-रमेश ठाकुर
सदी की सबसे बड़ी प्रघटना के रूप में दर्ज हो गई अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया प्रमुख किम जोंग के बीच हुई मुलाकात। दुनिया को दो दुश्मनों के मिलन से युद्व की विभीषिका से मुक्ति के सकारात्मक प्रतिसाद मिला है। मुलाकात के मायने भविष्य में कैसे निकलेंगे वह और बात है लेकिन दोनों कट्टर दुश्मनों का एक साथ बैठना भी किसी चमत्कार से कम नहीं। ट्रंप-जोंग की मुलाकात को कोरियाई प्रायद्वीप के अलावा पूरी विश्व विरादरी में शांति के उजाले के फैलने जैसा देखा जा रहा है। इन दोनों का न मिलना दुनिया के खत्म होने जैसा था। संकीर्ण सोच के जोंग के सनकी मंसूबों से दुनिया बाकिफ हो चुकी थी। वह कब क्या कर बैठे किसी को नहीं पता था। दशकों से एक-दूसरे को नेस्तनाबूद करने की धमकी देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया प्रमुख किम जोंग उन जब सिंगापुर में मिले तो पूरी दुनिया में उत्सुकता देखी गई। सबकी नजरें दोनों की मुलाकात पर टिकी हुईं थी। मुलाकात में दुनिया जो उम्मीद लगाए बैठी थी हुआ भी वैसा ही। दोनों नेताओं ने अपनी ऐतिहासिक शिखर वार्ता के बाद हुए समझौते में जहां किम जोंग उन ने भविष्य के लिए परमाणु निरस्त्रीकरण के लिये प्रतिबद्धता जताई तो वहीं अमेरिका ने प्योंगयांग को सुरक्षा की गारंटी देने का वायदा किया। एक बात यह भी सच है अगर वार्ता के बाद जोंग अपनी बात से पलटते हैं तो अमेरिका जोंग के साथ भी सद्दाम हुसैन जैसा हाल करने में देरी नहीं करेगा।
डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग के महामिलन पर हिंदुस्तान ने भी खुशी जताई है। विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने अपने संदेश में कहा है कि अब कोरियाई प्रायद्वीप में शांति की बहाली होगी। उन्होंने विशेषतौर पर सिंगापुर की प्रशंसनीय भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि दोनों शासनाध्यक्षों के मिलने की पटकथा सिंगापुर ने ही लिखी। निश्चित रूप से इस मुलाकात के बाद अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच संबंधों का नया युग शुरू हुआ। दोनों मुल्कों के अलावा दुनिया के लिए भी खुशी की बात है। क्यों अब सभी देशों ने अपने सिर पर मंडराते युद्ध के बादलों के छंटने के बाद चैन की सांस जो ली है। उम्मीद अब इस बात की है कि इसके बाद दोनों नेता अपनी चुबान से पल्टे नहीं। मेल-मिलाप में कोई खोट नहीं होनी चाहिए। हालांकि सनकी उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग उन पर अमेरिका एकदम भरोषा नहीं करेगा। मुलाकात के बाद उनकी हर एक गतिविधियों पर गहरी नजर रखेगा। इसके बाद भी अगर किम जोंग उन कोई हरकत करता है तो उसे अमेरिका माकूल जबाव देने में देरी नहीं करेगा। जिसका जिम्मेदार वह खुद ही होगा।
कहावत है कि देर आए दुरूस्त आए। इस वार्ता के बाद पुरानी कटुता पर विराम लग गया यह हम सबके लिए खुशी की बात है। क्योंकि यह समय की दरकार है। खैर, डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग के बीच जब वार्ता खत्म हुई तो दोनों नेताओं ने हंसते हुए साझे बयान पर हस्ताक्षर किए। दरअसल इस दृश्य को देखने के लिए पूरी दुनिया की आंखे पथरा सी गई थीं। ट्रंप ने मीडिया वार्ता के बाद संकेत दिये कि उत्तर कोरिया में शीघ्र ही परमाणु निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया पर काम शुरू हो जाएगा। दुनिया भर में इस बात की जिज्ञासा थी कि दोनों नेताओं की तुनकमिजाजी के अलावा उम्र का जो लंबा फासला है, वह क्या इस वार्ता को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचा पाएगा। इस वार्ता के बाद निःसंदेह कोरिया प्रायद्वीप को युद्ध की विभीषिका से बचाने की दिशा में इस पहल को पूरी दुनिया में सकारात्मक प्रतिसाद मिला है।
ट्रंप और किम जोंग के बीच मुलाकात का संयोग भी काफी कठिनाईयों के साथ बना। अमेरिका ने पहले मिलने से मना कर दिया था। लेकिन जब कुछ देशों का दवाब बढ़ा तो राजी हुआ। सिंगापुर के सैंटोसा द्वीप में हुई इस शिखर वार्ता को जहां दुनिया में शांति कायम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दुनिया से अलग-थलग रहने वाले उत्तरी कोरिया के दुनिया से जुड़ने का अवसर है। निश्चित रूप से यह घटनाक्रम कोरियाई द्वीप में सामरिक रणनीति में बदलाव का वाहक बन सकता है। डेढ़ साल तक एक-दूसरे को तबाह करने की धमकी देने वाले ट्रंप व किम जब बातचीत के लिये राजी हुए तो दुनिया के देशों ने सुकून महसूस किया। निश्चित रूप से सवाल  उठ रहे हैं कि क्या इस शिखर वार्ता के बाद चीन व उत्तर कोरिया के रिश्तों में फर्क आयेगा? क्या अमेरिका उत्तर कोरिया के ज्यादा करीब आयेगा? क्या यह कदम कोरियाई एकीकरण की दिशा में बढ़ेगा? निश्चित रूप से यह वार्ता संभावनाओं से भरी है। यहां सवाल उत्तर कोरिया की जर्जर अर्थव्यवस्था का भी है और उत्तर कोरिया में मानवाधिकार हनन के मुद्दे का भी। यह भी कि उस पर लादे गये आर्थिक प्रतिबंधों को अमेरिका कितनी जल्दी हटाता है? इससे पहले किम जोंग उन ने अपने दो परमाणु परीक्षण केंद्रों को नष्ट करके  और तीन अमेरिकी नागरिकों को रिहा करके संदेश देने का प्रयास किया था कि वह निरस्त्रीकरण की दिशा में गंभीर हैं।
उत्तर कोरिया दशकों से अपनी नापाक हरकतों के कारण दुनिया से अलग रहा है। दूसरे देशों ने भी उत्तर कोरिया को ज्यादा तबज्जों अबतक इसलिए नहीं दी क्योंकि उन्होंने बात बात पर परमाणु विस्फोट करने की धमकी दी। लेकिन अब उनके परमाणु निरस्त्रीकरण की कसम खाने के बाद पूरी दुनिया ने उन्हें अपनाने का मौका दिया है। इस मौके को वह कैसे स्वीकार करता है यह जोंग पर निर्भर करता है। अगर इसके बाद भी परमाणु का बेजा इस्तेमाल होगा तो उसका खामियाजा उन्हें तत्काल भुगतना होगा। इसी तरह की गलती कभी सद्दाम हुसैन ने भी की थी। समझाने के बावजूद भी अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आए। अंजाम क्या हुआ पूरी दुनिया ने देखा। जांेग को इसके बाद अमेरिका दूसरा मौका नहीं देगा। जोंग की तानाशाही के चलते उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से जर्जर है। दूसरे देशों से आयात-निर्यात के तकरीब रास्ते बंद हैं। पर्यटक उत्तर कोरिया जाने से भी कतराते हैं। कुल मिलाकर वहां कोई भी जाना उचित नहीं समझता। इस लिहाज से जांेग को दुनिया के साथ कदम ताल मिलाकर चलना ही उचित होगा। क्योंकि समय की दरकार भी यही है।


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