-राहुल लाल (कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ)


चीन नई अंगड़ाइयाँ लेते हुए अब शी जिनपिंग युग में प्रवेश कर चुका है।माओ युग तथा डेंग शियापिंग के बाद अब चीन अपने तीसरे युग शी जिनपिंग युग में प्रवेश कर विश्व को चुनौती दे रहा है। चीनी विधायिका(संसद) ने रविवार को एक ऐतिहासिक संविधान संशोधन करते हुए राष्ट्रपति पद के लिए दो कार्यकाल की सीमा समाप्त कर वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग को दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश पर आजीवन शासन करने का अधिकार प्रदान कर दिया। 64 वर्षीय शी जिनपिंग इस माह दूसरी बार अपने पांच वर्ष के कार्यकाल की शुरुआत करने वाले हैं और हाल के दशकों में सर्वाधिक शक्तिशाली नेता हैं,जो सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना और सेना प्रमुख हैं।वह संस्थापक अध्यक्ष माओत्से तुंग के बाद पहले चीनी नेता हैं,जो आजीवन सत्ता में बने रह सकते हैं।इसका आशय है कि शी जिनपिंग तब तक चीन के राष्ट्रपति बने रहेंगे,जब तक वह अवकाश नहीं लेंगे या उनका निधन नहीं हो जाता।माओ भी इसी तरह 1949 से 1976 तक मृत्युपर्यंत चीन के सत्ता पर काबिल रहे हैं।इसी के साथ एक दलीय राजनीति वाले देश में तानाशाही से बचने के लिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा पालन की जा रही सामूहिक नेतृत्व प्रणाली खत्म हो गई है।अब चीन में सत्ता एकदलीय प्रणाली से एक निरंकुश नेता के शासन की ओर बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है।
चीनी संसद नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ने दो तिहाई बहुमत के साथ संविधान संशोधन को पारित कर मौजूदा राष्ट्रपति के जीवनपर्यंत पद पर बने रहने का रास्ता साफ कर दिया है।राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के लिए महज दो कार्यकाल की अनिवार्यता को समाप्त करने के लिए चीनी पीपुल्स कांग्रेस के 2,963 प्रतिनिधियों में से 2,958 प्रतिनिधियों ने विधेयक के पक्ष में,जबकि केवल 2 ने विरोध किया।मतदान के दौरान तीन प्रतिनिधि अनुपस्थित थे।प्रस्ताव के विरोध के 2 मत भी केवल दिखावे के ही विरोध को प्रतिबंबित करता है।
1982 में चीन के संविधान में बदलाव के द्वारा चीनी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के लिए अधिकतम 2 बार ही चुने जाने का प्रावधान किया गया था।डेंग
शियाओ पिंग ने तब यह बदलाव चीन को निरंकुश शासन से बचाने के लिए किया था।यद्यपि उस समय चीनी राष्ट्रपति का पद उतना शक्तिशाली नहीं था।1990 के दशक में चीनी राष्ट्रपति का पद तब बहुत महत्वपूर्ण हो गया,जब 1993 में डेंग शियापिंग ने जियांग जेमिन को राष्ट्रपति पद के साथ साथ,कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव और कमीशन इन चार्ज ऑफ मिलिट्री का चेयरमैन बनाकर अपना उत्तराधिकार सौपा।डेंग यह भी चाहते थे कि जियांग अनिश्तिकाल तक राष्ट्रपति न बने रहें।इसी कारण उन्होंने हु जिनताओ को भी उत्तराधिकारी के रुप में प्रमोट किया था।2002 में जियांग के बाद हु जिनताओ चीन के राष्ट्रपति भी बने।
इस तरह डेंग शियापिंग जहाँ लगातार उत्तराधिकारियों को पनपने दे रहे थे,वहीं शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षा पिछले वर्ष चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 19 वीं बैठक में ही स्पष्ट दिख रही थी।अक्टूबर 2017 में जब खुद को सर्वशक्तिमान बनाते हुए शी जिनपिंग ने अपनी टीम घोषित की थी,तभी जिनपिंग ने अपने उत्तराधिकारी का संकेत न देकर महत्वाकांक्षी इरादों को स्पष्ट कर दिया था कि अभी वे टिककर चीन की दिशा-दशा तय करते रहेंगे।शी ने ऐसी टीम चुनी है जिसमें कोई उनको चुनौती देता नजर नहीं आता है।पिछले 5 वर्षों में उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के तहत लगभग सभी ऐसे नेताओं को या तो अनुशासन के डंडे से हाशिये पर डाल दिया या फिर उन्हें वफादार बनने पर मजबूर कर दिया।अक्टूबर 2017 में ही 19 वीं सीपीएम बैठक के पूर्व पोलित ब्यूरो के सदस्य सू चंगसाए को राष्ट्रपति शी के खिलाफ साजिश करने की वजह से अचानक से सभी पदों से हटाया गया,जबकि माना जा रहा था कि 2022 में चिनफिंग के बाद वही चीन की कमान संभालेंगे।लेकिन स्टेडिंग कमेटी पिछले वर्ष के नए सदस्यों के चुनाव से स्पष्ट था कि पार्टी 2022 में नेतृत्व के लिए फिलहाल किसी को तैयार नहीं कर रही है।
इससे स्पष्ट है कि रविवार 11 मार्च 2018 को चीनी संसद ने अचानक से शी जिनपिंग के आजीवन राष्ट्रपति बनने के लिए संविधान संशोधन नहीं किया है,अपितु लंबे समय से इसकी तैयारियाँ चल रही थी।चीन का पहला संविधान 1954 में लागू हुआ था,परंतु वर्तमान संविधान डेंग शियापिंग ने 1982 में लागू किया , जिसमें अब तक 1988,1993,1999 और 2014 में चार बार संशोधन हो चुके हैं।परंतु रविवार के इस संविधान संशोधन ने पूरे चीनी एक दलीय शासन प्रणाली के प्रकृति को ही परिवर्तित कर शी जिनपिंग को सर्वशक्तिमान बना दिया।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 19 वीं बैठक में न केवल शी जिनपिंग को अगले राष्ट्रपति का कार्यकाल दिया गया,अपितु शी जिनपिंग के विचारों को चीनी संविधान में जगह दिया गया।माओ और डेंग शियापिंग के बाद शी जिनपिंग ऐसे तीसरे चीनी नेता हैं,जिनके विचारों को चीन के मूल संविधान में जगह दिया गया है।चीनी संविधान में शी जिनपिंग के विचारों को"जिनपिंग थॉट"के रुप में जगह दिया गया है।पाँच साल पर होने वाले कम्युनिस्ट पार्टी के सम्मेलन के अंत में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर पार्टी संविधान में चिनफिंग की अवधारणा"नए युग के लिए चीन की विशेषताओं के साथ समाजवाद"को शामिल किया गया।इससे पहले पद पर रहते हुए केवल माओ का नाम ही संविधान में शामिल किया गया,जबकि डेंग का नाम उनकी मृत्यु के बाद 1997 में शामिल किया गया था। इस परिघटना के बाद शी जिनपिंग का कद चीन में कितना ऊँचा हो गया,उसे इसी से स्पष्टत:समझा जा सकता है कि शी जिनपिंग थॉट अब चीन के करोड़ों छात्र अनिवार्य पाठ्यक्रम के अंतर्गत पढ़ेंगे।पूर्व चीनी नेताओं हू जिंताओ और जियांग जेमिन के सिद्धांत इसमें शामिल किए गए लेकिन उनका नाम शामिल नहीं किया गया।
2012 में 18 वीं कांग्रेस से पार्टी की कमान संभालने वाले वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग माओ के तरह शक्तिशाली हो गए हैं।ली घरेलू और बाहरी मामलों के कई सुपर कमीशनों के चैयरमैन हैं।वे
राष्ट्रपति के अतिरिक सीपीसी और सेना प्रमुख भी हैं।
जिनपिंग ने पिछले 5 वर्षों में चीनी सेना को पुनर्गठित किया और उसे खुद के प्रति ज्यादा निष्ठावान बनाया।

भारत के लिए चुनौती---
शी जिनपिंग का सर्वशक्तिमान रुप भारत और के विश्व के लिए गंभीर चुनौती है।2014 से 2017 तक भारत-चीन संबंध काफी उथल पुथल से भरा है।इसमें डोकलाम विवाद,अरुणाचल विवाद और चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा प्रमुख है।इसके अतिरिक्त भारत के धुर विरोधी पाकिस्तान के आतंकवादी मसूद अजहर को बार-बार वीटो से बचाकर भी चीन ने आतंकवाद के विरुद्ध भारत के लड़ाई के धार को कुंद करने में कोई कमी नहीं की।एशिया में चीनी प्रभुत्व को चुनौती देने का दमखम सिर्फ भारत में है।यही वजह है कि चीन का रवैया भारत के प्रति आक्रामक है।इस संदर्भ में चीन के पाकिस्तान के प्रति मित्रता,नेपाल में अचानक सक्रियता,स्ट्रिंग्स ऑफ पर्ल की नीतियों को देख जा सकता है।भविष्य में हिंद महासागर और लाइन ऑफ कंट्रोल पर चीन अपनी ताकत दिखा सकता है।पाकिस्तान आर्थिक तौर पर चीन पर निर्भर होता जा रहा है,जो ठीक नहींं।जिनपिंग को ताकत मिलने के बाद चीन भारत के पड़ोसी देशों में दखल बढ़ाने की कोशिश करेगा,जिससे भारत को नुकसान हो सके।
आर्थिक मदद और विकास का लालच देकर चीन ने भारत के उन पड़ोसियों पर भी डोरे डालने शुरू कर दिए,जिनकी सीमा भारत से लगती है।इस रुप में चीन के नेपाल से लेकर बांग्लादेश में अपनी पैठ मजबूत कर ली है,जिसमें अब और भी वृद्धि संभावित है।म्यांयामार के क्याकप्यू में भी चीन बंदरगाह बना रहा है।चीन ने डोकलाम के 73 दिनों के पिछले वर्ष के गतिरोध के बाद अब पुनः विवादित क्षेत्र से कुछ दूरी पर हैलीपेड तथा अन्य निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया है।इससे चीनी आक्रामकता को समझा जा सकता है।
चीन को भी समझ लेना चाहिए कि वह लंबे समय तक विकास के नाम पर निवेश के बहाने छोटे देशों के संप्रभुता से नहीं खेल सकता।अगर उसकी साम्राज्यवादी विस्तार की छवि बनी रहेगी,तो चीन को काफी नुकसान उठाना होगा।यही कारण है कि शी जिनपिंग को पार्टी संबोधन में कहना पड़ा कि चीन से किसी को डरने की जरूरत नहीं है।
दक्षिण चीन सागर में शी जिनपिंग ने जिस तरह आक्रमक तरीके से दो तिहाई हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया,बिल्कुल उसी रणनीति को अपनाकर चीन हिंद महासागर में भी वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।दक्षिण चीन सागर में चीन कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर अथवा वेधशाला का निर्माण कर अपने कब्जे को विस्तार देता रहा है।उसी तरह अब हिंद महासागर में वह छोटे-छोटे देशों से द्वीप खरीद रहा है।चीन मालदीव में वेधशाला निर्माण की तैयारी भी कर रहा है,जिससे वह हिंद महासागर में भी दक्षिण चीन सागर के तरह वर्चस्व स्थापित कर सके।ज्ञात हो दक्षिण चीन सागर में चीन ने अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण के फैसले और विश्व समुदाय के भारी आलोचना के बावजूद अपना अवैध कब्जा हटाया नहीं है,अपितु इसे आगे ही बढ़ाया है।भारत के लिए आवश्यक है कि वह भी हिंद महासागर में आक्रामक नीति को क्रियान्वित करे तथा मालदीव में जल्द से जल्द सुप्रीम कोर्ट को फिर से पुनर्स्थापित कर लोकतंत्र की रक्षा करते हुए,वहाँ चीनी प्रभाव को कम करे।ऐसे में भारतीय नेतृत्व को चीनी आक्रामक विदेश नीति से निपटने के लिए खुद को जल्द से जल्द तैयार करना होगा।

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