-संजय रोकड़े
इन दिनों नरेन्द्र भाई मोदी की लोकप्रियता में जैसे-जैसे कमी आ रही है वैसे-वैसे अपने और पराएं दोनों उन पर हमलावर होते जा रहे है। हाल ही में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने यह कह कर मोदी के विरोध में अपना बयान जारी किया कि हमें कांग्रेस मुक्त भारत नही चाहिए। वहीं मोदी लगभग अपनी हर राजनीतिक सभा में इस बात को प्रमुखता से उठाते रहते है कि हमें कांग्रेस मुक्त भारत बनाना है। मोदी को आंखें दिखाने का काम केवल भागवत ही नही कर रहे है बल्कि आरएसएस के अनुशांगिक संगठनों ने भी केन्द्र सरकार के कामकाज में दखल देकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की परेशानियां बढ़ा दी है। हालाकि आमजन यह समझ नही पा रहा है कि मोहन भागवत का बयान देना और आरएसएस के सहयोगी संगठनों का मुखर होना क्या मोदी की नीतियों का विरोध है या हाल के दिनों में मोदी के प्रति आमजन में जो नाराजगी आई है उससे ध्यान हटाने का काम है। बहरहाल, मामला जो भी हो लेकिन मोदी यह जान गए है कि 2019 करीब है और ऐसे में अपने या पराए किसी को भी कोई मौका दिया तो आगामी राह आसान नही होगी। कहने का मतलब साफ है कि अब वे हर कदम फंक-फुंक कर उठाने लगे है। इसकी एक ताजा मिसाल मोदी के आगामी झारखंड़ दौरे को लेकर सामने आ रही है। सुना है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 मई को धनबाद जाने वाले है और उनकी यह यात्रा करीब-करीब फाइनल है। वे अपनी इस यात्रा के दौरान आईएसएम के दीक्षांत समारोह में शरीक होने के साथ ही सिंदरी कारखाना, पतरातू पावर प्लांट व एम्स का भी शिलान्यास करेंगे। बता दे कि उनकी इसी यात्रा में गोड्डा में प्रस्तावित अडाणी पावर प्लांट की आधारशिला रखने का कार्यक्रम भी था लेकिन यह रद्द कर दी है। पीएमओ ने इस पर सहमति नहीं दी है। सूत्रों के मुताबिक पीएमओ ने फिलहाल अडाणी पावर प्लांट का शिलान्यास यह कह कर टाल दिया कि सरकारी परियोजनाओं के साथ निजी कंपनियों का शिलान्यास उचित नहीं है। दरअसल, माजरा कुछ अलग है। पीएमओ द्वारा जो दलील दी जा रही है कि सरकारी परियोजनाओं के साथ निजी कंपनियों का शिलान्यास उचित नही है यह पूरा सच नही है। असल में सच तो यह है कि गौतम अड़ानी को लेकर प्रधानमंत्री मोदी पर कई तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे है। अतीत भी इस बात का साक्षी है कि मोदी ने भी कई मौकों पर खुल कर गृह प्रदेश का होने के नाते अड़ानी को लाभ पहुंचाया है। बहरहाल, मोदी और आड़ानी के संबंध में गड़े मुर्दे उखाडऩे के पहले हम यह जान ले कि आखिर पीएमओ आफिस की ऐसी कौन सी मजबूरी आन पड़ी की उसे आड़ानी के पावर प्लांट के शिलान्यास के लिए मना करना पड़ा। यह तो सब भली भांति जानते है कि आड़ानी को मोदी की सरपरस्ती में विकास की उडाऩ भरने का मौका मिला है। नरेन्द्र भाई की व्यक्तिगत मंशा नही होती तो शायद आड़ानी इतनी उचांइयों को छू नही सकते थे। आड़ानी के इस गोड्डा प्लांट को लेकर भी मोदी पर आउट आफ वे जाकर मदद करने के आरोप लगे है। बता दे कि यह प्रोजेक्ट वर्ष 2015 में प्रस्तावित था। 17 फरवरी 2016 को झारखंड सरकार के साथ एमओयू हुआ। लेकिन मई 2016 में ही नया प्रपोजल यह कह कर दिया गया कि कोयला इम्पोर्ट होगा। अप्रैल 2017 में आए एनवायरॉनमेंटल इम्पैक्ट एसेसमेंट के मुताबिक इस प्रोजेकट के लिए घरेलू कोयला मौजूद नहीं है, इसलिए बिजली अगर बांग्लादेश भेजनी है तो कोयला इंम्पोर्ट करना होगा। विवाद का फसाद यही से शुरू हो गया। हालाकि योजना गोड्डा प्लांट के लिए अडाणी के जितपुर कोल माइंस से कोयला देने की थी। इस प्रोजेक्ट को लेकर इतमीनान तो तब होता कि ये विवाद यही ठहर जाता लेकिन ऐसा नही हुआ और मुसीबत बढ़ गई। दुनिया में ऊर्जा क्षेत्र से संबंधित प्रोजेक्ट्स के आर्थिक-सामाजिक मापदंडों का अध्ययन करने वाली इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल
एनालिसिस (आईईईएफए) ने अनेक ऐसे खुलासे किए है कि मोदी इसके शिलान्यास से मना नही करते तो शायद सीधे-सीधे पीएम मोदी की व्हाईट कालर पर भी दाग लग सकते थे। इस रिपोर्ट में कई कमियां बताई गई है। इसमें अनेक ऐसे खुलासे भी सामने आए जो इस बात को इंगित करते है कि अड़ानी को मोदी की सरपरस्ती नही होती तो इस परियोजना में इतना झोल नही होता। सबसे पहले तो यह बात सामने आई कि अडाणी पावर बेहद आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। प्लांट शायद बने ही ना। गर बन भी गया तो बांग्लादेश के लिए न केवल महंगी बिजली पैदा करेगा बल्कि खतरनाक भी साबित होगा। बता दे कि अडाणी के इस प्लांट से बांग्लादेश को 8.71 रु. प्रति टका प्रति किलोवाट आवर के हिसाब बिजली मिलेगी। जबकि बांग्लादेश में ही 5 कंपनियां ऐसी हैं जो 3.24 से 7.78 टका प्रति किलोवाट आवर की दर से बिजली दे रही हैं। इसके साथ ही रिर्पोट में इस बात की शंका भी जाहिर की गई कि यह प्रोजेक्ट सिर्फ और सिर्फ अडाणी को ही फायदा दिलाएगा, बांग्लादेश देश के लोगों को नही। बताते चले कि गोड्डा प्लांट से बनने वाली 1600 मेगावॉट बिजली बांग्लादेश भेजी जानी है। रिर्पोट में इस बात को लेकर भी आगाह किया कि प्लांट 2022 से पहले उत्पादन शुरू नहीं कर पाएगा। जब अडाणी का यह पावर प्रोजेक्ट कर्ज में है तो समय पर इसके शुरू होने में भी अंदेशा है। सनद रहे कि मार्च 2017 में झारखंड की चीफ सेक्रेटरी ने कहा था कि जून में अडाणी का यह प्रोजेक्ट शुरू हो जाएगा, 18 महीनों में यह पूरा भी हो जाएगा। लेकिन अडाणी पावर कंपनी खुद यह मान रही है कि मई 2022 से पहले यह प्रोजेक्ट पूरा नहीं होगा। इसमें कोई दो राय नही है कि अडाणी पावर इस समय कर्ज के चलते परेशान है। आड़ानी पावर ने दिसंबर-17 में कहा था कि उसे 9 महीनों में 1513 करोड़ रु. का घाटा हुआ है। कंपनी पर 48 हजार करोड़ रु. का कर्ज है। इस बीच कंपनी ने यह भी माना कि गुजरात के मुंद्रा स्थित प्लांट से बिजली सप्लाई भी बंद है। काबिलेगौर तो यह है कि अडाणी इस प्रोजेक्ट का 51 फीसदी हिस्सा गुजरात सरकार को बेचने की तैयारी में है। इसलिए ऑडिटर्स को शक है कि कंपनी नया प्लांट बना पाएगी भी या नही। इसके साथ ही आईईईएफए की रिपोर्ट में पर्यावरणीय मुद्दों पर भी सवाल उठाए गए है। इसके मुताबिक भारत में 25 वर्षों के लिए कोई भी बिजली वितरण कंपनी पीपीए नहीं कर रही है। पच्चीस वर्षों के लिए कोयले पर चलने वाले प्लांट से पूरा इलाका बुरी तरह से प्रदूषित हो जाएगा। जबकि अभी देश में प्रदूषणरहित-सस्ती ऊर्जा की मुहिम चल रही है। इस रिर्पोट में इस बात की भी शंका जाहिर की गई कि आड़ानी इस प्लांट से केवल और केवल अपना भला करना चाहते है। इस प्लांट के सहारे ही वे ऑस्ट्रेलिया में मौजूद अपनी बदहाल कोयला कंपनी कार्मिकेल को फिर से खड़ा करना चाहते हैं। वे झारखंड के इस प्लांट में कोयला भी ऑस्ट्रेलिया स्थित अपनी बदहाल कंपनी से ही मंगाना चाहते है। कोयला समुद्र के रास्ते पहले ओडिशा के धामरा पोर्ट पर लाएंगे फिर धामरा से गोड्डा लाया जाएगा। धामरा- गोड्डा 700 किमी दूर है। फिर ट्रेन से कोयला प्लांट पर पहुंचाया जाएगा, जबकि, अडाणी के पास जितपुर कोल माइंस है। जो गोड्डा प्लांट से मात्र 16 किमी दूर है। समुद्री रास्ते से कोयला मंगाकर फिर उसे ट्रेन से प्लांट तक पहुंचाना कितना अक्लमंदी का काम होगा। बहरहाल यह सस्ता तो नही ही होगा। खैर। इन सब उलझनों, झंझावटों और अंशकाओं के बाद भी नरेन्द्र भाई मोदी अगर अड़ानी के इस पावर प्लांट को लोकार्पित करेगें तो उंगलियां उठना तो स्वाभाविक है। मोदी, उठने वाली इन्हीं उंगलियों के चलते अड़ानी के इस पावर प्लांट से दूरी बनाए रखे है। वैसे भी अड़ानी को लेकर अब तक मोदी पर अनेक आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे है।

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*लेखक मीडिय़ा रिलेशन पत्रिका का संपादन करने के साथ ही सम-सामयिक विषयों पर कलम चलाते है।

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