय जीरो है तो यह कंपनियां कुछ भी नहीं कर रही है। इसके अलावा बहुत से कंपनियां ऐसी भी है जो थोड़ा बहुत कारोबार दिखाते हुए टेक्स बचाने का काम कर रही है। देखा जाए तो आर्थिक सुधारोें और कर दायरें में कर चोरों को लाने के लिए सरकार ने योजनावद्ध तरीके से प्रयास किए है। सरकार की मंशा को असल में आम आदमी ही क्या बहुत से आर्थिक विश्लेषक और राजनीतिक दल भी समझ नहीं पाए। केवल और केवल सरकार के निर्णयोें की आलोचना करने में ही उलझ कर रह गए। विदेशों से काला धन वापिस नहीं लाने के लिए सरकार की विफलता बताते हुए आलोचना में उलझे रह गए जबकि सरकार ने देश के अंदर और बाहर कालाधन पर कारगर रोक लगाने की दिशा में आगे बढ़ती रही। अब यह देखो की पहले गरीब से गरीब देशवासी को शून्य बैलेन्स पर बैंकों में जन धन खातों खुलवाकर सीधे बैंकांे से जोड़ा गया। इसके बाद खातों से आधार नंबर को जोड़ा। खाते हैं तो पेन कार्ड से अधिक से अधिक लोगों को जोड़ने का अभियान चला दिया। डीबीटी योजनाओं को आधार से लिंक कर दिया। सीधे आपके नाम और पते के आधार पर आपके सभी खातों पर सरकार की नजर हो गई। इसके बाद सरकार ने बिना समय गंवाए जुलाई 2017 से जीएसटी लागू कर दिया। हांलाकि जीएसटी में सुधार की प्रक्रिया निरंतर जारी रखते हुए सरकार ने साफ संदेश दे दिया कि सरकार किसी को परेशान नहीं करना चाहती बल्कि एक देश एक कर व्यवस्था को लेकर आगे बढ़ रही हैं और जीएसटी की निरंतर समीक्षा की प्रक्रिया जारी रखी जा रही है ताकि आवश्यकता व समयानुकूल व्यावहारिक सोच अपनाते हुए दरों में आसानी से बदलाव किया जा सके।
असल में सरकारी योजनाओं का बेजा फायदा उठाने, कर बचाने के नए-नए तरीके अपनाने पर सरकार की अब सीधी नजर हो गई है। जीएसटी लागू करते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के चार्टेड एकाउंटेटस के आयोजन में उन्हीं को संबोधित करते हुए साफ साफ कहा कि कर चोरी का रास्ता बताने में सीए अधिक सक्रिय है। उन्होंने साफ कर दिया कि कारोबारी सीए की सलाहों के आधार पर ही काले धन को सफेद करने में जुटते हैं वहीं कर चोरी के रास्ते भी सीए के माध्यम से ही कारोबारियों को प्राप्त होती है। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इस तरह की कार्यवाही करने वाले सीए को एक तरह से चेतावनी भी देदी थी। पर इससे देर सबेर सरकार इस तरह की गतिविधियों में लिप्त चार्टेड एकाउंटेटस पर कार्यवाही करने में भी नहीं हिचकेगी यह साफ संकेत दिए गए।
दरअसल सरकारी भाषा में कहे तो विमुद्रीकरण के बाद से सरकारी एंजेंसियां खासतौर से आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई समेत आर्थिक गतिविधियों पर नजर रखने वाली संस्थाएं अतिसक्रिय हो चुकी है। यही कारण है कि फर्जी कंपनियों में काला धन खपाने वाले लगातार सरकारी एंजेंसियों की स्केनिंग में आ चुकी है। देर सबेर इस तरह की संस्थाएं सामने आने वाली है। सरकार ने साफ कर दिया कि सरकार अब इस तरह की गतिविधियों को अधिक दिन तक चलने नहीं देगी।
मुखोटा कंपनियों को डीरजिस्टर्ड करने का निर्णय इस मायनें में महत्वपूर्ण हो जाता है कि साल के अंत में तीन बड़े व प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, लोकसभा का चार साल का कार्यकाल पूरा हो चुका है और अब केन्द्र सरकार भी चुनाव मोड पर आ चुकी है। इलेक्शन मोड के बावजूद लाखों की संख्या में फर्जी कंपनियों पर सिकंजा कसना सरकार की मंशा को साफ कर देता है कि सरकार चुनावी वर्ष में भी कठोर आर्थिक निर्णय लेने में नहीं हिचकेगी और आर्थिक अपराधियों से सख्ती से निपटने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी। इसे यों समझा जा सकता है कि 15-16 लाख कंपनियों में से पहले 2लाख 26 हजार को डीरजिस्टर्ड करना और अब सवा दो लाख कंपनियों को डीरजिस्टर्ड करने के संकेत से साफ हो जाता है कि एक तिहाई कंपिनयां केवल और केवल कागजों में या यों कहे कि मुखोटा कंपनियों के रुप में ही रजिस्टर्ड होकर सरकारी योजनाओं व सुविधाओं का किसी ना किसी तरह से लाभ उठाने के साथ ही लेखे प्रस्तुत नहीं करना यह दर्शाता है कि वित्तीय अनियमितताओं या कर समायोजन में लगी हुई है। सोचने की बात यह है कि देश में पांच लाख कंपनियां बंद हो जाए तो हाहाकार मच जाना चाहिए था, हंगामा हो जाना चाहिए था, पर ऐसा नहीं होने का साफ मतलब है कि सरकार द्वारा जिन कंपनियों का पंजीयन रद्द किया गया है या किया जा रहा है वास्तव में वह मुखौटा कंपिनयों के रुप में कारोबारी हित साधने वाली कंपनियां ही है। सरकार को आर्थिक अपराध में भागीदार कंपनियों या निदेशकों पर सख्ती तो डठानी ही होगी ताकि देश में स्वच्छ कारोबारी माहौल बन सके।

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