बाल मुकुंद ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)

विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर देश में सियासी हलचल शुरू हो गई है। आंध्र प्रदेश ने विशेष राज्य का दर्जा देने की अपनी पुरानी मांग को मनवाने के लिए एनडीए सरकार से अपने सम्बन्ध विच्छेद करने का फैसला किया है। बिहार ने भी विशेष राज्य की मांग उठाकर एनडीए का सिरदर्द बढ़ा दिया है। झारखण्ड पहले से ही आंदोलनरत है। देश में 2019 में लोकसभा चुनाव होने है। राजनीतिक दल इसका लाभ लेने के लिए केंद्र पर दबाव बना रहे है। केंद्र की हालत यह हो रही है कि उससे न उगलते बन रहा है और न ही खाते। वह धरम संकट में फंस गई है। अगला वर्ष चुनावी वर्ष होने से वह कोई सियासी संकट मोल लेने की स्थिति में नहीं है। आंध्र में लोकसभा के साथ ही चुनाव है और वहां के मुख्यमंत्री इसका फायदा उठाने के लिए काफी चाकचैबंध है। कांग्रेस के दोनों हाथ में लड्डू है। वह टीडीपी सांसदों के समर्थन में खड़ी होगयी है। सांसद काफी दिनों दे संसद परिसर में आंदोलनरत है। केंद्र ने आंध्र की मांग ठुकरादी है। केंद्र इस बात को भलीभांति जानता है की उसने किसी एक राज्य की मांग स्वीकार की तो देश में सियासी तूफान उठ खड़ा होगा। सरकार का कहना है कि फिलहाल किसी भी राज्य को विशेष दर्जा देने का कोई भी प्रस्ताव उसके विचाराधीन नहीं है। । वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह स्पष्ट कहा कि केन्द्र आन्ध्र प्रदेश को विशेष दर्जा प्राप्त राज्य के समकक्ष ही केन्द्र समर्थित योजनाओं में मौद्रिक लाभ देने के लिए तैयार है। यह अब राज्य सरकार को निर्णय लेना है कि वह किस प्रकार से इसे प्राप्त करना चाहती है।
विशेष श्रेणी राज्य की अवधारणा को पहली बार 1969 में शुरू किया गया था । शुरू में तीन राज्य- असम, नागालैंड और जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया था, लेकिन उसके बाद से आठ अधिक राज्य अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा और उत्तराखंड को इसमें शामिल किया गया है। देश के आर्थिक रूप से पिछड़े और जनजाति बहुल आबादी वाले पहाड़ी इलाके अथवा पड़ोसी मुल्क की सीमा से लगे हुए राज्य इसके अंतर्गत आते हैं।
देश के 11 राज्यों को विशेष राज्य की श्रेणी में रखा गया है जबकि बिहार, उड़ीसा, राजस्थान और गोवा सरकार से विशेष श्रेणी के राज्य का दर्जा दिये जाने का अनुरोध प्राप्त हुआ है। चार राज्यों ने इस विषय पर अनुरोध किया है। विशेष श्रेणी के राज्य का दर्जा संबंधी मुद्दा सबसे पहले राष्ट्रीय विकास परिषद की अप्रैल 1969 की बैठक में गाडगिल फार्मूला के अनुमोदन के समय सामने आया था। राष्ट्रीय विकास परिषद की ओर से कुछ राज्यों को विशेष श्रेणी के राज्य का दर्जा दिया गया है। किसी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने पर विचार के लिए कुछ मापदंड बनाये हैं ताकि उनके पिछड़ेपन का सटीक मूल्यांकन किया जा सके और इसके अनुरूप दर्जा प्रदान किया जा सके। इसके तहत अरूणाचल प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, सिक्किम, मणिपुर, मेघालय, नगालैण्ड, त्रिपुरा, उत्तराखंड और मिजोरम को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है। इन मापदंडों में उक्त क्षेत्र का पहाड़ी इलाका और दुर्गम क्षेत्र, आबादी का घनत्व कम होना एवं आदिवासी आबादी का अधिक होना, पड़ोसी देशों से लगे सामरिक क्षेत्र में स्थित होना, आर्थिक एवं आधारभूत संरचना में पिछड़ा होना और राज्य की आय की प्रकृति का निधारित नहीं होना शामिल है। इन मापदंडों को पूरा करने वाले राज्यों को केंद्रीय सहयोग के तहत प्रदान की गई राशि में 90 प्रतिशत अनुदान और 10 प्रतिशत रिण होता है। जबकि दूसरी श्रेणी के राज्यों को केंद्रीय सहयोग के तहत 70 प्रतिशत राशि रिण के रूप में और 30 प्रतिशत राशि अनुदान के रूप में दी जाती है। इसके साथ बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग जोर पकड़ रही है। बिहार के एक दल ने राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने के विषय पर जुलाई 2011 को प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन सौंपा और आठ सितंबर 2011 को एक अंतर मंत्रालयी समूह का गठन किया गया था।
भारतीय संविधान में किसी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने का प्रावधान नहीं है। लेकिन यह समझते हुए कि देश के कुछ हिस्से अन्य राज्यों की तुलना में संसाधनों के लिहाज से पिछड़े हैं, ऐसे राज्यों को केंद्र ने विशेष राज्यों का दर्जा देने का फैसला किया। नैशनल डिवेलपमेंट काउंसिल ने कई तथ्यों जैसे पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्र, कम जनसंख्या घनत्व या बड़ा आदिवासी बहुल इलाका, अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर से जुड़ी सीमा, प्रति व्यक्ति आय और गैर कर राजस्व कम के आधार पर ऐसे राज्यों की पहचान की। कुछ राज्य भौगोलिक एवं सामाजिक-आर्थिक विषमताओं के शिकार हैं। इन राज्यों में ज्यादा दुर्गम पहाड़ी इलाके होने और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित होने के कारण उद्योग-धंधा लगाना मुश्किल होता है। कुछ राज्य में बुनियादी ढांचा का घोर अभाव है और आर्थिक रूप से काफी पिछड़े हैं। ऐसे में ये राज्य विकास की रफ्तार में पिछड़ जाते हैं। विकास के मार्ग पर इन राज्यों को साथ लेकर चलने के लिए विशेष राज्य का दर्जा दिया जाता है।
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