--अंकित कुंवर (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

भारतीय लोकतंत्र में संसद को लोकतंत्र का मंदिर कह कर पुकारते हैं। आय दिनों संसद में नोक-झोंक, बहसबाजी, व्यंग्य विनोद और तर्क वितर्क जैसी कार्यवाहियों को अंजाम दिया जाता है। ये सभी कार्यवाहियां संसद की कार्यशैली को जीवंत बनाती हैं। इन सब के मध्य संसद के प्रांगण में देश के विभिन्न क्षेत्रों के सांसद अपनी क्षेत्र विशेष की समस्याओं को लेकर अपनी बहसबाजी शुरू कर देते हैं। यह बात लाजमी है कि संसद में तर्क-वितर्क और बहसबाजी के परिणामस्वरूप ही कोई निर्णय सटीक एवं सुयोग्य होता है। किंतु व्यवधान उत्पन्न होने से संसद में गतिरोध या अवरोध की स्थिति बन गई है। संसद की सबसे बड़ी विशेषता है कि सदन का सुचारू रूप से चलना। अब यह एक अपवाद है। पिछले दो-तीन हफ़्तों में हर 30 मिनट एवं 1घंटे के अंतराल पर सदन की कार्यवाही स्थगित हुई है, यहां संसद की गरिमा पर प्रश्न चिह्न लगाने के साथ हमें संसद की गरिमा पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। यदि भारतीय संसद की तुलना विश्व के अन्य संसदों से की जाए तो हमारे समक्ष निष्कर्ष निकाला है कि भारतीय संसद में वार्षिक बैठकों और कार्यवाहियों का समय बहुत कम है। भारत की संसद में मात्र 64 दिन 337 घंटे काम होता है जो कि अन्य देशों की संसद के तुलना में कम है। यदि 15वीं लोकसभा की बैठक पर गौर करें तो मालूम होता है कि कुल 357 बैठकें हुई जिसमें 1344 घंटे में मात्र 483 घंटे सदन की कार्यवाही चली। लगभग 75 फीसदी समय सदन को स्थगित और अवरोध करने में बर्बाद हुआ। संसद में अवरोध की राजनीति को बनाए रखने के लिए सत्तापक्ष के असंतुष्ट सदस्यों ने संसद में पोस्टर और बैनर की प्रदर्शनी लगानी शुरू कर दी। यह वाकई संसद की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला कदम हैै।

वर्तमान सत्र में अवरोध और टकराव के कारण मंत्रिमंडल में अविश्वास प्रस्ताव को लोकसभा अध्यक्ष ने यह कहकर नाकार दिया कि सदन व्यवस्थित नहीं है, वहीं दूसरी ओर सदन में लंबित वर्ष 2018-19 के विधयकों पर तर्कसंगत चर्चा किए बिना उन्हें पारित कर दिया गया। आखिरकार ऐसा कब तक चलता रहेगा। संसद में जनता के ज्वलंत मुद्दों पर बहस होनी चाहिए न कि धरना-प्रदर्शन। देश के कोने-कोने से आए जनता के प्रतिनिधि अर्थात सांसदों को अपनी सोच दलीय एवं राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि तक सीमित न रखते हुए राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि समझने की आवश्यकता है। यदि संसद में उपस्थिति सांसदों के क्रियाकलापों में राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता प्रदान है तो वह हित जनमत की आकांक्षाओं और आशाओं के अनुरूप होगा। भारतीय लोकतंत्र अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक दोंनो का समन्वित रूप है। इस लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व ही सबकुछ है। किंतु प्रतिनिधित्व का उद्देश्य तभी संभव है जब हमारे सांसद सरकार बनाने और चुनाव जीतने से उपर उठकर देश हित में कार्य करें। यदि संसद में अवरोध और टकराव की राजनीति से दूर रहकर जनमानस की आवश्यकताओं के अनुरूप बहसबाजी हो तो यह भारतीय लोकतंत्र की श्रेष्ठता को बनाए रखने में लाभदायक सिद्ध होगा अन्यथा धरना- प्रदर्शन, बेतुकी बातें और संसदीय प्रकियाओं का उल्लंघन भारतीय लोकतंत्र सहित संसद की आधारशिला को ठेस पहुँचाने में अग्रणी साबित होगा। अंततः संसद की गरिमा को बनाए रखने के लिए संसद में सारगर्भित और रचनात्मक चर्चा होनी चाहिए तथा अध्यक्ष महोदया के पास सदन में विश्वास अर्जित करने का संकल्प होना चाहिए तभी विश्व के समक्ष भारतीय लोकतंत्र अपनी सिद्धांतों और प्रकियाओं के आधार पर सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र का एकमात्र उदाहरण होगा।


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