-डा. आशा चैधरी,

उस रात बच्चों की जिद थी कि सोऐंगे तो कहानी सुन कर ही सोएंगे ! फुरसत के क्षणों में अखबार और कुछ चुनिंदा पत्रिकाएं लिये उस रात मैं उनके सामने बेबस बैठी थी। दो मेरे बेटे, एक मेरी बहन का बेटा, तीनों जब जिद पर आते हैं तो अपनी मनवाकर ही रहते हैं, ये सो जाएं तो ही पढ़ सकूंगी कुछ।
‘‘हाँ तो सुनो एक राजा था’‘ -
‘‘नहीं-नहीं, राजा-रानी की कहानी नहीं सुननी’‘
‘‘ये तो पुरानी कहानी है’‘ -
‘‘तो एक हंस था . . . . .’‘
‘‘नहीं-नहीं ये वाली भी नहीं’‘
‘‘जू में एक लंगूर था . . . . ’‘
‘‘नहीं-नहीं लंगूर वाली भी नहीं’‘
मैं एक-एक कहानी का नाम भर लेती और वे तीनों के तीनों उसे पूर्ण बहुमत से अस्वीकार कर देते। अब और कहां से लाऊं नई कहानी ? सारा तो कहानियों का मेरा स्टाॅक ये लोग सुन चुके हैं ! चंदा मामा से लेकर रामायण-महाभारत तक की अपनी याददाश्त की सारी परीक्षा देती आई हूं आज तक इन लोगों के सामने। अब तो दिमाग में कुछ और सूझ ही नहीं रहा
‘‘मम्मी सोच रही हैं, अब जरुर कोई नई कहानी सुनने को मिलेगी . . .‘‘ बच्चों की खुशी व बैचेनी उनकी आँखों से नींद उड़ाए दे रही है। ये लोग मानेंगे नहीं सो, मेरी दिमागी लायबे्ररी से जो कहानी मेरे हाथ आई तो आप भी सुनिये .....
‘‘एक मम्मी थीं, एक पापा थे . . . . ‘’
‘‘ओहो ! अब आप बोलोगी कि मम्मी कहती थीं कि रात को जो बच्चे ब्रश करके नहीं सोते‘‘ . . .’
‘‘नहीं-नहीं, ये ऐसी कहानी नहीं, मैं तुम्हें एक सच्ची-मुच्ची की कहानी सुनाने जा रही हूं। बीच-बीच में बोलोगे तो कहानी सुनाना बंद’‘ . . . .
‘‘अच्छा-अच्छा अगर कोई सुनी हुई कहानी हुई तो बीच में बोलेंगे ।‘’
‘‘ठीक है ! ये कहानी मैं तुम लोगांे को पहली बार सुना रही हूं ।’‘
‘‘मम्मी क्या कहानी भी झूठ-मूठ की और असली की भी होती है ?‘’ छुटके ने सीरियस होकर पूछा था।
ओफ्फो ! सच ही तो पूछा था मगर . .. . .
क्या कहानी भी असली होती है ? मेरा दिमाग फिर सोच के दायेरे में फंसा देख दोनों बड़े भाई जल्दी से छुट्टू पर बरसने लगे।
‘‘चुप रहो, गुल्लु ! देखते नहीं, फिर कहानी रुक गई।’‘
‘‘बस ! ये ही तो पूछ रहा हूं के क्या कहानी असली होती है ?‘’ गुल्लु नहीं मानता, उसे जब सच में ही किसी बात का उत्तर चाहिये तो वह इसी प्रकार सीरियस हो जाता है।
‘‘बेटे कहानी सच्ची-झूठी दोनों तरह की होती हैं। अपने लिये उनमें कुछ शिक्षाएं भी होती हैं। पर ये कहानी बिल्कुल असली है जो मैं अब सुनाने जा रही हूं।’‘
कहाँ से शुरु करुं ! मेरे मन में रील सी चल रही है, आज से करीब 35-40 वर्ष पहले ही रील। अनेक शुरुआतें सामने आ रही है इस कहानी की जो मेरी मम्मी ने मुझे अनेक बार सुनायी थी। मगर, ये कहानी कहाँ थी ? ये तो एक वास्तविक घटना थी जिसे मैं आज बच्चों को किसी अनसुनी कहानी की तरह सुनाने जा रही थी। तो ये शुरुआत ठीक रहेगी ‘‘एक मम्मी थीं, एक पापा थे . . . . ’‘
‘‘हें हें, राजा-रानी जैसी कहानी लग रही है . . . . .’‘
‘‘नहीं-नही, ये वैसी कहानी नहीं, एक मम्मी-पापा थे उनकी दो छोटी-छोटी बेटियां थीं पापा थानेदार थे, मम्मी हाउस वाइफ थीं।’‘
‘‘थानेदार क्या ?‘’ गुल्लु ने फिर टोका।
आज की शहरी बच्चों की पीढ़ी थानेदार को बहुत अच्छी तरह नहीं जानती, मैंने उसे जब थानेदार के बारे में बताया तो वह फिर बोला -‘‘अच्छा ! तो पुलिस बोलो न !‘‘
‘‘हां चलो वही, पापा पुलिस में थे। अक्खड़, ंिबदास, निडर, ढीठ, जिद्दी, गुस्सैल और भी जैसे उन दिनांे अंग्रेजांे के जमाने के कई वर्षों बाद तक पुलिस वालों का जो रंग-ढंग था, वैसे ही सारे गुण उनमें थे। एक वह गुण उनमें अलग से था, जिसे ईमानदारी और कत्र्तव्यनिष्ठा कहा जाता है, जो तब भी ‘रेयर’ था। आज भी ‘रेयर’ है, उन्हें इसी ‘गुण’ के कारण छः-छः महीनों में ट्रांसफर झेलना पड़ता था। सी.आर. बिगड़ती थी, प्रमोशन रुके पड़े रहने का डर तो खैर था ही। एक इसी ईमानदारी के कारण जो कि प्रायः गुण के स्थान पर अवगुण ही अधिक समझ लिया जाता है, उन्हें कई परेशानियां उठानी पड़ती थीं, तब भी ऐसा ही था, आज भी व्यवस्था ऐसी ही है।’‘
‘‘मम्मी आगे बढ़ो न ! कहानी बोर लग रही है, समझ में कुछ नहीं आ रहा। आप तो लेक्चर जैसा ़ ़ ़ ’‘
सच था, मैं पिछली यादों में खो, बड़ी-बड़ी बातों के चक्कर में उलझ अनावश्यक रुप से कहानी को बच्चों के लिये बोर बनाए दे रही थीं।
‘‘ठीक है ! अब बीच में कुछ बोर नहीं। केवल कहानी कहती हूं, हां तो मैं कहाँ थी ?’‘
‘‘पापा पुलिस में थे, पुलिस जैसी खराब होती है वैसे ही . . . . ’‘
‘‘ना . . . , ये मतलब कैसे निकाल लिया तुमने ? न तो पुलिस खराब थी न पापा खराब पुलिस थे। वे एक अच्छे मगर सख्त थानेदार थे। शहर में अपराधियों के साथ सख्ती की तो उनका ट्रांसफर शहर से दूर एक छोटे से गांव से कर दिया गया . . . सुन रहे हो न तुम लोग ?’‘
‘‘मम्मी साफ-साफ कहो न कि कहानी शहर की है या गांव की ?’‘ बड़े बेटे ने पूछा, उसे भी बोर कर रही थी मैं।
‘‘बेटू कहानी गांव में घटी, वहाँ . . . . जब पापा ने ज्वाइन किया तो अफीम की खेती वाले उसे एरिया में अफीम की स्मग्लिंग जोर-शोर से होती थी, आज भी होती होगी . . . ’‘
‘‘मौसी आप बस कहानी पर कंसट्रेट करो . . . . ’‘
‘‘अच्छा लो बाबा ! आदत से लाचार हूँ न ! प्रोफेसर जो ठहरी, क्या करुं ? हां, तो तब अफीम का एक स्मग्लर था। खान या शायद पठान, अपन सुविधा के लिए उसे पठान कहेंगे। पूरे इलाके के लोग डरते थे उससे। तब पुलिस वालों के पास घोड़े हुआ करते थे। गांव-शहर के रईस, रुतबे और शान-शौकत पसंद लोग भी बढ़िया नस्ल के घोड़े रखते थे। पठान के पास कई अच्छे घोड़े थे। जैसे आज कारें स्टेट्स-सिंबल होती है, वैसे तब घोड़े स्टेट्स-सिंबल हुआ करते थे। पापा के पास भी एक शुद्ध अरबी नस्ल का ऊँचा-पूरा सफेद घोड़ा का जिसके माथे पर गहरे भूरे रंग का . . . . . ’‘
‘‘भूरा रंग कैसा होता है मम्मी ?’‘ छुटके ने फिर टोका।
‘‘अरे हां, भूरा रंग यानि ब्राउन, डार्क ब्राउन टीका था उसके माथे पर !’‘
‘‘मम्मी-पापा और सईस उस दिलखुश नाम के घोड़े का खूब ख्याल रखते। जैसे आज तुम लोग कार से, बाइक से राउंड लगाने जाते हो, तब दोनों बच्चियां बारी-बारी से उस घोड़े पर सवारी करती थीं, उसके बाद ही पापा को जाने देती थीं।’‘
‘‘फिर . . . . . ?’‘
फिर . . . . ! मैंने पाया कि बच्चे कहानी में इंटरेस्ट ले रहे हैं, मुझे भी कुछ उत्साह हो आया।
‘‘फिर एक दिन वही हुआ जो आखिर एक न एक दिन तो होना ही था। पठान के खिलाफ बहुत रिपोर्ट मिलती थी। पर ़ ़ ़ सबूत के अभाव में वह आजाद ही घूमता था। उसने थानेदार पापा के सामने भारी भरकम रिश्वत की पेशकश भिजवायी, जिसे उन्होनंे आदतन अस्वीकार कर दिया।’‘
‘‘पुरानी कहानी है इसलिय पुराने-पुराने वड्र्स हैं !‘’ बच्चे कुछ शब्द नहीं समझ पाने की वजह से खुस-फुस कर रहे थे ।
‘‘ठीक है भई नए शब्द लेती हूं। उसके खिलाफ कोई प्रू्फ नहीं था इसलिए उसे पकड़ा नहीं जा सकता था, पर एक दिन आखिर वही हुआ . . . . एक दिन पठान अपने काले घोड़े पर और पापा अपने सफेद घोड़े पर आमने-सामने टकरा ही गए !‘‘
‘‘सलाम है थानेदार साहब को !’‘ पापा ने ऊपर से नीचे उसे घूरा और सलाम के जवाब में केवल लंबी सी ‘‘हूँ . . . . ‘’ कह कर सिर हिलाया। थोड़ी देर कांईयां से सिर हिलाते उसे घूरते रहे। वह भी कम न था। दो-दो हाथ करने के मूड में था। बोला . . . . ‘‘बड़े जलवे हैं सुना आपके, बंदे को अंदर करके ही मानेंगे सुना है !‘’
‘’क्यों नहीं पठान ? आज के बाद उल्टी गिनती गिनना शुरु कर दे . . . ‘’ पापा ने घोड़े का सिर थपथपाते हुए पुलिसिया रुआब से कहा।
‘‘वो तो ठीक है हुजुर ! मगर घर में थानेदारनी साहिबा को ंिबदी और चूड़ी का तो शौक होगा . . . ’‘ पठान बहुत तल्खी से पेश आ रहा था, ना, ना पुराने शब्द नहीं, ‘वह एकदम टाॅटिंग वे में बात कर रहा था . . . . ‘‘
‘‘चुप बे ! चूड़ी तो तेरे हरम में भी पहनी जाती है। मेरे घर में तो एक की ही चूड़ियां टूटेंगी। तू कितनियों की फुड़वाएगा बता दे अभी ही, ताकि किसी बेवाखाने में उनका एडवांस रजिस्ट्रेशन कराया जा सके . . . ’‘
‘‘बस ! बहुत हो गया हुजुर, आज तो दल-बल के साथ मिले हैं। कभी अकेले न निकल जाइयेगा। वरना सच ही थानेदारनी चूड़ियों को तरस जाएगी !’‘
थानेदार पापा ने फिर एक गुस्साई गाली दी और दांत पीसते हुए कहा - ‘‘अबे भिड़ना है तो खुद भिड़ ! औरतों को बीच में लाने वाले को मैं भिड़ने के लायक नहीं समझता . . . ‘’ दांत पीसते थानेदार को भर नजर घूरता रहा पठान, उसकी आँखों में खून उतर आया था, ठीक है, यह तय रहा कि या तो अब आप रहेंगे या मैं रहूंगा’ और . . . ‘‘सुन ले छोकरे ! क्या तुझे आप-आप कर रहा हूँ ? क्या उमर और क्या हैसियत है तेरी मेरे सामने ? जितना तू सरकार से लेता है उससे दोगुना तो मैं अपने सईस को देता हूं। अब उसकी तनख्वाह और बढ़ा दूंगा क्योंकि जिस नस्ली घोड़े पर तू बैठा है वह समझ ले अब मेरे अस्तबल की शान बढ़ाएगा, क्योंकि ऐसे नस्ली घोड़े मुझ जैसे नस्ली लोगों के ही लायक होते हैं . . . . ’‘
‘‘तो अब तक क्यों कुत्ते की सवारी कर रहा है ? ले ले नस्ली घोड़ा तुझसे संभले तो !’‘
बात बढ़ती जाती थी। थानेदार पापा को अपराधियों से उलझने की आदत थी। ऐसे में उन पर अजमेर के मेयो काॅलेज की अपनी शिक्षा-दीक्षा का कोई असर न रह जाता था। सो वे झुकने को तैयार न थे। और पठान अब तक पैसे से पुलिस को खरीदता आया था। अतः वह भी झुकने को तैयार न था।
पापा के साथ कुछ कांस्टेबल और एक हेड कांस्टेबल थे। उन्होंने किसी तरह पापा को बात खत्म करने के लिये राजी किया और इस प्रकार उनका काफिला कुछ आगे बढ़ा। लेकिन पठान को बात चुभ गई थी। वह कहां रुकने वाला था ? वह पीछे-पीछे आया चुनौती देता हुआ सा बोला -‘‘थान्दार छोकरे ! तू समझ ले मेरे घोड़े पर सवारी कर रहा है। अब ये घोड़ा मैं लेकर रहंूगा। तेरी तो कहीं लाश भी नहीं मिलेगी। साल दो साल घोड़ा कहीं दूर रहेगा फिर इसे यहीं लाकर इसी पर बैठ कर अपना काम धंधा संभालूंगा - खूब !’‘
‘‘खूब ! ससुरे क्या छोकरे-छोकरे की रट लगा रखी है ? मेरी लाश की बात करने वाले मैं तेरा बाप साबित होउंगा। तेरी लाश जरुर तेरे जनानखाने में भिजवा दूंगा। किसी की मिट्टी खराब करने में मेरा यकीन नही। हां तेरे पीछे तेरी बेवाओं की गिनती करने जरुर अपने दल-बल के साथ जाऊंगा . . . . !’‘
इस तरह की फजूल की बातों में उलझते-उलझते वे दोनों आखिरकार अपने-अपने रास्ते चले गए, गुस्से में दांत किटकिटाते हुए से। पापा ने साथ वालों को सख्त मना कर दिया कि वे घटना की चर्चा किसी से न करें !
‘‘सर हेड आॅफिस तो खबर किये देते हैं, वहां से थोड़ी और फोर्स आ जाएगी। ये तो सीघे-सीधे आपको जान से मारने की धमकी दे गया है। इसी आधार पर इसे धरा जा सकता है .... ’‘
‘‘नहीं ! कोई मुंह नहीं खोलेगा, यही मेरी रणनीति है . . . ’‘
अड़ियल थानेदार का हुक्म था, सो मुंह बंद रहे। लेकिन एक फिक्रमंद कांस्टेबल ने मम्मी को थोड़ा-बहुत बता कर अपना फर्ज पूरा कर ही दिया। मम्मी ने भी उससे वादा किया कि वे उसका नाम समय आने से पहले ’थान्दार साब’ को मालूम नहीं पड़ने देंगी। वरना बिचारे की खैर नहीं थी।
‘‘अब मम्मी को चिंता के सागर ने घेर लिया। क्या करें ? पूजा-पाठ, भक्ति प्रार्थना के अलावा ? थानेदार कई-कई बार आकेले दौरे पर निकल पड़ते, जरुर पठान से मुठभेड़ की उम्मीद में . . . । पठान उन पर जुनून के जैसे सवार हो गया था। मम्मी पीछे से कुछ फासला रखते हुए पापा के पीछे कुछ विश्वस्त सिपाहियों को भी जरुर भेजतीं, वो थानेदार के आॅर्डर और गुस्से की परवाह किये बिना भी जाते, ऐसे लोग हुआ करते थे पहले . . . ‘’ कहानी कुछ रोकी मैंने, देखा तीनों बच्चे भय-मिश्रित हैरत में आंखें और होंठों को गोल किये पूरी तरह कहानी के क्लाईमेक्स का इंतजार कर रहे थे, उनकी कल्पनाओं में वो निःसंदेह वह सब घटित होते देख रहे थे जो मैं सुना रही थी। बात कहानी सुनते हुए सोने की हुई थी यहां तो तीनों जागने के लिये मुस्तैद दिख रहे थे।
‘‘हां तो आगे क्या हुआ मम्मी ?’‘ बड़ा बेटा बेहद बेसब्र था।
‘‘क्या थानेदार पापा को पठान ने मार डाला मौसी . . . ?’‘ मंझलू मरने-मारने की बात से घबराया दिख रहा था।
‘‘ना, ना, ना ! ऐसे थोड़े ही ना हुआ कुछ। पूरी कहानी तो सुनो पहले, अब दिन हो कि रात हो। पापा बस पठान के पीछे साए की तरह लग गए। कहां-कहां की मुखबिरी कैसे-कैसे ईनाम के लालच, कैसी-कैसी पुलिस दस्तों की तैनाती आए दिन होती। पर पठान था कि माल इधर-उधर करके सांप सा सरक लेता। उसे ढूंढना भूसे के ढेर में सुई ढूंढने के जैसा हो गया। यहां तक कि उसका कोई एक गुर्गा तक न पकड़ा ना सका ! पापा पर ‘ऊपर’ से दबाव आने लगा। अफसर सोचने लगे कि थानेदार ने पठान से पैसा खा लिया है। इसीलिए लुका-छिपी का खेल दिखा रहे हैं दोनों ! ‘ऊपर’ से दबाव आने लगा कि पैसा इधर भी दो भई ! अकेले-अकेले खाओगे ?’‘
‘’मगर पापा पैसा खाते तो देते ! एक तरफर पठान से झड़प का बेतहाशा इंतजार, दूसरी तरफ अफसरों से बिन बुलायी झड़पंे। पापा का पारा आसमान पर रहने लगा। स्टाॅफ की मुसीबत हो गई। पापा कहें कि कोई तो पठान की तरफ मिल गया है जो पुलिस की अगली चाल उस तक पहुंचा देता है। मगर इसका भी कोई सबूत नहीं मिला पा रहा था।
‘‘मम्मी सबूत माने प्रुफ ना ?’‘ छुटकू नींद आने के पहले की ऊंघती सी स्थिति में आ गया था फिर भी ध्यान से सुन रहा था।
‘‘हां बेटा वही . . . मम्मी की रातों की नींद और दिन का चैन सब गायब ! लेकिन पापा को अपनी धुन के आगे किसी से कोई मतलब नहीं रहता था। मम्मी सोचतीं कभी-कभी, कि ऐसे जिदैले लोगों को घर नहीं बसाना चाहिये।‘‘
मगर सोचने से क्या होता है ? घर तो बस ही चुका था, न जाने कब कैसे तिनका-तिनका बिखर जाएगा। बस् यही देखना बाकी बचा था क्या ? उनकी चिंताओं का ओर-छोर नहीं था।
‘‘अब आती हूं असली बात पर, जिसे सुनाने के लिये ही तुम लोगों को इतना बोर किया . . . । ‘’
कहानी ने यद्यपि बहुत उत्सुकता जगायी थी फिर भी बच्चे नींद की बाहों में दिख रहे थे। जल्दी से खत्म करती हूं कहानी वरना कल फिर पूरी सुनने की जिद करेंगे।
‘‘एक गर्म चिलचिलाती दोपहर थी वह। गर्मी ही गर्मी, ऐसी गर्मी कि बस हाल-बेहाल थे। थानेदार का क्वार्टर थाने से कुछ दूर पर था। वहां मम्मी अपनी दोनांे नन्ही बच्चियों और एक बूढ़े से चैकीदार के साथ लगभग अकेली सी ही हालत में थी। चैकीदार बगीचे का काम निपटा कर खाना-वाना खाकर ऊंघ रहा था। थाने के घड़ियाल पर ड्यूटी वाले कांस्टेबल ने दो के घंटे बजाए और तेज धूप की चिलक से बचने वह भी थाने के अंदर जा बैठा, हो सकता है वह भी ऊंघने की तैयारी में हो !’‘
‘‘खाना खा कर नींद तो कुछ-कुछ मम्मी को भी आ रही थी। रातों को दहशत में जागती थीं। हल्की सी आहट पर भी उठ बैठती थीं। इसलिये दिन में थोड़ी आंख लग जाया करती थीं। अभी जरा मम्मी की आंख लगी ही थीं कि किसी के भागते-घिसटते कदमों की आवाज ने उनकी लगती नींद उड़ा दी। धड़ाक् से दरवाजा बंद हुआ। लोहे की मोटी जंजीर नुमा सांकल लगने की कर्कश आवाज सुन पड़ी। जोरों से धड़क कर सीने से बाहर निकल पड़ने को बेताब होते ह्दय को संभालने की कला मम्मी अब तक बड़ी अच्छी तरह सीख चुकी थीं। वे झट से उठीं और बेडरुम के पल्ले जरा खोल बाहर झांकती हैं तो देखती हैं कि चैकीदार जोर-जोर से सांस लेता, बाहर बरामदे की ओर खुलने वाला दरवाजा बंद कर, वहीं बैंठक कक्ष में, दरवाजे के पास बैठा, भारी गठरी सा हिलता-डुलता अपने किसी ईष्ट देव को बेतहाशा याद किये जा रहा था। मरा ! मगर अंदर कैसे चला आया ? मम्मी को गुस्सा आने लगा--‘‘
‘‘क्या है रे चैकीदार ?’‘ गुर्राती आवाज में पूछा उन्होंने, लेकिन चैकीदार के जवाब देने के पहले ही घोड़े की बढ़ी चली आ रही टापों ने स्थिति को अजीब सा रहस्यमय बना दिया। निःसंदेह वे टापों की आवाजें अपने घोड़े की नहीं थीं। वो अलग तरह के स्ट्रोक थे। मम्मी धक्क् !
चैकीदार अधमरा सा हो गया ‘‘ब् ब्बाई, बाई सा . . . प . . प... प ठान !’‘
वह घबराहट से बेहोश ही न हुआ बस्। मम्मी के काटो तो खून नहीं ! पहले आज की तरह फोन वगैरह भी नहीं थे। बाकी क्वार्टर भी दूरी पर थे। थाना भी इतनी दूर था कि गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाएं तो भी शायद ऊंघते कांस्टेबल की नींद न खुले। और यदि नींद खुल भी जाए तो क्या गारंटी कि उसकी हालत चैकीदार जैसी या और भी उससे बुरी न हो रहेगी ?
चैकीदार की हालत देख कर सुनसान वीरान दुपहरी में निपट असहाय वे भी भयभीत हो गई, डर संका्रमक होता है। एक से दूसरे को फेलता है। मम्मी को मानो घिघ्धी बंध गई। मैंने थोड़ा रुक कर देखा कि बच्चे अभी पूछेंगे कि ये घिध्घी बंधना, ये संका्रमक क्या होता है ? लेकिन उन्होंने नहीं पूछा कुछ। वे तो सो गए थे डरे-डरे से। पसीने से उनकी गरदन के नीचे नाइट शर्ट गीली हो चुकी थी। ए.सी. का ब्लोअर उनकी तरफ स्थिर कर मैंने उनके चेहरों पर गौर किया। डर से तने हुए चेहरे, आंखे कस कर बंद, दांत भ्ंिांचे हुए से। अवश्य ही डर उन पर हावी था। मैंने उनके पसीना भीगे बालों में अंगुलियां फिराई, थोड़ा उनके चेहरे थपथपाए, थोड़ा उन्हें प्यार किया ताकि वे डर के साए से मुक्त हो कर सो सकें।
अब उनकी मुखमुद्रा कुछ नार्मल लगी।
आश्वस्त होकर कि वे अब अच्छी नींद में हैं, नाइट लैंप आॅफ करने के लिये मैं बेड स्विच को दबाना ही चाहती थी, कि बड़कू ने हाथ थाम लिया। वह फुसफुसाया . . . . ‘‘मम्मी कहानी पूरी करो ! मैं सुनना चाहता हूं !‘’ नींद में दिखता हुआ सा वह पूरी तरह सोया नहीं था।
‘‘आगे क्या हुआ मम्मी ? क्या सच में पठान आ गया था ?’‘
‘‘नानी कैसे बचीं ? जल्दी से बताओ ना !’‘
अपनी ननिहाल इंदौर से कुछ ही घंटे की दूरी पर किशोर कुमार के खंडवा शहर में मेरी चार साल की पोस्टिंग के दौरान वह नानी का बहुत करीबी हो गया था। मुझसे अधिक नानी ने उसे संभाला था सो नानी से ज्यादा अटैच्ड था वह। उसकी बेताबी मैं महसूस कर सकती थी।
मुझे अपनी स्मृतियों के उसी माहौल में फिर से जाना पड़ा जहां आगे खुला बरामदा, पीछे पांच फुट ऊंचाई की कंपाउंड वाॅल से घिरा आंगन और इनमें बीच कुल जमा तीन छोटे-छोटे कमरों व रसोई वाले थानेदार के मकान के तरतीब से सजे साफ-सुथरे मेहमान कक्ष में हक्की-बक्की मेरी मम्मी बेहाल हो चुके चैकीदार के सामने खड़ी थीं। घोड़े की सधी हुए टापें एक क्षण को खामोश हुईं, फिर उसकी बैचेनी का तबला वादन सा प्रस्तुत करने लगीं। घोड़ा खड़ा नहीं रहना मांग रहा था। इधर-उधर हो रहा था बैचेन-अधीर घोड़ा !
‘‘कोई है ?‘’
एक निहायत खुरदुरी मगर ठेठ रौबीली आवाज गूंज मचाती हुई मेहमान कक्ष तक आ कर फर्श पर ओंधे से घुटनों के बल पड़े चैकीदार से कुछ कदम दूरी पर बुत सी बनी खड़ी मम्मी को झुरझुरी दे गई। वे बताती थीं कि ‘‘बेटा बोलना चाहूं तो आवाज ही न निकले ! ऐसी हालत, घिघ्धी बंधना क्या होता है तब पता चला।’‘
‘‘अरे कोई है ? कहाँ छिपा है थानेदार ? !!!‘’
पठान फिर दहाड़ा, जुझारु महिला थीं मम्मी। स्थितियों से लड़ने-भिड़नेे का अनुकूल साहस वे अपने में ले ही आती थीं। क्षण-क्षण साध रही थीं खुद को, सोचती हुई कि सारे पूजा-पाठ, सारी प्रार्थनाओं के सफल या असफल होने की घड़ी आ ही गई न आखिर! मुश्किल घड़ियों में दिमाग बड़ी तेजी से काम करता था उनका। पास की खिड़की की दरार में, आलमारी में मैकिनटोश के नीचे, फर्श पर कालीन के चारों कोनों में, कई गुप्त ठिकानों पर कई दिनों पहले से नए-नए ब्लेड छिपा कर रख छोड़े थे उन्होंने, कि यदि कोई बुरी स्थिति आ ही जाए तो, सामने वाले से यदि जीता न जा सके तो उसे खुद पर भी राई-रत्ती जीत हाँसिल न हाने दें। वे ब्लेड काम में लाए जाने का मौका आज आ गया दिखता था। खिड़की में रखा ब्लेड अंगुलियों में दबाते ही उनकी बंद जुबान में जैसे ताकत लौटने लगी . . . दूसरे, थानेदार को गांव भर में ‘थान्दार सा’ के अलावा ‘थान्दार’ मात्र कह कर पुकाने का दुस्साहस करने वाला चाहे कोई भी शख्स हो मम्मी के गुस्से की गिरफ्त में आने लगा . . . । फिर भी उन्होंने भरसक तमीज से जवाब दिया।
‘‘वे तो नहीं हैं घर पर !’‘
‘‘हूं . . . ! कहां गया है ?‘’
’‘भर दुपहरी हमारे में मर्द लोग अपने-अपने काम-काज की जगह पर मिलते हैं घरों में नहीं !’‘ थीं तो आखिर वे भी अक्खड़, पुलिस वाले की बीबी सो उठाया और दाग दिया बात-गोला ! थोड़ा अचकचा गया पठान, जवाब नहीं सूझा उसे एकबारगी।
टप्. . . टप् टप् की बेचैनी भरी लय थमी नहीं थी ।
अब यह लय खिड़की के पास से गुजरते हुए बेडरुम और उसके पास किचन, फिर पीछे आंगन का चक्कर लेती जान पड़ती थी।
कहीं सोई बच्चियां न जग जाएं ! ़ ़ ़ और कहीं थानेदार ही न आ जाएं किसी काम से घर वापस ! धक्-धक् कलेजा हो रहा था, तो एकदम चैकन्ने कान मम्मी के, उस टप् टप् पर जा चिपके थे मानो ।
हाय राम ! कहीं आंगन का पिछला दरवाजा खुला न रहा गया हो !
पठान पूरा चक्कर लगा रहा था मकान का कि कहीं शायद पीछे घोड़ा बंधा हो। न घर में घोड़ा था न घोड़े का सवार। दोनों का घर में होना न होना प्रायः साथ-साथ ही होता था। पठान पूरे घाघपन से तस्दीक कर रहा था . . . उसकी तस्दीक पूरी हुई। न तो घर में घोड़ा था न घुड़सवार।’
‘‘मम्मी बहुत धीरे-धीरे सुना रहे हो . . . ।’‘ बेटू की बैचेनी बढ़ी जाती थी। नानी के लिये खासा चिंतित था वह।
‘‘जब पठान ने जान लिया कि वाकई वे वहां दोनों नहीं है तो . . . ’‘
‘‘तो मम्मी ?’‘
‘‘वह फिर से घर के सामने बरामद के पास आ खड़ा हुआ क्योंकि घोड़े की टापों की आवाजें मम्मी को वहीं से आती सुन रही थीं। घोड़े को काबू में करता पठान बोला . . . ‘‘इंशा अल्ला ! आज उसका दिन मुबारक था जो वो इस वक्त घर पर नहीं है . . . ’‘
बेतहाशा गर्मी से परेशान थमा हुआ घोड़ा . . . और उसका सवार शायद उससे भी ज्यादा परेशान था। अपने मकसद में कामयाब न होने से और भीषण गर्मी से भी . . . .
‘‘मुझे प्यास लगी है, बड़ी मेहरबानी होगी अगर थोड़ा पानी का बंदोबस्त करा देंगी किसी चैकीदार से . . . ?’‘
‘चैकीदार’ शब्द सुनते ही अर्ध मूचर््िछत से चैकीदार को जैसे करंट सा लगा। वह जोर-जोर से कांपने लगा। मम्मी सहमी हुई तो थीं मगर वह सोच कर कि कम से कम ये खतरा आज तो टले यहां से, जल्दी से चैकीदार को बोलीं . . .
‘‘जा रे पानी दे कर आ . . . ’‘
‘‘नी बई सा ! नी जाउं हूं तो ! मरी जउं पन नी जउं !’‘
हें ! कैसा अवज्ञाकारी चैकीदार है ये ! पानी पिलाने में इसे मौत आ रही है। उसने पानी मांगा है तो देना ही होगा ना ? चलंू मैं ही लाए देती हूं। जाए तो ये बला जल्दी से, कहीं ऐसा न हो कि इसी बीच घर का मालिक ही आ जाए। तब तो अनर्थ ही हो जाएगा। यही सोचती मम्मी अपनी पूरी ताकत समेट रसोई की तरफ लपकीं और सबसे ठंडे मटके से एक ग्लास भरा . . . फिर उन्हें ख्याल आया कि एक ग्लास के बाद उसने दुबारा मांगा तो ? उन्होंने झट से एक बड़ा मुरादाबादी चित्रकारी किया गया खूबसूरत लोटा पूरा भरा और जल्दी-जल्दी चैकीदार के पास आ कर समझाने के स्वर में बोलीं . . . .
‘‘ले उठ तो ! दे दे जरा . . . ! देख मैं तो बाहर वालों से परदा करती हूं !’‘
मगर कुछ असर नहीं पड़ा था चैकीदार पर, ‘‘आप मारी लाखो जद भी नी उठी संकू हूं तो !’‘ वह तो वहीं और पसर गया। ‘‘आप भी मती जाओ बई सा, वा आपणा ने मारी लाखेगा। आप तो बईरा (स्त्री) हो। साब का दुस्मण है वा, कजने कंई करेगा ! मती जाओ बसा, मती जाओ . . . ’‘ फुसफुसाते चैकीदार ने किसी भी तरह मम्मी का आदेश नहीं माना।
अब क्या करें मम्मी ? द्वार पर खड़ा था प्यासा बैरी ! कहीं बिना पानी और बिगड़ गया तो ! और फिर है तो द्वार खड़ा मेहमान। ऐसी गर्मी में बिना कहे पानी का अधिकारी .... जबकि वह तो खुद हो कर पानी मांग रहा है तो उसे कैसे पानी न दें ? यहां तक जब पानी ले आई हैं तो ... डर भी लग रहा था। एकमात्र ब्लेड के सहारे क्या कुछ बिगड़ पाएंगी वे उसका ? आज कहीं सचमुच ही दीनो-दुनिया खोने का समय तो नहीं आ गया .... ? हे किशन ! ये जान तेरी ही दी हुई है तू ही आना इसे ले जाने !
मन ही मन प्रार्थना करती मम्मी ने दिल कड़ा किया। लोटा संभाला, दरवाजे की ओर बढ़ सांकल को उसकी कुंडी से उतार ही तो दिया। चैकीदार तो अब बोल भी नहीं पा रहा था। बस् हाथों को ना, ना की मुद्रा में हिलाता मना किये जाता था, पर मम्मी ने सांकल उतार दरवाजा इतना ही खोला कि लोटा भर बाहर रखा जा सके और कहा .......
‘‘लो भैया पानी !’‘
उनका एक हाथ पानी के लोटे को संभाले दरवाजे के बाहर था। दूसरे हाथ से पूरी ताकत से वे दरवाजे को दुबारा बंद करने को तत्पर थीं। सुनसान दुपहरी में मम्मी को अपनी ही आवाज अजीब तरीके से गंूजती लगी ‘लो भैया पानी !’ इधर उन्होंने पानी से भरा लोटा देहरी के पार रखा उधर चट से दरवाजे को बंद कर सांकल चढ़ाने में देर न लगाई।
पठान घोड़े से अदब से उतरा, रास थामे-थामे सीढ़ियां चढ़ बरामदे में आया। दुनाली को दीवार के सहारे टिका कर रखा। उसे बरामदे के अधखुल दरवाजे से एक पल के लिये दिख पड़ा था गोरा चिट्टा चूड़ियों भरा हाथ और पानी से भरा बेल-बूटोंदार लोटा साथ ही सुन पड़ा था ‘लो भैया पानी’
जितने अदब से वह वहां तक पहुंचा था उससे भी कहीं ज्यादा अदब से उसने पानी से भरा लोटा थाम लिया। इधर लोटा उसने थामा, उधर मम्मी दरवाजे के पीछे से गिन रही थीं मानों --- गट् ....गट् ..... गट् मम्मी गिनती सी रहीं जैसे, पूरा भरा लोटे का ठंडा पानी उसके गले से नीचे उतर गया।
लोटे को वहीं दरवाजे के पास रख दुनाली फिर से उठाकर कंधे पर लटकाई उसने और कहा ‘‘शुक्रिया !’‘ वह समझ रहा था कि अभी लोटे की वापसी के लिये दरवाजा नहीं खुलेगा। बराम्दा पार कर तीन सीढ़ियां उतर वह उछल कर घोड़े पर जा बैठा। जरुर अच्छा भारी-भरकम हट्टा-कट्टा रहा होगा वह। क्योंकि जैसे ही वह उछल कर घोड़े पर जा बैठा, उसी की जोड़ का घोड़ा बड़े जोर से हिनहिनाया !
मम्मी तो पल-पल गिन रही थीं कि यह जाए। जल्दी जाए। ऐसा लग रहा था उन्हें मानो वह वहां अरसे से खड़ा था।
‘‘आप उससे मेरी तरफ से एक दरख्वास्त कर दीजियेगा ... बेटू दरख्वास्त यानि रिक्वेस्ट हां, कि मैं .... आया तो दुश्मनी के इरादे से था, पर आज आपने जो मुझे भैया कह दिया है ....मैं अब दुश्मनी कायम नहीं रख पाऊंगा।’‘
मम्मी को यकीन नहीं आया कि वो सब क्या सुन रही है !
वो घोड़े को मोड़ता हुआ फिर बोला ‘‘अब आप मेरी बहन हैं तो ठहरा बहनोई। मेरी अब उससे दुश्मनी नहीं, अलबत्ता वो चाहे तो अपनी तरफ से दुश्मनी निबाहे .....’‘
मम्मी की नसों से रुकता-अटकता खून फिर से दौड़ने लग पड़ा ! ये क्या सुना था उन्होंने ! क्या खतरा टल गया था ? उनकी तो आदत थी प्रायः हर किसी छोटे-बड़े को ‘भैया’ कह कर पुकारने की .... यू.पी. की आम महिलाओं की तरह ....
‘‘शुक्रिया ... ! अलविदा बहन ...’‘ वो रौबदार आवाज खौफ को तोड़ती, घोड़े की दूर जाती टापों के साथ गुम होती चली गई।
अब चैकीदार जल्दी से उठा खड़ा हुआ। उसकी चेतना लौट आई। साँकल चैक की। अपने कपड़े-लत्ते झाड़े, कुछ शरमाया अपनी हालत पर ... और मम्मी ? .... उन्हें तो यकीन ही नहीं आ रहा था कि क्या हो गया !
‘‘मम्मी चले गए न अंकल पठान ? नानी को कुछ ‘हार्म’ नहीं किया ना उन्होंने ? फिर नानाजी को भी परेशान नहीं किया ना ?’‘ बेटू ने बेसब्री से पूछा।
मैंने नोट किया कि हम भारतवासियों के खून में पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह शै है कि हम आत्मीय रिश्ते क्षण भर में बना लेते हैं। इसी से पठान बिना कोई खुराफात किये लौट गया और इधर इतने अर्से बाद... मेरे बेटे ने ‘पठान’ के लिये ‘अंकल’ शब्द का प्रयोग करने में पल भर भी नहीं बरबाद किया।
‘‘फिर और क्या हुआ मम्मी ?’‘
‘‘कुछ नहीं बेटा, बस इतना ही मम्मी बताती थीं कि जब तक तुम्हारे नानाजी उस जगह रहे पठान ने उनके इलाके में वारदात नहीं की और.....’‘
‘‘और नानाजी ने भी उनको नहीं पकड़ा ना ?’‘
‘‘अ ? हाँ शायद ! लेकिन शायद क्योंकि वो उनके इलाके में कुछ करता ही न था तो ‘पकड़ते कैसे ?’‘
‘‘नहीं मम्मी मुझे लगता है नानाजी ने भी.....’‘
‘‘छोड़ो इसे .... अब सो जाओ .... कहानी खत्म पैसा हजम !’‘
लेकिन ़ ़ ़
बेटू फिर से पूछ रहा था ‘‘मम्मी लास्ट क्वेश्चन !... ‘‘क्या ये कहानी थी या सचमुच की कोई घटना ? सच-सच कहना मम्मी।’‘
मेरे बेटे को तो मैं यकीन दिला चुकी हूं कि ये मेरी इमेजिनेशन नहीं थी, बल्कि मेरी मम्मी के साथ घटी खरे सोने-सी सच्ची एक घटना थी ! आप को यकीन न आए ऐसा तो इसमें कुछ नहीं..... !


शा जे योगानंदम छत्तीसगढ़ महाविद्यालय,
रायपुर, छ ग।
मो : 7987798613, 895994611
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