-दीपक गिरकर (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

इस देश की धरती पर कई धर्मवीर, कर्मवीर, दानवीर, कलमवीर इत्यादि वीरों ने जन्म लिया और हमारे देश का नाम रोशन किया. अब इन इन दिनों बयानवीरों ने अपने बयानों से देश-विदेश में खलबली मचाई हुई हैं. पुराने जमाने में घर के बुजुर्ग लोग, समाज में समाज के सर्वेसर्वा और राजनीति में पार्टी के प्रवक्ता ही बयान देते थे लेकिन आजकल घरों में परिवार का हर सदस्य, समाज में हर सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीति में पार्टी के सभी नेता बयानबाज़ी में सबसे आगे रहते हैं. यों तो बयानबाज़ी सुर्ख़ियों में हमेशा से ही रही है लेकिन इन दिनों बयानवीरों की संख्या में काफ़ी वृद्धि हुई है इसके दो कारण है एक मीडिया जो कि इन बयानवीरों को सर-आँखों पर रखता है और दूसरा सोशल मीडिया. सोशल मीडिया के कारण सभी अपने आप को महाज्ञानी समझने लगे हैं. देश की सियासी पिच पर बेतुके बयानों का खेल चल रहा हैं. राजनीतिक पार्टी का एक नेता बयानों की ऐसी गुगली बॉलिंग करता है कि दूसरी राजनीतिक पार्टी का नेता क्लीन बोल्ड हो जाता हैं. लेकिन कभी-कभी ऐसी बॉलिंग पर अन्य राजनीतिक पार्टी का नेता बॉल को बाऊंड्री पार भी पहुँचा देता हैं. सत्ता के मद में नेता अपना धैर्य खो देते हैं. ये बयानवीर शब्दों के तीखे बाण चलाने में माहिर होते हैं. ये बयानवीर शब्दों के तीखे बाण चलाकर सामने वाले के मन को घायल कर देते हैं.
कुछ राजनीतिक पार्टियों के पास बयानवीरों की कमी हैं. इन राजनीतिक पार्टियों के नेता बयानवीरों को अपनी पार्टी में भर्ती करने का विचार कर रही हैं. एक राजनीतिक पार्टी जिसमें बयानवीरों की कमी है वह पार्टी बयानवीरों की भर्ती की जगह आऊटसोर्सिंग सेवाओं पर विचार कर रही हैं. बयानवीरों को बयानबाज़ी के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती हैं जबकि एक सांसद को किसी बिल पर संसद में सार्थक चर्चा करने के लिए काफ़ी मेहनत करनी पड़ती हैं. किसी विषय पर सार्थक चर्चा करने के लिए उस विषय का संपूर्ण ज्ञान होना आवश्यक हैं. लेकिन बयानबाज़ी के लिए विषय के ज्ञान की आवश्यकता नहीं हैं. इन बयानवीरों को राई का पहाड़ बनाने में महारत हासिल हैं. ज़ुबानी जंग और आरोप-प्रत्यारोप में ये बयानवीर काफी माहिर होते हैं. कौनसा भी मुद्दा हो इन बयानवीरों के बयानों के कारण मुद्दे को ही सुस्त होना पड़ता हैं.
माननीय बयानवीरों के अनर्गल बयान थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. मसालेदार बयानों का क्रम जारी हैं. तथाकथित बाबाओं को उम्र क़ैद की सज़ा होने के बाद भी ये बाबा बयान दे रहे है कि हम तो जेल में ही मजे करेंगे. सत्ता का नशा चढ़ कर बोल रहा हैं और इनको सत्ता का नशा इतना चढ़ जाता है कि इनके बयान मर्यादा लाँघ देते हैं. बयानवीरों का कोई दोष नहीं हैं. ये अपनी भावनाओं को काबू में नहीं रख पाते है और जोश-जोश में भावनाओं में बहकर ऐसे बयान दे देते है कि राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता को सफाई देनी पड़ती है कि बयानवीर ने जो बयान दिए है वे उनके स्वयं के विचार है और उनकी पार्टी के विचार इस तरह के नहीं हैं. बयानवीर अपने दिए गये बयान से कभी भी पलट सकते हैं. बयानवीर हमेशा बयानबाज़ी के बाद एक ही बात दोहराते है कि उनके बयान का ग़लत अर्थ निकाला गया हैं एवं उनकी मंशा किसी को दु:ख पहुँचाने की नहीं थी. कुछ बयानवीर तो इतनी अधिक बयानबाजी करते है क़ि वे स्वयं के दिए हुए बयान ही भूल जाते है और फिर अपने साथियों से ही पूछते है क़ि क्यां मैंने यह बयान दिया था? बयानवीरों की ज़बान बहुत लचीली होती हैं. यह आसानी से फिसल जाती हैं. ये बयानवीर कहना कुछ चाहते है लेकिन इस लचीली ज़बान के कारण और कुछ कह जाते हैं. बयानबाज़ी के बिना राजनीतिक पार्टी का काम भी तो नहीं बनता हैं. प्रजातांत्रिक देश में बयानबाज़ी के कौशल को विकसित करना हर राजनीतिक पार्टी की मजबूरी हैं. राजनीतिक पार्टी में उन्हीं नेताओं की पूछ है जो बयानबाज़ी में कुशल हैं. बयानवीर सभी दूरदर्शन चैनलों पर छाए रहते हैं. राष्ट्रीय स्तर पर तो बयानवीरों की कोई कमी नहीं है. आजकल तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी काफ़ी बयानवीर अपने धाँसू बयानों से अपनी उपस्थिति एवं अपने बयानबाज़ी के कौशल का अहसास करवाते रहते हैं.

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