-नीरज त्यागी
किसी भी कहानी को लिखना उस वक्त निरर्थक हो जाता है जब उस कहानी का वास्तविक संबंध कहीं ना कहीं आपके जीवन में घटी घटना पर आधारित ना हो। आज मैं कुछ ऐसी ही घटना का उल्लेख करने जा रहा हूं जिसे शायद आप मेरे जीवन की एक लघु कथा भी कह सकते हैं लगभग एक वर्ष पुरानी बात है मेरे मित्र रवि जिसकी माँ काफी लंबे समय से बीमार चल रही थी,बीमारी का आलम कुछ ऐसा था कि हर व्यक्ति को ऐसा लगने लगा कि बस अब रवि की माँ को जीवन मृत्यु के मोह से बाहर निकल जाना चाहिए। रवि गाजियाबाद से दूर बेंगलुरु में जॉब करता है अपनी जॉब में बहुत व्यस्त होने के कारण कम ही मोको पर अपने घर आ पाता था।लंबे अरसे से बीमारी में झुंझती हुई रवि की माँ का अचानक एक दिन स्वर्गवास हो गया। सुबह से शाम तक रवि का इंतजार किया गया।रात्रि के समय रवि घर पर पहुचा।तब ऐसा निश्चित किया गया उसकी माँ का दाह संस्कार सुबह किया जाएगा। सुबह-सुबह रवि की माँ को अंतिम यात्रा पर ले जाने की तैयारियां शुरू हो गयी।रवि के परिवार से कुछ इस तरीके का हमारे परिवार का मिलना जुलना था कि हम भी समय पर वहां पहुंच गए अभी हम रवि सभी बस निकलने के लिए तैयार ही थे कि मैंने देखा सफेद कुर्ते पाजामा पहने रवि अपनी माँ को अंतिम यात्रा पर ले जाने के लिए एक दम से तैयार था।अपनी खराब आदत होने के कारण मैंने रवि से पूछ ही लिया कि अपने आप को इस प्रकार सजाने की सलाह किसने दी।रवि ने बड़ी ही बेफिक्री से ऐसा जवाब दिया कि मेरा दिमाग एक दम सुन्न हो गया।उसने मुझे बताया कि बहुत से ऐसे परिचित लोग आने वाले है जो कि बड़ी अच्छी अच्छी सरकारी नोकरियो में है और काफी बड़े बड़े अधिकारी है और उनके परिवार के पंडित जी की भी ऐसी ही सलाह है।ऐसी बाते सुनकर मन बडा व्यथित हुआ और एक कोफ्त सी अपने आप से होने लगी।जिन पंडितो की बात मानकर आज हम लोग ऐसी दुखान्त घटनाओं पर भी सज सवरकर घर से निकलते है।वो पंडित आपकीं चापलूसी कर कर ही जीवन मे आगे बढ़े है।पता नही मैं सही हूँ या गलत पर मुझे ऐसी सोच वाले व्यक्तियों से एक घिन सी आती है।अंत मे यही कहूँगा कि ये मेरी सोच है जरूरी नही ये बाते सभी को सही लगे।मेरी वजह से किसी के दिल को ठेश लगे तो माफी चाहूँगा।


E-mail : neerajtyagi262@gmail.com
ग़ाज़ियाबाद (उ. प्र)

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