-विनोद कुमार विक्की (स्वतंत्र लेखक सह व्यंग्यकार)


श्रीमान जी गजब के लेखक है।जनाब लिखते कम लेकिन छपते ज्यादा है।हो गए ना आप भी हैरान। जी हाँ ये बिलकुल सच है।
बंदे के पास ना तो बंगाली बाबा का कोई जंतर है और ना ही उसने पी सी सरकार की तरह जादू का क्रैश कोर्स किया है।बावजूद इसके आए दिन जनाब भंगार मेल,कबाड़ मेल,जुगाड़ मेल,बेकार मेल आदि पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य के लिए निर्धारित पेज पर पोज वाले तस्वीर के साथ नजर आ जाते है।
दैनिक पत्र से लेकर साप्ताहिक,पाक्षिक,मासिक,त्रैमासिक,अर्द्धवार्षिक,वार्षिक आदि पत्र-पत्रिका तक श्रीमानजी की लेखनी का डंका बजता है वो भी नूरानी चेहरे वाली फोटो के साथ।
मैने प्रसंग के प्रारंभ में कहा कि वे लिखते कम छपते ज्यादा है तो आप सोच रहे होगें कि आखिर श्रीमान जी 'कम लिखो खूब दिखो' जादू के लिए कौन सी तकनीक का इस्तेमाल करते है! श्रीमान जी की साहित्यिक तकनीक का नाम है "बदलो नाम दिखो आम"।
जी बिल्कुल सही समझे आप। जनाब रचते तो तो है एकाध ही कविता,कहानी पर शीर्षक का नाम दर्जनों रखते है।
जिसप्रकार घर परिवार में किसी एक ही बच्चे को दर्जनों नाम का पेटेंट हासिल होता है यथा घर में गोलू ,स्कूल में श्रेयश,दादा-दादी के लिए पुट्टू,माँ के लिए शोना,मुहल्ला में मोटू, अजनबियों के लिए छोटूआदि आदि।ठीक उसीप्रकार श्रीमानजी अपनी एक ही कविता या कहानी को ढेर सारे शीर्षक दे देते है साथ ही उस इकलौती कालजयी रचना को सभी पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग शीर्षक के नाम से चेंप देते है।
कभी-कभी तो एक ही रचना को बिना परिवर्तित किए सभी जगह मेल कर देते है।कभी-कभी साल भर पर दुसरी पत्रिकाओं में रीपीट कर उसी कालजयी रचना को छपवाते है मानों रचनाएँ ना हुई स्कूल काॅलेज का टेक्सट बुक हो जिसका प्रतिवर्ष नया संस्करण आवश्यक हो।
इनपुट कम आउटपुट मैक्सिमम का मैनेजमेंट कोर्स करने वाले श्रीमानजी लिखते तो एक ही रचना है लेकिन दैनिक से वार्षिक तक उसी इकलौती या गिनी चुनी रचना के साथ अलग अलग शीर्षकों से फेसबुक पर अपनी लेखन कुशलता की उपस्थिति दर्ज कराते रहते है।
ये तो बात हुई लेखक महोदय की अब आइए चर्चा करते है श्रीमानजी के पाठक वर्ग की।
लेखक मियां तो लेखक मियां पाठक मियां सुभानाल्लाह!
इनके पाठक इनके एक ही रचना को दैनिक से वार्षिक अवधि तक झेलते रहते है बावजूद इसके फेसबुक पर नुमाईश(कमेंट्स व लाइक) के लिए लगाए गए इनकी कटिंग को नजरअंदाज करने की बजाय वो रचनाओं पर जमकर टिप्पणी करते है।
कई बुद्धिजीवी पाठक तो बगैर पूरी रचना पढ़े बधाई ठोक देते है।लेखक महोदय भी कंफर्म नही हो पाते कि आखिर बधाई उन्हें रचना के लिए मिल रही है या ऐसी रचना के छप जाने पर।
कुछ पाठक तो ऐसे जिगरा वाले होते है जो धुंधली अस्पष्ट स्क्रीनशाॅट रचना पर 'वाह क्या लिखा है,शानदार,जबरदस्त,जिंदाबाद,बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति, सुंदर कटाक्ष,बेहतरीन, नाइस,वाउ आदि कमेंट्स के मानसून से से लेखक की लेखनी को ग्लूकोज देने का काम करते है।
यहाँ तो लेखक महोदय भी चकरा जाते है कि बंदे ने आखिर किस माइक्रोस्कोप की सहायता से मेरी धुंधली अस्पष्ट रचना को पूरा पढ़ लिया जो अश अश कर रहा है।
जिसप्रकार बिहार एक्सप्रेस से तिहाड़ एक्सप्रेस तक एक ही रचना को छपवाकर फेसबुक पर शेयर करने वाले मजबूत गुर्दा के स्वामी लेखक महोदय है उसीप्रकार उससे डबल स्ट्रैंग्थ मेमोरी वाले उनके प्रशंसक व पाठक वर्ग है जो एक ही रचना को थोड़े समयांतराल पर पुनः पढकर(संदेहास्पद) इतनी जबरदस्त प्रतिक्रिया देते है मानों उनके चहेते श्रीमानजी ने प्रकाशित होने के अगले ही क्षण उस फ्रेश रचना को फेसबुक पर लांच किया हो और पहली बार पाठक को उस रचना का रसास्वादन प्राप्त हुआ हो।

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