-राहुल लाल (कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ)

सोवियत विघटन की त्रासदी झेलते रूस की अस्मिता जगाने वाले एवं रूसी पारंपरिक मूल्यों को पुनः स्थापित करने वाले पुतिन ने 6 साल के एक और कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति पद की शपथ ली।दो माह पूर्व हुए चुनाव में करीब 77 फीसदी वोट पाकर वह चौथी बार राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे।पुतिन ऐसे समय में चौथी बार राष्ट्रपति का पद संभाला है,जब रूस का पश्चिमी देशों के साथ टकराव चल रहा है।रूस की अर्थव्यवस्था नाजुक स्थिति में है और उनके कार्यकाल की समाप्ति के बाद क्या होगा,इसको लेकर भी अनिश्चितता है।
स्वास्थ्य और शराब के नशे की समस्याओं से जूझ रहे बोरिस येल्तसिन ने अगस्त ,1999 में पुतिन को देश का प्रधानमंत्री बना दिया और चेचन्या क्षेत्र में विद्रोहियों के दमन के लिए शुरु किए गए दूसरे युद्ध की देखरेख करने के साथ उनकी लोकप्रियता बढ़ गई। 31 दिसंबर 1999 को अर्थात नव वर्ष के एक दिन पहले जब येल्तसिन ने सनसनीखेज तरीके से इस्तीफा दिया,तब वर्ष 2000 में पुतिन दुनिया के सबसे बड़े देश के रूस के राष्ट्रपति बन गए।इसके साथ पुतिन ने न केवल रूस के सुसुप्त आत्मगौरव को जीवित किया,अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रूसी सक्रियता में अप्रत्याशित वृद्धि की।यूक्रेन के क्रीमिया क्षेत्र का रूस में विलय कराकर एवं सीरिया में हस्तक्षेप कर पश्चिमी देशों के साथ पुनः वर्चस्व की लड़ाई प्रारंभ कर रूसी शक्ति का प्रदर्शन किया।अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे पर उन्होंने तीन अमेरिकी राष्ट्रपतियों के कार्यकाल देखे तथा पिछले 4 सालों से फोर्ब्स पत्रिका द्वारा दुनिया की सबसे ताकतवर हस्ती करार दिए गए।
पुतिन के निकट सहयोगी दमित्री मेदवेदेव को मंगलवार को एक बार फिर भारी बहुमत से रूस का प्रधानमंत्री चुन लिया गया।संसद ने राष्ट्रपति पुतिन के लंबे समय से सहयोगी रहे मेदवेदेव को इस पद पर लाने के लिए व्यापक समर्थन दिया।मेदवेदेव की उम्मीदवारी के पक्ष में 377 सांसदों ने वोट किया,जबकि केवल 56 ने उनका विरोध किया।स्पष्ट है कि पुतिन ने रूस के आंतरिक राजनीति में बेहद मजबूत पकड़ प्राप्त कर ली है।मेदवेदेव 2008 से 2012 तक रूस के राष्ट्रपति रह चुके हैं,जबकि पुतिन रूसी संविधान द्वारा निर्धारित लगातार अधिकतम 2 कार्यकाल के चलते राष्ट्रपति नहीं बन पाए थे।इसके बाद एक समझौते के तहत पुतिन 2012 में पुनः राष्ट्रपति बन गए।
पुतिन का वर्तमान कार्यकाल 2024 में खत्म होगा।रूस के संविधान के मुताबिक पुतिन 2024 के बाद राष्ट्रपति पद का चुनाव नहीं लड़ सकते।मार्च में रूस में हुए चुनाव में 77% वोट लाने वाले पुतिन ने अभी तक अपने उत्तराधिकारी के चयन का कोई संकेत नहीं दिया है।ऐसे में संभव है कि यदि वे इसी तरह लोकप्रिय रहे,तो संविधान संशोधन कर 2024 में भी राष्ट्रपति चुनाव लड़ सकते हैं।2024 में नया कार्यकाल पूरा कर पुतिन स्टालिन के बाद रूस में सबसे अधिक समय तक सत्ता में रहने वाले नेता बन जाएंगे।

सीरिया में हस्तक्षेप कर न केवल मध्यपूर्व अपितु वैश्विक राजनीति में रूस को पुतिन ने महत्वपूर्ण बनाया---
पुतिन ने क्रीमिया का रूस में विलय प्रारंभ कर जहाँ यूरोप के साथ क्षेत्रीय संघर्ष को जन्म दिया,वहीं सीरिया में प्रत्यक्षतः हस्तक्षेप कर अमेरिका समेत संपूर्ण पश्चिम को स्पष्टतः कठोर संकेत दिया कि वे विश्व राजनीति में पुराने सोवियत संघ की तरह रूस को फिर से स्थापित करना चाहते हैं। 2011 के अरब स्प्रिंग से सीरिया में प्रारंभ हुए घरेलू असंतोष ने जब शीघ्र ही गृहयुध्द का स्वरूप ले लिया,तो मध्यपूर्व में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने के लिए पुतिन ने सीरिया में असद सरकार को मजबूती से समर्थन दिया।इस संघर्ष में रूस और अमेरिका आमने सामने आ गए।मध्यपूर्व में पश्चिमी देशों के मजबूत उपस्थिति के बीच पुतिन ने ईरान जैसे क्षेत्रीय शक्ति का भी भरपूर प्रयोग किया।वहीं अमेरिका,सऊदी अरब,फ्रांस,ब्रिटेन इत्यादि मित्र देशों की सेना तथा उनके समर्थकों को भी रूस ने सीरिया से बाहर कर दिया।सीरिया के अधिकांश हिस्से पर इस समय रूस समर्थित बसर अल असद का प्रभाव पुनः कायम हो गया है।वहीं पूर्वी गूटा के कुछ क्षेत्रों में बसर विरोधी विद्रोही संघर्ष की आखिरी कमजोर लड़ाई लड़ रहे हैं। इसके अतिरिक्त सीरिया द्वारा बार-बार रासायनिक हमले किए जाने के कारण रूस को अंतर्राष्ट्रीय आलोचनाओं का भी शिकार होना पड़ा।सीरिया प्रकरण में रूस ने अंततोगत्वा विश्व में अपना शक्ति प्रदर्शन मजबूती से कर ही दिया,जिसमें आखिरी लड़ाई में पश्चिमी जगत को रूस से पराजित होना पड़ा।

कोरियाई प्रायद्वीप में रूस द्वारा पश्चिम को चुनौती---
इसी तरह कोरियाई प्रायद्वीप में रूस और चीन उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन को अप्रत्यक्ष समर्थन प्रदान करके अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं।यही कारण है कि उत्तर कोरिया संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के कठोरतम आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद लगातार परमाणु एवं मिसाइल परीक्षण करता रहा।चीन और रूसी समर्थन के कारण एक समय तो कोरियाई संकट दुनिया में इतना गहरा हो गया था कि परमाणु युद्ध की भी प्रबल संभावना प्रारंभ हो गई थी।यही कारण है कि कोरिया संकट में भी अंततः अब अमेरिका को उत्तर कोरिया से शांति वार्ता के लिए तैयार होना पड़ रहा है।पुतिन अपनी इन्हीं रणनीतिक चतुराई के कारण वैश्विक स्तर पर रूस की भूमिका को पुनः स्थापित कर रहे हैं।इसी कारण पुतिन ने केजीबी अधिकारी से लेकर वैश्विक नेता बनने तक का सफर बखूबी निभाया है।

नव शीतयुद्ध की ओर दुनिया---
रूसी डबल एजेंट पर कैमिकल अटैक(नर्व एजेंट) करने के मामले में ब्रिटेन और रूस के बीच छिड़ी तनाव जल्द ही अमेरिका और रूस के बीच तनाव का सबसे कारण बन गया और दोनों देशों के संबंध लगातार बिगड़ते जा रहे ह़ै।दोनों देशों के बीच नव शीतयुद्ध की स्थितियाँ पैदा हो रही हैं।पुतिन के पुनः शक्तिशाली तरीके राष्ट्रपति बनने से इस मामले में रूस के रूख के कठोर रहने की संभावना जताई जा रही है।संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतानियो गुतारेस ने अमेरिकख और रूस के बीच तनाव के मद्देनजर दुनिया में शीतयुद्ध की याद दिलाने वाले दौर की ओर बढ़ने को लेकर गंभीर चिंता प्रकट की है।इस संपूर्ण मामले में किसी को उम्मीद नहीं थी कि पश्चिमी देश इस तरह की एकता का प्रदर्शन करेंगे।शीतयुद्ध के दिनों में जब जब तत्कालीन सोवियत संघ के साथ पश्चिमी देशों का तनाव चरम पर था,उसके बाद से राजनयिकों को इतने बड़े पैमाने पर निष्कासित किया गया है।पुतिन के शक्तिशाली होकर उभरने से इस तनाव में भी अप्रत्याशित वद्धि की संभावना है।

भारत के लिए मायने---
रूस और भारत में करीबी एक समृद्ध इतिहास रहा है,लेकिन पिछले 10 सालों में वैश्विक स्तर पर कई चीजें उलट-पुलट हुई हैं।इसी क्रम में भारत-रूस के मित्रता के आयामों में भी परिवर्तन आया है।पिछले माह ही पाकिस्तान के रक्षा मंत्री खुर्म दस्तगिर खान ने रूस की सरकारी मीडिया स्पूतनिक से कहा कि पाकिस्तानी सेना रूस से एसयू -35 लड़ाकू विमान और टी-90 टैंक खरीदने की योजना है।खान की यह घोषणा पाकिस्तान के पहले के रूख से बिल्कुल अलग थी।इस समय चीन - रूस गठबंधन में चीनी मित्रता के सहयोग से रूस और पाकिस्तान की भी मित्रता गहरी होती जा रही है।रूस और पाकिस्तान दोनों देश दक्षिण एशिया में अमेरिकी प्रभुत्व घटाना चाहते हैं तथा अफगानिस्तान में युद्ध का समाधान ढूढने के लिए साझी रणनीति के तहत काम करने के लिए इच्छुक हैं।रूस और पाकिस्तान के बीच बढ़ते संबंध न केवल अमेरिकी नीति निर्माताओं अपितु भारतीय नीति - निर्माताओं के लिए भी चुनौती है।इस संदर्भ में दिसंबर 2017 में नई दिल्ली में संपन्न रूस-भारत-चीन की संयुक्त त्रिपक्षीय बैठक कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण थी,जिसमें अमेरिकी निकटता के बावजूद भारत ने रूस और चीन से भी निकटतम संबंध रखने का प्रयास किया।अभी हाल ही में भारत-चीन के वुहान शिखर सम्मेलन में भी भारत के ऐसे ही प्रयासों को देखा जा सकता है।पिछले वर्ष जून में भारत-रूस के द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन द्वारा भी भारत-रूस के आपसी अविश्वास को घटाने के प्रयत्न किया गया।इस तरह भारत-रूस संबंध अब भी जीवंत है।भारतीय नीति निर्माताओं ने अब तक इस चुनौती का मजबूती से सामना किया है,लेकिन बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत के लिए यह चुनौती और भविष्य में और भी गंभीर होने वाली है।

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